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 10 / 01 / 17  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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शिवभगवानुवाच :-

➳ _ ➳  रोज रात को सोने से पहले बापदादा को पोतामेल सच्ची दिल का दे दिया तो धरमराजपुरी में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 2*5=10)

 

➢➢ *मुरली धारण कर फिर सुनायी ?*

 

➢➢ *तूफानों से डरे तो नहीं ?*

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∫∫ 2 ∫∫ विशेष अभ्यास (Marks:3*10=30)

 

➢➢ *देह अभिमान के अंशमात्र की भी बलि चडाने का पुरुषार्थ किया ?*

 

➢➢ *"इच्छा नहीं थी, लेकिन अच्छा लग गया" - ऐसी जीवनबन स्थिति का तो अनुभव नहीं किया ?*

 

➢➢ *परमधाम की ऊंची स्थिति में बैठकर नीचे पूरे ग्लोब को साकाश देने की सेवा की ?*

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∫∫ 3 ∫∫ विशेष पुरुषार्थ (Marks: 10)

( इस रविवार की अव्यक्त मुरली से... )

 

➢➢ *इष्ट देवात्मा के संस्कार इमर्ज किये ?*

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∫∫ 4 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

➢➢ *"मीठे बच्चे - आधाकल्प से जो 5 विकारो की बीमारियां लगी हुई थी, वह अब छूटी कि छूटी, इसलिए अब अपार ख़ुशी में रहना है"*

 

❉   प्यारा बाबा कहे - मेरे मीठे फूल बच्चे... अब दुःख के दिन बीत चले अब सुख की दस्तक लिए सतयुग सामने खड़ा सा है... *अब विकारो की कालिमा धुल चली और सुनहरा आत्मिक वजूद दमक उठा है.*.. यह सोच कर अपार ख़ुशी से भर चलो... आनन्द के सागर में ठांठे मार कर मुस्कराओ...

 

➳ _ ➳  आत्मा कहे - हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा पुण्य आत्मा बन मुस्करा रही हूँ... ईश्वर पिता के हाथो में चमकते अपने भाग्य को देख देख निहाल हूँ... विकारी जीवन से मुक्त *पवित्रता के श्रंगार में महकता जीवन यूँ पाकर मीठे बाबा के प्यार में अभिभूत हूँ..*.

 

❉   मीठा बाबा कहे - मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वर पिता के प्यार भरी छाँव ने जनमो के विकारो की तपन से मुक्त किया है... *अब पवित्रता की मुस्कान ने जीवन को सच्चे सौंदर्य से दमका दिया है.*.. ईश्वरीय पालना के अपने महा भाग्य को सराहो और अपार ख़ुशी में डूब जाओ...

 

 ➳ _ ➳  आत्मा कहे - मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा देह के रिश्तो को सर्वोपरि समझ खपती चली जा रही थी... विकारो में सुख ढूंढकर दुर्गुणों का पर्याय बन बेठी थी कभी... और आज मीठे बाबा आपको पाकर *सच्चे सुखो और पवित्र मुस्कान से सजधज कर नई नवेली हो चली हूँ..*.

 

❉   मेरा बाबा कहे - प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... सच्चा पिता सच्चे सुखो को हथेली पर सौगात सजा आया है... अब विकारो की धुप में कुम्हलाये फूल बच्चे.. सच्चे प्यार की पालना पाकर सदा की महक से भर रहे है... *अब खुशियां बहुत नजदीक है... मीठे सुख बाँहों में भरने को आतुर है.*..

 

➳ _ ➳  आत्मा कहे - हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अब विकारीपन से पूर्णतया मुक्त हूँ... अब नये सुख नई सी दुनिया और नया नया सा श्रंगार पाकर देवत्व से सजने के दिन आ चले है... *अथाह खुशियो में हँसने मुस्कराने खिलखिलाने के मीठे दिन बांहे फैला कर मुझे पुकार रहे है.*..

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∫∫ 5 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मैं आत्मा महाबलवान हूँ ।"*

 

➳ _ ➳  मैं *एक अवतरित आत्मा* हूँ... मैं आत्मा 84 जन्मों से भिन्न-भिन्न देह धारण कर... पार्ट बजाते बजाते देह अभिमान में आ गई थी... मुझ आत्मा ने अल्पकाल की विजय की आश में अभिमान को ही स्वमान समझ लिया था... मैं आत्मा अज्ञान अंधकार के कारण देह-अभिमान में समाई हुई बहुतकाल की हार को नहीं देख पाई थी...

 

➳ _ ➳  अब ये मुझ आत्मा का अंतिम जन्म है... अब मुझ आत्मा को पार्ट समाप्त कर वापस घर जाना है... मुझ आत्मा को देही अभिमानी बन घर जाना है... सर्वशक्तिवान बाबा ने *अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ* रचा है... इस यज्ञ में सारी कलियुगी दुनिया स्वाहा हो जायेगी... मुझ आत्मा को भी अपना सब कुछ इस यज्ञ में समर्पित करना है...

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा *मनमनाभव के मंत्र से योगाग्नि प्रज्जवलित* करती हूँ... मैं आत्मा तन, मन, धन सब इस यज्ञ में समर्पित करती हूँ...  इस पवित्र योगाग्नि में मुझ आत्मा का देह अभिमान, देह के पदार्थों का आकर्षण, देह के सम्बन्धों प्रति मोह सब भस्म होते जा रहें हैं... देह-अभिमान की अंश और वंश सहित बलि चढा रहीं हूँ... मैं आत्मा सारी सूक्ष्म कमजोरियों को समर्पित करते जा रहीं हूँ...

 

➳ _ ➳  अब मैं आत्मा एक प्यारे बाबा की याद से सबसे बड़ी कमजोरी देह-अभिमान की सूक्ष्म अंश को भी बलि चढाकर *देही-अभिमानी बन रहीं* हूँ... मैं आत्मा ज्ञान अमृत पीकर बलवान बनती रहीं हूँ... योगबल से शक्तिशाली बनती जा रहीं हूँ... मैं आत्मा सदा स्व-स्वरूप की स्मृति में ही स्थित रहने का अभ्यास करती हूँ...

 

➳ _ ➳  अब मैं आत्मा सिर्फ निमित्त भाव से हर कर्म, हर सेवा कर रहीं हूँ... करावनहार करा रहा है मैं आत्मा करनहार बन कर रहीं हूँ... हर कर्म हर सेवा, सेवा के फल को भी बाबा को अर्पित कर देती हूँ... मैं आत्मा हर पल अटेन्शन रखती हूँ कि नाम, मान, शान की इच्छा रॉयल रूप में भी न आयें... अब मैं आत्मा देह अभिमान के अंश मात्र की भी बलि चढाने वाली *महाबलवान बन गई* हूँ...

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∫∫ 6 ∫∫ योग अभ्यास (Marks-10)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सूक्ष्म इच्छा या कुछ अच्छा लगना इसको भी समाप्त कर जीवनमुक्ति का अनुभव करना।"*

 

➳ _ ➳   *मैं आत्मा इच्छा मातरम् अविद्या हूँ...* सूक्ष्म में भी कोई भी बात की इच्छा नहीं हैं... इच्छा नहीं पर कुछ अच्छा लगना ये भी बन्धन हैं... ना किसी बात, व्यक्ति या वस्तु प्रति आकर्षण हैं... मैं आत्मा कदम-कदम पर चेक करती हूँ... मैं आत्मा ऐसे किसी सूक्ष्म आकर्षण में तो फंसी नहीं हूँ?...

 

➳ _ ➳   *मैं आत्मा परमात्मा की अमानत हूँ...* ये मेरा ब्राह्मण जीवन उनकी अमानत हैं... जब जीवन ही बाबा को सौंप दिया... फिर मुझे किसी भी बात की इच्छा कैसे हो सकती हैं... वो जैसा रखे सब अच्छा हैं... मुझे किसी भी बात का सूक्ष्म आकर्षण भी नहीं हैं... कोई भी बात मुझे खींच नहीं सकती... ना मुझे कुछ विशेष अच्छा लगता, ना ही बुरा...

 

➳ _ ➳   सर्व के प्रति समभाव की दृष्टी रखती... मैं सम्पूर्ण सन्तुष्ट आत्मा हूँ... मेरी सभी कर्मेन्द्रियाँ मेरे ऑर्डर प्रमाण चलती हैं... *कोई भी इन्द्रियाँ कभी मायावी आकर्षण की और चलायमान नहीं होती...* ड्रामा की पट्टी पर पक्की हो चलती... सब अच्छा, सब अच्छे... यही सदा स्मृति में रखती हूँ...

 

➳ _ ➳   मैं आत्मा सम्पूर्ण सन्तुलन में रहते... सम्पूर्ण जीवन मुक्ति का अभी ही अनुभव करती हूँ... ना कोई सूक्ष्म ते सूक्ष्म इच्छा हैं...  कुछ अच्छा लग गया... ऐसा भी कभी नहीं होता हैं... *दुनिया में रहते भी इस दुनिया से उपराम हूँ...* परमपिता की स्नेही मैं न्यारी और प्यारी आत्मा हूँ...

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∫∫ 7 ∫∫ ज्ञान मंथन (Marks:-10)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

➢➢  *देह - अभिमान के अंशमात्र की भी बलि चढ़ाने वाले महाबलवान होते हैं...  क्यों और कैसे?*

 

❉   देह - अभिमान के अंश मात्र की भी बलि चढ़ाने वाले महाबलवान होते हैं क्योंकि...  हमारी सबसे बड़ी कमजोरी होती है देह - अभिमान की और *देह - अभिमान का सूक्ष्म वंश और अंश बहुत बड़ा* है और देह - अभिमान की बलि चढ़ाना अर्थात!  अंश और वंश सहित बाप पर समर्पित हो जाना है।

 

❉   तभी तो कहा गया है कि...  देह-अभिमान के अंशमात्र की भी बलि चढ़ाने वाले महाबलवान होते है। इसका ज़रा भी भान अर्थात!  देह अभिमान सभी विकारों की जड़ होता है, क्योंकि *हम आत्मायें जब देह भान में आती हैं तब सभी विकार* हमारे अन्दर आने लगते हैं।

 

❉   तभी तो!  हम अपने सब से बड़े विकारदेह अभिमान का त्याग करकेतथा इससे उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म अंश मात्र विकारों को भी प्रभु के अर्पण कर देते हैं तब उस विधि को ही देह अभिमान की बलि चढ़ना कहते हैं। हमें *अपना सब कुछ भगवान को अर्पित कर देना* है। 

 

❉   अर्थात!  देह और देह से सम्बन्धित सूक्ष्म देह के भान को भी सूक्ष्मता से परमात्मा शिव को समर्पित कर देना है। इस प्रकार से अपने सूक्ष्म ते अति सूक्ष्म देह अभिमान को *बाबा पर बलि चढ़ा देने वाले को ही महाबलवान कहा* जाता है। अतः हमें अपने देह के अभिमान को उसके अंश और वंश के सहित परम पिता परमात्मा के प्रति समर्पित कर देना है।

 

❉   यदि हमने देह अभिमान का कोई भी अंश छिपा कर रख लिया और अभिमान को ही स्वमान समझ लिया तो उसमें *अल्पकाल की विजय भल दिखाई देगी* लेकिन! उस में सफलता की प्राप्ति नहीं होगी बल्कि!  उसमें तो बहुत काल की हार ही समाई हुई होगी।

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∫∫ 8 ∫∫ ज्ञान मंथन (Marks:-10)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

➢➢  *इच्छा नहीं थी लेकिन अच्छा लग गया - यह भी जीवनबंध स्थिति है... क्यों और कैसे* ?

 

❉   किसी चीज की इच्छा ना होते हुए उस चीज का अच्छा लगना भी इच्छा का ही अप्रत्यक्ष रूप है । जो कि सूक्ष्म रूप के देह अभिमान का कारण बनती है और देह अभिमान *देह और देह की दुनिया के आकर्षणों से आत्मा को मुक्त नही होने देता* । यह आकर्षण सोने की जंजीरों के समान हैं जो आत्मा को ऐसे बन्धनों में बांध देते हैं जिनसे निकलने में फिर बहुत मेहनत लगती है । यही जीवनबन्ध स्थिति है ।

 

❉   हद के नाम, मान और शान की इच्छा ना रखना किन्तु नाम, मान और शान अच्छा लगना यह एक प्रकार की रॉयल इच्छा है । क्योकि किसी चीज को पाने की इच्छा ना होना किन्तु मिलने पर अच्छा लगना तो *अच्छा लगने का यह भाव भी रॉयल रूप का मांगना है* और जहाँ मांगने का भाव है वहां अधीनता है और जो अधीन है वह कभी भी जीवनमुक्त स्थिति का अनुभव नही कर सकता क्योकि अधीनता की स्थिति है ही जीवनबन्ध स्थिति ।

 

❉   कोई भी वस्तु या व्यक्ति अगर अच्छा लगता है तो यह आकर्षण भी लगावमुक्त बनने नही देगा । क्योकि जिस व्यक्ति या वस्तु से लगाव है बुद्धि का झुकाव भी स्वत: ही उस ओर रहेगा । मन बुद्धि बार - बार उस वस्तु या व्यक्ति की और आकर्षित होगी और *यह आकर्षण आत्मा को हद के बंधनों में बांध कर उसे कभी भी निर्बन्धन स्थिति का अनुभव नही होने देगा* और निर्बन्धन स्थिति का अनुभव ना होना ही जीवनबन्ध स्थिति है ।

 

❉   कर्म का फल स्वत: ही सम्पन्न स्वरूप में सामने आता है । इसलिए बाबा कहते अल्पकाल के भी इच्छा मात्रम अविद्या बनो । *इच्छा नही है लेकिन अच्छा लगना यह संकल्प भी इच्छा मात्रम अविद्या बनने नही देगा* । किसी चीज की इच्छा नही है लेकिन उसकी प्राप्ति अच्छी लग रही है और सन्तुष्टता का अनुभव करा रही है तो यह अल्पकाल की सन्तुष्टता भी अनेक प्रकार के बन्धनों का निर्माण कर जीवन बन्ध स्थिति में ले जाएगी ।

 

❉   जीवनमुक्त स्थिति का अनुभव करने का आधार है तपस्या और तपस्या का आधार है न्यारे और प्यारे बनना । जितना न्यारे और प्यारे रहेंगे उतना स्थिति एकरस रहेगी और बन्धन मुक्त स्थिति का अनुभव कर सकेंगे । *अगर न्यारे और प्यारे नही बनेंगे तो हद के आकर्षणों में आसक्ति रहेगी* । किसी चीज को पाने की इच्छा नही होगी किंतु अगर वो अच्छी लगती है तो यह भी उस चीज में आसक्ति है जो जीवनमुक्त नही बनने देगी ।

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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