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 10 / 02 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *"हम गोडली स्टूडेंट्स हैं" - यह सदैव स्मृति में रहा ?*

 

➢➢ *भिन्न भिन्न पॉइंट्स पर विचार सागर मंथन किया ?*

 

➢➢ *बर्थ राईट के नशे द्वारा लक्ष्य और लक्षण को समान बनाया ?*

 

➢➢ *हर कर्म सवा स्थिति में स्थित होकर किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *मन को पहले परमधाम में लेके आओ, फिर सूक्ष्मवतन में फरिश्तेपन को याद करो फिर पूज्य रूप याद करो, फिर ब्राह्मण रूप याद करो, फिर देवता रूप याद करो। सारे दिन में चलते फिरते यह 5 मिनट की एक्सरसाइज करते रहो।* इसके लिए मैदान नहीं चाहिए, दौड़ नहीं लगानी है, न कुर्सी चाहिए, न सीट चाहिए, न मशीन चाहिए। सिर्फ शुद्ध संकल्पों का स्वरूप चाहिए।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सर्व सम्बन्ध एक बाप से रखने वाला नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप हूँ"*

 

✧  सर्व सम्बन्धों से बाप को अपना बना लिया है? किसी भी सम्बन्ध में अभी लगाव तो नहीं है? *क्योंकि कोई एक सम्बन्ध भी अगर बाप से नहीं जुटाया तो नष्टोमोहा, स्मृति स्वरूप नहीं बन सकेंगे। बुद्धि भटकती रहेगी।* बैठेंगे बाप को याद करने और याद आयेगा धोत्रा पोत्रा। जिसमें भी मोह होगा वही याद आयेगा। किसका पैसे में होता है, किसका जेवर में होता है, किसका किसी सम्बन्ध में होता - जहाँ भी होगा वहाँ बुद्धि जायेगी। अगर बार-बार बुद्धि वहाँ जाती है तो एकरस नहीं रह सकते।

 

  आधा कल्प भटकते-भटकते क्या हाल हो गया है, देख लिया ना! सब कुछ गँवा दिया। तन भी गया, मन की सुख-शान्ति भी गई, धन भी गया। सतयुग में कितना धन था, सोने के महलों में रहते थे, अभी ईटों के मकान में, पत्थर के मकान में रहते हो, तो सारा गँवा दिया ना! *तो अभी भटकना खत्म। 'एक बाप दूसरा न कोई' - यही मन से गीत गाओ। कभी भी ऐसे नहीं कहना कि यह तो बदलता नहीं है, यह तो चलता नहीं है, कैसे चलें, क्या करूँ...इस बोझ से भी हल्के रहो।* भल भावना तो अच्छी है कि यह चल जाए, इसकी बीमारी खत्म हो जाए लेकिन इस कहने से तो नहीं होगा ना! इस कहने के बजाए स्वयं हल्के हो उड़ती कला के अनुभव में रहो। तो उसको भी शक्ति मिलेगी। बाकी यह सोचना वा कहना व्यर्थ है।

 

  मातायें कहेंगी मेरा पति ठीक हो जाए, बच्चा चल जाए, धन्धा ठीक हो जाए, यही बातें सोचते या बोलते हैं। लेकिन यह चाहना पूर्ण तब होगी जब स्वयं हल्के हो बाप से शक्ति लेंगे। इसके लिए बुद्धि रूपी बर्तन खाली चाहिए। *क्या होगा, कब होगा, अभी तो हुआ ही नहीं, इससे खाली हो जाओ। सभी का कल्याण चाहते हो तो स्वयं शक्तिरूप बन सर्वशक्तिवान के साथी बन शुभ भावना रख चलते चलो। चिन्तन वा चिन्ता मत करो। बन्धन में नहीं फँसो। अगर बन्धन है तो उसको काटने का तरीका है - 'याद'। कहने से नहीं छूटेंगे, स्वयं को छुड़ा दो तो छूट जायेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *एक सेकण्ड में मन की ड़ि्ल याद है? हर एक सारे दिन में कितने बार यह ड़ि्ल करते हो? यह नोट करो।*

 

✧  *यह मन की ड्रिल जितना बार करेंगे उतना ही सहज योगी बनेंगे।* एक तरफ मन्सा सेवा दूसरे तरफ मन्सा एक्सरसाइज। अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी फरिश्ता।

 

✧  ब्रह्मा बाप आप फरिश्तों का आह्वान कर रहे हैं। *फरिश्ता बनके ब्रह्मा बाप के साथ अपने घर निराकार रूप में चलना। फिर देवता बन जाना।* अच्छा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *सम्पूर्ण समर्पण जो हो जाता है उसकी दृष्टि क्या होती है? (शुद्ध दृष्टि, शुद्ध वृत्ति हो जाती है) लेकिन किस युक्ति से वह वृत्ति - दृष्टि शुद्ध हो जाती है? एक ही शब्द में यह कहेंगे कि दृष्टि और वृति में 'रूहानियत आ जाती है। अर्थात् दृष्टि-वृत्ति रूहानी हो जाती है* रूहानी दृष्टि अर्थात् अपने को और दूसरों को भी रूह देखना चाहिए। जिस्म तरफ देखते हुए भी नहीं देखना है, ऐसी प्रैक्टिस होनी चाहिए।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पुरानी दुनिया से मरकर नई दुनिया में जाना"*

 

_ ➳  मैं आत्मा बगीचे में बैठ झुला झूलते हुए प्रकृति का आनंद ले रही हूँ... *मेरी नज़र पेड़ पर बैठी बया चिड़िया पर पड़ती है... वो छोटी सी प्यारी सी चिड़िया एक एक तिनके को जोड़कर घोंसला बना रही है... उस घोंसले को देख मुझे भी अपने नए घर की याद आती है जिसे मेरा प्यारा बाबा बना रहा है...* इस दुःख की दुनिया से निकाल सुख, शांति की नगरी बना रहा है... मैं आत्मा उस स्वर्ग के सपने को यादों में लिए उड़ चलती हूँ मीठे वतन, मीठे बाबा के पास...

 

  *प्यारे बाबा मुझे दिव्य देवताई गुणों से सजाकर हथेली पर स्वर्ग की सौगात देकर कहते हैं:-* मेरे लाडले बच्चे... *आप फूल से बच्चों के लिए पिता खूबसूरत परिस्तान बना रहा... सारे सुखो की जन्नत बच्चों के लिए बसा रहा... यह पुरानी दुनिया का अंत करीब है...* सुखो में मुस्कराने का मीठा समय नजदीक है... इसलिए हर साँस हर संकल्प हर कर्म में पवित्रता को अपनाओ...

 

_ ➳  *नए घर स्वर्ग में जाने स्वयं को निज गुण, शक्तियों के श्रृंगार से सुन्दर बनाती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा नई सी दुनिया में चलने को आतुर हूँ... सम्पूर्ण पवित्रता को अपनाकर सज रही हूँ... *नए सुख बाँहो में भरने को नई दुनिया में जाने के महा पुरुषार्थ में जुट गयी हूँ...*

 

  *पवित्र किरणों से मुझे परी समान सजाकर खुशियों के गगन में उड़ाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... *आप सुंदर देवता बन सुंदर दुनिया में चलोगे असीम खुशियां और आनन्द से खिलोगे... इस दुनिया का बदलाव समीप है...* पर नई दुनिया की पवित्रता पहली शर्त है... इसलिए पवित्रता को अपनाकर अनोखी दिव्यता से नई दुनिया के हकदार बनो...

 

_ ➳  *मैं आत्मा स्वर्ग की यादों में झूमती, नाचती, पवित्र किरणों में खिलखिलाती हुई कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा पवित्र बन कितनी खूबसूरत होती जा रही हूँ... *मीठा बाबा मेरे लिए प्यारी सी दुनिया बनाने धरा पर उतर आया है... मै इस विनाशी दुनिया के विकारी जीवन को छोड़ चमकीली पवित्र होती जा रही हूँ...*

 

  *खुशियों के बगीचे की रूहानी फूल बनाकर पवित्रता की खुशबू से महकाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *इस विनाशी दुनिया से ममत्व निकाल नई दुनिया सुखो के संसार को याद करो...* पवित्र बन कर अनन्त खुशियो में मुस्कराओ... और शानदार सुखो की दुनिया के मालिक बन सदा के आनन्दित हो जाओ...

 

_ ➳  *इस पुरानी दुनिया से प्रीत निकाल सुखधाम को यादों में बसाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा इस विनाशी देह और दुनिया से मुक्त होती जा रही हूँ... *पवित्रता को दामन में सजाये स्वर्ग के लिए दिव्य प्रकाश से भरती जा रही हूँ... प्यारा बाबा मुझे सुखधाम में ले जाने आ गया है...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- जीते जी शरीर का भान भूलकर बाप को याद करना है*"

 

_ ➳  भगवान की पहचान मिलते ही ब्रह्मा बाबा ने जिस समर्पण भाव से अपना तन - मन - धन सब कुछ शिव बाबा के ऊपर बलिहार कर दिया और भगवान का मुरब्बी बच्चा बन, सभी ब्राह्मण बच्चों के लिए प्रेंरणा स्त्रोत बन गए, *ऐसे अपने प्यारे ब्रह्मा बाबा को फॉलो करने और बुद्धि से सब कुछ अपने भगवान बाप के आगे सरेन्डर करने की स्वयं से दृढ़ प्रतिज्ञा कर मैं अशरीरी स्थिति में स्थित होकर अपने अति प्यारे अति मीठे शिव बाबा की याद में मन बुद्धि को जैसे ही एकाग्र करती हूँ। मुझे बाबा की उपस्थिति का स्वत: ही अहसास होने लगता है*। बाबा की छत्रछाया को अपने ऊपर अनुभव करते हुए मैं महसूस करती हूँ जैसे एक महाज्योति जिसमे से अनन्त प्रकाश निकल रहा है, मेरे सिर के बिल्कुल ऊपर स्थित है। 

 

_ ➳  उस महाज्योति से निकल रहे प्रकाश की रंग बिरंगी किरणे एक खूबसूरत रंग बिरंगे इन्द्रधनुषी झरने के समान प्रतीत हो रही हैं। *जिनसे निकल रही सर्व गुणों और सर्वशक्तियों की मीठी - मीठी फ़ुहारों को मैं अपने ऊपर गिरता हुआ स्पष्ट कर रही हूँ। औंस की बूंदों की तरह ये फुहारें मुझ आत्मा के ऊपर गिरते हुए मुझे एक अद्भुत शीतलता की अनुभूति करवा रही हैं*। एक रूहानी नशा मेरे अंदर भरता जा रहा है जो मुझ आत्मा के ऊपर चढ़े देह के आवरण को पारदर्शी बना रहा है। 

 

_ ➳  ऐसा लग रहा है जैसे देह नाम की कोई वस्तु है ही नही केवल एक प्वाइंट ऑफ लाइट मुझे दिखाई दे रही है। अशरीरीपन का यह अनुभव बहुत ही अद्भुत और निराला है। 

*हर बन्धन से मुक्त यह निर्बन्धन स्थिति मुझे बहुत ही सुखद अनुभव करवा रही है। एक गहन शन्ति मैं अपने आप मे महसूस कर रही हूँ*। एक ऐसी शान्ति जिसकी तलाश में मैं ना जाने आज तक कहाँ - कहाँ नही भटक रही थी। लेकिन आज मुझे यह एहसास हो गया है कि वो शान्ति जिसे मैं बाहर ढूंढ रही थी वो तो मेरे ही अंदर समाई हुई है। 

 

_ ➳  आज इस अशरीरी स्थिति में अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करके मैंने ये जान लिया कि मेरा निजी गुण ही शांति है। इसलिए जब चाहे अशरीरी बन, अपने स्वधर्म में स्थित होकर मैं गहन शांति की अनुभूति कर सकती हूँ। *इसी संकल्प के साथ अपने स्वधर्म में टिक कर, शांति के शक्तिशाली वायब्रेशन्स चारों ओर फैलाती हुई मैं शांति के सागर अपने शिव पिता के पास अपने शांति धाम घर की ओर चल पड़ती हूँ*। झिल - मिल करती, जग - मग करती मैं चैतन्य शक्ति अपनी रूहानी यात्रा का आनन्द लेती, शीघ्र ही साकारी और आकारी दुनिया को पार कर अपनी निराकारी दुनिया मे प्रवेश करती हूँ और शांति के सागर अपने शिव पिता के पास पहुँच कर, *उनसे आ रही शांति की शीतल लहरों का स्पर्श पाकर शन्ति के गहरे अनुभवों में डूब जाती हूँ*।

 

_ ➳  शान्ति के सुखद अनुभवों का असीम आनन्द लेकर अब मैं आत्मा अपने प्यारे पिता के बिल्कुल समीप जा कर उन्हें टच करती हूँ और उनसे आ रही सर्वगुणों और सर्वशक्तियों की शक्तिशाली किरणों से स्वयं को भरपूर करने लगती हूँ। *सर्व शक्तियों को स्वयं में भर कर, सर्व शक्ति सम्पन्न स्वरूप बनकर और अपने प्यारे पिता के साथ अद्भुत मंगलमयी मिलन मनाकर अब मैं आत्मा लौट आती हूँ फिर से उसी साकारी दुनिया मे अपना पार्ट बजाने*। अपने साकारी तन में प्रवेश कर, भृकुटि के अकालतख्त पर आ कर मैं आत्मा विराजमान हो जाती हूँ। 

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करते, बुद्धि से सब कुछ सरेन्डर कर, बीच बीच मे अशरीरी बन अपने प्यारे पिता की याद से विकर्मो को दग्ध करने का पुरुषार्थ भी मैं अब साथ - साथ कर रही हूँ। *कर्मयोगी बन कर्म करते और फिर कर्म के समाप्त होते ही, अशरीरी बन बाप को याद करने का अभ्यास मुझे शान्ति का अनुभव करवाकर, मेरी स्थिति को शक्तिशाली बनाता जा रहा है। अपनी शक्तिशाली स्व स्थिति के कारण अब हर परिस्थिति का सामना करना मुझे सहज अनुभव होने लगा है*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं बर्थ राइट के नशे द्वारा लक्ष्य और लक्षण को समान बनाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं श्रेष्ठ तकदीरवान आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा हर कर्म सदा स्व स्थिति में स्थित होकर करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सहज ही सफलता का सितारा बन जाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा कर्मयोगी हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बोल में निर्माण बनो। बोल में निर्माणता कम नहीं होनी चाहिए। भले साधारण शब्द बोलते हैं, समझते हैं, इसमें तो बोलना ही पड़ेगा ना! लेकिन निर्माणता के बजाए अगर कोई अथारिटी से, निर्माण बोल नहीं बोलते तो थोड़ा कार्य का, सीट का, 5 परसेन्ट अभिमान दिखाई देता है। *निर्माणता ब्राह्मणों के जीवन का विशेष श्रृंगार है। निर्माणता मन में, वाणी में, बोल में, सम्बन्ध-सम्पर्क में... हो।* ऐसे नहीं तीन बातों में तो मैं निर्माण हूँ, एक में कम हूँ तो क्या हुआ! लेकिन वह एक कमी पास विद आनर होने नहीं देगी। *निर्माणता ही महानता है। झुकना नहीं है, झुकाना है। कई बच्चे हँसी में ऐसे कह देते हैं क्या मुझे ही झुकना है, यह भी तो झुके। लेकिन यह झुकना नहीं है वास्तव में परमात्मा को भी अपने ऊपर झुकाना है, आत्मा की तो बात ही छोड़ो।*

 

 _ ➳  निर्माणता निरअहंकारी स्वतः ही बना देती है। निरअहंकारी बनने का पुरुषार्थ करना नहीं पड़ता है। *निर्माणता हर एक के मन में, आपके लिए प्यार का स्थान बना देती है। निर्माणता हर एक के मन से आपके प्रति दुआयें निकालेंगी। बहुत दुआयें मिलेंगी। दुआयें, पुरुषार्थ में लिफ्ट से भी राकेट बन जायेंगी।* निर्माणता ऐसी चीज है। कैसा भी कोई होगा, चाहे बिजी हो, चाहे कठोर दिल वाला हो, चाहे क्रोधी हो, लेकिन निर्माणता आपको सर्व द्वारा सहयोग दिलाने के निमित्त बन जायेगी। *निर्माण, हर एक के संस्कार से स्वयं को चला सकता है। रीयल गोल्ड होने के कारण स्वयं को मोल्ड करने की विशेषता होती है।* तो बापदादा ने देखा है कि बोल-चाल में भी, सम्बन्ध-सम्पर्क में भी, सेवा में भी एक-दो के साथ निर्माण स्वभाव विजय प्राप्त करा देता है।

 

✺   *ड्रिल :-  "निर्माणता को धारण कर परमात्मा को भी अपनी ओर झुकाने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मै आत्मा सवेरे सवेरे बड़े प्यार से बाबा को गुड मॉर्निंग कह अपने बिस्तर से उठ जाती हूँ... *अब मैं आत्मा टहलते-टहलते एक पार्क में आ गई हूँ... मनोहर वातावरण, फूलो की सुगन्धित महक मन को महका रही है...* मै आत्मा पार्क में एक कुर्सी पर बैठ प्राकृतिक वातावरण का आनंद ले रही हूँ... कुछ देर बाद, बच्चो की खिलखिलाती आवाज सुनाई देती है... मै आत्मा इन आँखों द्वारा उस तरफ देखती हूँ...

 

 _ ➳  *कुछ दूर पर एक विशाल सेब का पेड़ है... जो लाल-लाल सेबो से लदा हुआ है...* बहुत ज्यादा लदा हुआ होने के कारण सेब का पेड़ बहुत झुका हुआ है... बच्चे खेल-खेल में उस पेड़ पर पत्थर मार रहे है... *पेड़ से सेब नीचे जमीन पर गिर रहे है... बच्चे झुककर जमीन से उन सेबो को उठाकर अपने कपड़ो से साफ़ करते हुए बड़े प्यार के साथ एक दूसरे को सेब देते हुए ख़िलखिलाते हुए उन सेबो का आनंद ले रहे है...* उनकी खिलखिलाती मुस्कान, ना केवल पेड़-पौधों को बल्कि पार्क में आये सभी को, अपनी ओर आकर्षित कर रही है...   

 

 _ ➳  *इस दृश्य को देख मै आत्मा स्वयं से पूछती हूँ क्या मेरे लिए इस सेब के वृक्ष की भाति पीड़ा(पत्थर) सहन करना सहज है ?* क्या मेरे लिए इस वृक्ष की भांति सर्व के प्रति समभाव रखना सहज है ??... क्या मै भी कभी उदासीनता को त्यागकर इन फूलो की भांति, इन बच्चो की भांति खिलखिला सकती हूँ ??... *अंतर्मन की गहराई से आवाज़ आती... यह मुझ आत्मा का वास्तविक गुण है...* 

 

 _ ➳  *मै आत्मा भृकुटि के मध्य चमकता हुआ सितारा अंतर्मन की आवाज सुन आत्मिक स्थित में स्थित हो प्यारे बाबा का आह्वान करती हूँ...* प्यारे बाबा चाँद तारो से परे की दुनिया को छोड़ मुझ आत्मा की पुकार सुन इस धरा पर अवतरित होते है... *बाबा के नैनो से निकलती हुई दृष्टि मुझ आत्मा में समाती जा रही है... इस दृष्टि में समाती हुई मै आत्मा एकदम हल्की होती जा रही हूँ...* अब मै आत्मा प्यारे बाबा को अपने समक्ष अनुभव करती हूँ... बाबा के हाथों में गोल-गोल लाल-लाल सेबो की टोकरी है... इन सेबो के माध्यम से बाबा मुझ आत्मा को उस दृश्य की स्मृति दिलाते है जो मुझ आत्मा ने पार्क में देखा था...  

 

 _ ➳  *प्रकृति, पेड़-पौधे निर्माणता का गुण धारण किये सदैव समभाव से सबको देते है...* सेब का वृक्ष फलो से लदा हुआ सर्व को झुका हुआ भल प्रतीत हो रहा था पर वास्तव में उस पेड़ के सेब खाने के लिए बच्चो को झुकना पड़ा... *निर्माणता वास्तव में सर्व के आगे, परिथिति के आगे झुकना नही बल्कि सर्व को महानता के आधार पर झुकाना है...* हर परिस्थिति में, हर सम्बन्ध-सम्पर्क में आने पर रियल गोल्ड बन सबके स्वभाव- संस्कारो के साथ मोल्ड हो जाना ही निर्माणचित्त आत्मा की विशेषता है... निर्माणता ही महानता है...

 

 _ ➳  मैं आत्मा निर्माणता का गुण धारण कर सर्व के प्रति नम्रचित रहती हूँ... चाहे कैसे भी स्वभाव संस्कार वाली आत्मा क्यों ना संपर्क में आये, मैं आत्मा सबके प्रति समभाव प्रस्तुत करते हुआ सर्व की दुआये प्राप्त करते हुए अपने पुरुषार्थी जीवन में निरंतर आगे बढ़ती जा रही हूँ... सर्व की दुआये लिफ्ट से भी आगे राकेट का काम करती है... सर्व का सहयोग प्राप्त कर सर्व को निरंतर सहयोग दे रही हूँ... मै ब्राह्मण आत्मा इस संगम पर निर्माणता का गुण धारण कर निरअहंकारी और निर्विकारी बन निराकारी स्थिति में स्थित होती जा रही हूँ... *मै निर्माणचित आत्मा परमात्मा शिव को याद कर हर कार्य निमित्त भाव से करती हूँ... मै आत्मा कर नही रही हूँ, कराने वाला करा रहा है... मैने बाबा का हाथ नही पकड़ा, बाबा मेरा हाथ पकड़े मुझ आत्मा से हर कार्य करवा रहे है... मै पदमापदम सौभाग्यशाली आत्मा हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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