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 09 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *पवित्र शुद्ध भोजन खाया ?*

 

➢➢ *बाप को और स्वीट राजधानी को याद किया ?*

 

➢➢ *अपनी निश्चिंत स्थिति द्वारा श्रेष्ठ टचिंग के आधार पर कार्य किया ?*

 

➢➢ *हर सेकंड, हर संकल्प समर्थ रहा ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *फरिश्ता अर्थात् जिसका एक बाप के साथ सर्व रिश्ता हो अर्थात् सर्व सम्बन्ध हो।* एक बाप दूसरा न कोई जिसके सर्व सम्बन्ध एक बाप के साथ होंगे *उसको और सब सम्बन्ध निमित्त मात्र अनुभव होंगे। वह सदा खुशी में नाचने वाले होंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं पद्मापद्म भाग्यवान आत्मा हूँ"*

 

✧  सदा अपने को पद्मापद्म भाग्यवान अनुभव करते हो? क्योंकि बाप द्वारा वर्सा मिला है। तो वर्से में कितने अविनाशी खजाने मिले हैं? जब खजाने अविनाशी हैं तो भाग्य की स्मृति भी अविनाशी चाहिए। अविनाशी का अर्थ क्या है? सदा या कभी-कभी? *सदा अपने को पद्मापद्म भाग्यवान आत्मायें हैं-यह स्मृति में रखो और खजानों को सदा सामने इमर्ज रूप में रखो। कितने खजाने मिले हैं? अगर सदा खजानों को सामने रखेंगे तो नशा वा खुशी भी सदा रहेगी और कभी भी कम-ज्यादा नहीं रहेगी, बेहद की रहेगी।* तो खजाने को बढ़ाओ भी और इमर्ज रूप में भी रखो। बढ़ाने का साधन क्या है? जितना बांटेंगे उतना बढ़ेगा।

 

✧  सदा यह सोचो कि आज के दिन खजाने को बढ़ाया या जितना था उतना ही है? *खजाना जितना बढ़ेगा, तो बढ़ने की निशानी है-खुशी बढ़ेगी। तो बढ़ते जाते हैं ना। क्योंकि यह खजाने सदा खुशी को बढ़ाने वाले हैं। इसलिए कभी भी खुशी कम नहीं होनी चाहिए। कितना भी बड़ा विघ्न आ जाये लेकिन विघ्न खुशी को कम ना करे।* किसी भी प्रकार का विघ्न खुशी को कम तो नहीं करता है ? बापदादा ने पहले भी कहा है कि शरीर चला जाये लेकिन खुशी नहीं जाये। इतनी अपने आपसे दृढ़ प्रतिज्ञा की है? तो सदा यह दृढ़ संकल्प करो कि-खुशी नहीं जायेगी।

 

✧  *ब्राह्मण जीवन का आधार ही है 'खुशी'। अगर खुशी नहीं तो ब्राह्मण जीवन नहीं। ब्राह्मण जीवन अर्थात् खुश रहना और दूसरों को भी खुशी बांटना। वर्तमान समय में सभी को अविनाशी खुशी की आवश्यकता है, खुशी के भिखारी हैं। और आप दाता के बच्चे हो। दाता के बच्चों का काम है-देना। जो भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आये-खुशी बांटते जाओ, देते जाओ। कोई खाली नहीं जाये।* इतना भरपूर हो ना! हर समय देखो कि मास्टर दाता बनकर के कुछ दे रहा हूँ या सिर्फ अपने में ही खुश हैं। जिस समय जिसको कोई भी चीज की आवश्यकता होती है और आवश्यकता के समय अगर कोई वही चीज उसको देता है, तो उसके दिल से दुआयें निकलती हैं। वो दुआयें भी आपको सहज पुरुषार्थी बनने में सहयोगी बन जायेंगी। तो आपका कर्तव्य है - दुआयें देना और दुआयें लेना। इसी में बिजी रहते हो ना! सारे विश्व को इसकी आवश्यकता है।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  एकाग्रता की शक्ति से किसी भी आत्मा का मैसेज उस आत्मा तक पहुँचा सकते हो। किसी भी आत्मा का आह्वान कर सकते हो। किसी भी आत्मा की आवाज को कैच कर सकते हो। किसी भी आत्मा को दूर बैठे सहयोग दे सकते हो। वह एकाग्रता जानते हो ना।  *सिवाए एक बाप के और कोई भी संकल्प न हो।*

 

✧  एक बाप में सारे संसार की सर्व प्राप्तियों की अनुभूति हो। एक ही एक हो। पुरुषार्थ द्वारा एकाग्र बनना वह अलग स्टेज है। लेकिन *एकाग्रता में स्थित हो जाना, वह स्थिति इतनी शक्तिशाली है। ऐसी श्रेष्ठ स्थिति का एक संकल्प भी बाप समान का बहुत अनुभव कराता है।* अभी इस रूहानी शक्ति का प्रयोग करके देखो।

 

✧  इसमें एकान्त का साधन आवश्यक है। *अभ्यास होने से लास्ट में चारों ओर हंगामा होते हुए भी आप सभी एक के अंत में खो गये तो हंगामे के बीच भी एकांत का अनुभव करेंगे।* लेकिन ऐसा अभ्यास बहुत समय से चाहिए। तब ही चारों ओर के अनेक प्रकार के हंगामे होते हुए भी अपने को एकान्तवासी अनुभव करेंगे। *वर्तमान समय ऐसे गुप्त शक्तियों द्वारा अनुभवी मूर्त बनना अति आवश्यक है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *चारों ओर कितना भी वातावरण हो, हलचल हो लेकिन आवाज में रहते आवाज से परे स्थिति का अभ्यास अभी बहुत काल का चाहिए।* शान्त वातावरण में शान्ति की स्थिति बनाना यह कोई बड़ी बात नहीं है। अशान्ति के बीच आप शान्त रहो, यह अभ्यास चाहिए। ऐसा अभ्यास जानते हो? चाहे अपनी कमजोरियों की हलचल हो, संस्कारों के व्यर्थ संकल्पों की हलचल हो। ऐसी हलचल के समय स्वयं को अचल बना सकते हो वा टाइम लग जाता है? *क्योंकि टाइम लगना यह कभी भी धोखा दे सकता है। समाप्ति के समय में ज्यादा समय नहीं मिलना है। फाइनल रिजल्ट का पेपर कुछ सेकण्ड और मिनटों का ही होना है।* लेकिन चारों और की हलचल के वातावरण में अचल रहने पर ही नम्बर मिलना है। *अगर बहुतकाल हलचल की स्थिति से अचल बनने में समय लगने का अभ्यास होगा तो समाप्ति के समय कया रिजल्ट होगी?* इसलिए यह रूहानी एक्सरसाइज का अभ्यास करो। मन को जहाँ और जितना समय स्थित करना चाहो उतना समय वहाँ स्थित कर सको। *फाइनल पेपर है बहुत ही सहज। और पहले से ही बता देते हैं कि यह पेपर आना है। लेकिन नम्बर बहुत थोड़े समय में मिलना है। स्टेज भी पावरफुल हो।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  इस कड़वी दुनिया से निकल, बहुत बहुत स्वीट बनना"*

 

_ ➳  प्यार के सागर मीठे बाबा के प्यार में खोयी हुई मै आत्मा... *मीठे बाबा के प्यार और मीठेपन में फूलो जैसा खिले अपने जीवन को देखती हूँ.*.. यही जीवन बिना मेरे बाबा के कितना बेनूर और बेसुरा था... प्यारे बाबा ने जीवन में आकर कितनी रौनक, कितनी खुशियां, कितनी मिठास भर दी है... कि मै आत्मा जहाँ भी जाती हूँ... *मेरे नूर से मेरे मीठे बाबा की झलक दिखाई देती है.*.. मेरी खुशियां, मेरा मीठापन देख, जहान मेरे बाबा पर फ़िदा हो जाता है... इसी मीठे चिंतन में खोयी हुई मै आत्मा... तपस्या धाम में मीठे बाबा के पास पहुंचती हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को गुणो और शक्तियो से दिव्य बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... विकारो से भरा जीवन जीते जीते जो दुखो में इतने कड़वे हो गए हो... *प्यारा बाबा अपनी फूलो सी गोद में बिठाकर आप समान मीठा और प्यारा बनाने आया है.*.. मीठे बाबा की मीठी यादो में दिव्यता की मिठास से भरकर मुस्कराओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने मीठे बाबा से सारी मिठास स्वयं में भरकर कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... आपने जीवन में आकर मिठास भरी बहार खिलाई है... सच्ची मुस्कान से मुझ आत्मा को सजाया है... *दिव्य गुण और पवित्रता की खुशियां देकर... मुझे सदा का मीठा और प्यारा प्यारा बनाया है.*.."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को अपनी शक्तियो और ज्ञान रत्नों से सजाते हुए कहते है :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... देह के अंधेरो में, जो दुखो के भूतो से घिर गए थे... अब मीठे बाबा की यादो का हाथ पकड़कर सुख के उजालो में आ जाओ... *अपने सत्य स्वरूप के नशे में आकर...मीठे बाबा की मीठी गोद में सदा का सुख और आराम पाओ.*..सच्ची मिठास के पर्याय बन जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा की अमूल्य शिक्षाओ को अपने बुद्धि पात्र में समाते हुए कहती हूँ :-* "मीठे दुलारे बाबा मेरे... आपको पाकर जीवन कितना मीठा प्यारा हो गया है... मै आत्मा दिव्यगुण धारी बनकर सबको खुशियां बाँट रही हूँ... आपसे पायी सुखो की मिठास हर दिल पर लुटा रही हूँ... *सबको दुखो के कड़वेपन से छुड़ाकर, सुखो का मीठापन आपसे दिलवा रही हूँ.*.."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपने मीठे प्यार में अति मीठा और प्यारा बनाते हुए कहा :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... *ईश्वर पिता परमधाम से खुशियो की, सुखो की, गुणो की, और शक्तियो की अनन्त सौगाते. आप फूल बच्चों के लिए लाया है.*.. इन खुशियो में मीठे सुखो में फूलो जैसा मुस्कराओ... मीठे बाबा की मीठी महकती यादो में सच्चे प्यार से भरपूर हो जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा के प्यार तरंगो में प्रेम स्वरूप बनकर कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... मै आत्मा दुखो के दलदल में, अपने निज स्वरूप को ही खो गयी थी... कितनी कड़वी और विकारी हो गयी थी... आपने प्यारे बाबा मुझे मा प्यार का सागर बना दिया है... *अपना सारा मीठापन मेरे अंतर्मन में उंडेल दिया है, मै आत्मा प्यार का समीर बनकर, विश्व धरा पर बह रही हूँ..*.प्यारे बाबा से सारा प्यार अपने मन आँचल में भरकर मै आत्मा साकार वतन में आ गयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मम्मा बाबा को फॉलो कर पवित्र बनने का पुरुषार्थ करना है*"

 

_ ➳  जिस समर्पण भाव से मम्मा, बाबा ने पुरुषार्थ कर सम्पूर्णता को पाया, वैसे ही सम्पूर्णता को पाने का लक्ष्य रख, मैं मम्मा बाबा की शिक्षाओं को अपने जीवन मे धारण करने की मन ही मन स्वयं से दृढ़ प्रतिज्ञा करती हूँ और इस प्रतिज्ञा को पूरा करने का बल स्वयं में भरने के लिए मैं अपना लाइट का आकारी फ़रिशता स्वरूप धारण करती हूँ और अपनी साकारी देह को छोड़ सूक्ष्म लोक की ओर चल पड़ती हूँ। *ऐसा लग रहा है जैसे आज मम्मा, बाबा दोनों ही वतन में मेरा इंतजार कर रहें हैं। उनकी याद मुझे ऊपर की और खींच रही है और मैं तेजी से उड़ता हुआ अति शीघ्र पांच तत्वों की बनी इस साकारी दुनिया को पार कर जाता हूँ*।

 

_ ➳  सूर्य, चांद, तारागणों से भी परे अब मैं स्वयं को देख रहा हूँ लाइट के उस घर मे जहां चारो और चांदनी सा सफेद प्रकाश फैला हुआ है। अब मेरी निगाहें मम्मा, बाबा को ढूंढ रही हैं। *मैं चारों ओर नजर घुमा कर देख रहा हूँ तभी कानों में मम्मा, बाबा की आवाज आती है:- आओ बच्चे, यहाँ आओ*। देखते ही देखते सामने मम्मा बाबा एक झूले पर झूला झूलते हुए नज़र आते हैं। मैं दौड़ कर मम्मा बाबा के पास पहुंच जाता हूँ। मम्मा बाबा मुझे अपनी बाहों में भर लेते हैं। उनका असीम स्नेह मुझ पर बरसने लगता है। *प्यार भरी दृष्टि देते हुए मम्मा बाबा मुझे भी उसी झूले पर बीच मे बिठा लेते हैं*।

 

_ ➳  अब मम्मा बाबा दोनों अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रख कर, मुझे आप समान बनने का वरदान दे रहे हैं और मेरे मस्तक पर विजय का तिलक लगा कर अपनी लाइट और माइट मुझ में प्रवाहित कर रहे हैं, ताकि तीव्र पुरुषार्थ कर, उनके समान सम्पूर्ण बनने के लक्ष्य को मैं अति शीघ्र प्राप्त कर सकूँ। *मम्मा बाबा से विजय का तिलक ले कर और उनकी दुआओं से अपनी झोली भर कर अब मैं स्वयं को परमात्म बल से भरपूर करने और सम्पूर्ण पावन बनाने के लिए अपने निराकारी ज्योति बिंदु स्वरूप में स्थित हो कर सूक्ष्म लोक से ऊपर परमधाम की ओर चल पड़ती हूँ*।

 

_ ➳  अब मैं देख रही हूं स्वयं को पवित्रता के सागर अपने शिव पिता परमात्मा के सामने परमधाम में। जिनसे आ रही पवित्रता की सफेद रंग की किरणें मुझ आत्मा पर पड़ रही है, और मुझे पावन बना रही हैं। *मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूं कि बाबा से आ रही किरणे योग अग्नि बन कर मुझ आत्मा द्वारा किए हुए जन्म जन्मांतर के विकर्मों को दग्ध कर रही हैं*। विकारों की कट जैसे-जैसे मुझ आत्मा के ऊपर से उतरती जा रही है मैं स्वयं को बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूं। मेरा स्वरूप चमकदार बनता जा रहा है। मैं रीयल गोल्ड बनती जा रही हूं। *हल्की होकर रीयल गोल्ड बनकर मैं आत्मा अब वापिस साकारी दुनिया की ओर आ रही हूं*। अपनी अद्भुत छटा चारों ओर बिखेरती हुई मैं पहुंच जाती हूं वापिस देह और देह की पुरानी दुनिया में और अपने साकारी तन में प्रवेश कर भृकुटि सिंहासन पर विराजमान हो जाती हूं।

 

_ ➳  अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्वयं को देख रही हूं। अपने ब्राह्मण स्वरुप में स्थित होते ही मुझे मेरे कर्तव्य का अनुभव होने लगता है कि अपने इस ब्राह्मण जीवन मे अब मुझे मम्मा, बाबा के समान अवश्य बनना है। इस लिए अब *मैं हर कर्म में फ़ॉलो मदर, फॉलो फादर कर रही हूँ। जैसे मम्मा, बाबा ने सम्पूर्ण निश्चय बुद्धि बन, शिव बाबा की श्रीमत पर चल पावन बनने का पुरुषार्थ किया ऐसे ही मैं आत्मा भी फॉलो मदर, फॉलो फादर करते हुए घर गृहस्थ में रहते पवित्र बनने का पुरुषार्थ कर रही हूँ*। मम्मा, बाबा के समान सम्पूर्ण पवित्र बनने का लक्ष्य सदा स्मृति में रखते हुए अब मैं मनसा, वाचा, कर्मणा सम्पूर्ण पवित्रता को अपने जीवन में धारण कर अपना जीवन बाप समान बना रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं अपनी निश्चिन्त स्थिति द्वारा श्रेष्ठ टचिंग के आधार पर कार्य करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सफलतामूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं ज्ञान स्वरूप आत्मा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव हर संकल्प, हर सेकण्ड को समर्थ बनाती हूँ  ।*

   *मैं सदा समर्थ आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  *व्यक्ति भी क्या हैमिट्टी है ना! मिट्टी-मिट्टी में मिल जाती है।* देखने में आपको बहुत सुन्दर आता हैचाहे सूरत सेचाहे कोई विशेषता सेचाहे कोई गुण सेतो कहते हैं कि और मुझे कोई लगाव नहीं हैस्नेह नहीं है लेकिन इनका ये गुण बहुत अच्छा है। तो गुण का प्रभाव थोड़ा पड़ जाता है या कहते हैं कि इसमें सेवा की विशेषता बहुत है तो सेवा की विशेषता के कारण थोड़ा सा स्नेह हैशब्द नहीं कहेंगे लेकिन अगर विशेष किसी भी व्यक्ति के तरफ या वैभव के तरफ बार-बार संकल्प भी जाता है-ये होता तो बहुत अच्छा.... ये भी आकर्षण है। *व्यक्ति के सेवा की विशेषता का दाता कौनवो व्यक्ति या बाप देता है?* कौन देता हैतो व्यक्ति बहुत अच्छा हैअच्छा है वो ठीक है लेकिन जब *कोई भी विशेषता को देखते हैंगुणों को देखते हैं, सेवा को देखते हैं तो दाता को नहीं भूलो। वह व्यक्ति भी लेवता है, दाता नहीं है।*

➳ _ ➳  *बिना बाप का बने उस व्यक्ति में ये सेवा का गुण या विशेषता आ सकती हैया वह विशेषता अज्ञान से ही ले आता है? ईश्वरीय सेवा की विशेषता अज्ञान में नहीं हो सकती।* अगर अज्ञान में भी कोई विशेषता या गुण है भी लेकिन ज्ञान में आने के बाद उस गुण वा विशेषता में ज्ञान नहीं भरा तो वो विशेषता वा गुण ज्ञान मार्ग के बाद इतनी सेवा नहीं कर सकता। *नेचरल गुण में भी ज्ञान भरना ही पड़ेगा। तो ज्ञान भरने वाला कौनबाप।* तो किसकी देन हुईदाता कौनतो आपको लेवता अच्छा लगता है या दाता अच्छा लगता है? तो लेवता के पीछे क्यों भागते हो?

✺   *ड्रिल :-  "किसी भी व्यक्ति की विशेषता, गुणों व् सेवा को देखते हुए सदैव दाता को स्मृति में रखना"*

➳ _ ➳  *कृष्ण के रंग में रंगी... कृष्ण के प्यार में समर्पित राधा...* कृष्णमयी राधा का दिव्य... अलौकिक जन्म... *पवित्र प्रेम की साम्राज्ञी राधा... स्वार्थ से परे निर्मल प्रेम की अविरत बहती धारा* राधा... सतयुगी प्रिन्स... प्रिन्सेस की दिव्य छबि देख मन हर्षित हो जाता हैं... संपूर्ण पवित्र... संपूर्ण समर्पित... राधा जो सिर्फ कृष्ण को ही देखती... कृष्ण को ही जानती... कृष्ण को ही महसूस करती... कृष्ण की ही यादों में खोयी... कृष्ण की ही स्नेह से बंधी सिर्फ कृष्ण की ही विशेषता को देखती... *क्या मैं राधा बन पाई हूँ...* क्या मेरे मन बुद्धि में शिव बाबा के प्रति दिव्य और अलौकिक... निःस्वार्थ प्रेम के झरने बहते हैं... क्या मेरा मन देह धारियो में और उनके प्रति आकर्षणों में तो बंधा नहीं हैं... *क्या मेरा मन कोई विशेष व्यक्ति प्रति... उसकी सेवाओ प्रति तो स्नेहित नहीं हो रहा हैं...*

➳ _ ➳  क्या मैं सेवा में विशेषता प्रदान कराने वाले दाता को न देख सेवाधारी को तो देखती नहीं हूँ... अपने इस मनः स्थिति से उलझी मैं आत्मा... *राधा बनने की कतार में कोसो दूर खड़ी... बापदादा को पुकार रही हूँ...* मेरा प्यार भरा आह्वान सुनकर बापदादा अपने रूहानी स्वरुप में मुझ आत्मा के सामने उपस्थित हो जाते हैं... *मुझ आत्मा को अपनी अनंत शक्तियों से आच्छादित करते जा रहे हैं...* प्यार भरी दृष्टि से भिगोते जा रहे हैं... और मैं आत्मा बापदादा के साथ... सूक्ष्म वतन की सैर पर चल पड़ती हूँ... *सूक्ष्म वतन का रूहानी नजारा... एडवांस पार्टियों का रूहानी समारोह देख रही हूँ...* मेरा और बापदादा का आगमन इस रूहानी समारोह में चार चांद लगा रहा हैं...

➳ _ ➳  *बापदादा से आती हुई... चमकीली श्वेत किरणें सारे सूक्ष्म वतन में फ़ैल रही हैं...* फूलों की रंग बिरंगी पंखुड़ियों से हमारा स्वागत हो रहा है... और बापदादा के समीप ही मुझ आत्मा के फ़रिश्ते स्वरुप को बिठाया जाता हैं... अचरज भरी नैनों से मैं आत्मा इस रूहानी सभागृह को देखती रहती हूँ... बापदादा सभी एडवांस पार्टियों की आत्माओं की विशेषता को मुझ आत्मा को बता रहे हैं... और मैं आत्मा ऐसी महान हस्तिओं को देख गर्व से फूली नहीं समाती हूँ... *उनकी सेवा के प्रति लगन... बापदादा के प्रति सच्चा सच्चा रूहानी प्यार... सच्चा सच्चा समर्पण... निःस्वार्थ स्नेह का झरना प्रत्यक्ष बहता देख रही हूँ...* न अपने सेवा के प्रति अभिमान... न मेरेपन के जंज़ीरों में बंधे और न ही किसी भी देहधारी के प्रति... उसकी सेवा के प्रति स्नेह पूर्ण लगाव...

➳ _ ➳  अपने अपने अलौकिक पार्ट को बापदादा की आशीर्वादों से परिपूर्ण कर बापदादा के दिलतख्तनशींन बन गए हैं... *गुणों को देखा... सेवा को देखा... लेकिन दाता को नहीं भूले...* दाता के बच्चे दाता को ही देखते हैं... दाता के बच्चे दाता को छोड़ लेवता में अपनी शक्तियों को व्यर्थ नहीं करते हैं... *ईश्वरीय सेवा की विशेषता अज्ञान में नहीं हो सकती... ऐसी महान एडवांस पार्टी की सभी आत्माओं का श्रृंगार आज बापदादा अपने हाथों से कर रहे थे... बिना बाप का बने  व्यक्ति में सेवा का गुण या विशेषता आ ही नहीं सकती हैं...* सभी की विशेषताओ को रूहानी सभा में बापदादा संबोधित कर रहे थे और बाबा के यह महावाक्य सभी योगी... तपस्वी आत्माओं तक... विश्व के सभी सेंटर तक... पहुँच रहे थे...

➳ _ ➳  *ज्ञान भरने वाला कौनबाप... सेवा की विशेषता में चार चांद लगाने वाला कौन ? बाप... व्यक्ति के सेवा की विशेषता का दाता कौनबाप...*  जब सब कुछ एक बाप का ही दिया हुआ हैं तो बुद्धि सिर्फ एक बाप में ही तो लगानी हैं... *सच्ची सच्ची राधाओं का रूहानी मेला* देखकर मैं आत्मा अपने आप को सच्ची राधा बनाने के रास्ते पर चल पड़ी हूँ... *सेवा को देखती... सेवाधारियों को नहीं... सेवा की विशेषता को देखती... व्यक्ति की विशेषता को नहीं...* और मैं आत्मा राधा बनने की कतार में पहली खड़ी हूँ... संगमयुग में बापदादा से सतयुगी स्वराज्य का राजतिलक लगा रही हूँ...

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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