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 09 / 04 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *याद की गुप्त मेहनत की ?*

 

➢➢ *अपने मुह मियाँ मिठू तो नहीं बने ?*

 

➢➢ *सच्चाई सफाई की धारणा द्वारा समीपता का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *बिगड़े हुए को सुधारने की सेवा की ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  प्रयोगी आत्मा संस्कारों के ऊपर, प्रकृति द्वारा आने वाली परिस्थितियों पर और विकारों पर सदा विजयी होगी। *योगी वा प्रयोगी आत्मा के आगे ये पांच विकार रूपी सांप गले की माला अथवा खुशी में नाचने की स्टेज बन जाते हैं।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सहजयागी आत्मा हूँ"*

 

✧  सभी सहजयोगी आत्मायें हो ना। *सदा बाप के सर्व सम्बन्धों के स्नेह में समाये हुए। सर्व सम्बन्धों का स्नेह ही सहज कर देता है। जहाँ स्नेह का सम्बन्ध है वहाँ सहज है। और जो सहज है वह निरंतर है।* तो ऐसे सहजयोगी आत्मा बाप के सर्व स्नेही सम्बन्ध की अनुभूति करते हो? ऊधव के समान हो या गोपियों के समान? ऊधव सिर्फ ज्ञान का वर्णन करता रहा। गोप-गोपियाँ प्रभु प्यार का अनुभव करने वाली।

 

  *तो सर्व सम्बन्धों का अनुभव यह है विशेषता। इस संगमयुग में यह विशेष अनुभव करना ही वरदान प्राप्त करना है। ज्ञान सुनना सुनाना अलग बात है। सम्बन्ध निभाना, सम्बन्ध की शक्ति से निरंतर लगन में मगन रहना वह अलग बात है।*

 

*तो सदा सर्व सम्बन्धों के आधार पर सहयोगी भव। इसी अनुभव को बढ़ाते चलो। यह मगन अवस्था गोपगोपि यों की विशेष हैं। लगन लगाना और चीज है लेकिन लगन में मगन रहना यही श्रेष्ठ अनुभव हैं।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *अब मुख्य पुरुषार्थ यही करना है कि आवाज में आना जितना सहज है उतना ही आवाज से परे जाना सहज हो*। इसको ही सम्पूर्ण स्थिती के समीप की स्थिती कहा जाता है। जैसे बुद्धि से छोटा बिन्दु खिसक जाता है। ऐसे यह छोटा बिन्दु भी हाथ से खिसक जाता है।

 

✧   *जितना - जितना अपने देह से न्यारे रहेंगे उतना समय बात से भी न्यारे*। जैसे वस्त्र उतारना और पहनना सहज है कि मुश्किल? इस रीति न्यारे होंगे तो शरीर भान में आना, शरीर के भान से निकलना यह भी ऐसे लगेगा।

 

✧  *अभी - अभी शरीर का वस्त्र धारण किया, अभी - अभी उतारा*। मुख्य पुरुषार्थ आज इस विशेष बात पर करना है। जब यह मुख्य पुरुषार्थ करेंगे तब मुख्य रत्नों में आयेंगे। यह बिन्दी लगाना कितना सहज है। एसे ही बिन्दी रूप है जाना सहज है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *जैसे एक सेकंड में स्विच आन आफ किया जाता है, ऐसे ही एक सेकेण्ड में शरीर का आधार लिया और फिर एक सेकेण्ड में शरीर से परे अशरीरी स्थिति में स्थित हो सकते हो? अभी-अभी शरीर में आये, फिर अभी-अभी अशरीरी बन गये - यह प्रैक्टिस करनी है। इसी को ही कर्मातीत अवस्था कहा जाता है।* ऐसा अनुभव होगा। जब चाहे कोई कैसा भी वस्त्र धारण करना वा न करना - यह अपने हाथ मे रहेगा। आवश्यकता हुई धारण किया, आवश्यकता न हुई तो शरीर से अलग हो गये। ऐसे अनुभव इस शरीर रूपी वस्त्र में हो। *कर्म करते हुए भी अनुभव ऐसा ही होना चाहिए जैसे कोई वस्त्र धारण कर और कार्य कर रहे हैं। कार्य पूरा हुआ और वस्त्र से न्यारे हुए।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अपने को आत्मा बिंदु समझ बिंदु बाप को याद करना"*

 

_ ➳  *बिंदु समझ बिंदु बाप को याद करना... बिंदु अर्थात आत्मा, स्व स्वमान में स्थित हो बिंदु बाप को याद करना...* बाप भी बिंदु, बच्चे भी बिंदु... जैसा बाप वैसे बच्चे... तो वह जो है, जैसा है, उसे उसी रूप में पहचान और स्वयं भी उस समान स्थिति में स्थित हो, बाप को याद करने की *इस विधि को ही ज्वालामुखी याद कहेंगे...* फिर बाप ने भी कहा है, अब जहां जाना है वही आप स्वयं को स्थित कर मुझे बाप को याद करो, तो विकर्म विनाश हो तुम मेरे पास चले आएंगे... *मीठे बाबा की इन्ही स्मृतियों को स्मृति में रखते मैं आत्मा आ पहुंची हूं परमधाम में...*

 

  *मैं मीठे बाबा के सम्मुख, बाप मेरे सम्मुख, प्यार के सागर प्यार भरी दृष्टि देते मुझ आत्मा से बोले:-* "मीठी बच्ची... जिस प्रकार दो तारों से करंट पास करने लिए उन्हें जोड़ने से पहले, उनके ऊपर का रबड़ उतारना अति आवश्यक है, इसी प्रकार बाप से भी करंट लेने के लिए, *अब अपने ऊपर से देह अभिमान के रबड़ को उतारो... और निराकार मुझ बाप को याद करो..."*

 

_ ➳  *मीठे बाबा की मीठी समझानी को प्यार से समझते हुए मैं आत्मा बाबा से बोली:- "मीठे बाबा... आपके कहे अनुसार अब मैं आत्मा अपना ज्यादा से ज्यादा समय स्वयं को विदेही स्थिति में टिकाने में तत्पर हूं...* मैं जानती हूं बाबा, मुझ आत्मा को ऐसी स्थिति में घर वापस जाना है... *अगर स्थिति नहीं तो मैं आत्मा नहीं उड़ पाऊंगी, इसलिए बाबा आगे का सोच अभी अपने वर्तमान पुरुषार्थ पर तत्पर हूं..."*

 

  *मीठे बाबा रूहानी शक्तिशाली किरणें मुझ आत्मा में भरते हुए बोले:- "मीठी बच्ची... अगर तुम तत्पर हो, तो बाप भी तत्पर है, एक कदम तुम्हारा, 1000 कदम बाप के... जितना-जितना तुम विदेही स्थिति में स्थित होने का प्रयत्न करोगी... बाप भी फिर तुम्हें स्थिति में टिकने में मदद करेगा...* अब समय है खुद में शक्तियां भर हल्के बनने का... हल्की वस्तु ही आसानी से आसमान में उड़ पाती हैं..."

 

_ ➳  *मीठे बाबा से मिली शिक्षाओं को स्वयं में धारण करते मैं आत्मा बाबा से बोली:- "बाबा, मीठे बाबा... अभी पंख उड़ान भरने को तैयार हैं... अब कोई न देह, न संबंधों का बंधन है... न स्वयं के व्यर्थ संकल्पों का...* अब मैं आत्मा निरंतर स्वयं को बहुत हल्का, व्यर्थ से मुक्त विदेही स्थिति में स्थित देखती हूं... *मैं लाइट, लाइट के शरीर में रह अपना पार्ट बजा रही हूं..."*

 

  *मीठे बाबा प्यार भरी बौछार मुझ आत्मा पर करते बोले:- "मीठे बच्चे... बाप खुश है तुमसे, तुम कितनी भाग्यवान हो जिससे बाप, स्वयं भगवान प्रसन्न हैं! वाह तुम्हारा भाग्य!...* किसे प्रसन्न करने का सौभाग्य तुम्हें प्राप्त हुआ... तुम्हारे निरंतर पुरुषार्थ को देख, मुझे भी तुम्हारी संपन्न कर्मातीत अवस्था देखने में आती है..."

 

_ ➳  *मीठे बाबा के प्यार भरे शब्दों से गदगद होते मैं आत्मा बाबा से बोली:- "बस बाबा... अब आपने कह दिया, तो अब क्या देर... अब मैं सच में स्वयं को अपने संपूर्ण कर्मातीत अवस्था में, स्वयं को देख रही हूं... बस एक बिंदु मैं और एक बिंदु बाबा स्मृति है, दूसरा ना कोई...* बाबा यह अवस्था कितनी आनंदमय हैं... बाबा तुम सचमुच आनंद के सागर हो, जिसकी मैं प्यासी हूं..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पावन बनने का उपाय है अपने को आत्मा बिन्दी समझ बिन्दु बाप को याद करना*"

 

_ ➳  कितनी महान सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा जिसे भगवान ने स्वयं आकर अपना यथार्थ परिचय दिया। जिस भगवान को महा मण्डलेश्वर साधु सन्यासी बेअन्त कहते रहे उसने स्वयं आकर सारे उलझे हुए प्रश्नों को सुलझा कर अगम अगोचर के सारे भेद खोल दिये। *मैं आत्मा हूँ, परम पिता परमात्मा की सन्तान, एक छोटा सा स्टार सर्व गुणों सर्वशक्तियों से सम्पन्न हूँ मेरे इस यथार्थ  स्वरूप का मुझे अनुभव करवा कर मेरे प्यारे पिता ने मेरे अंदर फैले अज्ञान अंधकार को मिटाकर ज्ञान का सोझरा मेरे जीवन मे कर दिया*। जैसे मैं आत्मा बिंदी हूँ वैसे मेरे पिता भी बिंदी है किन्तु गुणों में सिंधु के समान है। उनका यह यथार्थ परिचय पाकर मन को जैसे एक सुकून मिल गया है।

 

_ ➳  जिस भगवान को दुनिया भिन्न - भिन्न नामों और रूपों से याद कर रही है उसे यथार्थ रीति कोई नही जानता इसलिए उससे आज दिन तक दूर हैं। *अपने उस बिंदी बाप को मैंने कितना सहज रीति जान लिया और उसे यथार्थ बिंदी रूप में जानकर याद करने से कितनी अखुट प्राप्तियों की मैं अधिकारी आत्मा बन गई। मेरे जैसा भाग्यवान इस संसार मे ओर कोई नही जो स्वयं भगवान बाप बन मेरी पालना कर रहें हैं*। ईश्वरीय गोद मे मैं पल रही हूँ यह विचार कर, मन ही मन अपने भाग्य का गुणगान करते हुए, अपने प्यारे पिता का मैं दिल से कोटि - कोटि शुक्रिया अदा करती हूँ जिन्होंने करोड़ो आत्माओं में से मुझे चुना और अपना यथार्थ परिचय देकर अपना बच्चा बना लिया। 

 

_ ➳  अपने यथार्थ स्वरूप में टिक कर, बाप जो है जैसा है उसे उसके यथार्थ बिंदी स्वरूप में याद करके, *सेकेण्ड में पदमों की कमाई जमा करने के लिए, अपने यथार्थ बिंदी स्वरूप में अब मैं स्वयं को स्थित करने के लिए मन बुद्धि को सभी दुनियावी बातों से हटाकर पूरी तरह अपने मस्तक पर एकाग्र करती हूँ*। स्वयं को मैं देह से न्यारी आत्मा निश्चय करती हूँ और पूरी एकाग्रता के साथ इसी संकल्प में टिक जाती हूँ। *सेकण्ड में मेरा सत्य स्वरूप एक अति सूक्ष्म प्वाइंट ऑफ लाइट के रूप में भृकुटि पर चमकता हुआ मुझे स्पष्ट अनुभव होने लगता है*।

 

_ ➳  देख रही हूँ मैं अपने उस अति सुंदर, लुभावने सतोगुणी स्वरूप को जो सुख, शांति, पवित्रता, प्रेम, आनन्द, ज्ञान और शक्ति से सम्पन्न, एक अति सूक्ष्म स्टार के रूप में भृकुटि के अकालतख्त पर विराजमान हो कर चमक रहा है। *इस चमकते हुए चैतन्य सितारे में से निकल रही प्रकाश की रंग बिरंगी किरणें मेरे चारों और शक्तिशाली वायब्रेशन्स फैला कर मुझे असीम तृप्ति का अनुभव करवा रही हैं*। स्वयं से निकल रहे रंग बिरंगे प्रकाश की एक - एक किरण को निहारते, अपने अनादि सत्य स्वरूप का भरपूर आनन्द लेकर अब मैं भृकुटि की कुटिया से बाहर आ जाती हूँ और अपने आस पास की वस्तुओं को साक्षी होकर देखने लगती हूँ। *अपने आस पास की हर वस्तु यहाँ तक कि अपनी देह के आकर्षण से भी मैं पूरी तरह मुक्त हूँ। इन सबके बीच में होते हुए भी मैं जैसे इनसे न्यारी और प्यारी हूँ*।

 

_ ➳  मन को आनन्दित करने वाले अपने अति न्यारे और प्यारे स्वरूप का अनुभव करते - करते अब मैं मन बुद्धि के विमान पर बैठ, अपने बिंदी बाप से मिलने उनके धाम की ओर चल पड़ती हूँ। एक खूबसूरत रूहानी यात्रा पर निरन्तर आगे बढ़ते हुए, आकाशमण्डल को पार कर सूक्ष्म वतन से होती हुई उससे भी परे मैं पहुँच गई हूँ अपने प्यारे पिता के पास उनके परमधाम घर में।  *देख रही हूँ मैं अपने पारलौकिक बिंदी बाप को अपने बिल्कुल सामने एक ज्योतिपुंज के रूप में। उनके पास जाकर, उनकी सर्वशक्तियों की अनन्त किरणों की छत्रछाया के नीचे बैठ अब मैं उनके स्नेह की शीतल फुहारों को अपने ऊपर बरसता हुआ स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ*। बाबा की सर्वशक्तियों की अनन्त किरणें निरन्तर मेरे ऊपर प्रवाहित होकर, मेरी सोई हुई शक्तियों को पुनः जागृत कर रही हैं। और मुझे सर्वशक्तियों से सम्पन्न बना रही हैं। 

 

_ ➳  अपने बिंदी बाप से यथार्थ मिलन मना कर, परमात्म स्नेह और परमात्म शक्तियों से भरपूर होकर मैं आत्मा अब वापिस साकारी दुनिया में लौट रही हूँ। अपने साकार तन मे प्रवेश कर भृकुटि पर विराजमान होकर अब मैं देह और देह की दुनिया मे फिर से अपना पार्ट बजा रही हूँ। *बाप जो है जैसा है, उसे यथार्थ बिंदी रूप में जान कर याद करते हुए मैं परमात्म स्नेह और परमात्म बल प्राप्त करने के साथ - साथ, परमात्म याद रूपी योग अग्नि में अपने विकर्मों को दग्ध करने का भी पुरुषार्थ बड़ी सहजता से कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सच्चाई - सफाई की धारणा द्वारा समीपता का अनुभव करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सम्पूर्णमूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा बिगड़े हुए को सदा सुधारती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव सबसे बड़ी सेवा करती हूँ  ।*

   *मैं सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  अभी बापदादा सभी बच्चों को सदा निर्विघ्न स्वरूप में देखने चाहते हैं, क्यों? जब आप निमित्त बने हुए निर्विघ्न स्थिति में स्थित रहो तब विश्व की आत्माओं को सर्व समस्याओं से निर्विघ्न बना सके... इसके लिए *विशेष दो बातों पर अण्डरलाइन करो... करते भी हो लेकिन और अण्डरलाइन करो... एक तो हर एक आत्मा को अपने आत्मिक दृष्टि से देखो... आत्मा के ओरिजिनल संस्कार के स्वरूप में देखो...* चाहे कैसे भी संस्कार वाली आत्मा है लेकिन आपकी हर आत्मा के प्रति शुभ भावना, शुभ कामना, परिवर्तन कर सकती है... आत्मिक भाव इमर्ज करो...

 

 _ ➳  जैसे शुरू-शुरू में देखो तो संगठन में रहते आत्मिक दृष्टि, आत्मिक वृत्ति, आत्मा-आत्मा से मिल रही है, बात कर रही है, इस दृष्टि से फाउण्डेशन कितना पक्का हो गया... अभी सेवा के विस्तार में, सेवा के विस्तार के सम्बन्ध में आत्मिक भाव से चलना, बोलना, समपर्क में आना मर्ज हो गया है... खत्म नहीं हुआ है लेकिन मर्ज हो गया है... *आत्मिक स्वमान, आत्मा को सहज सफलता दिलाता है* क्योंकि आप सभी कौन आकर इकट्ठे हुए हो? वही कल्प पहले वाले देव आत्मायें, ब्राह्मण आत्मायें इकट्ठे हुए हो... *ब्राह्मण आत्मा के रूप में सभी श्रेष्ठ आत्मायें हो, देव आत्माओं के हिसाब से भी श्रेष्ठ आत्मायें हो...* उसी स्वरूप से सम्बन्ध-सम्पर्क में आओ...

 

 _ ➳  हर समय चेक करो - मुझ देव आत्मा, ब्राह्मण आत्मा का श्रेष्ठ कर्तव्य, श्रेष्ठ सेवा क्या है? 'दुआयें देना और दुआयें लेना'... आपके जड़ चित्र क्या सेवा करते हैं? कैसी भी आत्मा हो लेकिन दुआयें लेने जाते, दुआयें लेकर आते... और कोई भी अगर पुरुषार्थ में मेहनत समझते हैं तो *सबसे सहज पुरुषार्थ है, सारा दिन दृष्टि, वृत्ति, बोल, भावना सबसे दुआयें दो, दुआयें लो...*

 

✺   *ड्रिल :-  "निर्विघ्न स्थिति में स्थित रहने का अनुभव"*

 

 _ ➳  अपने स्वधर्म में स्थित हो कर, अपने प्राणेश्वर बाबा की याद में बैठ गहन शांति की अनुभूति करने के बाद, कुछ समय के लिए मैं जैसे ही अपनी आंखों को हल्के - हल्के बन्द करती हूँ, मैं स्वयं को एक बहुत बड़े मन्दिर में अपने ही दैवी स्वरूप में देखती हूँ... *अपना वरदानी हाथ ऊपर उठाये मैं सबकी मनोकामनाओं को पूर्ण कर रही हूँ... चाहे कैसी भी आत्मा मेरे सम्मुख आ रही है मैं सबको दुआयें देती जा रही हूँ...* अपने इस दैवी स्वरूप को देखते - देखते मैं जैसे ही अपने ब्राह्मण स्वरूप में वापिस लौटती हूँ... मेरे कानों में अव्यक्त बापदादा की आवाज सुनाई देती है:- "हर समय चेक करो - मुझ देव आत्मा, ब्राह्मण आत्मा का श्रेष्ठ कर्तव्य, श्रेष्ठ सेवा क्या है?

 

 _ ➳  अव्यक्त बापदादा के इन महवाक्यों को सुन इस बात पर अटेंशन देते हुए अब मैं अपनी चेकिंग करती हूँ कि क्या सारा दिन अपनी दृष्टि, वृत्ति, बोल, भावना से मैं सबको दुआयें देती और दुआयें लेती हूँ? *चेकिंग करते - करते मैं विचार करती हूँ कि आज दिन तक मेरे जड़ चित्रों का जो गायन है कि उनके सामने कैसी भी आत्मायें आएं लेकिन दुआयें लेने जाते, दुआयें लेकर आते हैं वो गायन तो तभी होगा जब अभी ब्राह्मण जीवन में वो कर्म होगा...* और यह तभी होगा जब मेरा ब्राह्मण जीवन निर्विघ्न होगा... इसलिए अब मुझे अपने इस ब्राह्मण जीवन को निर्विघ्न बनाने का ही पुरुषार्थ करना है...

 

 _ ➳  अपने आप से दृढ़ प्रतिज्ञा कर अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप से अपने निराकारी स्वरूप में स्थित होती हूँ... अशरीरी बन बाबा की याद में बैठते ही मैं देह की दुनिया से किनारा कर, ज्ञान और योग के पंख लगाये *अपने निराकार शिव पिता परमात्मा की उस सुंदर सितारों की अद्भुत दुनिया की ओर चल पड़ती हूँ...* कुछ क्षणों की सुंदर, लुभावनी रूहानी यात्रा करके मैं पहुंच जाती हूँ उस अद्भुत दुनिया परमधाम में अपने प्यारे मीठे बाबा के पास... *संकल्पों विकल्पों की हलचल से दूर शांति के सागर बाप के सामने मैं आत्मा गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ...* मन बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं अपलक शक्तियों के सागर अपने बाबा को निहार रही हूँ...

 

 _ ➳  धीरे - धीरे अब मैं आत्मा अपने मीठे प्यारे बाबा की ओर बढ़ रही हूँ... उनके समीप पहुंच कर मैं जैसे ही उन्हें टच करती हूँ... *शक्तियों का झरना फुल फोर्स के साथ बाबा से निकल कर अब मुझ आत्मा में समाने लगता है... मेरा स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली व चमकदार बनता जा रहा है...* मास्टर बीजरूप अवस्था में स्थित हो कर अपने बीज रूप परमात्मा बाप के साथ यह मंगलमयी मिलन मुझे अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करवा रहा है... परमात्म लाइट मुझ आत्मा में समाकर मुझे पावन बना रही है... मैं स्वयं में परमात्म शक्तियों की गहन अनुभूति कर रही हूँ...

 

 _ ➳  शक्ति स्वरुप बनकर अब मैं परमधाम से नीचे आ रही हूँ... अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर, अपने इस जीवन मे निर्विघ्न स्थिति का अनुभव करने के लिए अब मैं निरन्तर आत्मिक स्मृति में रह, सबको आत्मिक दृष्टि से देखने का अभ्यास कर रही हूँ... *सबके साथ बातें करते उनके मस्तक में चमकती हुई आत्मा को ही अब मैं देख रही हूँ... यह सब भी शिव बाबा की अजर-अमर संताने हैं इसी समृति से अब मैं हर संबंध में आती हूँ...* मेरे सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली आत्मा चाहे कैसे भी स्वभाव संस्कार वाली  हो लेकिन आत्मिक भाव इमर्ज करके मैं सबके प्रति शुभ भावना, शुभ कामना रखते हुए उन्हें परिवर्तन करने का पुरुषार्थ कर रही हूँ...

 

 _ ➳  *चाहे लौकिक परिवार हो या अलौकिक ब्राह्मण परिवार हो, दोनों में ही आत्मिक दृष्टि, आत्मिक वृति के आधार पर परिवार की फाउंडेशन को मजबूत करके* मैं निर्विघ्न स्थिति में स्थित रहने का अनुभव अब सहज ही करते हुए निरन्तर आगे बढ़ रही हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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