━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 10 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *जो भी भूलें हुई, उनका दिल से पश्चाताप कर योगबल से माफ़ किया ?*

 

➢➢ *साक्षी हो अपने व दूसरों के पुरुषार्थ को देखा ?*

 

➢➢ *निरंतर याद द्वारा अविनाशी कमाई जमा की ?*

 

➢➢ *स्नेह रूप और शक्ति रूप दोनों का अनुभव किया ?*

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  ज्ञान के मनन के साथ शुभ भावना, शुभ कामना के संकल्प, सकाश देने का अभ्यास, यह मन के मौन का या ट्रैफिक कण्ट्रोल का बीच-बीच में दिन मुकरर करो। अगर किसको छुट्टी नहीं भी मिलती हो, *सप्ताह में एक दिन तो छुट्टी मिलती है, उसी प्रमाण अपने-अपने स्थान के प्रोग्राम फिक्स करो। लेकिन विशेष एकान्तवासी और खजानों के एकानामी का प्रोग्राम अवश्य बनाओ।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

   *"मैं तीव्र पुरुषार्थी आत्मा हूँ"*

 

  अलबेलापन छोड़ दो। ठीक हैं, चल रहे हैं, पहुँच जायेंगे-यह अलबेलापन है। अलबेले को इस समय तो मौज लगती है। जो अलबेला होता है उसे कोई फिक्र नहीं होता है, वह आराम को ही सब-कुछ समझता है। तो अलबेलापन नहीं रखना। पाण्डव सेना हो ना। सेना अलबेली रहती है या अलर्ट रहती है? *सेना माना अलर्ट, सावधान, खबरदार रहने वाले। अलबेला रहने वाले को सेना का सैनिक नहीं कहा जायेगा। तो अलबेलापन नहीं, अटेन्शन! लेकिन अटेन्शन भी नेचुरल विधि बन जाये।*

 

  *कई अटेन्शन का भी टेन्शन रखते हैं। टेन्शन की लाइफ सदा तो नहीं चल सकती। टेन्शन की लाइफ थोड़ा समय चलेगी, नेचुरल नहीं चलेगी। तो अटेन्शन रखना है लेकिन 'नेचुरल अटेन्शन' आदत बन जाये।* जैसे विस्मृति की आदत बन गई थी ना। नहीं चाहते भी हो जाता है। तो यह आदत बन गई ना, नेचुरल हो गई ना। ऐसे स्मृतिस्वरूप रहने की आदत हो जाये, अटेन्शन की आदत हो जाये। इसलिए कहा जाता है आदत से मनुष्यात्मा मजबूर हो जाती है। न चाहते भी हो जाता है-इसको कहते हैं मजबूर।

 

  तो ऐसे तीव्र पुरुषार्थी बने हो? *तीव्र पुरुषार्थी अर्थात् विजयी। तभी माला में आ सकते हैं। बहुतकाल का अभ्यास चाहिए। सदैव अलर्ट माना सदा एवररेडी! आपको क्या निश्चय है-विनाश के समय तक रहेंगे या पहले भी जा सकते हैं? पहले भी जा सकते हैं ना। इसलिए एवररेडी। विनाश आपका इन्तजार करे, आप विनाश का इन्तजार नहीं करो। वह रचना है, आप रचता हो। सदा एवररेडी।* क्या समझा? अटेन्शन रखना। जो भी कमी महसूस हो उसे बहुत जल्दी से जल्दी समाप्त करो। सम्पन्न बनना अर्थात् कमजोरी को खत्म करना। ऐसे नहीं-यहाँ आये तो यहाँ के, वहाँ गये तो वहाँ के। सभी तीव्र पुरुषार्थी बनकर जाना।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  *समझा, समय की गति कितनी विकराल रूप लेने वाली है।* ऐसे सयम के लिए एवररेडी हो ना? या डेट बतायेंगे। तब तैयार होंगे। *डेट का मालूम होने से सोल कान्सेस के बजाए डेट कान्सेस हो जायेंगे।* फिर फुल पास हो नहीं सकेंगे। इसलिए डेट बताई नहीं जायेगी लेकिन डेट स्वयं ही आप सबको टच होगी।

 

✧  *ऐसे अनुभव करेंगे जैसे इन आँखों के आगे कोई दृश्य देखते हो तो कितना स्पष्ट दिखाई देता है।* ऐसे इनएडवान्स भविष्य स्पष्ट रूप में अनुभव करेंगे।

 

✧  लेकिन इसके लिए जहान के नूरों की आँखें सदा खुली रहें। अगर माया की धूल होगी तो स्पष्ट देख नहीं सकेंगे। समझा, क्या अभ्यास करना है? *ड्रेस बदली करने का अभ्यास करो।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧ सभी सदा साक्षी स्थिति में स्थित हो, हर कर्म करते हो? *जो साक्षी हो कर्म करते हैं। उन्हें स्वत: ही बाप के साथी-पन का अनुभव भी होता है।* इसलिए सदा साक्षी अवस्था में स्थित रहो। देह से भी साक्षी जब देह के सम्बन्ध और देह के साक्षी बन जाते हो तो स्वत: ही इस पुरानी दुनिया से भी साक्षी हो जाते हो। यही स्टेज सहज योगी का अनुभव कराती है - तो सदा साक्षी इसको कहते हैं साथ में रहते हुए भी निर्लेप। *आत्मा निर्लेप नही है लेकिन आत्मअभिमानी स्टेज निर्लेप है अर्थात माया के लेप व आकर्षण से परे है।* न्यारा अर्थात निर्लेप। तो सदा ऐसी अवस्था में स्थित रहते हो? किसी भी प्रकार की माया का वार न हो।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺  *"ड्रिल :- शांतिधाम जाकर सुखधाम में आयेंगे यह नहीं भूलना"*

 

_ ➳  *झील के किनारे बैठी मैं आत्मा प्यारे बाबा का आह्वान करती हूँ... प्यारे बाबा के आगमन से झील की लहरें ख़ुशी से उछल रही हैं... हवा और पानी साथ साथ खेल रहे हैं... पेड़ पौधे झुक झुककर सलाम कर रहे हैं... मौसम की मस्ती से मेरे मन में भी उमंग उल्लास की लहरें दौड़ रही हैं...* ऐसा लग रहा पूरी प्रकृति प्रेम के सागर की आने की खुशी में प्रेम की कविताएं सुना रही हैं... इस दुख की दुनिया से निकाल सुख, शांति की दुनिया में ले जाने आए मेरे बाबा के सामने मैं आत्मा बैठ प्यार की बातें करती हूँ...

 

  *सुख-शांति के सागर मेरे प्यारे बाबा हथेली पर स्वर्ग की सौगात सजाकर कहते हैं:-* "मेरे लाडले बच्चे... मै विश्व का पिता आप बच्चों की झोली सदा के लिए सुख से भरने आया हूँ...* अमन ही अमन हो ऐसी चैन की दुनिया बसाने आया हूँ... सुख शांति भरपूर हो ऐसी मीठी सुखो की दुनिया बच्चों के लिए सौगात स्वरूप लाया हूँ..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा खुशियों के सागर में झूमती लहराती हुई कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपके बिना किस कदर दुखमय जीवन को अपनी नियति समझ रही थी... आपने मीठे बाबा... *मेरा दामन खुशियो से खिलाया है... सुख शांति से भरे जीवन का अधिकारी बना सजाया है..."*

 

  *प्यारे बाबा परमात्म माइट और परमात्म दिव्य लाइट से मुझे भरपूर करते हुए कहते है:-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... इस घोर पाप की दुनिया से ईश्वर पिता के सिवाय कोई निकाल ही न सके... सुख भरा चैन सिर्फ पिता ही जीवन में ला सके... *ऐसे मीठे बाबा को हर पल यादो में सजाओ... जो परमधाम से उतर आये और सुख शांति के सौगातों से लबालब कर जाय..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा शांतिधाम और सुखधाम की स्मृतियों को मन में बसाकर कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... आप महा पिता मेरे लिए कितनी दूर से आते हो... *सुनहरे सुखो से और शांतिमय जीवन से मेरी सदा के लिए दुनिया सजाते हो... अपनी मीठी यादो से मुझे आप समान सुंदर बनाते हो... जिंदगी को महकाते हो..."*

 

  *मेरे बाबा पाप की दुनिया से मुझे निकाल चैन की दुनिया में ले जाने दूर देश से आकर कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *अपने खिलते हुए खुशबूदार फूलो को इस कदर विकारो रुपी काँटों में झुलसता तो मै पिता देख ही न सकूँ... और बच्चों को मुस्कराहटों से सजाने महकाने धरती पर आऊं...* बच्चे सुख शांति के जीवन में चैन से रहे तो मै पिता सदा का आराम पाऊँ..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपने घर को, स्वर्णिम दुनिया के सुखों को याद कर आनंदोल्लास में डूबकर कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा पाप की दुनिया में गहरे धस गई थी... आपसे मेरी दारुण सी दशा देखी न गई... आप दौड़े से आये और मेरा जीवन सुखो की सौगातों से महका दिया...* यूँ जीवन मीठा और प्यारा बना दिया..."

 

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *ड्रिल :- साक्षी हो अपने वा दूसरों के पुरुषार्थ को देखना है*"

 

_ ➳  साक्षीदृष्टा बन मास्टर त्रिकालदर्शी की सीट पर सेट हो कर सृष्टि के आदि मध्य अंत को समृति में लाते ही *इस सृष्टि रंग मंच पर मुझ आत्मा द्वारा बजाए गए 84 जन्मों का पार्ट एक-एक करके भिन्न-भिन्न स्वरूपों में मेरे सामने स्पष्ट होने लगता है*। आदि से लेकर अंत तक के अपने पार्ट को अब मैं साक्षी होकर देख रही हूँ।

 

_ ➳  मेरा अनादि सतोप्रधान स्वरूप बहुत सुंदर, बहुत आकर्षक और बहुत ही प्यारा है। *बीजरूप निराकार परम पिता परमात्मा शिव बाबा की अजर, अमर, अविनाशी सन्तान मै आत्मा अपने अनादि स्वरूप में सम्पूर्ण पावन, सतोप्रधान अवस्था मे हूँ*। एक दिव्य प्रकाशमयी दुनिया जहां हजारों चंद्रमा से भी अधिक उज्ज्वल प्रकाश है उस निराकारी पवित्र प्रकाश की दुनिया की मैं रहने वाली हूँ।

 

_ ➳  अपने अनादि सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप में ही अपनी निराकारी दुनिया को छोड़ सम्पूर्ण सतोप्रधान देवताई चोला धारण कर मैं आत्मा सम्पूर्ण सतोप्रधान देवताई दुनिया मे अवतरित होती हूं। मन बुद्धि से देख रही हूं अब मैं स्वयं को अपने आदि स्वरूप में सतयुगी दुनिया में। *मेरा आदि स्वरूप 16 कला सम्पूर्ण, डबल सिरताज, पालनहार विष्णु के रूप में मन को लुभाने वाला है*।

 

_ ➳  अपने पूज्य स्वरूप में मैं आत्मा स्वयं को कमल आसन पर विराजमान, शक्तियों से संपन्न अष्ट भुजाधारी दुर्गा के रूप में देख रही हूं। *असंख्य भक्त मेरे सामने भक्ति कर रहे हैं, मेरा गुणगान कर रहे हैं, तपस्या कर रहे हैं, मुझे पुकार रहे हैं, मेरा आवाहन कर रहे हैं*। मैं उनकी सभी शुद्ध मनोकामनाएं पूर्ण कर रही हूं।

 

_ ➳  अब मैं देख रही हूँ स्वयं को अपने ब्राह्मण स्वरूप में। ब्राह्मण स्वरुप में स्थित होते ही अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की स्मृति में मैं खो जाती हूँ। *संगम युग की सबसे बड़ी प्रालब्ध स्वयं भाग्यविधाता भगवान मेरा हो गया*। विश्व की सर्व आत्माएँ जिसे पाने का प्रयत्न कर रही है उसने स्वयं आ कर मुझे अपना बना लिया। कितनी पदमापदम सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा जिसे घर बैठे भगवान मिल गए।

 

_ ➳  यह विचार करते करते अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य के साथ साथ मुझे मेरे ब्राह्मण जीवन के कर्तव्यों का भी अनुभव होने लगता है कि *मेरा यह ब्राह्मण जीवन तो पुरुषार्थी जीवन है। जिसमे मुझे तीव्र पुरुषार्थ कर भविष्य 21 जन्मो की अपनी श्रेष्ठ प्रालब्ध बनानी है*। विश्व की सर्व आत्माओं को परमात्म सन्देश देने की सेवा अर्थ बाबा ने जो मुझे यह ब्राह्मण जीवन दिया है उस कर्तव्य को पूरी निष्ठा और लगन से करने का तीव्र पुरुषार्थ मुझे अवश्य करना है।

 

_ ➳  अपने आप से दृढ़ प्रतिज्ञा कर अब मैं अपने लाइट के फ़रिशता स्वरूप में स्थित हो पहुंच जाती हूँ सूक्ष्म वतन में बापदादा के पास। अपनी मीठी दृष्टि से असीम स्नेह और सर्व शक्तियाँ मुझमे समाहित करने के साथ साथ *बाबा मुझ से मीठी मीठी रूह रिहान करते हुए कहते हैं, मेरे मीठे बच्चे:- " विश्व की सर्व आत्मायें आपके रूहानी भाई बहन हैं। इसलिए सर्व के प्रति यही शुभभावना रहे कि सबको अपने अविनाशी पिता का परिचय मिल जाये और सभी मुक्ति, जीवनमुक्ति के वर्से की अधिकारी बन जाएं"।*

 

_ ➳  बाबा की इस मीठी रूह रिहान का जवाब देते हुए मैं बाबा से कहती हूँ, जी बाबा:-  "मैं जानती हूं सेवा के मार्ग पर हर घड़ी आप मेरे साथ हो"। बाबा मैं आपको पूर्ण विश्वास दिलाती हूँ कि मैं पूर्णतया योगयुक्त और अंतर्मुखी रह सेवा का पार्ट बजाने का पुरुषार्थ करूँगी। *बाबा आपने मुझे संगठन में रहते "पहले आप" का जो पाठ पक्का करवाया है उसका ख्याल रखते हुए अपने साथी सहयोगियों को आगे रखने का प्रयत्न करूँगी*। साक्षी हो कर दूसरों के पुरुषार्थ को देखते मैं तीव्र पुरुषार्थी बनूँगी।

 

_ ➳  बाबा से मीठी मीठी रुह रिहान करके, साक्षी स्थिति में स्थित रह सबके पार्ट को साक्षी हो कर देखने का दृढ़ संकल्प ले कर *अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर नथिंग न्यू की स्मृति से इस बेहद नाटक को हर्षित हो कर देख रही हूं*।

 

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं निरन्तर याद में रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं अविनाशी कमाई जमा करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सर्व खजानों के अधिकारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा स्नेह रूप का अनुभव सुनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा शक्ति रूप का अनुभव सुनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा स्नेह स्वरूप और शक्ति स्वरूप हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  लेकिन फिर भी सम्बन्ध जोड़ने के कारण सम्बन्ध के आधार पर स्वर्ग का अधिकार वर्से में पा ही लेते हैं - क्योंकि ब्राह्मण सो देवताइसी विधि के प्रमाण देवपद की प्राप्ति का अधिकार पा ही लेते हैं। *सतयुग को कहा ही जाता है - देवताओं का युग। चाहे राजा हो, चाहे प्रजा हो लेकिन धर्म देवता ही है - क्योंकि जब ऊँचे ते ऊँचे बाप ने बच्चा बनाया तो उँचे बाप के हर बच्चे को स्वर्ग के वर्से का अधिकारदेवता बनने का अधिकार, जन्म सिद्ध अधिकार में प्राप्त हो ही जाता है। ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारी बनना अर्थात् स्वर्ग के वर्से के अधिकार की अविनाशी स्टैम्प लग जाना।* सारे विश्व से ऐसा अधिकार पाने वाली सर्व आत्माओं में से कोई आत्मायें ही निकलती हैं। इसलिए ब्रह्माकुमार-कुमारी बनना कोई साधारण बात नहीं समझना। ब्रह्माकुमार-कुमारी बनना ही विशेषता है और इसी विशेषता के कारण विशेष आत्माओं की लिस्ट में आ जाते हैं। इसलिए ब्रह्माकुमार-कुमारी बनना अर्थात् ब्राह्मण लोक केब्राह्मण संसार के,ब्राह्मण परिवार के बनना।

 

✺   *"ड्रिल :- सतयुगी वर्से की स्मृति में रहना।"*

 

 _ ➳  *मैं फरिश्ता प्रेम सागर की लहरों में लहराती हुईखुशियों के झूले में झूलती हुई उमंग उत्साह के पंख लगाकर उड़ चलती हूँ और पहुंच जाती हूं इस धरती के स्वर्ग मधुबन पावन भूमि पर...* मधुबन की शांति और सुकून का अनुभव करती पूरे मधुबन का चक्कर लगा रही हूँ... मैं आत्मा सभी सांसारिक झमेलों से मुक्त होकर कल्प के सबसे बड़े मिलन मेले में आई हूँ... मधुबन के डायमंड हाल में पहुंच जाती हूँ... चारों ओर सफेद पोश फरिश्तों के बीच मैं फरिश्ता योगयुक्त अवस्था में बैठ जाती हूँ... अव्यक्त बापदादा आते ही अपनी मीठी दृष्टि देकर नजरों से निहाल करते हैं... *अव्यक्त बापदादा की पावन दृष्टि से मैं आत्मा अव्यक्त स्थिति में स्थित हो जाती हूँ... और स्टेज पर बाबा के सम्मुख पहुंच जाती हूँ...*

 

 _ ➳  अव्यक्त बापदादा से अव्यक्त मिलन मनाते हुए अतीन्द्रिय सुखों में खो जाती हूँ... *फिर बाबा मुझे दिव्य दर्पण सौगात में देते हैं... जैसे ही मैं आत्मा दिव्य दर्पण में देखती हूँ मुझे अपने तीनों काल स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं...* मैं आत्मा उत्सुकतावश अपना भविष्य देखती हूँ... *मैं फरिश्ता दिव्य दर्पण के रास्ते सतयुगी स्वर्णिम दुनिया में पहुँच जाती हूँ... जहाँ चारों ओर सोने, हीरों से सजे हुए भव्य जगमगाते हुए महल नजर आ रहे हैं... चारों ओर देवी-देवता नज़र आ रहे हैं...* जो आजकल के देवी देवताओं के चित्र हैं उनसे भी अत्यंत सुन्दर, सम्पन्न, दैवीय गुणों से भरपूर दिख रहे हैं... सभी आत्मिक स्वरुप में स्थित हैं... न कोई माया है, न अपवित्रता है, न कोई विकार हैं... प्रकृति भी सतोप्रधान है... यहाँ की प्रजा भी कितनी सम्पन्न और सुखी हैं...

 

 _ ➳  मैं फरिश्ता स्वयं को एक दिव्य अलौकिक शहजादी के रूप में महल में सोता हुआ देख रही हूँ... *सर्वगुण संपन्न, 16 कलाओं से सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी अवस्था में मैं अति तेजस्वी, दिव्य शहजादी के रूप में स्वयं को अनुभव कर रही हूँ...* अमृतवेले पंछियों की मधुर साज से उठ जाती हूँ... पंछी भिन्न-भिन्न सुन्दर आवाजों से मेरा मनोरंजन कर रहे हैं... नैचुरल पहाड़ों से क्रॉस करता हुआ झरना बह रहा है... सुगन्धित जडी-बूटियों वाले खुशबूदार झरने में नहाकर सुन्दर देवताई ड्रेस पहनती हूँ... सोने, हीरों के आभूषणों से दासियाँ मेरा श्रृंगार करती हैं... रत्नजडित ताज पहनकर मैं शहजादी देवताई परिवार के साथ वैरायटी प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खाती हूँ... महल से बाहर निकलकर सुन्दर-सुन्दर फूलों और फलों से लदे हुए बगीचे में प्रवेश करती हूँ... एक फल तोड़कर उसका रस पीती हूँ... कितना मीठा, स्वादिष्ट और रसीला है... *रत्नजडित झूले में सखियों संग झूल रही हूँ... खेल-खेल में पढाई कर रही हूँ... सुन्दर चित्रकारी कर रही हूँ... रतन जडित नैचुरल साज बजाकर मधुर गायन कर रही हूँ...*

        

 _ ➳  फिर मैं देवता पुष्पक विमान में बैठकर आसमान में सैर करती हूँ... *सैर करते-करते मैं फरिश्ता गोल्डन ऐज से फिर से डायमंड युग में डायमंड हाल में पहुँच जाती हूँ...* सामने बापदादा मुझे देख मुस्कुरा रहे हैं... बाबा मुझे वरदानों से भरपूर कर रहे हैं... चारों ओर ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारी भाई-बहनें अपने पिता से मिलन मनाकर खुशियों में नाच रहे हैं... मैं अपने श्रेष्ठ अविनाशी भाग्य पर नाज कर रही हूँ... मुझ आत्मा के दिव्य चक्षु खुल गए हैं, मुझ आत्मा की बुद्धि का ताला खुल गया है... *मैं आत्मा ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारी बनने की विशेषता को समझ गई हूँ... ब्रह्माकुमार-कुमारी बनना कोई साधारण बात नहीं है... कोटो में कोई कोई में भी कोई आत्मायें ही निकलती हैं...* ब्रह्माकुमार-कुमारी बनना अर्थात् स्वर्ग के वर्से के अधिकार की अविनाशी स्टैम्प लग जाना...

 

 _ ➳  *ब्राह्मण लोक कीब्राह्मण संसार कीब्राह्मण परिवार की बनकर स्वर्ग के वर्से के अधिकार की अविनाशी स्टैम्प लगाकर, मैं विशेष आत्माओं की लिस्ट में आ गई हूँ...* बाबा को शुक्रिया करती हूँ कितना ऊंचा भाग्य बना दिया है मेरा... बाबा ने अपना बच्चा बनाकर स्वर्ग के वर्से का अधिकार, देवता बनने का जन्म सिद्ध अधिकार दे दिया है... बाबा मिल गया सब कुछ मिल गया... अलौकिक परिवार मिल गया, खुशियों का खजाना मिल गया... मैं आत्मा *बाबा से दिव्य अनुभूतियों की सौगात लेकर वापस अपने अकालतख्त पर विराजमान हो जाती हूँ... और सदा सतयुगी वर्से की स्मृति में रहती हूँ...*

 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━