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 10 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *देहधारियों की याद से टाइम वेस्ट तो नहीं किया ?*

 

➢➢ *शुद्ध भोजन खाया ?*

 

➢➢ *रूहानी सिम्पैथी द्वारा सर्व को संतुष्ट किया ?*

 

➢➢ *हर कार्य में सहस को साथी बनाया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *ज्वाला स्वरूप की स्थिति का अनुभव करने के लिए निरन्तर याद की ज्वाला प्रज्वलित रहे। इसकी सहज विधि है-सदा अपने को ''सारथी' और 'साक्षी' समझकर चलो। आत्मा इस रथ की सारथी है-* यह स्मृति स्वत: ही इस रथ (देह) से वा किसी भी प्रकार के देहभान से न्यारा बना देती है। *स्वयं को सारथी समझने से सर्व कर्मेन्द्रियाँ अपने कण्ट्रोल में रहती हैं। सूक्ष्म शक्तियां 'मन-बुद्धि-संस्कार' भी ऑर्डर प्रमाण रहते हैं।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं स्वदर्शन चक्रधारी श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  अपने को स्वदर्शन चक्रधारी श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो? *सिर्फ स्व का दर्शन किया तो सृष्टि चक्र का स्वत: ही हो जायेगा। आत्मा को जाना तो आत्मा के चक्र को सहज ही जान गये। वैसे तो 5000 वर्ष का विस्तार है। लेकिन आप सबके बुद्धि में विस्तार का सार आ गया। सार क्या है? कल और आज-कल क्या थे, आज क्या है और कल क्या बनेंगे। इसमें सारा चक्र आ गया ना।* कल और आज का अन्तर देखो कितना बड़ा है! कल कहाँ थे और आज कहाँ हैं, रात और दिन का अन्तर है। तो जब विस्तार का सार आ गया तो सार को याद करना सहज होता है ना। कल और आज का अन्तर देखते कितनी खुशी होती है! बेहद की खुशी है? ऐसे नहीं आज थोड़ी खुशी कम हो गई, थोड़ा सा उदास हो गये। उदास कौन होता है? जो माया का दास बनता है।

 

  क्या करें, कैसे करें, ये क्वेश्चन आना माना उदास होना। जब भी क्यों का क्वेश्वन आता है - क्यों हुआ, क्यों किया तो इससे सिद्ध है कि चक्र का ज्ञान पूरा नहीं है। अगर ड्रामा के राज को जान जाये तो क्यों क्या का क्वेश्चन उठ नहीं सकता। जब स्वयं भी कल्याणकारी और समय भी कल्याणकारी है तो यह क्या.. का क्वेश्चन उठ सकता है? तो ड्रामा का ज्ञान और ड्रामा में भी समय का ज्ञान इसकी कमी है तो क्यों और क्या का क्वेश्चन उठता है। तो कभी उठता है कि क्या यह मेरा ही हिसाब है.. मेरा ही कड़ा हिसाब है दूसरे का नहीं... कितना भी कड़ा हो लेकिन योग की अग्नि के आगे कितना भी कड़ा हिसाब क्या है! कितना भी लोहा कड़ा हो लेकिन तेज आग के आगे मोम बन जाता है। *कितनी भी कड़ी परीक्षा हो, हिसाब किताब हो, कड़ा बन्धन हो लेकिन योग अग्नि के आगे कोई बात कड़ी नहीं, सब सहज है। कई आत्मायें कहती हैं - मेरे ही शरीर का हिसाब है और किसका नहीं.. मेरे को ही ऐसा परिवार मिला है.. मेरे को ही ऐसा काम मिला है.. ऐसे साथी मिले हैं.. लेकिन जो हो रहा है वह बहुत अच्छा। यह कड़ा हिसाब शक्तिशाली बना देता है। सहन शक्ति को बढ़ा देता है।*

 

  तेज आग के आगे कोई भी चीज परिवर्तन न हो - यह हो ही नहीं सकता। तो यह कभी नहीं कहना - कड़ा हिसाब है। कमजोरी ही सहज को मुश्किल बना देती है। ईश्वरीय शक्ति का बहुत बड़ा महत्व है। *तो सदा स्व को देखो, स्वदर्शन चक्रधारी बनो। और बातों में जाना, औरों को देखना माना गिरना और बाप को देखना, बाप का सुनना अर्थात् उड़ना।* स्वदर्शन चक्रधारी हो या परदर्शन चक्रधारी हो? यह प्रकृति भी पर है, स्व नहीं है। अगर प्रकृति की तरफ भी देखते हैं तो परदर्शनधारी हो ये। बोडी कोंन्शसनेस होना माना परदर्शन और आत्म अभिमानी होना माना स्वदर्शन। परदर्शन के चक्र में आधाकल्प भटकते रहे ना। संगमयुग है स्वदर्शन करने का युग। सदा स्व के तरफ देखने वाले सहज आगे बढ़ते हैं।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जैसे *मोटे शरीर* की भी *वैरायटी* होती है, वैसे ही *आत्माओं के भारी-पन* के पोज भी *वैरायटी* थे। अगर अलौकिक कैमरा से फोटो निकालो वा शीशा महल में यह वैरायटी पोज देखो तो बड़ी हँसी आए।

 

✧  जैसे आपकी दुनिया में वैरायटी पोज का खूब हँसी का खेल दिखाते हैं ना, वैसे *यहाँ भी खूब हँसाते हैं।* देखेंगे हँसी का खेल?

 

✧  बहुत ऐसे भी थे जो *मोटे-पन के कारण* अपने को मोडना चाहते भी *मोड नहीं सकते।* ऊपर जाने के बदले बार-बार नीचे आ जाते थे। बीज रूप स्टेज को अनुभव करने के बदले, विस्तार रूपी वृक्ष में अर्थात अनेक संकल्पों के वृक्ष में उलझ जाते हैं।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ जैसे पहले-पहले मौन व्रत रखा था तो सब फ्री हो गए थे, टाइम बच गया था- तो ऐसा कोई साधन निकालो जिससे सबका टाइम बच जाए-मन का मौन हो व्यर्थ संकल्प आवे ही नहीं। यह भी मन का मौन है ना। *जैसे मुख से आवाज न निकले वैसे व्यर्थ संकल्प न आयें - यह भी मन का मौन है। तो व्यर्थ खत्म हो जावेगा। सब समय बच जावेगा, तब फिर सेवा आरम्भ होगी।* मन के मौन से नई इन्वेन्शन निकलेगी - जैसे शुरु के मौन से नई रंगत निकली वैसे इस मन के मौन से नई रंगत होगी।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  ज्ञान सागर बाप की ज्ञान वर्षा में पावन बनने के नशे में रहना"*

 

_ ➳  परमात्म प्रेम में सराबोर होकर मै आत्मा मधुबन आँगन में पहुंच ज्यो ही मीठे बाबा के कमरे में कदम रखती हूँ... मीठे बाबा कह उठते है आओ बच्चे.... और प्यारा बाबा अपनी प्रेममयी बाँहों को... मुझे आगोश में भरने को फैला रहे है... और कहने लगे *बच्चों के प्यार,बच्चों की पुकार का मै पिता सदा ही दीवाना हूँ..*. मीठे बच्चों के बिना तो ईश्वर दिल भी सूना सूना सा है..."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा के इंतजार में ही मै कब से मेरी राह देख रहे थे... मुझे देखकर पुलकित होकर बोले* ;-" मीठे फूल बच्चे... जब घर से निकले थे कितने खुबसूरत फूल से खिले थे... अब खेलते खेलते कितने पतित और विकारी बन गए हो... *ज्ञान सागर बाबा की ज्ञान वर्षा और मीठी यादो में गहरे डूबकर, पुनः पावनता से सज जाओ..*. श्रीमत का हाथ पकड़कर देवताई खूबसूरती को फिर से पा लो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा को अमूल्य ज्ञान रत्नों को बरसाते देख कह उठी :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... आपसे बिछड़कर और खुदको भी भूलकर मै आत्मा विकारो की कालिमा में निस्तेज हो गयी... आपने प्यारे बाबा *ज्ञान के तीसरे नेत्र को देकर मुझे त्रिकालदर्शी बना दिया है.*.. मै आत्मा आपके प्यार में फिर से पावन होती जा रही हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा मुझ फूल आत्मा को सम्मुख देखकर, असीम प्यार को बरसाने लगे और बोले :-* "लाडले प्यारे मीठे बच्चे :-" ईश्वर पिता का हाथ और साथ पाकर, *सच्ची यादो में सांसो को पिरोकर, पावनता से सज संवर कर.*.. सतयुगी दुनिया के मालिक बन मुस्कराओ... मीठे बाबा की सारी दौलत को लेकर मालामाल हो जाओ..."

 

_ ➳  *मीठे बाबा के प्यार में और अनमोल शिक्षाओ में... खुबसूरत होते जा रहे अपने भाग्य को देख... मै आत्मा कहने लगी :-* "मेरे दिल के दिलाराम बाबा... *कब सोचा था मेने की भगवान यूँ गोंद में बिठाकर मुझे पढ़ायेगा..*. इतना प्यारा मेरा भाग्य संवारेगा... यूँ पवित्रता की चुनरी पहना कर मुझे परी सा सजाएगा...ज्ञान की वर्षा में रोम रोम को सिक्त करेगा...."

 

   *प्यारे बाबा मेरे असीम सुखो की चाहना में दीवाने बने ज्ञान रत्नों को मेरी झोली में बिखेरते ही रहे और कहने लगे :-* "सिकीलधे लाडले बच्चे... संगम में वरदानी पलों और ईश्वरीय मिलन की घड़ियों में... पावन बनकर, सच्ची सुंदरता को पाओ... ज्ञान सागर बाबा सम्मुख है तो... *सारी जागीर को हथिया कर 21 जनमो का खुबसूरत भाग्य संवारो..*.

 

_ ➳  *मै आत्मा प्रेम में डूबी हुई मीठे बाबा को निहारती जा रही हूँ... भीगी पलको की पोंछती जा रही हूँ... और कह रही हूँ :-* "प्राणप्रिय बाबा मेरे... *आप जो मिल गए हो तो लगता है यह जहान मिल गया..*. सारा संसार मेरे कदमो तले आ गया है... सारी खुशियां मेरी दीवानी हो गयी है और मै आपकी दीवानी हो गयी हूँ... ऐसी मीठी प्यारी बातो में, यादो में, डूबकर मै आत्मा अपने कर्मक्षेत्र पर पुनःलौट आई..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कर्मभोग से छूटने के लिए एक बाप की याद में रहना है*"

 

_ ➳  ईश्वरीय शक्तियों से भरपूर एक सूक्ष्म ऊर्जा का भंडार मैं ज्योति बिंदु आत्मा अपने चारों और एक दिव्य कार्ब को धारण किये हुए अपने इस साकारी तन से बाहर निकल कर चल पड़ती हूँ एक रूहानी यात्रा पर। *सेकण्ड में मन बुद्धि रूपी विमान पर सवार हो कर मैं पहुँच जाती हूँ परमधाम*। मन बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं देख रही हूं स्वयं को परमधाम में अपने निराकार परमपिता परमात्मा शिव बाबा के सामने।

 

_ ➳  निराकारी, निर्संकल्प स्थिति में स्थित यहां मैं आत्मा गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ। शिव बाबा से निकल रही अनन्त किरणे गोल - गोल घूमती हुई एक चक्र की भांति प्रतीत हो रही हैं। *सात रंगों की शक्तिशाली किरणों का गोल चक्र बाबा से निकल रहा है जिसका दायरा निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है*। ऐसा लग रहा है जैसे इन किरणों के गोल चक्र ने मुझे अपने आगोश में भर लिया है। मेरे चारों और फैले सर्वशक्तियों के इस औरे ने जैसे ज्वाला स्वरूप धारण कर लिया है। इसमें उठ रही लपटों में मैं स्वयं को तपता हुआ महसूस कर रही हूँ। *मेरे पुराने आसुरी स्वभाव, संस्कार इस योग अग्नि में जल कर भस्म हो रहें हैं*। मेरी खोई हुई सर्वशक्तियाँ पुनः जागृत हो रही हैं।

 

_ ➳  अपनी खोई हर सर्वशक्तियों को पुनः प्राप्त करके, शक्तिशाली बन कर मैं आत्मा वापिस लौट आती हूं और साकार लोक में फिर से अपने ब्राह्मण तन में आ कर विराजमान हो जाती हूँ। अब मैं ब्राह्मण आत्मा मन ही मन विचार करती हूं कि *जब मैं आत्मा अपने अनादि स्वरूप में अपने शिव पिता परमात्मा के साथ परमधाम में अपनी सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था में थी तो हर प्रकार के कर्म के बंधन से मुक्त थी*। किन्तु तन का आधार ले कर इस सृष्टि रूपी कर्म क्ष्रेत्र पर जब कर्म करने के लिए आई तो भी पहले पहले नई सतोप्रधान दुनिया में सतोप्रधान देवताई स्वरूप धारण कर दो युगों तक अपरमपार सुख भोगा। यहां भी किसी प्रकार की कोई कर्मभोगना नही थी।

 

_ ➳  द्वापर युग में प्रवेश करते ही देह भान में आने के कारण मुझ आत्मा से जो विकर्म होने शुरू हुए वही कर्मो के बंधन बन गए । पूरे 63 जन्म देह अभिमान में आ कर ना जाने मैंने कितने कर्म बन्धन बनाये। 63 जन्मो के विकर्मों का बोझ मुझ आत्मा पर चढ़ता गया। और अब *संगम युग पर स्वयं मेरे पिता परमात्मा ने आ कर कर्मो की गुह्य गति का राज मेरे सामने स्पष्ट कर दिया*। मेरे मीठे प्यारे बाबा ने आ कर मुझे बताया कि केवल बाबा की याद से ही 63 जन्मो के कर्म भोग चुकतू हो सकते हैं।

 

_ ➳  यह विचार करते करते अपने लाइट के फ़रिशता स्वरुप को धारण कर मैं पहुंच जाता हूँ सूक्ष्म लोक बापदादा के पास। मुझे देखते ही बाबा अपनी बाहें फैला लेते हैं और मैं फरिश्ता दौड़ कर उनके आँचल में समा जाता हूँ। *अपने रुई समान कोमल हाथों का स्पर्श वो मेरे मस्तक पर जैसे ही करते हैं वैसे ही मेरी सारी थकान एक दम समाप्त हो जाती है*। अब मैं उनके पास बैठ कर उनके घुटनों में अपना सिर रख कर रोते हुए उन्हें उन सारे पाप कर्मों के बारे में बता रहा हूँ जो देह भान में आने के कारण जाने अनजाने मुझ से हुए।

 

_ ➳  मेरा सिर ऊपर उठा कर, मेरे आंसुओं को अपने कोमल हाथों से साफ करते हुए बाबा अपने हाथ मेरे सिर पर रख देते हैं। बाबा के हस्तों से अनन्त शक्तियों की ज्वाला स्वरूप किरणे निकल कर मेरे मस्तक से होती हुई मेरे अंग - अंग में समाने लगती हैं। *मैं स्पष्ट अनुभव कर रहा हूं कि ये ज्वाला स्वरूप किरणे मेरे द्वारा किये हुए पापों को दग्ध कर रही हैं*। मैं बोझ मुक्त होता जा रहा हूँ। कर्मो के भोग चुकतू हो रहें हैं। स्वयं को अब मैं बहुत ही हल्का अनुभव कर रहा हूँ।

 

_ ➳  इस बात को अब मैं अच्छी रीति समझ गया हूँ कि हर प्रकार के कर्मभोग से छूटने के उपाय केवल बाबा की याद है।  इसलिए अब किसी भी प्रकार के कर्मभोग से मुझे डरना नही है बल्कि *हर प्रकार के कर्मभोग से छूटने के लिए बाबा की याद निरन्तर बनी रहे, यही अवस्था अब मुझे बनानी है*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं रुहानी सिम्पेथि द्वारा सर्व को संतुष्ट करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सदा सम्पत्तिवान आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव हर कार्य में साहस को अपना साथी बना लेती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सफलता अवश्य प्राप्त करती हूँ  ।*

   *मैं सफलता स्वरूप आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ समय और स्वयं के महत्व को स्मृति में रखो तो महान बन जायेंगे *संगम युग का एक-एक सेकण्ड सारे कल्प की प्रालब्ध बनाने का आधार है। ऐसे समय के महत्त्व को जानते हुए हर कदम उठाते हो? जैसे समय महान है वैसे आप भी महान आत्मा हो - क्योंकि बापदादा द्वारा हर बच्चे को महान आत्मा बनने का वर्सा मिला है। तो स्वयं के महत्व को भी जानकर हर संकल्प, हर बोल और हर कर्म महान करो।* सदा इसी स्मृति में रहो कि हम महान बाप के बच्चे महान हैं।' इससे ही जितना श्रेष्ठ भाग्य बनाने चाहो बना सकते हो। संगमयुग को यही वरदान है। सदा बाप द्वारा मिले हुए खजानों से खेलते रहो। कितने अखुट खजाने मिले है, गिनती कर सकते हो! तो सदा ज्ञान रत्नों से, खुशी के खजाने से शक्तियों के खजाने से खेलते रहो। सदा मुख से रतन निकलें, मन में ज्ञान का मनन चलता रहे। ऐसे धारणा स्वरूप रहो। महान समय है, महान आत्मा हूँ - यही सदा याद रखो।

✺ *"ड्रिल :- समय और स्वयं के महत्व को स्मृति में रखना"*

➳ _ ➳ सुबह सुबह जब मैं दाना पानी लेकर छत पर गई और चिड़िया को खिलाने लगी... तो मैंने देखा कुछ पंछी बहुत तेजी से आकाश में उड़ते हुए जा रहे हैं... उनमें से एक पक्षी उडकर मेरे पास आ जाता है... और दाना चुगने लगता है दाना चुगकर जैसे ही वह पक्षी पानी पीकर उड़ने लगता है तो मैं उसे रोकती हूं और कहती हूं... तुम सभी पक्षी इतनी तेजी से कहां उड़े चले जा रहे हो... *तो वह पक्षी मुझे समय का महत्व समझाते हुए कहता है कि मैं अपने समय के इस महत्व को अच्छी रीती जानते हुए उस दिशा में अपने घोंसले में छोड़े हुए छोटे-छोटे बच्चे हैं उनके लिए भोजन एकत्रित करने के लिए उस दिशा की तरफ जा रहा हूं... इतना कहकर वह पक्षी फर्र से उड़ जाता है...*

➳ _ ➳ तभी अचानक वहां पर मेरे सामने चिड़िया आकर छोटे से पेड़ की टहनी पर बैठ जाती है और मैं उससे कहती हूं... चिड़िया रानी मुझे इस समय के महत्व के बारे में पूर्ण रीति से समझाइए... चिड़िया मेरी बात सुनकर खुश हो जाती है... और चहक चहक कर मुझे सारा हाल बताती हैंऔर कहती है... *हम पक्षियों को बस दिन ही मिलता है जिसमें हम हमारा भोजन जुटा सकते हैं... इसमें बीच-बीच में आंधी और तूफान भी आते हैं जिससे हमें अपनी रक्षा करनी होती है... इसलिए हम कम समय में अपना भोजन एकत्रित करने का प्रयास करते हैं....* और वह चिड़िया मुझसे कहती है जब मुझे उड़ना भी नहीं आता था मैं अपने घोंसले में सारा दिन व्यतीत करती थी और मेरी मां मेरे लिए दाना अर्थात भोजन इकट्ठा करने के लिए सुबह ही घर से निकल जाती थी... और शाम को जब मेरी मां घोंसले में आती तो मेरे लिए अपनी चोंच में भोजन लेकर आती थी... इतना कहकर वह चिड़िया भी उड़ जाती है...

➳ _ ➳ पक्षियों के इन विचारों को सुनकर मेरे मन में एक अलग ही अनुभूति होती है... मुझे भी यह विचार आता है कि इस संगम युग पर परमपिता परमात्मा सिर्फ हमारे लिए इस धरा पर आए हैं... और मुझे भी यह आभास होता है कि यह संगम युग मेरे लिए कितना महत्वपूर्ण है... यह सोचते हुए मैं फरिश्ता बनकर मेरे बाबा के पास सूक्ष्म वतन में पहुंच जाती हूं... और बाबा से कहती हूं बाबा मुझ आत्मा को इस संगम युग के महत्व के बारे में विस्तार से बताइए... बाबा मेरा हाथ पकड़ कर फरिश्ते स्वरूप में उड़ते हुए चंद्रमा के ऊपर बैठ जाते हैं... और उस शीतल वातावरण में मुझे समझाते हैं... *बच्चे इस संगम युग का जन्म तुम्हारे लिए हीरे तुल्य जन्म है... तुम इस संगम युग में पुरूषार्थ करके 21 जन्मों की सुख की अनुभूति और सुख समृद्धि को प्राप्त कर सकते हो... यह समय तुम्हारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है... इस समय का एक एक सेकंड तुम्हारे लिए 100 वर्षों के समान है... अगर तुमने 1 सेकंड भी व्यर्थ में गवाया तो मानो 100 वर्ष तुमने व्यर्थ में गवा दिए...*

➳ _ ➳ कुछ समय बाद मैं अपने आप को एक तारे पर बाबा के साथ बैठा हुआ अनुभव करती हूं और बाबा मुझसे कह रहे हैं... (बच्चे इस संगम युग में तुम्हें अधिक-से-अधिक पुरुषार्थ करके पुरुषोत्तम बनना है... इसी समय तुम परमात्मा द्वारा दिए हुए खजानो को बटोर सकते हो... और *इसी समय परमात्मा से प्रीत बुद्धि बनकर उनके दिलतख्तनशीन बन सकते हो परमात्मा तुम्हें महान बनाने आए हैं... तुम्हें महान स्थिति का अनुभव करते हुए अपने हर बोल, संकल्प , कर्म को महान बनाना है... और इस महान संगम युग में तुम्हें अपने आप को और अपने कर्मों को महान बनाना है...*

➳ _ ➳ फिर बाबा मुझे फरिश्ते स्वरूप में उड़ा कर सूक्ष्म वतन में ले जाते हैं... और बाबा मुझे कहते हैं बच्चे जो मैंने तुम्हें अभी शिक्षा दी है जिस समय के महत्व के बारे में बताया है आज से उस समय के महत्व को जानते हुए और अपना महत्व जानकर इस स्मृति में रहना...कि यह समय तुम्हारे लिए कितना महत्वपूर्ण है... मैं बाबा को धन्यवाद करते हुए और यह वादा करते हुए कि मैं आपके द्वारा दी हुई इन शिक्षाओं का अनुसरण करूंगी और वापस छत पर आ जाती हूं... जहां मैं चिड़िया को दाना पानी डाल रही थी और *मैं अब उस पुरुषार्थ में जुट जाती हूं कि आज से संगम युग मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है... इस समय और स्वयं की महत्वपूर्णता की स्मृति में मैं हर कर्म, बोल और संकल्प को महान बनाने में जुट जाती हूं...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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