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 10 / 05 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *देह सहित देह के सर्व समबंधो से अपनी संभाल की ?*

 

➢➢ *बाप समान मास्टर दुःखहर्ता सुखकर्ता बनकर रहे ?*

 

➢➢ *"मैं और मेरा बाबा" - इस विधि द्वारा जीवनमुक्त स्थिति का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *मैं और मेरेपन की अलाए को समाप्त किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जब तपस्वी तपस्या करते हैं तो वृक्ष के नीचे तपस्या करते हैं। इसका भी बेहद का रहस्य है, *इस सृष्टि रूपी वृक्ष में आप लोग भी नीचे जड़ में बैठकर तपस्या कर रहे हो। वृक्ष के नीचे बैठने से सारे वृक्ष की नॉलेज बुद्धि में आ जाती है। यह जो आपकी स्टेज है, उसका यादगार भक्तिमार्ग में चलता आया है। यह है प्रैक्टिकल, भक्ति मार्ग में फिर स्थूल वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या करते हैं।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं ईश्वरीय सुख के अधिकारी आत्मा हूँ"*

 

  अविनाशी सुख और अल्पकाल का सुख - दोनों के अनुभवी हो ना? *अल्पकाल का सुख है - स्थूल साधनों का सुख और अविनाशी सुख है - ईश्वरीय सुख। तो सबसे अच्छा सुख कौनसा हैं! ईश्वरीय सुख जब मिल जाता है तो विनाशी सुख आपे ही पीछे-पीछे आता है।* जैसे कोई धूप में चलता है तो उसके पीछे परछाई आपे ही आती है और अगर कोई परछाई के पीछे जाये तो कुछ नहीं मिलेगा।

 

  *तो जो ईश्वरीय सुख के तरफ जाता है, उसके पीछे अल्पकाल का सुख स्वत: ही परछाई की तरह आता रहेगा, मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। जैसे कहते हैं - जहाँ परमार्थ होता है, वहाँ व्यवहार स्वत: सिद्ध हो जाता है। ऐसे ईश्वरीय सुख है 'परमार्थ' और विनाशी सुख है 'व्यवहार'।* तो परमार्थ के आगे व्यवहार आपे ही आता है।

 

  तो सदा इसी अनुभव में रहना जिससे दोनों मिल जाएं। नहीं तो, एक मिलेगा और वह भी विनाशी होगा। कभी मिलेगा, कभी नहीं मिलेगा। क्योंकि चीज ही विनाशी है, उससे मिलेगा ही क्या? *जब ईश्वरीय सुख मिल जाता है तो सदा सुखी बन जाते हैं, दु:ख का नामनिशान नहीं रहता। ईश्वरीय सुख मिला माना सब कुछ मिला, कोई अप्राप्ति नहीं रहती। अविनाशी सुख में रहने वाले विनाशी चीजों को न्यारा होकर यूज करेगा, फंसेगा नहीं।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *अपने आपको एक सेकण्ड में शरीर से न्यारा अशरीरी आत्मा समझ आत्म - अभिमानी वा देही - अभिमानी स्थिति में स्थित हो सकते हो?* अर्थात एक सेकण्ड में कर्मेन्द्रियों का आधार लेकर कर्म किया और एक सेकण्ड में फिर कर्मेंन्द्रियों से न्यारा, ऐसी प्रैक्टिस हो गई है? कोई भी कर्म करते कर्म के बन्धन में तो नहीं फंस जाते हो?

 

✧  *हर कर्मेन्द्रियों को जैसे चलाना चाहो वैसे चला सकते हो वा आप चाहते एक हो, कर्मेन्द्रियाँ दूसरा कर लेती है?* रचयिता बनकर रचना को चलाते हो? जैसे और कोई भी जड वस्तु को चैतन्य आत्मा वा चैतन्य मनुष्यात्मा जैसे चाहे वैसे कर्तव्य में लगा सकती है, जहाँ चाहे वहाँ रख सकती है।

 

✧  जड वस्तु चैतन्य के वश में है, चैतन्य जड वस्तु के वश में नहीं होता है। *ऐसे ही 5 तत्वों के जड शरीर को चैतन्य आत्मा जैसे चलाना चाहे वैसे नहीं चला सकती है?* जैसे जड वस्तु को किस भी रुप में परिवर्तन कर सकते हो वैसे कर्मेन्द्रियों को विकारी से निर्विकारी  वा विकारों के वश आग में जले हुए कर्मेन्द्रियों को शीतलता में नहीं ला सकते हो? क्या चैतन्य आत्मा में यह परिवर्तन की शक्ति नहीं आई हैं ?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ बाप-समान निराकारी, देह की स्मृति से न्यारे, आत्मिक स्वरूप में स्थित होते हुए, साक्षी होकर अपना और सर्व आत्माओं का पार्ट देखने का अभ्यास मजबूत होता जाता है? सदा साक्षीपन की स्टेज स्मृति में रहती है? *जब तक साक्षी स्वरूप की स्मृति सदा नहीं रहती तो बाप-दादा को अपना साथी भी नहीं बना सकते। साक्षी अवस्था का अनुभव, बाप के साथीपन का अनुभव कराता है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- रूहानी पढाई पढ़ना और पढ़ाना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा स्कूल के पार्क में खेल रहे बच्चों को देख रही हूँ... कोई फ़ुटबाल खेल रहे... कोई झूला झूल रहे, कोई फिसल पट्टी पर फिसल-फिसल कर मजे ले रहे हैं... कुछ बच्चे एक दूसरे से खाना बांटकर मजे से खा रहे हैं... मंत्रमुग्ध होती मैं इनको देख रही... जैसे ही इंटरवेल खत्म होने की घंटी बजी, सभी बच्चे दौड़ते हुए अपने अपने क्लास में चले जाते हैं और पढाई शुरू करते हैं... इनको पढ़ते हुए देख मुझे भी अपनी पढाई याद आती है...* मैं आत्मा सबकुछ भूल इस दुनियावी खेल में मग्न हो गई थी... अब प्यारे बाबा सुप्रीम शिक्षक बनकर मुझे पढ़ा रहे हैं... मैं आत्मा सेण्टर जाकर सुप्रीम शिक्षक के सामने बैठ जाती हूँ...

 

  *प्यारे सुप्रीम शिक्षक गुड मॉर्निंग करते हुए कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... *ईश्वर पिता के साये में फूल से जो खिल उठे हो... दुखो के गहरे दलदल से निकल जो गुलाब बन महक उठे हो... तो यह महक हर दिल तक पहुँचाओ... सारे विश्व को दुखो से मुक्ति की सच्ची राह दिखाओ...* स्वयं जो प्रकाशित हो गए हो तो औरो के भी जीवन में सुखो का प्रकाश कर आओ... यह पढ़ाई इस अंतिम जन्म के लिए ही है इसलिए अच्छी रीति पढ़ो और पढ़ाओ"

 

_ ➳  *मैं आत्मा भी बाबा को गुड मॉर्निंग कर रिगार्ड देते हुए कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... *मै आत्मा ज्ञानसागर बाबा से ज्ञान रत्नों को पाकर ज्ञानपरी बन गई हूँ... दुखो के जंजालों से सदा की आजाद उड़ता पंछी बन चहक रही हूँ...* और अब अच्छी रीति पढ़कर टीचर बन औरो के जीवन को भी खुशनुमा बना रही हूँ..."

 

  *मीठे बाबा मीठी शिक्षाओं से मुझे भरपूर करते हुए कहते है:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... यह ईश्वरीय पढ़ाई ही सारे सच्चे सुखो का आधार है... इस अंतिम जन्म में अनेक जनमो के विकर्मो से मुक्त होने की जादुई छड़ी सी है... *जीवन को गजब का खुबसूरत बनाने वाली इस पढ़ाई में जी जान से जुट जाओ... और स्वयं महक कर औरो को भी महकाओ..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा ईश्वरीय पढ़ाई के महत्व को जान कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा प्यारे बाबा को टीचर रूप में पाकर अति सौभाग्यशाली बन ज्ञान रत्नों के खजाने को प्रतिपल लूट रही हूँ... *और ज्ञान की बुलबुल बन कर यह मनभावन ईश्वरीय गीत हर दिल को सुना कर मन्त्रमुग्ध कर रही हूँ..."*

 

  *मेरे सुप्रीम शिक्षक बाबा ज्ञान रत्नों की वर्षा करते हुए कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... अब दुखो के दिन पूरे हो गए... अब ईश्वरीय यादो में महकने और खिलने के सुनहरे दिन आये है... *मीठा बाबा सबको शिक्षक बन पढ़ा रहा... सुन्दरतम देवता रूप में सजाकर सुख शांति और आनन्द के सागर में लहरा रहा... सुखो के सारे राज समझा रहा...* तो इस ईश्वरीय पढ़ाई में खो जाओ औरो को भी यह मार्ग दिखाओ..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्यारे बाबा से अनमोल शिक्षाओं को पाकर आनन्दित होती हुई कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अब देह और दुखो की दुनिया से आजाद होकर ईश्वरीय यादो में डूब रही हूँ... ईश्वरीय पढ़ाई में मगन होकर अपने खुबसूरत भाग्य का निर्माण कर रही हूँ... *ज्ञान रत्नों से जीवन संवार रही हूँ... और ज्ञान की बुलबुल बन टिकलु टिकलु का गीत सबके दिल आँगन में गा रही हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- रूहानी सेवा कर सच्ची कमाई करनी है*"

 

_ ➳  इस पुरानी दुनिया के डूबे हुए बेड़े को पार लगाने के लिए स्वयं परम पिता परमात्मा *शिव बाबा ने आ कर जो रूहानी मिशनरी चलाई है उस ईश्वरीय मिशनरी में रूहानी सेवाधारी बन रूहों को सेल्वेज करने के कार्य मे स्वयं भगवान ने मुझे अपना मददगार बना कर जो श्रेष्ठ भाग्य बनाने का गोल्डन चाँस मुझे दिया है उसके लिए अपने शिव पिता परमात्मा का मैं दिल से कोटि कोटि धन्यवाद करती हूँ* और रूहानी सेवा करने के उनके फ़रमान को पूरा करने और सेवा मे सफ़लता प्राप्त करने के लिए स्वयं को मनसा,वाचा, कर्मणा तीनो रूपो से शक्तिशाली बनाने के लिए अब मैं अपने शिव पिता की याद में अशरीरी हो कर बैठ जाती हूँ।

 

_ ➳  अशरीरी स्थिति में स्थित होते ही मैं अनुभव करती हूँ जैसे शरीर के सभी अंगों से चेतना सिमट कर भृकुटि पर एकाग्र हो गई है। *एकाग्रता की इस अवस्था मे अपने सत्य स्वरूप का मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ। स्वयं को मैं एक चैतन्य सितारे के रूप में भृकुटि के बीचोंबीच चमकता हुआ देख रही हूँ*। ऊर्जा का एक ऐसा स्त्रोत जिसके बिना इस शरीर का कोई अस्तित्व नही। अपने इसी वास्तविक स्वरूप में स्थित हो कर मैं जागती ज्योति आत्मा अब भृकुटि सिहांसन को छोड़ ऊपर आकाश की ओर जा रही हूँ। विशाल तारामण्डल और अंतरिक्ष को पार करके अब मैं सूक्ष्म वतन में प्रवेश करती हूँ।

 

_ ➳  सूक्ष्म वतन में प्रवेश करते ही मैं देख रही हूँ सामने सृष्टि के रचयिता सर्वशक्तिवान मेरे शिव पिता परमात्मा अपने लाइट माइट स्वरूप में अव्यक्त ब्रह्मा बाबा की भृकुटि में विराजमान हैं। *अपनी बाहों को फैलाये स्वागत की मुद्रा में खड़े बाबा मेरा आह्वान कर रहें हैं। ऐसा लग रहा है जैसे बाबा मेरा ही इंतजार कर रहे थे*। अपने लाइट माइट स्वरूप में स्थित हो कर, चमकीली फ़रिशता ड्रेस पहन कर अब मैं बापदादा के पास जा रही हूँ। अपनी बाहों में समाकर असीम स्नेह लुटाने के बाद अब बाबा अपनी शक्तिशाली दृष्टि से अपनी सम्पूर्ण लाइट और माइट मुझ फ़रिश्ते में प्रवाहित करके मुझे आप समान बलशाली बना रहे हैं। *सेवा में सदा सफ़लता प्राप्त करने के लिए बाबा अपने वरदानी हस्तों से मुझे सफ़लतामूर्त भव का वरदान दे रहें हैं और मेरे मस्तक पर विजय का तिलक लगा रहें हैं*।

 

_ ➳  बाबा से वरदान और विजय का तिलक ले कर सूक्ष्म रूहानी सेवा करने के लिए अब मैं फ़रिशता बापदादा के साथ कम्बाइंड हो कर विश्व ग्लोब के ऊपर पहुँच जाता हूँ और उन आत्माओं को जो अपने पिता परमात्मा से बिछुड़ कर उन्हें पाने के लिए दर - दर भटक रही है और दुखी हो रही हैं। *उन भटकती आत्माओं को मनसा साकाश द्वारा परमात्म पहचान और परमात्म पालना का अनुभव करवाकर अब मै स्थूल सेवा करने के लिए अपनी बुद्धि रूपी झोली को ज्ञान के अखुट खजानों से भरपूर करने के लिए ज्ञान सागर अपने शिव पिता परमात्मा के पास जाने के लिए अपने निराकारी स्वरूप में स्थित होती हूँ* और परमधाम की ओर चल पड़ती हूँ।

 

_ ➳  यहाँ पहुँच कर मैं आत्मा अपने शिव पिता की सर्वशक्तियों और सर्वगुणों की किरणों की छत्रछाया के नीचे जा कर बैठ जाती हूँ। ज्ञान की शक्तिशाली किरणो का फव्वारा मेरे ज्ञान सागर शिव पिता से सीधा मुझ आत्मा पर प्रवाहित होने लगता है। *अपनी बुद्धि रूपी झोली को ज्ञान के अखुट अविनाशी खजानों से भरपूर करके स्थूल सेवा करने के लिए मैं वापिस साकारी दुनिया मे लौट आती हूँ*।

 

_ ➳  अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हूँ और रूहानी सेवाधारी बन अपने सम्बन्ध - सम्पर्क में आने वाली हर आत्मा को अपने मुख से ज्ञान रत्नों का दान दे कर उनकी बुद्धि रूपी झोली में भी अविनाशी ज्ञान रत्न डाल कर उन्हें भी उनके परमपिता परमात्मा बाप से मिलवाने की रूहानी सेवा कर रही हूँ। *अपने शिव पिता द्वारा मिले ज्ञान रत्नों को स्वयं धारण कर ज्ञान स्वरुप बन मैं अनेको आत्माओं का कल्याण कर रही हूँ*। मेरे मुख से निकले वरदानी बोल अनेकों आत्माओं को मुक्ति, जीवन मुक्ति का रास्ता दिखा रहें हैं।

 

_ ➳  *बाप समान निरहंकारी बन, सर्व आत्माओं को ज्ञान रत्न दे कर, उनका कल्याण करने की रूहानी सेवा ही मेरे ब्राह्मण जीवन का उद्देश्य है इस बात को सदा स्मृति में रख सच्ची रूहानी सेवाधारी बन अब मैं रूहों की सेवा के कार्य पर सदैव तत्पर रहती हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं "मैं और मेरा बाबा" इस विधि द्वारा जीवनमुक्त स्थिति का अनुभव करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सहजयोगी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा मैं और मेरेपन की अलाए (खाद) को समाप्त करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा रीयल गोल्ड हूँ  ।*

   *मैं समर्पित आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  माया की छाया से बचने के लिए छत्रछाया के अन्दर रहो:- सदा अपने ऊपर बाप के याद की छत्रछाया अनुभव करते हो? याद की छत्रछाया है। इस छत्रछाया को कभी छोड़ तो नहीं देते? *जो सदा छत्रछाया के अन्दर रहते हैं वे सर्व प्रकार के माया के विघ्नों से सेफ रहते हैं। किसी भी प्रकार से माया की छाया पड़ नहीं सकती। यह 5 विकार, दुश्मन के बजाए दास बनकर सेवाधारी बन जाते हैं। जैसे विष्णु के चित्र में देखा है - कि सांप की शय्या और सांप ही छत्रछाया बन गये। यह है विजयी की निशानी।* तो यह किसका चित्र है? आप सबका चित्र है ना। जिसके ऊपर विजय होती है वह दुश्मन से सेवाधारी बन जाते हैं। ऐसे विजयी रत्न हो। शक्तियाँ भी गृहस्थी माताओं से, शक्ति सेना की शक्ति बन गई। शक्तियों के चित्र में रावण के वंश के दैत्यों को पांव के नीचे दिखाते हैं। शक्तियों ने असुरों को अपने शक्ति रूपी पाँव से दबा दिया। *शक्ति किसी भी विकारी संस्कार को ऊपर आने ही नहीं देगी।*

 

✺  *"ड्रिल :- अपने विष्णु स्वरुप का अनुभव करना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा बगीचे में झूला झूलती हुई आसमान को निहार रही हूँ...* 16 कलाओं से परिपूर्ण पूर्णमासी का चाँद चारों ओर अपनी चांदनी बिखेर रहा है... आसमान में सितारे जगमग चमकते हुए अति सुंदर नजर आ रहे हैं... *सितारों की सुन्दरता को देखते हुए मैं आत्मा एकाएक चिंतन करने लगती हूँ कि मैं आत्मा भी एक सितारे मिसल हूँ...* आसमान के सितारों से भी ज्यादा चमक है मुझ आत्मा में...

 

_ ➳  मैं आत्मा अपने भव्य स्वरूप को देखने लगती हूँ... *जैसे ही आत्मानुभूति करने लगती हूँ प्यारे बाबा की याद आ जाती है...* प्यारे बाबा का आह्वान करती हूँ... प्यारे बाबा को बुलाते ही चंद्रमा में बाबा मुस्कुराते हुए नज़र आने लगते हैं... परमधाम जैसा नज़ारा अनुभव हो रहा है... बाबा के चारों ओर आत्मा सितारे जगमगा रहे हैं... पूरा आसमान छत्रछाया लग रहा है...

 

_ ➳  *बाबा अपनी शीतल किरणों की वर्षा कर रहे हैं...* पूरे आसमान से दिव्य किरणों की बौछारें मुझ पर पड़ रही हैं... मुझ आत्मा से एक-एक विकार बाहर निकलते जा रहे हैं... काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार सभी विकार बाहर निकलकर माया रावण का पुतला बन सामने खड़े हो जाते हैं... *बाबा से निकलती दिव्य तेजोमय किरणों से रावण का पुतला बीज सहित भस्म हो रहा है...* मेरे सामने विकारों रूपी रावण का वंश सहित अंत हो चुका है...

 

_ ➳  मैं आत्मा माया की छाया से मुक्त हो चुकी हूँ... और सदा बाबा की छत्र छाया का अनुभव कर रही हूँ... *मैं आत्मा सभी विकारों पर विजय प्राप्त कर विजयी रत्न होने का अनुभव कर रही हूँ...* माया के सभी विघ्नों से सेफ अनुभव कर रही हूँ... अब मैं आत्मा सदा बाबा की छत्रछाया के अन्दर ही रहती हूँ... पांचो विकार अब मुझ आत्मा के अधीन हो गए हैं... सभी कर्मेन्द्रियाँ मेरे वश हो गए हैं...

 

_ ➳  *ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे पांचो विकारों रूपी नाग सेवाधारी बन मेरी सेवा कर रहे हैं...* मुझ आत्मा को ये झूला शेषशैया अनुभव हो रहा है जिस पर मैं आत्मा विष्णु स्वरुप में लेटी हुई हूँ... क्षीरसागर में लेटी मैं अपने विष्णु स्वरुप में मायाजीत, प्रकृतिजीत, जगतजीत होने का अनुभव कर रही हूँ... *मैं आत्मा अपने विष्णु स्वरुप का अनुभव करती हुई बाबा की याद की गोदी में सो जाती हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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