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 09 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *हर एक की नब्ज़ देखकर फिर उसे ज्ञान दिया ?*

 

➢➢ *कोई भी डिस सर्विस का काम तो नहीं किया ?*

 

➢➢ *नथिंग न्यू की स्मृति से विघनो को खेल समझकर पार किया ?*

 

➢➢ *सबके गुणों को देख विशेषताओं की खुशबू फैलाई ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *योग में सदा लाइट हाउस और माइट हाउस की स्थिति का अनुभव करो। ज्ञान है लाइट और योग है माइट।* ज्ञान और योग-दोनों शक्तियां लाइट और माइट सम्पन्न हो *इसको कहते हैं मास्टर सर्वशक्तिमान।* ऐसी शक्तिशाली आत्मायें किसी भी परिस्थिति को सेकण्ड में पार कर लेती हैं।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं मास्टर सर्वशक्तिवान श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  अपने को सदा मास्टर सर्वशक्तिवान श्रेष्ठ आत्मायें हैं अनुभव करते हो? क्योंकि सर्वशक्तियां बाप का खजाना है और खजाना बच्चों का अधिकार है, बर्थ राइट है। तो बर्थ राइट को कार्य में लाना - यह तो बच्चों का कर्तव्य है। और खजाना होता ही किसलिए है? आपके पास स्थूल खजाना भी है, तो किसलिए है? खर्च करने के लिए, कि बैंक में रखने के लिए? बैंक में भी इसीलिए रखते हैं कि ऐसे समय पर कार्य में लगा सके। काम में लगाने का ही लक्ष्य होता है ना। *तो सर्वशक्तियां भी जन्म सिद्ध अधिकार हैं ना। जिस चीज पर अधिकार होता है तो उसको स्नेह के सम्बन्ध से, अधिकार से चलाते हैं। एक अधिकार होता है आर्डर करना और दूसरा होता है स्नेह का। अधिकार वाले को तो जैसे भी चलाओ वैसे वह चलेगा। सर्वशक्तियां अधिकार में होनी चाहिएं।* ऐसे नहीं - चार है दो नहीं है, सात है एक नहीं है।

 

  *अगर एक भी शक्ति कम है तो समय पर धोखा मिल जायेगा। सर्व शक्तियां अधिकार में होंगी तभी विजयी बन नम्बर वन में आ सकेगे। तो चेक करो सर्व शक्तियां कहाँ तक अधिकार में चलती हैं। हर शक्ति समय पर काम में आती है या आधा सेकेण्ड के बाद कार्य में आती है। सेकेण्ड के बाद भी हुआ तो सेकेण्ड में फेल तो कहेंगे ना।* अगर पेपर में फाइनल मार्क्स में दो मार्क भी कम है तो फेल कहेंगे ना। तो फेल वाला फुल तो नहीं हुआ ना? तो हर परिस्थिति में अधिकार से शक्ति से यूज करो, हर गुण को यूज करो। जिस परिस्थिति में धैर्यता चाहिए तो धैर्यता के गुण को यूज करो। ऐसा नहीं थोड़ा सा धैर्य कम हो गया। नहीं।

 

  अगर कोई दुश्मन वार करता है और एक सेकेण्ड भी कोई पीछे हो गया तो विजय किसकी हुई? इसीलिए ये दोनों चेकिंग करो। ऐसे नहीं सर्वशक्तियां तो हैं लेकिन समय पर यूज नहीं कर सकते। कोई बढिया चीज दे और उसको कार्य में लगाने नहीं आये तो उसके लिए वह बढिया चीज भी क्या होगी? काम की तो नहीं रही ना। तो सर्वशक्तियां यूज करने का बहुतकाल का अभ्यास चाहिए। यदि बहुतकाल से कोई बच्चा आपकी आज्ञा पर नहीं चलता तो समय पर क्या करेगा? धोखा ही देगा ना। तो यह सर्वशक्तियां भी आपकी रचना है। रचना को बहुत काल से कार्य में लगाने का अभ्यास करो। हर परिस्थिति से अनुभवी तो हो गये ना। अनुभवी कभी दुबारा धोखा नहीं खाते। तो हर समय स्मृति से तीव्र गति से आगे बढ़ते चलो। *सभी तपस्या की रेस में अच्छी तरह से चल रहे हो ना। सभी प्राइज लेंगे ना। सदा खुशी खुशी से सहज उड़ते चलो। मुश्किल है नहीं, मुश्किल बनाओ नहीं। कमजोरी मुश्किल बनाती है। सदा मुश्किल को सहज करते उड़ते रहो।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आज अमृतवेले बापदादा बच्चों की ड्रिल देख रहे थे, क्या देखा? *ड्रिल करने के लिए समय की सीटी पर पहुँचने वाले नम्बरवार पहुँच रहे थे।* पहुँचने वाले काफी थे लेकिन तीन प्रकार के बच्चे देखे।

 

✧   *एक थे - समय बिताने वाले, दूसरे थे - संयम निभाने वाले, तीसरे थे - स्नेह निभाने वाले।* हरेक का पोज अपना - अपना था। बुद्धि को ऊपर ले जाने वाले बाप से, बाप समान बन, मिलन मनाने वाले कम थे।

 

✧  रूहानी ड्रिल करने वाले ड्रिल करना चाहते थे लेकिन कर नहीं पा रहे थे। कारण क्या होगा? जैसे आजकल स्थूल ड्रिल करने के लिए भी हल्का - पन चाहिए, मोटा - पन नहीं चाहिए, मोटा - पन भी बोझ होता है। *वैसे रूहानी ड्रिल में भी भिन्न - भिन्न प्रकार के बोझ वाले अर्थात मोटी बुद्धि - ऐसे बहुत प्रकार के थे।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ जैसे शारीरिक हल्केपन का साधन है एक्सरसाइज़। *वैसे आत्मिक एक्सरसाइज़ योग अभ्यास द्वारा अभी-अभी कर्मयोगी अर्थात् साकारी स्वरूपधारी बन साकार सृष्टि का पार्ट बजाना, अभी-अभी आकारी फरिश्ता बन आकारी वतनवासी अव्यक्त रूप का अनुभव करना- अभी-अभी निराकारी बन मूल वतनवासी का अनुभव करना, अभी-अभी अपने राज्य स्वर्ग अर्थात् वैकुण्ठवासी बन देवता रूप का अनुभव करना। ऐसे बुद्धि की एक्सरसाइज़ करो तो सदा हल्के हो जावेंगे।* भारीपन खत्म हो जावेगा। पुरुषार्थ की गति तीव्र हो जावेगी। सहारा लेने की आवश्यकता नहीं होगी।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  पक्का वैष्णव बनना"*

 

_ ➳  मीठे बाबा की यादो ने इस कदर मुझे दीवाना कर दिया... की मै आत्मा बाबा से मिलन करने के लिए उड़ चली... और मीठे बाबा और मै आत्मा बाँहों में बाहें डालकर... शांति स्तम्भ के चारो ओर घूमने लगे... *कभी बाबा मुझे मुझे निहारे और मुस्कराये... कभी मै आत्मा बाबा से लिपट जाऊँ.*.. ऐसे ही बाँहों में बाहें डाले बाबा और मै आत्मा रुहरिहानं करने लगे..."

 

   *मीठे प्यारे बाबा मुझ आत्मा पर अपने ज्ञान रत्नों की दौलत लुटाते हुए मालामाल करते हुए बोले :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... ईश्वर को पाकर श्रीमत को अपनाकर सच्चा सच्चा वैष्णव बनना है,.. भगवान के बिना जो विकारो भरा जीवन आज तक जीते आये हो... अब उसका सम्पूर्ण त्याग करना है... *देवता कुल में आने के लिए गुणवान फूल बनना है.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के ज्ञान अमृत को अंतर्मन में पीकर बोली :-* "प्यारे प्यारे बाबा मेरे...आप जीवन में न थे तो जीवन विकारो की दुर्गन्ध से भर गया था... आपने आकर मुझे फूलो सा सुवासित किया है... मात्र देह समझकर ही जीती जा रही थी... *आपने मुझे देवताओ सा खुबसूरत लक्ष्य देकर  भाग्यवान बना दिया है..*."

 

   *मीठे मीठे बाबा मेरे सिर पर वरदानी हाथो का स्पर्श देते हुए कहने लगे :-* "श्रीमत को दिल से अपनाकर... देवताओ सा सजधज कर... *सतयुगी सुखो की धरती पर अपना आशियाना पा लो..*. श्रीमत पर देवताओ सी चाल चलन धारण कर... देवताई गुणो से भरपूर हो जाओ... और सच्ची खुशियो में सदा की मुस्कान से खिल जाओ..."

 

_ ➳  *मीठे बाबा को मेरे सुखो की खातिर... यूँ धरती पर आता देख... और सारे संकल्प मेरे उज्ज्वल भविष्य के खतिर लुटाते देख... मै आत्मा रोम रोम से ऋणी हो गयी और बोली :-* "मीठे बाबा देह और धरती के रिश्तो ने मुझे सदा ही ठगा... और आपने आकर मेरे बिखरे जीवन को देवताई सांचे में ढाल दिया है... *सच्चे प्यार की यही तो बयानगी है न मीठे बाबा... कि आपकी चाहत मेरा सदा का सुख है.*.."

 

   *मीठे प्यारे बाबा अपनी नजरो में बेपनाह मुहोब्बत लिये... मेरे जज्बातों पर मुस्करा उठे और कहने लगे :-* "मीठे लाडले बच्चे... सच्चे प्यार को पाकर, श्रीमत की खुबसूरत राहो पर चलकर. सच्चे सौंदर्य से दमक जाओ... और स्वर्ग के सच्चे सुखो के हकदार हो मुस्कराओ... विकारी जीवन से मुक्त होकर, *सच्चे वैष्णव बन विष्णुकुल में आने का खुबसूरत भाग्य पा जाओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने प्यारे बाबा को अपना धाम छोड़कर... मुझ आत्मा के सुख के पीछे यूँ... दीवानो सा खपते देख कर बोली :-* "लाडले प्यारे बाबा मेरे... आपने अथाह ज्ञान रत्नों को मुझ आत्मा पर लुटाकर... मुझे बेहद का समझदार बना दिया है... ज्ञान के तीसरे नेत्र को देकर त्रिनेत्री बना दिया है... इस नेत्र से मै आत्मा अपने *खुबसूरत देवताई भाग्य विष्णुकुल को देख देखकर पुलकित हो रही हूँ..*. ऐसी मीठी रुहरिहानं से तृप्त होकर... मै आत्मा स्थूल जगत में आ गयी..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- ऊंच पद पाने के लिए शिव बाबा की हट्टी का अच्छा सेल्समैन बनना है*"

 

_ ➳  अविनाशी ज्ञान रत्नों का व्यापार करने वाले सृष्टि के रचयिता, सृष्टि की संपूर्ण कारोबार को चलाने वाले, ऑल माइटी अथॉरिटी, ज्ञान सागर अपने प्यारे परम पिता परमात्मा शिव बाबा के साथ सच्चा सौदा करने वाली मैं ब्राह्मण आत्मा अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य पर इठलाती हुई मन-ही-मन स्वयं से प्रोमिस करती हूं कि *स्वयं भगवान ने अपनी दुकान का सेल्समेन बनने का जो सर्वश्रेष्ठ सौभाग्य मुझे प्रदान किया है। उस भाग्य को और ऊंचा उठाने के लिए एक अच्छा सेल्समैन बन अविनाशी ज्ञान रत्नों के इस व्यापार को मुझे निरंतर आगे बढ़ाने का पुरुषार्थ अवश्य करना है*।

 

_ ➳  स्वयं से यह प्रोमिस कर, मास्टर ज्ञान सूर्य की सीट पर सेट होकर मैं ब्राह्मण आत्मा ज्ञान सूर्य शिव बाबा की याद में बैठ जाती हूं। ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे ज्ञान सूर्य शिवबाबा समस्त शक्तियों और गुणों की फैलाते हुए परम धाम से नीचे आ रहे हैं और आकर मेरे सिर के ऊपर स्थित हो जाते हैं। *बाबा से ज्ञान की शक्तिशाली किरणों का फव्वारा सीधा मुझ आत्मा पर पड़ रहा है और मैं आत्मा ज्ञान रत्नों से भरपूर होती जा रही हूं*। मुझ मास्टर ज्ञान सूर्य आत्मा से निकल रही सर्व शक्तियां मेरे शरीर पर पड़ रही है और इन शक्तियों की तपन से मेरा साकारी शरीर जैसे लुप्त होता जा रहा है और एक लाइट का दिव्य आकारी स्वरूप साकारी शरीर से बाहर निकल आया है।

 

_ ➳  लाइट का दिव्य आकारी स्वरूप धारण कर मैं आत्मा अब साकारी दुनिया के आकर्षण से मुक्त होकर ऊपर की ओर जा रही हूं। *पांच तत्वों की इस दुनिया को पार कर मैं फरिश्ता अब सूक्ष्म लोक में पहुंच गया जहां सभी दिव्य आकारी स्वरूप धारण किए लाइट के फरिश्ते ही फरिश्ते विचरण करते हुए दिखाई दे रहे हैं*। मैं फरिश्ता बाप दादा के पास पहुंचता हूं। बाबा मुझे देखते ही:- "आओ मेरे मास्टर सौदागर बच्चे कह कर गले से लगा लेते हैं"।

 

_ ➳  बाबा की बाहों में समा कर, बाबा के प्यार की गहराई का सुख प्राप्त कर, मैं बाबा के पास बैठ जाता हूं। *बाबा सामने की ओर इशारा करते हुए कहते हैं:- "देखो बच्चे वहां देखो"। मैं देखता हूं सामने एक बहुत बड़ा शोरूम है*। इस शोरूम के अंदर का दृश्य बहुत ही लुभावना और मनमोहक है जो गेट के अंदर से स्पष्ट दिखाई दे रहा है। किंतु इस गेट के बाहर एक लॉक लगा है और गेट पर लिखा है मुक्ति जीवन मुक्ति के लिए गेट। उस गेट के पास मेरा ही फ़रिशता स्वरूप मुझे दिखाई दे रहा है।

 

_ ➳  मैं उस दृश्य को देख जैसे ही बाबा की ओर देखता हूं। बाबा कहते हैं:- "हां मेरे बच्चे, इस शोरूम के सेल्समैन आप हो"। मुक्ति, जीवन मुक्ति धाम के गेट पास लेने वालों की बड़ी लंबी क्यू यहां लगने वाली है। अगर गेट पास देने में देरी लगाई तो उस समय टू लेट हो जाएगा। इसलिए *सदा स्व स्वरुप, स्व स्थिति में स्थित रहकर शक्तियों का स्टॉक स्वयं में जमा करो। तभी सेकंड में किसी आत्मा को नजर से निहालकर अच्छे सेल्समैन बन सकेंगे और ऊंच पद पा सकेंग*े। जी बाबा कह कर, शक्तियों का स्टॉक स्वयं में जमा करने के लिए अब मैं अपने सूक्ष्म आकारी शरीर को सूक्ष्म लोक में छोड़ निराकारी आत्मा बन पहुंच जाती हूँ सर्वशक्तिमान, ज्ञान सागर अपने शिव पिता के पास परमधाम।

 

_ ➳  ज्ञान सागर शिव पिता से आ रही सर्वशक्तियों को अपने अंदर भर कर, ज्ञान की वर्षा करने के लिए मैं आत्मा वापिस सूक्ष्म लोक में आ जाती हूँ। अपना सूक्ष्म आकारी शरीर धारण कर बाप दादा के साथ कम्बाइंड हो कर अब मैं फ़रिशता एक ऊंची पहाड़ी पर जा कर बैठ जाता हूँ। *बापदादा से निकल रही आसमानी रंग की ज्ञान की किरणे और सर्व शक्तियों की रंग बिरंगी किरणें मुझ फरिश्ते पर पड़ रही हैं* और मुझ से होती हुई समस्त वायुमण्डल में चारों ओर फैल रही हैं।

 

_ ➳  इन किरणों का प्रभाव अब संपूर्ण विश्व की समस्त आत्माओं पर पड़ने लगा है। सभी सुख शांति की अनुभूति कर रही है। और जिज्ञासावश ऊपर आकाश की ओर निहार रही है। *धीरे-धीरे विश्व की सभी आत्माओं को सर्व शक्तियों के स्त्रोत अर्थात बापदादा का साक्षात्कार होने लगा है* और सभी इस बात को स्वीकार करने लगी है कि सदा काल की सुख शांति का वर्सा, मुक्ति - जीवन मुक्ति का वर्सा परमात्मा द्वारा दिए जा रहे इस सत्य ज्ञान से ही प्राप्त हो सकता है।

 

_ ➳  इस सुखद दृश्य को देख मन ही मन हर्षित होते हुए मैं फ़रिशता अब अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो बाबा की दुकान का *अच्छा सेल्समैन बनने का दृढ़ संकल्प मन मे लिए ज्ञान रत्नों का व्यापार करने के लिए चल पड़ता हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं नथिंग न्यू की स्मृति से विघ्नों को खेल समझ कर पार करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं अनुभवीमूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सब के गुणों को देख विशेषताओं की खुशबू फैलाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा यह संसार को सदा सुखमय बनाती हूँ  ।*

   *मैं सुख स्वरूप आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ विशेष आत्मा बनने के लिए सर्व की विशेषताओं को देखो- बापदादा सदा बच्चों की विशेषताओं के गुण गाते हैं। *जैसे बाप सभी बच्चों की विशेषताओं को देखते वैसे आप विशेष आत्मायें भी सर्व की विशेषताओं को देखते स्वयं को विशेष आत्मा बनाते चलो। विशेष आत्माओं का कार्य है विशेषता देखना और विशेष बनना। कभी भी किसी आत्मा के सम्पर्क में आते हो तो उसकी विशेषता पर ही नज़र जानी चाहिए।* जैसे मधुमक्खी की नज़र फूलों पर रहती ऐसे आपकी नज़र सर्व की विशेषताओं पर हो। हर ब्राह्मण आत्मा को देख सदा यही गुण गाते रहो - वाह श्रेष्ठ आत्मा वाह''! अगर दूसरे की कमज़ोरी देखेंगे तो स्वयं भी कमजोर बन जायेंगे। तो आपकी नज़र किसी की कमज़ोरी रूपी कंकर पर नहीं जानी चाहिए। आप होली हंस सदा गुण रूपी मोती चुगते रहो।

✺ *"ड्रिल :- सर्व आत्माओं की विशेषता को देखना"*

➳ _ ➳ मैं आत्मा सागर के किनारे सुहाने मौसम में ठंडी हवाओं के बीच बैठी हुई हूं... ठंडी हवाओं के झोंके मेरे बालों को उड़ा रहे हैं... और समुंदर की लहरें मेरे पास आकर मेरे पैरों को छूती हुई जा रही है... बैठे-बैठे मैं आत्मा सागर को गहराई से देख रही हूँ... और जैसे ही सागर की लहरें शांत होती है तो मैं देखती हूं सागर के किनारे कुछ हंस मुझे दिखाई देते हैं... *उन्हें देखकर मैंने यह अनुभव किया कि वह हंस उस सागर से सिर्फ और सिर्फ मोती ही चुगते हैं और दूसरी तरफ मैंने देखा कि कुछ पक्षी है जो उसमें से सिर्फ कीड़े मकोड़े चुन रहे हैं... यह दृश्य बड़ा ही विचित्र था...* तभी मेरा अंतर्मन उस हंस के पास जाकर पूछता है तुम और यह पक्षी एक ही जगह पर रहते हुए भी अलग-अलग वस्तुएं क्यों चुन रहे हो ? हंस मुझे देख कर मुस्कुराने लगता है और कुछ सोचने लगता है...

➳ _ ➳ और कुछ समय बाद हंस मुस्कुराते हुए मुझे कहता है... इसी स्थान पर अच्छी और बुरी दोनों चीजें हैं परंतु मैं सिर्फ अच्छी चीजें ही चुनता हूं मेरी आदत सिर्फ अच्छाई को देखना है और अन्य जीव जंतु सिर्फ बुराई को चुनते हैं सिर्फ बुरी चीजों को चुनते हैं, अर्थात सिर्फ बुराई को चुनते हैं... इतना कहकर हंस फिर से मोती चुगने लग जाता है और मेरा अंतर्मन मेरे इस शरीर में आकर विराजमान हो जाता है फिर मैं सोचने लगती हूं... *हम मनुष्य की फितरत भी शायद इन जीव जंतुओं की तरह हो गई है जो सिर्फ एक दूसरे के अंदर बुराई ही देखते हैं... हम किसी की हम किसी की बुराई देखते हैं तो उसकी सभी अच्छाइयां उसके अंदर दब कर रह जाती है...*

➳ _ ➳ और सोचते सोचते जब मैं हंस के बारे में सोचती हूँ तो मैं यह अनुभव करती हूं कि बाबा ने आकर हम बच्चों को सिखाया है कि हम एक दूसरे की अच्छाइयों को देखें ... *और जब हम एक दूसरे की अच्छाइयों को देखते हैं तो उसकी सभी बुराइयां धीरे धीरे समाप्त हो जाती है...* इस दृश्य का अनुभव करने के बाद मैं चलते-चलते एक बगीचे में आ जाती हूं जहां पर मैं देखती हूं अलग-अलग तरह के फूल खिले हुए हैं... साथ ही मैं देखती हूं कि मधुमक्खी उन फूलों पर बैठ कर उनका रस पी रही है... वैसे तो उस बगीचे में और भी पौधे थे... और परंतु मधुमक्खी सिर्फ और सिर्फ खुशबूदार और रसीले फूलों पर ही बैठकर रस ले रहे हैं... इस दृश्य का आनंद लेने के लिए मैं कुछ देर बैठ जाती हूं...

➳ _ ➳ पर बैठे-बैठे मैं यह आभास करती हूं कि मधुमक्खी मेरे कान के पास आकर कहती है... मुझे सिर्फ फूलों के रस पीने की ही आदत है... इसलिए मैं सिर्फ यहां फूलों पर ही बैठती हूं... इतना कहकर वह मधुमक्खी उड़ जाती है... और दूसरे फूल पर जाकर बैठ जाती है और मैं अनुभव करती हूं कि यह मधुमक्खी फिर से मुझे वही गुण सिखा गई... *मधुमक्खी ने भी मुझे सिखाया कि हमेशा दूसरों के गुण ही देखो अगर दूसरों के गुण देखोगे तो गुणग्राही कहलाओगे और अगर अवगुण देखने की चेष्टा करोगे तो अवगुणी कहलाओगे... और मैं सोचती हूं कि अगर हम दूसरों की कमजोरियां देखते हैं तो उनका चिंतन करते करते हमारे में भी धीरे धीरे वही कमजोरियाँ आने लगती हैं और हमारी सभी शक्तियां कम होने लगती है...*

➳ _ ➳ इतना सब सोचकर मैं अपने सामने मेरे बाबा को इमर्ज करती हूं... और कहती हूं बाबा आप तो यह दृश्य लगातार देख रहे हो आपने मुझे बहुत समझाने का प्रयास किया कि बच्चे गुणग्राही बनो... आज जैसे मैंने उस हंस को मोती चुगते हुए देखा तो मुझे आभास हुआ कि इस संसार में अच्छाई और बुराई दोनों हैं... परंतु हम सिर्फ अच्छाई को देखेंगे तो आगे बढ़ते ही जाएंगे... मैं बाबा को बार-बार धन्यवाद कहती हूं और बाबा से यह वादा करते हैं *बाबा अब मैं हमेशा सभी आत्माओं का और अपना कल्याण करने के लिए सिर्फ और सिर्फ उनका गुण ही देखूंगी, गुणग्राही बनूंगी... कभी भी किसी आत्मा का अवगुण नहीं देखूंगी हमेशा उस आत्मा की सिर्फ और सिर्फ अच्छाई ही और गुण ही देखूंगी... जब मैं बाबा से यह वादा करती हूं तो बाबा बहुत खुश होते हैं और मेरे सर पर हाथ रखकर कहते हैं विजयी भव...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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