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 09 / 11 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कुछ भी हुआ तो भावी समझ शनत रहे ?*

 

➢➢ *बहुत प्यार और नम्रता से सबको बाप का परिचय दिया ?*

 

➢➢ *नम्रता रुपी कवच द्वारा व्यर्थ के रावण को जलाया ?*

 

➢➢ *मेरेपन की अनेक हद की भावनाओं को एक "मेरे बाबा" में समा दिया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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〰✧  *लगाव की रस्सियों को चेक करो।* बुद्धि कहीं कच्चे धागों में भी अटकी हुई तो नहीं है? कोई सूक्ष्म बंधन भी न हो, अपनी देह से भी लगाव न हो - *ऐसे स्वतन्त्र अर्थात् स्पष्ट बनने के लिए बेहद के वैरागी बनो तब अव्यक्त स्थिति में स्थित रह सकोगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बाप का हाथ सदा अपने मस्तक पर अनुभव करने वाली भाग्यवान आत्मा हूँ"*

 

*बाप का हाथ सदा मस्तक पर है ही - ऐसा अनुभव करते हो? श्रेष्ठ मत श्रेष्ठ हाथ है।*

 

  *तो जहाँ हर कदम में बाप का हाथ अर्थात् श्रेष्ठ मत है, वहाँ श्रेष्ठ मत से श्रेष्ठ कार्य स्वत: ही होता है। सदा हाथ की स्मृति से समर्थ बन आगे बढ़ते चलो।*

 

  *बाप का हाथ सदा ही आगे बढ़ाने का अनुभव सहज कराता है। इसलिए, इस श्रेष्ठ भाग्य को हर कार्य में स्मृति में रख आगे बढ़ते रहो। सदा हाथ है, सदा जीत है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अच्छा! सभी एक-दो के साथी हैं। विन करना सहज है। क्यों सहज है? (बाबा साथ है) और अनेक बार विजयी बने हैं तो रिपीट करने में क्या मुश्किल है। कोई नई बात करनी होती है तो मुश्किल लगता है और किया हुआ काम फिर से करो तो मुश्किल लगता है क्या?

 

✧  तो *कितनी बार विजयी बने हो?* कितना सहज है! *किये हुए कार्य में कभी क्वेचन नहीं उठेगा* - कैसे होगा, क्या होगा, ठीक होगा, नहीं होगा? किया हुआ है तो इजी हो गया ना। कितना इजी? बहुत इजी है! अभी इजी लग रहा है। वहाँ जा के मुश्किल हो जायेगा? *सदा इजी।*

 

✧  जब मुश्किल लगे तो याद करो - *कितने बारी किया है तो मुश्किल के बजाये इजी हो जायेगा।* सभी बहादुर हैं। क्या याद रखेंगे? बिन्दु बनना भी बिन्दु है, लगाना भी बिन्दु है। फुलस्टॉप लगाना अर्थात बिन्दु लगाना। तो इसको भूलना नहीं। अच्छा (पार्टियों के साथ)

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  सभी एवररेडी बन कर बैठे हुए हो? कोई भी देह के हिसाब-किताब से भी हल्का। वतन में शुरू शुरू में पंछियों का खेल दिखलाते थे, पंछियों को उड़ाते थे। वैसे *यह आत्मा भी पंछी है जब चाहे तब उड़ सकती है। वह तब हो सकता है जब अभ्यास हो। जब खुद उड़ता पंछी बनें तब औरों को भी एक सेकेण्ड में उड़ा सकते हैं। अभी तो समय लगता है।* अपरोक्ष रीति से वतन का अनुभव बताया। अपरोक्ष रूप से कितना समय वतन में साथ रहते हो?

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  यह टाइम बहुत वैल्युएबल है इसे व्यर्थ नहीं गंवाना"*

 

_ ➳  *मैं सौभाग्य से सजी आत्मा... अपने संगम के सौभाग्य के नशे में खोयी हुई.उड़ चलती हूँ... और मधुबन घर के पांडव भवन के शांति स्तम्भ पर... और मीठे बाबा के सम्मुख बेठ जाती हूँ... मीठे बाबा से अनवरत आती शक्तियो की किरणों को स्वयं में भरती जा रही हूँ...* और मीठे बाबा से दिल की बाते कहती जा रही हूँ... मीठे बाबा भी मेरी यादो में उतावले... अपना परमधाम छोड़ मेरे दिल के करीब मौजूद है.. एक दूजे की यादो में खोये हुए बाबा और मै... एक दूजे की धड़कन की सुन रहे है... बाबा की धड़कन कह रही है.. मेरे मीठे बच्चे... और मेरा दिल सुना रहा है... मेरे मीठे बाबा...

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को ज्ञान रत्नों से निखारते हुए कहते है :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... इस पुरानी दुनिया और देह के बन्धनों से बुद्धियोग निकाल कर शिव पिता की यादो में खो जाओ... हर पल, हर साँस मीठे बाबा को याद कर स्वर्ग का राज्य भाग्य अपनी बाँहों में भर लो... *ज्ञान रत्नों की झनकार में सदा खोये रहो... अब जब भगवान ही जीवन में आ गया है... तो किसी भी व्यर्थ में स्वयं को न उलझाओ.*.."

 

_ ➳  *मै भाग्यशाली आत्मा अपने बाबा से पाये अमूल्य खजाने को निहारती हुई कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... देह के नातो में जो मै आत्मा उलझ गयी थी... *आपके प्यार भरे हाथो ने उन गांठो को सुलझा कर मुझे आत्मिक स्वरूप की माला में पिरो दिया है... आत्मिक प्रेम का पर्याय बनी मै आत्मा हर पल समर्थ चिंतन और आपकी मीठी यादो में मगन हूँ.*.."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा पर ज्ञान धारा को प्रवाहित करते हुए कहते है :-* "मीठे लाडले बच्चे...  शिवबाबा की यादो भरा यह खुबसूरत वरदानी साथ मीठे भाग्य की बलिहारी है... *इस समय को अब किसी भी व्यर्थ में न खपाओ... ईश्वर पिता के साये में, गुणो और मूल्यों से सज संवर कर, देवता बन जाओ..*."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने प्यारे बाबा के ज्ञान दौलत की वारिस बनकर मुस्कराते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मनमीत बाबा... आपके सच्चे प्रेम ने मुझ आत्मा का कायाकल्प किया है... *आपके प्यार ने मेरे दुर्गुणों को भस्म कर, मुझे अमूल्य रत्नों और गुणो की दौलत से भरपूर किया है... मै आत्मा, ज्ञान बुलबुल बनकर इस विश्व बगिया में चहक रही हूँ..."*

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को अपने वरदानों से सराबोर करते हुए कहते है :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... जिस ईश्वर पिता की जनमो से चाहना थी... *जब वो मिल गया है, तो साँस का हर तार, उसकी यादो में पिरो दो... और सदा ज्ञान रत्नों की खनक में खोये रहो...* जो भी सम्मुख आये उनको भी ज्ञान सुनाकर आप समान भाग्यवान बनाओ... यह दौलत हर दिल पर खूब लुटाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने मीठे भाग्य के नशे में डूबकर बाबा से कहती हूँ :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... कब सोचा था कि पत्थर की प्रतिमा से भगवान निकल कर यूँ सजीव हो उठेगा... पिता बनकर मुझे यूँ गोद में बिठाएगा... और टीचर बन ज्ञान रत्नों से मेरी झोलियाँ भरेगा.., सतगुरु बन सदगति करेगा... *मेरे भाग्य ने यह कितना खुबसूरत दिन मुझे दिखलाया है..." मीठे बाबा का दिल से शुक्रिया कर... मै आत्मा अपने कार्य जगत में आ गयी...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कुछ भी होता है तो भावी समझ शांत रहना है*"

 

 _ ➳  ईश्वर बाप द्वारा पढ़ाई जाने वाली यह पढ़ाई मुझे बहुत ही ऊँच पद की प्राप्ति करवाने वाली है। 21 जन्मों के लिए सारे विश्व का राज्य भाग्य दिलाने वाली है। इस बात को स्मृति में ला कर मैं स्वयं से यह प्रतिज्ञा करती हूँ कि इतने ऊँच पद को पाने का तीव्र पुरुषार्थ मुझे अवश्य करना है। और *आज बाबा ने फ़रमान किया है कि ऊँच पद पाने के लिए बहुत - बहुत शांतचित रहना है। तो अब मुझे बाबा के इस फरमान पर चल स्वयं को ऐसा शांन्त चित बनाना है कि कोई भी परिस्थिति मुझे कभी हलचल में ला कर अशांत ना कर सके*।

 

 _ ➳  स्वयं से यह प्रतिज्ञा कर, अब मैं अपने शांन्त स्वधर्म में स्थित हो कर बैठ जाती हूँ। शांति की गहन अनुभूति करते हुए, सेकण्ड में ही मैं स्वयं को इस देह से न्यारा, एक चमकता हुआ सितारा अनुभव करते हुए, देह रूपी इस पिंजड़े से बाहर निकल आती हूँ और अपने घर शांति धाम की ओर चल पड़ती हूँ। *मुझ सितारे से निकल रही किरणों से शांति के वायब्रेशन चारों और फैलते जा रहें हैं*। अपनी शांति की किरणे चारों ओर फैलाता हुआ, साकार दुनिया के अद्भुत नजारों को देखता हुआ मैं चमकता सितारा, मैं शांन्त स्वरूप आत्मा अपने पिता परमात्मा के प्रेम में मगन उनसे मिलन मनाने की तीव्र लग्न में एक अति शन्तिमई यात्रा पर निरंतर बढ़ती जा रही हूँ। 

 

 _ ➳  साकार लोक को पार कर, सूक्षम लोक को भी पार कर, मैं आत्मा पहुंच गई शान्तिधाम अपने शिव पिता परमात्मा के पास। *देख रही हूँ अब मैं स्वयं को अपने अनादि ज्योतिर्मय स्वरूप में, शांति के सागर अपने शिव पिता के सम्मुख परमधाम में*। मेरे शिव पिता से निकल रहे शांति के शक्तिशाली वायब्रेशन पूरे परमधाम घर मे फैले हुए हैं जो मुझे गहन शांति का अनुभव करवा रहें हैं। गहन शांति की गहन अनुभूति में खोई अपने शिव पिता को मैं निरन्तर निहार रही हूँ और उनसे आ रही शांति की शक्तिशाली किरणों की मीठी फ़ुहारों का आनन्द ले रही हैं। *63 जन्मों से मैं आत्मा जिस शान्ति के लिए प्यासी थी मेरी वो जन्म - जन्मान्तर की प्यास जैसे बुझ रही है। इतने लम्बें समय के बाद अब मैं स्वयं को तृप्त अनुभव कर रही हूँ*। 

 

 _ ➳  शांति के सागर मेरे शिव पिता से आ रहे शांति के शक्तिशाली वायब्रेशन मुझे अपनी ओर खींच रहें हैं। धीरे - धीरे अपने शिव पिता की ओर मैं बढ़ रही हूँ और जा कर उनके साथ कम्बाइंड हो जाती हूँ। *कम्बाइंड स्वरूप की स्थिति में मुझे ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे शांति के सागर में मैं डुबकी लगा रही हूँ*। बाबा से निकल रही सर्वशक्तियों रूपी सतरंगी किरणों का झरना मुझ आत्मा पर बरस रहा हैं। मैं असीम आनन्द का अनुभव कर रही हूँ। एक अलौकिक दिव्यता से मैं आत्मा भरपूर होती जा रही हूँ। *शांति के सागर मेरे बाबा असीम शांति से मुझे भरपूर करके आप समान मास्टर शांति का सागर बना रहे हैं*।

 

 _ ➳  गहन शांति की अनुभूति करके और शांति की शक्ति से स्वयं को भरपूर करके, कर्म करने हेतु अब मैं साकार सृष्टि में आ जाती हूँ। अपने साकारी तन में भृकुटि पर विराजमान हो कर, मैं हर कर्म कर रही हूँ। *आंखों से सब कुछ देख रही हूँ, कानो से सब कुछ सुन रही हूँ, मुख से बोल रही हूँ और ये सभी कार्य मैं अपने शांन्त स्वधर्म में स्थित हो कर के कर रही हूँ*। अपने स्वधर्म में स्थित हो कर हर कर्म करने से मेरी सर्व कर्मेन्द्रियां शांत और शीतल होती जा रही हैं । मेरे विचार शांत हो रहे हैं। *कैसी भी अशान्त करने वाली परिस्थिति मेरे सामने क्यों ना आ जाये किन्तु मेरी शांतचित स्थिति मुझे हर विपरीत परिस्थिति में भी अचल - अडोल बनाये रखती है*।

 

 _ ➳  *अपने शांन्त स्वधर्म में सदा स्थित रहते हुए, शांतचित स्थिति को बनाये, शांति के वायब्रेशन चारों और फैलाते हुए अब मैं अपने आस - पास के वातावरण को शांतिपूर्ण बना कर ऊँच पद की अधिकारी आत्मा बनने का पुरुषार्थ निरन्तर कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं नम्रता रूपी कवच द्वारा व्यर्थ के रावण को जलाने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं सच्ची स्नेही आत्मा हूँ।*

✺   *मैं सहयोगी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा मेरेपन की अनेक हद की भावनाओं से सदा मुक्त हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा उन भावनाओं को एक "मेरे बाबा" में समा देती हूँ  ।*

✺   *मैं बंधनमुक्त आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बापदादा पहली सेवा यही बताते हैं कि अभी समय अनुसार सभी बच्चे वानप्रस्थ अवस्था में हैंतो *वानप्रस्थी अपने समय, साधन सभी बच्चों को देकर स्वयं वानप्रस्थ होते हैं। तो आप सभी भी अपने समय का खजाना, श्रेष्ठ संकल्प का खजाना अभी औरों के प्रति लगाओ।* अपने प्रति समय, संकल्प कम लगाओ। औरों के प्रति लगाने से स्वयं भी उस सेवा का प्रत्यक्षफल खाने के निमित्त बन जायेंगे। *मन्सा सेवावाचा सेवा और सबसे ज्यादा - चाहे ब्राह्मणचाहे और जो भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हैं उन्हों को कुछ न कुछ मास्टर दाता बनके देते जाओ। नि:स्वार्थ बन खुशी दो, शान्ति दोआनंद की अनुभूति कराओ, प्रेम की अनुभूति कराओ।* देना है और देना माना स्वत: ही लेना। *जो भी जिस समय, जिस रूप में सम्बन्ध-सम्पर्क में आये कुछ लेकर जाये। आप मास्टर दाता के पास आकर खाली नहीं जाये।* जैसे ब्रह्मा बाप को देखा - चलते-फिरते भी अगर कोई भी बच्चा सामने आया तो कुछ न कुछ अनुभूति के बिना खाली नहीं जाता। यह चेक करो जो भी आया, मिलाकुछ दिया वा खाली गया? *खजाने से जो भरपूर होते हैं वह देने के बिना रह नहीं सकते। अखुट, अखण्ड दाता बनो। कोई मांगेनहीं। दाता कभी यह नहीं देखता कि यह मांगे तो दें।*अखुट महादानी, महादाता स्वयं ही देता है। तो पहली सेवा इस वर्ष - महान दाता की करो। आप दाता द्वारा मिला हुआ देते हो। ब्राह्मण कोई भिखारी नहीं हैं लेकिन सहयोगी हैं। तो *आपस में ब्राह्मणों को एक दो में दान नहीं देना है, सहयोग देना है। यह है पहला नम्बर सेवा।*

 

✺   *ड्रिल :-  "मास्टर दाता बन हर एक आत्मा को कुछ ना कुछ देने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा इस स्थूल शरीर को छोड़ अशरीरी बन उड़ चलती हूँ शान्तिधाम... शान्तिधाम की गहन शान्ति को गहराई से अनुभव करती हूँ... मैं आत्मा मास्टर दाता की स्थिति धारण कर... सर्वशक्तिवान... शिवबाबा... दाता के समीप बैठ जाती हूँ... *शिवबाबा से निकलती शक्तिशाली किरणों को मैं आत्मा स्वयं में धारण करती जा रही हूँ... भरपूर होती जा रही हूँ... अब मैं आत्मा... दाता की बच्ची... मास्टर दाता बन हर एक आत्मा को दातापन की दृष्टि से देख रही हूँ...*

 

 _ ➳  मैं बाबा की बच्ची... शांतिदाता की बच्ची... शान्त स्वरूप हूँ... मास्टर दाता हूँ... *बाबा ने मुझ आत्मा को वरदानों से... गुणों से श्रृंगारित कर सर्व आत्माओं को दुःखों से... विघ्नों से... अशांति से मुक्त कराने के निमित्त बनाया है... मुझ आत्मा को सर्व आत्माओं को सुख... शांति... प्रेम की अनुभूति करानी है... मैं आत्मा अशरीरी बन सर्व आत्माओं के प्रति शांति के वायब्रेशनस फैला रही हूँ... स्वदर्शन चक्रधारी बन सुख के वाइब्रेशन्स फैला रही हूँ...*

 

 _ ➳  मैं पद्मापदम् सौभाग्यशाली आत्मा हूँ... बाबा ने मुझे अपना बनाकर... खजानों से सम्पन्न बना दिया... मैं आत्मा सदा भरपूरता के नशे में रहती हूँ... ख़ुशी का पारा चढ़ा रहता है... *बाबा कहते हैं... बच्ची, देना ही लेना है... इसलिये बांटते चलो... तुम्हारी झोली स्वतः ही भरती जायगी... तो जिस शक्ति का जिस समय आह्वान करती हूँ... वह शक्ति उस समय जी हाज़िर हो जाती है... और मैं आत्मा शक्ति स्वरूप बन औरों को बाँट कर उन्हें ख़ुशी व शांति की अनुभूति कराती हूँ...*

 

 _ ➳  मैं शांत स्वरूप आत्मा, आत्मिक स्वरूप में स्थित होकर... शांति सागर परमात्मा से योगयुक्त होकर... गहन शांति में स्थित हो फिर शांति की किरणों का प्रवाह अन्य आत्माओं पर प्रवाहित करती हूँ... *सर्वशक्तिवान से बुद्धि जोड़ने से असीम शक्तियों का प्रवाह कमजोर आत्माओं में बल भर रहा है... और उन्हें शांति की अनुभूति हो रही है... जो भी आत्मा मेरे सम्बन्ध सम्पर्क में आती है... उसे बिना मांगे... बिना कहे शांति का अनुभव होने लगता है...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा सदा सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली सर्व आत्माओं के प्रति शुद्ध और शुभ भावना रखती हूँ... *शुभ कामना और निमित्त भाव के साथ मास्टर दाता बन हर एक को सुख शांति की अनुभूति करा रही हूँ...* मैं आत्मा अपने पवित्र संकल्पों का प्रभाव सभी आत्माओं तक पहुँचा रही हूँ... शुद्ध संकल्पों से सर्व आत्माओं का कल्याण कर रही हूँ... *मैं आत्मा मनसा सकाश द्वारा सर्व आत्माओं को परमात्म स्नेह की पालना का एहसास करवा रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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