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 10 / 02 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *भावुक आत्मा न बन ज्ञानी तू आत्मा बनकर रहे ?*

 

➢➢ *प्रेम स्वरुप व शक्ति स्वरुप दोनों बनकर रहे ?*

 

➢➢ *सदा अपने को फ़रिश्ता अर्थात डबल लाइट अनुभव किया ?*

 

➢➢ *स्वराज्य अधिकारी स्थिति का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *मन को पहले परमधाम में लेके आओ, फिर सूक्ष्मवतन में फरिश्तेपन को याद करो फिर पूज्य रूप याद करो, फिर ब्राह्मण रूप याद करो, फिर देवता रूप याद करो। सारे दिन में चलते फिरते यह 5 मिनट की एक्सरसाइज करते रहो।* इसके लिए मैदान नहीं चाहिए, दौड़ नहीं लगानी है, न कुर्सी चाहिए, न सीट चाहिए, न मशीन चाहिए। सिर्फ शुद्ध संकल्पों का स्वरूप चाहिए।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सर्व सम्बन्ध एक बाप से रखने वाला नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप हूँ"*

 

✧  सर्व सम्बन्धों से बाप को अपना बना लिया है? किसी भी सम्बन्ध में अभी लगाव तो नहीं है? *क्योंकि कोई एक सम्बन्ध भी अगर बाप से नहीं जुटाया तो नष्टोमोहा, स्मृति स्वरूप नहीं बन सकेंगे। बुद्धि भटकती रहेगी।* बैठेंगे बाप को याद करने और याद आयेगा धोत्रा पोत्रा। जिसमें भी मोह होगा वही याद आयेगा। किसका पैसे में होता है, किसका जेवर में होता है, किसका किसी सम्बन्ध में होता - जहाँ भी होगा वहाँ बुद्धि जायेगी। अगर बार-बार बुद्धि वहाँ जाती है तो एकरस नहीं रह सकते।

 

  आधा कल्प भटकते-भटकते क्या हाल हो गया है, देख लिया ना! सब कुछ गँवा दिया। तन भी गया, मन की सुख-शान्ति भी गई, धन भी गया। सतयुग में कितना धन था, सोने के महलों में रहते थे, अभी ईटों के मकान में, पत्थर के मकान में रहते हो, तो सारा गँवा दिया ना! *तो अभी भटकना खत्म। 'एक बाप दूसरा न कोई' - यही मन से गीत गाओ। कभी भी ऐसे नहीं कहना कि यह तो बदलता नहीं है, यह तो चलता नहीं है, कैसे चलें, क्या करूँ...इस बोझ से भी हल्के रहो।* भल भावना तो अच्छी है कि यह चल जाए, इसकी बीमारी खत्म हो जाए लेकिन इस कहने से तो नहीं होगा ना! इस कहने के बजाए स्वयं हल्के हो उड़ती कला के अनुभव में रहो। तो उसको भी शक्ति मिलेगी। बाकी यह सोचना वा कहना व्यर्थ है।

 

  मातायें कहेंगी मेरा पति ठीक हो जाए, बच्चा चल जाए, धन्धा ठीक हो जाए, यही बातें सोचते या बोलते हैं। लेकिन यह चाहना पूर्ण तब होगी जब स्वयं हल्के हो बाप से शक्ति लेंगे। इसके लिए बुद्धि रूपी बर्तन खाली चाहिए। *क्या होगा, कब होगा, अभी तो हुआ ही नहीं, इससे खाली हो जाओ। सभी का कल्याण चाहते हो तो स्वयं शक्तिरूप बन सर्वशक्तिवान के साथी बन शुभ भावना रख चलते चलो। चिन्तन वा चिन्ता मत करो। बन्धन में नहीं फँसो। अगर बन्धन है तो उसको काटने का तरीका है - 'याद'। कहने से नहीं छूटेंगे, स्वयं को छुड़ा दो तो छूट जायेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *एक सेकण्ड में मन की ड़ि्ल याद है? हर एक सारे दिन में कितने बार यह ड़ि्ल करते हो? यह नोट करो।*

 

✧  *यह मन की ड्रिल जितना बार करेंगे उतना ही सहज योगी बनेंगे।* एक तरफ मन्सा सेवा दूसरे तरफ मन्सा एक्सरसाइज। अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी फरिश्ता।

 

✧  ब्रह्मा बाप आप फरिश्तों का आह्वान कर रहे हैं। *फरिश्ता बनके ब्रह्मा बाप के साथ अपने घर निराकार रूप में चलना। फिर देवता बन जाना।* अच्छा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *सम्पूर्ण समर्पण जो हो जाता है उसकी दृष्टि क्या होती है? (शुद्ध दृष्टि, शुद्ध वृत्ति हो जाती है) लेकिन किस युक्ति से वह वृत्ति - दृष्टि शुद्ध हो जाती है? एक ही शब्द में यह कहेंगे कि दृष्टि और वृति में 'रूहानियत आ जाती है। अर्थात् दृष्टि-वृत्ति रूहानी हो जाती है* रूहानी दृष्टि अर्थात् अपने को और दूसरों को भी रूह देखना चाहिए। जिस्म तरफ देखते हुए भी नहीं देखना है, ऐसी प्रैक्टिस होनी चाहिए।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺  *"ड्रिल :- भावुक आत्मा और ज्ञानी आत्मा के लक्षण"*

 

_ ➳  *एकांत में बैठी मैं आत्मा घडी की टिक-टिक को सुन रही हूँ... घडी की टिक-टिक जैसे कह रही हो समय बड़ा अनमोल, समझो इसका मोल... कोई भी पल खो न जाए, गया समय फिर हाथ न आए...* हर घडी अंतिम घडी की स्मृति से मैं आत्मा इस स्थूल देह को छोड़ सूक्ष्म शरीर धारण कर, इस स्थूल दुनिया को छोड़ सूक्ष्म वतन में प्यारे बाबा के पास पहुँच जाती हूँ... मीठे मीठे बाबा संगमयुग के एक-एक सेकंड के अनमोल समय के महत्व को समझा रहे हैं...

 

  *प्यारे बाबा टाइम वेस्ट ना करने की समझानी देते हुए कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... *ईश्वरीय यादो में महकने और खिलने के खुबसूरत लम्हों में सदा ज्ञान के सुरीले नाद से आत्माओ को मन्त्रमुग्ध करना है...* सबका जीवन खुशियो से खिल उठे, सदा इस सुंदर चिंतन में ही रहना है... ईश्वर पिता के साथ भरे इस मीठे समय को सदा यादो से ही संजोना है...

 

_ ➳  *मैं आत्मा एक बाप की याद में रह टाइम आबाद करते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मैं आत्मा आपकी यादो में दीवानी सी... *ज्ञान रत्नों की बौछार सदा साथ लिए, खुशियो के आसमाँ से, आत्माओ के दिल पर बरस रही हूँ... सबको मीठे बाबा का परिचय देकर हर पल पुण्यो की कमाई में जीजान से जुटी हूँ...*

 

  *मीठे बाबा संगम युग की सुहावनी घड़ियों को सफल करने का राज बतलाते हुए कहते है:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... विश्व पिता के प्यार से लबालब, संगम का यह अनोखा अदभुत समय. संसार की व्यर्थ बातो में, भाग्य के हाथो से, यूँ रेत सा न फिसलाओ... *ज्ञानी तू आत्मा बनकर ज्ञान की झनकार पूरे विश्व को सुनाओ... ईश्वर पिता के साथ विश्व सेवा कर 21 जनमो का महाभाग्य पाओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा ज्ञानी तू आत्मा बन बाबा के ज्ञान रत्नों को चारों ओर बांटते हुए कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपसे पाये अमूल्य रत्नों को पूरे विश्व में बिखेर कर सतयुगी बहार ला रही हूँ... *हर पल यादो में खोयी हुई खुशियो में चहक रही हूँ... और ज्ञानी आत्मा बनकर अपनी रूहानी रंगत से बापदादा को प्रत्यक्ष कर रही हूँ...*

 

  *मेरे बाबा मुझ पर वरदानों की रिमझिम बरसात करते हुए कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *सारे कल्प का कीमती और वरदानी समय सम्मुख है... जिसे कन्दराओं में जाकर ढूंढ रहे थे, दर्शन मात्र को व्याकुल थे... वो पिता दिलजान से न्यौछावर सा दिल के इतना करीब है... जो चाहा भी न था वो भाग्य खिल उठा है...* इस मीठे भाग्य के नशे में खो जाओ, सबको ऐसा भाग्यशाली बनाओ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा सच्ची सच्ची रूहानी सेवाधारी बन सारे विश्व में खुशियों को बाँटती हुई कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में सच्चा सुख पाकर 21 जनमो की खुशनसीब बन गयी हूँ... और यह ख़ुशी हर घर के आँगन में उंडेल रही हूँ... *सारा विश्व खुशियो से भर जाये... हर दिल ईश्वरीय प्यार भरा मीठा और सच्चा सुख पाये... यह दस्तक हर दिल को दे रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  स्वराज्य अधिकारी स्थिति का अनुभव*

 

_ ➳  मैं स्वराज्य अधिकारी आत्मा हूँ इस श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर सेट होते ही मैं अनुभव करती हूँ कि भृकुटि के अकालतख्त पर विराजमान मैं आत्मा राजा इस शरीर रूपी रथ पर बैठ, कर्मेन्द्रियों रूपी घोड़े की लगाम थामे उसे जैसा ऑर्डर दे रही हूँ हर कर्मेन्द्रिय उसी ऑर्डर प्रमाण कार्य कर रही है। *जीवन मे आने वाली परीक्षायें और माया के तूफान भी मेरी स्व स्थिति के सामने जैसे हार खा कर भाग रहें हैं। हर कर्मेन्द्रिय मेरी सहयोगी बन मुझे हर परिस्थिति पर विजय दिला रही हैं*। किन्तु इस श्रेष्ठ स्वमान की सीट से नीचे उतरते ही मैं अनुभव करती हूँ जैसे मैं आत्मा राजा कर्मेन्द्रियों की गुलाम बन गई हूँ और हर कर्मेन्द्रिय मुझे धोखा दे रही है। *जीवन मे आने वाली छोटी - छोटी परिस्थितियाँ और माया के तूफान मुझे डरा धमका कर मुझ से विकर्म करवा रहें हैं*।

 

_ ➳  अपने श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर स्थित हो कर कर्म करने और सीट से नीचे उतर कर कर्म करने के अन्तर का स्पष्ट अनुभव करके मन ही मन मैं विचार करती हूँ कि *पूरे 63 जन्म स्वयं को देह समझने की भूल ने मुझ आत्मा से जो विकर्म करवाये उन विकर्मो के बोझ ने मेरी शान्ति और सुख छीन कर मुझे कितना दुखी और अशांत बना दिया है। अपने स्वधर्म को भूल परधर्म में स्थित होकर कर्मेन्द्रियों से भूले करते - करते मेरी ऐसी दशा हो गई कि सही और गलत की पहचान करना ही मैं  भूल गई*। किन्तु अब जबकि मेरे शिव पिता परमात्मा ने आकर मुझे मेरी पहचान देकर यह स्मृति दिला दी है कि मैं आत्मा गुलाम नही राजा हूँ तो अब मुझे सदैव इस स्मृति में स्थित रहना है और स्वयं को कर्मेन्द्रियों के हर धोखे से बचा कर, ऐसी कोई भूल नही करनी जो विकर्म बने।

 

_ ➳  मन ही मन स्वयं से प्रतिज्ञा कर, स्वराज्य अधिकारी बन, अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण कर, देह के परधर्म को भूल अपने स्वधर्म में स्थित होकर अब मैं अपने प्यारे प्रभु  की याद में अपने मन और बुद्धि को स्थित करती हूँ और ज्ञान, योग के पँख लगाकर, देह रूपी रथ का आधार छोड़ ऊपर की और उड़ान भरती हूँ। *भृकुटि के अकालतख्त से बाहर आकर, अपने सिर के ऊपर स्थित होकर, मन बुद्धि के नेत्र से अपनी स्थूल देह को साक्षी होकर देखते हुए, इस देह और देह की दुनिया के हर आकर्षण से मुक्त होकर अब मैं जा रही हूँ ऊपर आकाश की ओर*। निर्बन्धन होकर उड़ते हुए, इस रूहानी उड़ान का आनन्द लेते हुए, आकाश को पार कर, उससे भी ऊपर उड़ते हुए, सूक्ष्म लोक को पार करके मैं पहुँच जाती हूँ आत्माओं की निराकारी दुनिया, अपने स्वीट साइलेन्स होम में।

 

_ ➳  यहाँ पहुँच कर, कुछ क्षण डीप साइलेन्स की अनुभूति में खोकर गहन शान्ति का अनुभव करके अब मैं अपने सामने विराजमान सर्वशक्तिवान, महाज्योति अपने प्यारे शिव पिता के समीप पहुँचती हूँ और उन्हें निहारते हुए धीरे - धीरे उनके बिल्कुल पास जाकर उन्हें स्पर्श करती हूँ। *उन्हें स्पर्श करते ही मैं अनुभव करती हूँ जैसे सर्वशक्तियों की किरणों के रूप में उनका स्नेह मुझ पर बरसने लगा है। उनके स्नेह की शीतल किरणें मेरे रोम - रोम को पुलकित कर रही हैं*। बाबा के स्नेही स्वरूप का अनुभव करते - करते मैं महसूस करती हूँ जैसे बाबा से आ रही सर्वशक्तियों की किरणें अग्नि का रूप धारण कर मेरे द्वारा किये हुए जन्म जन्मांतर के विकर्मो को दग्ध करने लगी है। *विकारो की मैल को अपने ऊपर से उतरता हुआ मैं देख रही हैं*।

 

_ ➳  एक तरफ बाबा का स्नेही स्वरूप मुझे अपने स्नेह की शक्ति से भरपूर कर शक्तिशाली बना रहा है और दूसरी तरफ बाबा का शक्तिस्वरूप सर्वशक्तियों की ज्वलन्त किरणों द्वारा मेरे जन्म - जन्म के पापों को भस्म कर मुझे शुद्ध और पावन बना रहा है। *शुद्ध, पवित्र और शक्ति स्वरूप बनकर मैं वापिस अपना पार्ट बजाने के लिए साकार लोक में लौट आती हूँ*। अपने साकार तन में प्रवेश कर, भृकुटि के भव्य भाल पर विराजमान हो कर, कर्मेन्द्रियों का आधार ले, सृष्टि रूपी कर्मभूमि पर कर्म करने के लिये मैं तैयार हो जाती हूँ।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में अब मैं स्थित हूँ और स्वराज्य अधिकारी की सीट पर सेट होकर हर कर्म कर रही हूँ। "मैं आत्मा राजा कर्मेन्द्रियों की मालिक हूँ" इस स्मृति में सदा रहते हुए अब मैं अपनी इच्छानुसार हर कर्मेन्द्रिय को चला रही हूँ। *कर्मेन्द्रियजीत बन हर कर्म करने से जीवन में आने वाली परिस्थितियां अब मुझे हलचल में लाकर  विचलित नहीे करती। इसलिए परीक्षायें वा तूफान आते भी कर्मेन्द्रियों से कोई भूल ना करते हुए, विकर्मो पर जीत पाकर, विकर्माजीत बनने का पुरुषार्थ मैं सहजता से कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं एकाग्रता की शक्त्ति से परवश स्थिति को परिवर्तन करने वाली अधिकारी  आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं क्रोध को महाशत्रु बनाने वाली ज्ञानी तू आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बोल में निर्माण बनो। बोल में निर्माणता कम नहीं होनी चाहिए। भले साधारण शब्द बोलते हैं, समझते हैं, इसमें तो बोलना ही पड़ेगा ना! लेकिन निर्माणता के बजाए अगर कोई अथारिटी से, निर्माण बोल नहीं बोलते तो थोड़ा कार्य का, सीट का, 5 परसेन्ट अभिमान दिखाई देता है। *निर्माणता ब्राह्मणों के जीवन का विशेष श्रृंगार है। निर्माणता मन में, वाणी में, बोल में, सम्बन्ध-सम्पर्क में... हो।* ऐसे नहीं तीन बातों में तो मैं निर्माण हूँ, एक में कम हूँ तो क्या हुआ! लेकिन वह एक कमी पास विद आनर होने नहीं देगी। *निर्माणता ही महानता है। झुकना नहीं है, झुकाना है। कई बच्चे हँसी में ऐसे कह देते हैं क्या मुझे ही झुकना है, यह भी तो झुके। लेकिन यह झुकना नहीं है वास्तव में परमात्मा को भी अपने ऊपर झुकाना है, आत्मा की तो बात ही छोड़ो।*

 

 _ ➳  निर्माणता निरअहंकारी स्वतः ही बना देती है। निरअहंकारी बनने का पुरुषार्थ करना नहीं पड़ता है। *निर्माणता हर एक के मन में, आपके लिए प्यार का स्थान बना देती है। निर्माणता हर एक के मन से आपके प्रति दुआयें निकालेंगी। बहुत दुआयें मिलेंगी। दुआयें, पुरुषार्थ में लिफ्ट से भी राकेट बन जायेंगी।* निर्माणता ऐसी चीज है। कैसा भी कोई होगा, चाहे बिजी हो, चाहे कठोर दिल वाला हो, चाहे क्रोधी हो, लेकिन निर्माणता आपको सर्व द्वारा सहयोग दिलाने के निमित्त बन जायेगी। *निर्माण, हर एक के संस्कार से स्वयं को चला सकता है। रीयल गोल्ड होने के कारण स्वयं को मोल्ड करने की विशेषता होती है।* तो बापदादा ने देखा है कि बोल-चाल में भी, सम्बन्ध-सम्पर्क में भी, सेवा में भी एक-दो के साथ निर्माण स्वभाव विजय प्राप्त करा देता है।

 

✺   *ड्रिल :-  "निर्माणता को धारण कर परमात्मा को भी अपनी ओर झुकाने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मै आत्मा सवेरे सवेरे बड़े प्यार से बाबा को गुड मॉर्निंग कह अपने बिस्तर से उठ जाती हूँ... *अब मैं आत्मा टहलते-टहलते एक पार्क में आ गई हूँ... मनोहर वातावरण, फूलो की सुगन्धित महक मन को महका रही है...* मै आत्मा पार्क में एक कुर्सी पर बैठ प्राकृतिक वातावरण का आनंद ले रही हूँ... कुछ देर बाद, बच्चो की खिलखिलाती आवाज सुनाई देती है... मै आत्मा इन आँखों द्वारा उस तरफ देखती हूँ...

 

 _ ➳  *कुछ दूर पर एक विशाल सेब का पेड़ है... जो लाल-लाल सेबो से लदा हुआ है...* बहुत ज्यादा लदा हुआ होने के कारण सेब का पेड़ बहुत झुका हुआ है... बच्चे खेल-खेल में उस पेड़ पर पत्थर मार रहे है... *पेड़ से सेब नीचे जमीन पर गिर रहे है... बच्चे झुककर जमीन से उन सेबो को उठाकर अपने कपड़ो से साफ़ करते हुए बड़े प्यार के साथ एक दूसरे को सेब देते हुए ख़िलखिलाते हुए उन सेबो का आनंद ले रहे है...* उनकी खिलखिलाती मुस्कान, ना केवल पेड़-पौधों को बल्कि पार्क में आये सभी को, अपनी ओर आकर्षित कर रही है...   

 

 _ ➳  *इस दृश्य को देख मै आत्मा स्वयं से पूछती हूँ क्या मेरे लिए इस सेब के वृक्ष की भाति पीड़ा(पत्थर) सहन करना सहज है ?* क्या मेरे लिए इस वृक्ष की भांति सर्व के प्रति समभाव रखना सहज है ??... क्या मै भी कभी उदासीनता को त्यागकर इन फूलो की भांति, इन बच्चो की भांति खिलखिला सकती हूँ ??... *अंतर्मन की गहराई से आवाज़ आती... यह मुझ आत्मा का वास्तविक गुण है...* 

 

 _ ➳  *मै आत्मा भृकुटि के मध्य चमकता हुआ सितारा अंतर्मन की आवाज सुन आत्मिक स्थित में स्थित हो प्यारे बाबा का आह्वान करती हूँ...* प्यारे बाबा चाँद तारो से परे की दुनिया को छोड़ मुझ आत्मा की पुकार सुन इस धरा पर अवतरित होते है... *बाबा के नैनो से निकलती हुई दृष्टि मुझ आत्मा में समाती जा रही है... इस दृष्टि में समाती हुई मै आत्मा एकदम हल्की होती जा रही हूँ...* अब मै आत्मा प्यारे बाबा को अपने समक्ष अनुभव करती हूँ... बाबा के हाथों में गोल-गोल लाल-लाल सेबो की टोकरी है... इन सेबो के माध्यम से बाबा मुझ आत्मा को उस दृश्य की स्मृति दिलाते है जो मुझ आत्मा ने पार्क में देखा था...  

 

 _ ➳  *प्रकृति, पेड़-पौधे निर्माणता का गुण धारण किये सदैव समभाव से सबको देते है...* सेब का वृक्ष फलो से लदा हुआ सर्व को झुका हुआ भल प्रतीत हो रहा था पर वास्तव में उस पेड़ के सेब खाने के लिए बच्चो को झुकना पड़ा... *निर्माणता वास्तव में सर्व के आगे, परिथिति के आगे झुकना नही बल्कि सर्व को महानता के आधार पर झुकाना है...* हर परिस्थिति में, हर सम्बन्ध-सम्पर्क में आने पर रियल गोल्ड बन सबके स्वभाव- संस्कारो के साथ मोल्ड हो जाना ही निर्माणचित्त आत्मा की विशेषता है... निर्माणता ही महानता है...

 

 _ ➳  मैं आत्मा निर्माणता का गुण धारण कर सर्व के प्रति नम्रचित रहती हूँ... चाहे कैसे भी स्वभाव संस्कार वाली आत्मा क्यों ना संपर्क में आये, मैं आत्मा सबके प्रति समभाव प्रस्तुत करते हुआ सर्व की दुआये प्राप्त करते हुए अपने पुरुषार्थी जीवन में निरंतर आगे बढ़ती जा रही हूँ... सर्व की दुआये लिफ्ट से भी आगे राकेट का काम करती है... सर्व का सहयोग प्राप्त कर सर्व को निरंतर सहयोग दे रही हूँ... मै ब्राह्मण आत्मा इस संगम पर निर्माणता का गुण धारण कर निरअहंकारी और निर्विकारी बन निराकारी स्थिति में स्थित होती जा रही हूँ... *मै निर्माणचित आत्मा परमात्मा शिव को याद कर हर कार्य निमित्त भाव से करती हूँ... मै आत्मा कर नही रही हूँ, कराने वाला करा रहा है... मैने बाबा का हाथ नही पकड़ा, बाबा मेरा हाथ पकड़े मुझ आत्मा से हर कार्य करवा रहे है... मै पदमापदम सौभाग्यशाली आत्मा हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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