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 10 / 04 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *"स्वयं ज्ञान सागर निराकार बाप टीचर बन हमें पड़ा रहे हैं" - सदा नशा और निश्चय रहा ?*

 

➢➢ *पूरा परवाना बन शमा पर फ़िदा हुए *

 

➢➢ *मन बुधी को झमेलों से किनारा कर मिलन मेला मनाया ?*

 

➢➢ *इस बेहद नाटक में हीरो पार्ट बजाया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे साइन्स की शक्ति का प्रयोग लाइट के आधार पर होता है। *अगर कम्प्युटर भी चलता है तो कम्प्युटर माइट है लेकिन आधार लाइट है। ऐसे आपके साइलेन्स की शक्ति का भी आधार लाइट है।* जब वह प्रकृति की लाइट अनेक प्रकार के प्रयोग प्रैक्टिकल में करके दिखाती है तो आपकी अविनाशी परमात्म लाइट, आत्मिक लाइट और साथ-साथ प्रैक्टिकल स्थिति लाइट, तो इससे क्या नहीं प्रयोग हो सकता!

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं विघ्न-विनाशक हूँ"*

 

✧  कभी किसी भी विघ्न के प्रभाव में तो नहीं आते हो? *जितनी ऊँची स्थिति होगी तो ऊँची स्थिति विघ्नों के प्रभाव से परे हो जाती है। जैसे स्पेस में जाते हैं तो ऊँचा जाते हैं, धरनी के प्रभाव से परे हो जाते। ऐसे किसी भी विघ्नों के प्रभाव से सदा सेफ रहते।*

 

  *किसी भी प्रकार की मेहनत का अनुभव उन्हें करना पड़ता - जो मुहब्बत में नहीं रहते। तो सर्व सम्बन्धों से स्नेह की अनुभूति में रहो।*

 

  *स्नेह है लेकिन उसे इमर्ज करो। सिर्फ अमृतेवेले याद किया फिर कार्य में बिजी हो गये तो मर्ज हो जाता। इमर्ज रूप में रखो तो सदा शक्तिशाली रहेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अव्यक्त स्थिति का अनुभव होता है? *एक सेकण्ड भी अव्यक्त स्थिति का अनुभव होता है तो उसका असर काफी समय तक रहता है*। अव्यक्त स्थिती का अनुभव पाँवरफुल होता है। जितना हो सके उतना अपना समय व्यक्त भाव से हटाकर अव्यक्त स्थिती में रहना है।

 

✧  अव्यक्त स्थिती से सर्व स़कल्प सिद्ध हो जाता हैं। इसमें मेहनत कम और प्राप्ती अधिक होती है। और व्यक्त स्थिती में स्थित होकर पुरुषार्थ करने में मेहनत अधिक और प्राप्ती कम होती है। फिर चलते - फिरते उलझन और निराशा आती है। *इसलिए अव्यक्त स्थिती से सर्व प्राप्ती का अनुभव बढाओ*।

 

✧   *अव्यक्त मूर्त को समाने देख समान बनने का प्रयत्न करना है*। 'जैसा बाप वैसे बच्चे'। यह स्लोगन याद रखो। अन्तर न हो। अन्तर को अन्तरमुख होकर मिटाना है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *शरीर और आत्मा - दोनों का न्यारापन चलते-फिरते भी अनुभव होना है। जैसे कोई प्रेक्टिस हो जाती है ना।* लेकिन यह प्रेक्टिस किनकी हो सकती है? जो शरीर के साथ व शरीर के सम्बन्ध में जो भी बातें हैं, शरीर की दुनिया, सम्बन्ध व अनेक जो भी वस्तुएं हैं उनसे बिल्कुल डिटैच होंगे, ज़रा भी लगाव नहीं होगा, तब न्यारा हो सकेंगे। *अगर सूक्ष्म संकल्प में भी हल्कापन नहीं है, डिटैच नहीं हो सकते तो न्यारेपन का अनुभव नहीं कर सकेंगे।* तो अब महारथियों को यह प्रैक्टिस करनी है। बिल्कुल ही न्यारेपन का अनुभव हो। इसी स्टेज पर रहने से अन्य आत्माओं को भी आप लोगों से न्यारेपन का अनुभव होगा, वह भी महसूस करेंगे। ऐसे चलते-फिरते फरिश्तेपन के साक्षात्कार होंगे। यहाँ बैठे हुए भी अनेक आत्माओं को, जो भी आपके सतयुगी फैमिली में समीप आने वाले होंगे उन्हों को आप लोगों के  फरिश्ते रूप और भविष्य राज्य - पद के -  दोनो इकठे साक्षात्कार होंगे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  बाप और उनकी पढ़ाई में निश्चय रखना*"

 

_ ➳  *मीठे बाबा की यादो में खोयी हुई मै आत्मा... नक्की झील में उठती फुहारों को देख रही हूँ...और सोच रही हूँ... ऐसा ही खुबसूरत, मेरे मन के भीतर भी, ख़ुशी का फव्वारा निरन्तर बहता है... और भगवान को पाने के असीम आनन्द में मन झूमता और नाचता है...* कभी बाहर की अमीर और भीतर से गरीब... मै आत्मा ख़ुशी को सदा तरसती थी... आज मीठे बाबा से, अनगिनत खजाने पाकर, भीतर की अमीरी और सुखो से लबालब हूँ... ईश्वरीय वंशी होकर, ईश्वर पिता द्वारा... गॉडली स्टूडेंट पुकारी जाती हूँ... *ऐसा रत्नों से दमकता शानदार भाग्य तो कभी कल्पनाओ में भी न था... जो आज प्यारे बाबा ने जीवन की सच्चाई बना दिया है.*..यही मीठा चिंतन करते हुए मै आत्मा... पांडव भवन की ओर रुख करती हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अमूल्य ज्ञान रत्नों से मालामाल करते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *मीठे बाबा आप बच्चों के लिए ही तो अथाह खजाने अपनी बाँहों में भरकर, सौगात सजाकर, धरती पर आया है...* इन रत्नों से सदा खेलते रहो... और इन अमूल्य रत्नों की दिल जान से कद्र करो... *इन रत्नों की बदौलत ही तो अथाह सुख कदमो में बिखरेंगे... इसलिए इस सच्ची, देवता बनाने वाली पढ़ाई को, कभी न छोडो..."*

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की शिक्षाओ को पाकर संपत्तिवान बनकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... मै आत्मा देह की मिटटी से निकलकर, आपकी गोद में बैठ देवताई ताजोतख्त से सज संवर रही हूँ... *अपने खोये मूल्यों को पुनः पाकर दिव्यता और अलौकिकता से सम्पन्न हो रही हूँ... हर दिन ईश्वरीय पढ़ाई के आनन्द में बिताने वाली, महान भाग्यशाली आत्मा हूँ..."*

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को अतुलनीय धन सम्पदा से भरकर विश्व का मालिक बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *यह ईश्वरीय पढ़ाई अनमोल है, इसी पढ़ाई से देवताई संस्कार पुनः जाग्रत होंगे... इसलिए इस पढ़ाई के दिल से कद्रदान बनो... हर पल इस सच्ची पढ़ाई को पढ़कर, मन्थन कर शक्तिशाली बनो...* अंतिम साँस तक भी यह अमूल्य पढ़ाई पढ़ते ही रहो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से अथाह खजाने पाकर खुशियो में झूमते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... *मै आत्मा आपसे सच्चे रत्नों की दौलत पाकर, कितने खुबसूरत जीवन की मालिक बन गयी हूँ... जीवन खुशियो से छलक उठा है... और सुंदर शिक्षाओ को पाकर, देवताई संस्कारो से भर गया है...* मै आत्मा इन बहुमूल्य रत्नों को पाकर, सुंदर भाग्य से सज गयी हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझे विश्व राज्य की अधिकारी आत्मा बनाने के लिए श्रीमत से सजाकर कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... *मीठे बाबा ने जो टीचर बनकर पढ़ाया है... ज्ञान अमृत से उजला बनाया है... उन अमूल्य शिक्षाओ को श्रीमत को, सदा अपने जीवन का आधार बनाकर... दिव्य और पवित्र जीवन के मालिक बनो.*.. सदा इन ज्ञान मोतियो को ग्रहण करने वाले होली हंस बनकर मुस्कराओ... ज्ञान के सदा चात्रक बनकर, मरते दम तक ज्ञान अमृत को पीते रहो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से अमूल्य ज्ञान निधि को पाकर, सतयुगी अमीरी की अधिकारी बनकर कहती हूँ :-* "मेरे सच्चे साथी बाबा... मै आत्मा आपके प्यार के साये तले... *ज्ञान और योग के पंख पाकर... खुशियो के आसमाँ में उड़ता पंछी बनकर मुस्करा रही हूँ... सच्चे ज्ञान की झनकार ने मेरे जीवन को, आत्मिक मूल्यों से सजाकर कितना सुदर बना दिया है.*.. प्यारे बाबा की अमूल्य शिक्षाओ का दिल से शुक्रिया कर मै आत्मा अपने साकार वतन में लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- आत्मा रूपी दीपक में रोज ज्ञान का घृत डालना है*

 

_ ➳  अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर को धारण किये सारे विश्व का भ्रमण करते हुए मैं देख रही हूँ सारे संसार की गतिविधियों को, दुख और अशांति से मुरझाये लोगो के चेहरों को, जिन पर एक पीड़ा, एक दर्द की झलक स्पष्ट दिखाई दे रही है। *उन सबकी आत्मा रूपी ज्योति को मैं देख रही हूँ जो बिल्कुल उझाई हुई है और इस लिए दुख, निराशा से सबके चेहरे भी मुरझाये हुए है तो आत्मा की ज्योति भी धूमिल दिखाई दे रही है*। यह दृश्य देखती हुई मैं विचार करती हूँ कि इन सबको दुखो से लिबरेट कर अगर इन्हें कोई सदा के लिए सुखी बना सकता है तो वो है सर्व का लिबरेटर केवल एक परम पिता परमात्मा। *वही ज्ञानसूर्य शिव भगवान सारे विश्व की आत्माओं की उझाई हुई ज्योति को फिर से जगाने के लिए ही इस धरा पर पधारे हैं और सभी आत्मा रूपी दीपको में ज्ञान का घृत डाल सबकी ज्योति जगा रहें हैं*।

 

_ ➳  देख रही हूँ अब मैं उन सभी ब्राह्मण बच्चों के दिव्य आभा से दमकते चेहरों और उनके मस्तक पर चमक रही मणियों को जिन्होंने भगवान को पहचाना है और उनसे हर रोज ज्ञान का घृत लेकर आत्मा रूपी दीपक में डाल कर अपनी ज्योति को जगा रहे हैं। *कितनी पदमापदम सौभाग्यशाली हैं ये सभी ब्राह्मण आत्मायें जो भगवान की पालना में पल रही हैं, यही विचार करते - करते अपने ब्राह्मण स्वरूप को स्मृति में लाकर मैं फरिश्ता उन अखुट अविनाशी प्राप्तियों को याद करके आनन्दविभोर हो जाता हूँ जो ब्राह्मण बनते ही बाबा से मुझे प्राप्त हुई है*। सर्वगुण, सर्व शक्तियाँ और सर्व खजाने जो जन्मते ही बाबा ने मुझे प्रदान किये हैं, उनकी स्मृति मात्र से ही मैं आत्मा अविनाशी नशे से झूम उठती हूँ और उनसे मिलने के लिए व्याकुल हो जाती हूँ।

 

_ ➳  अपनी लाइट की सूक्ष्म आकारी देह को धारण किये, अव्यक्त वतन की और मैं उड़ान भरती हूँ और सेकण्ड में सूर्य, चाँद, तारागणों को पार कर फरिश्तो की उस अव्यक्त दुनिया मे आ जाती हूँ जहाँ प्यारे ब्रह्मा बाबा अपने सम्पूर्ण फरिश्ता स्वरूप में अपने बच्चों को आप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बनाने के लिए वतन में इंतजार कर रहे हैं। *फरिश्तो की इस जगमगाती दुनिया मे आकर देख रही हूँ मैं यहाँ के खूबसूरत नज़ारो को। मेरे बिल्कुल सामने है अव्यक्त ब्रह्मा बाबा और उनकी भृकुटि में चमक रहे ज्ञानसूर्य शिवबाबा जिनसे निकल रही सर्वशक्तियों की अनन्त धाराएं सारे वतन में फैल रही हैं और पूरा वतन सफेद चाँदनीे के प्रकाश की तरह जगमगा रहा है*। इन खूबसूरत नज़ारो का आनन्द लेते हुए धीरे - धीरे मैं बापदादा के पास पहुँचती हूँ। अपनी मीठी दृष्टि मुझ पर डालते हुए बाबा अपनी नजरों से मुझे निहाल कर रहें हैं और अपनी सारी शक्तियां मेरे अन्दर भर रहें हैं।

 

_ ➳  बापदादा से मिलन मना कर, शक्तियों से भरपूर होकर, अपनी फरिश्ता ड्रेस को उतार, निराकारी स्वरूप को धारण कर अब मैं जा रही हूँ अपनी निराकारी दुनिया में। *आत्माओं की इस निरकारी दुनिया मे आकर अपने निराकार शिव पिता की किरणों रूपी बाहों में समाकर मैं स्वयं को तृप्त कर रही हूँ। ज्ञान सागर मेरे प्यारे पिता से, ज्ञान की शीतल किरणो की बरसात निरन्तर मेरे ऊपर हो रही है और इन रिमझिम फ़ुहारों का आनन्द लेते, अपने पिता के सानिध्य में बैठ मैं ऐसा अनुभव कर रही हूँ जैसे ज्ञान सागर में मैं डुबकी लगा रही हूँ और ज्ञान के शीतल जल से स्नान करके, बाप समान मास्टर ज्ञान का सागर बन रही हूँ*। अपने प्यारे पिता के सर्व गुणों तथा सर्वशक्तियों से स्वयं को भरपूर करके मैं वापिस साकारी दुनिया में लौट आती हूँ और अपनी साकार देह में भृकुटि के अकालतख्त पर आकर विराजमान हो जाती हूँ।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, अपनी आत्म ज्योति को सदा जगाये रखने के लिए मैं स्वयं में ज्ञान का घृत अब निरन्तर डाल रही हूँ। ज्ञान सागर अपने प्यारे पिता के ज्ञान के अखुट ख़जानो से अपनी बुद्धि रूपी झोली को सदा भरपूर रखने के लिए मैं स्वयं को सदा ज्ञान सागर अपने पिता के साथ कम्बाइंड रखती हूँ। *मुरली के माध्यम से बाबा जो अविनाशी ज्ञान रत्न हर रोज मुझे देते हैं उन अविनाशी ज्ञान रत्नों को स्वयं में धारण कर, दूसरों को भी उन अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान देकर, सबमे ज्ञान का घृत डाल उनकी ज्योति को जगा कर उन्हें भी सदा जगती ज्योत बनाने का कर्तव्य मैं निरन्तर कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं मन-बुद्धि को झमेलों से किनारे कर मिलन मेला मनाने वाली झमेलामुक्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं इस बेहद नाटक में हीरो पार्ट बजाने वाला हीरो पार्टधारी हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  दुनिया में अनेक प्रकार की विल होती है लेकिन ब्रह्मा बाप ने बाप से प्राप्त हुई सर्व शक्तियों की विल बच्चों को की। ऐसी अलौकिक विल और कोई भी कर नहीं सकते हैं। बाप ने ब्रह्मा बाप को साकार में निमित्त बनाया और ब्रह्मा बाप ने बच्चों को निमित्त भव' का वरदान दे विल किया। *यह विल बच्चों में सहज पावर्स की (शक्तियों की) अनुभूति कराती रहती है। एक है अपने पुरूषार्थ की पावर्स और यह है परमात्म-विल द्वारा पावर्स की प्राप्ति। यह प्रभु देन है, प्रभु वरदान है।* यह प्रभु वरदान चला रहा है। वरदान में पुरूषार्थ की मेहनत नहीं लेकिन सहज और स्वत: निमित्त बनाकर चलाते रहते हैं।

 

✺  *"ड्रिल :- परमात्म-विल द्वारा पावर्स की प्राप्ति का अनुभव"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा चमकता हुआ सितारा... हद के बन्धनों, हद की दुनिया से डिटैच होती हुई... पहुँच जाती हूँ सफेद चमकीले प्रकाश की दुनिया में...* प्यारे बापदादा के सामने बैठ जाती हूँ... *मैं सितारा ज्ञान चंद्रमा के मस्तक पर चमकते हुए ज्ञान सूर्य को निहार रही हूँ...* मैं आत्मा बाबा से निकलती इन किरणों को आत्मसात कर रही हूँ... मैं आत्मा सम्पूर्ण फरिश्ता स्वरूप धारण कर रही हूँ...

 

_ ➳  *मैं फरिश्ता अपने सिर पर बापदादा का वरदानी हाथ अनुभव कर रही हूँ...* बापदादा के दिव्य हाथों से दिव्य वरदानों की वर्षा हो रही है... मैं आत्मा वरदानों से भरपूर हो रही हूँ... बापदादा मुझ फरिश्ते का हाथ पकड दृष्टि दे रहे हैं... *बाबा के दिव्य चमकते हुए मस्तक से... रूहानी दृष्टि से... दिव्य हाथों से दिव्य शक्तियां मुझ फरिश्ते में ट्रान्सफर हो रही हैं... बाबा मुझ फरिश्ते को सर्व शक्तियों की विल कर रहे हैं...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा सहज ही सर्व शक्तियों की अनुभूति कर रही हूँ...* मैं आत्मा सर्व गुणों, खजानों से भरपूर होने का अनुभव कर रही हूँ... मैं आत्मा सहजयोगी बन रही हूँ... मैं आत्मा निश्चय बुद्धि बन रही हूँ... *एक बाप दूसरा न कोई इस स्थिति से मुझ आत्मा का विनाशी संबंधो का मोह ख़तम हो रहा है...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा `निमित्त भव' के वरदान में स्थित होकर निमित्त भाव से हर कर्म कर रही हूँ...* और सफलता प्राप्त कर रही हूँ... मैं आत्मा कितनी ही सौभाग्यशाली हूँ जो परमात्मा की पालना, शिक्षा, और वर्से की अधिकारी हूँ... *अब मैं आत्मा सदा इसी नशे में रहती हूँ कि... सर्व शक्तिमान परमात्मा मेरे साथ है...* मैं आत्मा हर परिस्थिति में विजय प्राप्त कर रही हूँ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा इस अलौकिक परमात्म-विल द्वारा अलौकिक पावर्स की प्राप्ति का अनुभव कर रही हूँ...* और सहज प्राप्ति-स्वरूप बन रही हूँ... प्रभु वरदान से स्वतः चल रही हूँ... वही मुझे चला रहा है... *इस प्रभु देन से बिना मेहनत के सदाकाल के लिए सर्व प्राप्तियों की अधिकारी बन गई हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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