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 10 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अथॉरिटी के साथ साथ बहुत रीस्पेक्ट से बात की ?*

 

➢➢ *एक अव्यभिचारी याद में रहे ?*

 

➢➢ *हद की इच्छाओं का त्याग कर अच्छा बनकर रहे ?*

 

➢➢ *याद और निस्वार्थ सेवा द्वारा मायाजीत बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे साकार रूप में एक ड्रेस चेन्ज कर दूसरी ड्रेस धारण करते हो, ऐसे साकार स्वरूप की स्मृति को छोड़ आकारी फरिश्ता स्वरूप बन जाओ। *फरिश्तेपन की ड्रेस सेकेण्ड में धारण कर लो। यह अभ्यास बहुत समय से चाहिए तब अन्त समय में पास हो सकेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बाप के दिलतख्तनशीन आत्मा हूँ"*

 

✧  सदा अपने को बाप के दिलतख्त-नशीन आत्मायें अनुभव करते हो? *ऐसा तख्त सारे कल्प में अब एक बार ही मिलता है, और कोई समय नहीं मिलता। जो श्रेष्ठ बात हो और मिले भी एक ही बार-तो उस तख्त को कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए।* जो बाप के दिल तख्त-नशीन होंगे, सदा होंगे-तो तख्त-नशीन की निशानी क्या है? तख्त पर बैठने से क्या होता है? तख्त पर बैठने से अपने को बेफिक्र बादशाह अनुभव करेंगे। तो सदा बेफिक्र रहते हो या कभी थोड़ा-थोड़ा फिक्र आ जाता है-चाहे अपना, चाहे सेवा का, चाहे दूसरों का?

 

✧  *तो सदा दिलतख्त पर बैठने वाली आत्मा नशे में भी रहती और नशा रहने के कारण स्वत: ही बेफिक्र रहती। क्योंकि इस तख्त में यह विशेषता है कि जब तक जो तख्त-नशीन होगा वह सब बातों में बेफिक्र होगा। जैसे आजकल भी कोई-कोई स्थान को विशेष कोई न कोई नवीनता, विशेषता मिली हुई है। तो दिलतख्त की यह विशेषता है-फिक्र आ नहीं सकता।* तो नीचे क्यों आते जो फिक्र हो? काम करने के लिए नीचे आना पड़ता है! दिलतख्त को यह भी वरदान मिला हुआ है कि कोई भी कार्य करते भी दिलतख्त-नशीन बन सकते। फिर सदा क्यों नहीं रहते?

 

✧  तख्त-नशीन बनने के लिए तिलकधारी भी बनना पड़े। तिलक कौनसा है? स्मृति का। तिलक है तो तख्तनशीन भी हैं, तिलक नहीं तो तख्त नहीं। अविनाशी तिलक लगा हुआ है या कभी मिटता है, कभी लगता है? अविनाशी तिलक है ना! स्मृति का तिलक लगा और तख्त-नशीन हो सदा स्वयं भी नशे में रहेंगे और दूसरों को भी नशे की स्मृति दिलायेंगे। बच्चों को कभी भी बाप का वर्सा भूलता है क्या! तो यह दिलतख्त भी बाप का वर्सा है, तो वर्सा तो सदा साथ रहेगा ना! क्या याद रखेंगे? कौन हो? बेफिक्र बादशाह। *बार-बार स्मृति को इमर्ज करते रहना। सदा यह नशा रहे कि हम साधारण आत्मा नहीं हैं लेकिन विशेष आत्मायें हैं। आप जैसी विशेष आत्मायें सारे विश्व में बहुत थोड़ी हैं। थोड़ों में आप हो-इसी खुशी में सदा रहो।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आप सभी अभी भी अपने को बहुत बिजी समझते हो लेकिन अभी फिर भी बहुत फ्री हो। *आगे चल और बिजी होते जायेंगे।* इसलिए ऐसे भिन-भिन्न प्रकार के स्व-अभ्यास, स्वसाधना अभी कर सकते हो। *चलते-फिरते स्व प्रति जितना भी समय मिले अभ्यास में सफल करते जाओ।* दिन-प्रतिदिन वातावरण प्रमाण

 

✧  एमर्जेन्सी केसेज ज्यादा आयेंगे। अभी तो आराम से दवाई कर रहे हो। *फिर तो एमर्जन्सी केसेज में समय और शक्तियाँ थोडे समय में ज्यादा केसेज करने पडेगे।* जब चैलेन्ज करते है कि अविनाशी निरोगी बनने की एक ही विश्व की हास्पिटल है तो चारों ओर के रोगी कहाँ जायेंगे? एमर्जेन्सी केसेज की लाइन होगी। उस समय क्या करेंगे?

 

✧  *अमरभव का वरदान तो देंगे ना।* स्व अभ्यास के आक्सीजन द्वारा साहस का शवांस देना पडेगा *होपलेस केस अर्थात चारों ओर के दिल शिकस्त के केसेज ज्यादा आयेंगे।* ऐसी होपलेस आत्माओं को साहस दिलाना यही श्वांस भरना है। *तो फटाफट आक्सीजन देना पडेगा।* उस स्व-अभ्यास के आधार पर ऐसी आत्माओं को शक्तिशाली बना सकेंगे! इसलिए *फुर्सत नहीं है, यह नहीं कहो।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *देह, देह के सम्बन्ध, देह-संस्कार, व्यक्ति या वैभव, वायब्रेशन, वायुमण्डल सब हाते हुए भी आकर्षित न करे। इसी को ही कहते हैं - 'नष्टोमोहा समर्थ स्वरूप।'* तो ऐसी प्रेक्टिस है? लोग चिल्लाते रहें और आप अचल रहो। प्रकृति भी, माया भी सब लास्ट दांव लगाने लिए अपने तरफ कितना भी खींचे लेकिन आप न्यारे और बाप के प्यारे बनने की स्थिति में लवलीन रहो। *इसको कहा जाता है - देखते हुए न देखो। सुनते हुए न सुनो। ऐसा अभ्यास हो। इसी को ही 'स्वीट साइलेन्स' स्वरूप की स्थिति कहा जाता है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  देही-अभिमानी बनने की प्रेक्टिस करना*

 

_ ➳  मै आत्मा कभी अपने शरीर भान में उलझे अतीत को देखती हूँ... तो सोचती हूँ, मीठे बाबा ने किस दलदल में से मुझे निकाल कर... कितनी खुबसूरत सुख भरी राहो पर ला दिया है... आज ईश्वरीय यादो में और ज्ञान रत्नों की खनक में गूंजता हुआ जीवन... कितना प्यारा प्यारा सा है... और मै आत्मा *अपने प्यारे बाबा की प्यारी यादो में खोकर... दिल से शुक्रिया करने*... मीठे वतन में उड़ चलती हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपने सत्य रूप के अहसासो में डुबोते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *देह के भान से निकल कर देही अभिमानी बनने की हरपल प्रेक्टिस करो.*.. मै आत्मा हूँ... हर समय इस सत्य को यादो में भरो... और अब मुझे अपने मीठे बाबा संग घर को जाना है... यह बार बार स्म्रति में लाओ... देह के आवरण से अब अछूते बन, आत्मिक भाव में आओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने प्यारे बाबा को बड़ी ही प्यार भरी नजरो से देखते हुए कहती हूँ :-* "मीठे दुलारे मेरे बाबा... खुद को देह मानकर मै आत्मा कितने दुखो से भरी थी... *आपने मुझे मेरा सच आत्मा बताकर कितना सुकून दे दिया है..*. हर पल मै आत्मा अपने भान में खोयी हुई मुस्करा रही हूँ...और देही अभिमानी बनती जा रही हूँ...

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को अलौकिकता से सजाते हुए कहा :-* "मीठे लाडले बच्चे... जब घर से निकले थे, चमकती मणि स्वरूप थे... अपने उस सत्य के नशे में पुनः खो जाओ... देह को छोड़ देहि अभिमानी बन मुस्कराओ... हर क्षण अपने आत्मिक भान में रहो... *बार बार यही अभ्यास करो और पिता का हाथ पकड़ कर घर चलने की तैयारी में जुट जाओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने सच्चे साथी बाबा से कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा... आपने मुझे अपना बनाकर असीम खुशियो को मेरे दामन में सजा दिया है... मेरा जीवन सत्य की चमक से प्रकाशित हो गया है... *मै आत्मा अपने नूरानी नशे में खोयी हुई घर चलने को अब आमादा हूँ.*.."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को सत्य के प्रकाश से रौशन करते हुए कहा :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... ईश्वर पिता को पाकर जो अपने खोये वजूद को पा लिया है उसकी सत्यता में हर साँस डूबे रहो... *देह के आकर्षण से बाहर निकल अपने चमकते स्वरूप में गहरे खोकर आत्मिक तरंगे सदा फैलाओ.*.. अपने मीठे बाबा संग घर चलने की तैयारी कर पुनः देवताई कुल में आओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा से अनगिनत रत्नों को बटोर कर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे...आपने मुझे मेरे सत्य का पता देकर मुझे कितना हल्का प्यारा और निश्चिन्त कर दिया है... *मै आत्मा हूँ देह नही इस खुबसूरत सच ने मुझे खुशियो से भर दिया है.*..और मै आत्मा अब ख़ुशी ख़ुशी घर चलने की तैयारी में हूँ..."अपने मीठे बाबा से मीठा वादा करके मै आत्मा कर्म जगत पर आ गयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  पावन बनने की ही प्रतिज्ञा बाप से करनी है*"

 

_ ➳  अपने मीठे मधुबन घर में, पीस पार्क में बैठी ईश्वरीय यज्ञ के इतिहास पर लिखी हुई एक पुस्तक मैं पढ़ रही हूँ जिसमे यज्ञ से जुड़ी उन महान विभूतियों का उल्लेख है जिन्होंने अपने लौकिक परिवार के अनेक प्रकार के सितम सहन करके भी भगवान का हाथ और साथ नही छोड़ा। *हर सितम सहन करके भी अपनी पवित्रता की प्रतिज्ञा को कायम रखते हुए, अपना सम्पूर्ण जीवन इस यज्ञ में स्वाहा कर दिया और अपने इस महान कर्म से वो महान आत्मायें, ईश्वरीय यज्ञ के इतिहास में सबके लिए प्रेंरणा स्त्रोत बनने के साथ - साथ  भगवान के दिल तख्त पर सदा के लिए विराजमान रहने का सौभाग्य पाने वाली महान पदमापदम सौभागशाली आत्मायें बन गई*।

 

_ ➳  ईश्वरीय यज्ञ में सब कुछ समर्पण कर देने वाली उन महान विभूतियों की जीवन गाथा को पढ़ते हुए स्वयं से मैं प्रोमिस करती हूँ कि उनके नक्शे कदम पर चलते हुए इस अंतिम जन्म में सितम सहन करते भी मैं पावन अवश्य बनूँगी। *जैसे ही मैं स्वयं से यह प्रतिज्ञा करती हूँ मुझे ऐसा अनुभव होता है जैसे वो सभी महान आत्मायें मेरी इस प्रतिज्ञा को दृढ़ता के साथ पूरा करने के लिए मुझे सूक्ष्म रीति अपनी पवित्रता का बल दे रही हैं। एक अद्भुत शक्ति जैसे मेरे अंदर भरती जा रही हैं*। मन में पावन बनने का दृढ़ संकल्प लेकर मैं पीस पार्क से उठकर अब पांडव भवन की ओर चल पड़ती हूँ और बाबा के समान सम्पन्न, सम्पूर्ण बनने का लक्ष्य लेकर, बाबा के कमरे में पहुँच जाती हूँ और बाबा के ट्रांस लाइट के चित्र के सामने जा कर बैठ जाती हूँ।

 

_ ➳  ऐसा लग रहा है जैसे बाबा साक्षात मेरे सामने बैठे हैं और बिना कहे मेरी हर बात को समझ रहें है। मन्द - मन्द मुस्कारते हुए बाबा मुझे निहार रहें हैं। बाबा के अधरों की मुस्कराहट मन को एक सुकून दे रही है। बाबा के नयनों में मेरे लिए समाया अथाह स्नेह मुझे अंदर ही अंदर रोमांचित कर रहा है। *बाबा की दृष्टि में समाई पवित्रता की लहर को मैं स्पष्ट देख रही हूँ जो धीरे - धीरे बाबा की दृष्टि से निकल कर मुझ आत्मा को छू रही है और मेरे अंदर पवित्रता का बल भर रही है*।। बाबा की पवित्र दृष्टि के साथ - साथ बाबा के वरदानी हस्तों को भी मैं अपने ऊपर अनुभव कर रही हूँ जिनसे पवित्रता की सफेद किरणे निकल कर मुझ आत्मा में समाती जा रही हैं। *पवित्रता की शक्ति से भरपूर करते हुए बाबा मुझे पवित्र भव, योगी भव का वरदान दे रहें हैं*।

 

_ ➳  अपने प्यारे पिता से हर हाल में पावन बनने की दृढ़ प्रतिज्ञा करके अब मैं बाबा के कमरे से बाहर आ जाती हूँ और फूलों, पतियों और लताओं से सजी बाबा की कुटिया के बाहर पार्क में रखे एक बैंच पर आकर बैठ जाती हूँ। *पतित पावन अपने शिव पिता की याद में अपने मन बुद्धि को मैं एकाग्र कर लेती हूँ और मन बुद्धि के विमान पर बैठ अपने स्वीट साइलेन्स होम की तरफ रवाना हो जाती हूँ*। पवित्रता के सागर अपने पिता से पवित्रता की शक्ति स्वयं में भरने के लिए मैं धीरे - धीरे उनके पास पहुँच जाती हूँ और उनकी सर्कशक्तियो की किरणो की छत्रछाया के नीचे जाकर बैठ जाती हूँ। *पवित्रता के सफेद प्रकाश से सम्पन्न किरणे पूरे वेग के साथ मुझ आत्मा के ऊपर प्रवाहित होने लगती हैं*।

 

_ ➳  मुझे एवर प्योर बनाने के लिए बाबा अपनी सारी पवित्रता की शक्ति मेरे अंदर भरते जा रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे पवित्रता के सफेद प्रकाश में नहाकर मैं अति उज्ज्वल बन गयी हूँ। अपने इस उज्ज्वल स्वरूप के साथ, पवित्रता की शक्ति को अपने अंदर धारण करके मैं आत्मा अब वापिस साकार वतन की और लौट रही हूँ। *अपने ब्राह्मण स्वरूप में अब मैं स्थित हूँ और बाबा से की हुई पवित्रता की प्रतिज्ञा को दृढ़ता के साथ पूरा कर रही हूँ*। इस अंतिम जन्म में सितम सहन करके भी पावन बनने के स्वयं से और अपने प्यारे पिता से किये हुए प्रॉमिस को हर हाल में निभाते हुए, उनसे मिले पवित्रता के बल से मनसा, वाचा, कर्मणा सम्पूर्ण पावन बनने के लक्ष्य को मैं बिल्कुल सहज रीति प्राप्त कर रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं हद की इच्छाओं का त्याग करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं अच्छा बनने की विधि द्वारा सर्व प्राप्ति सम्पन्न आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा याद और नि:स्वार्थ सेवा द्वारा मायाजीत बन जाती हूँ  ।*

   *मैं विजयी आत्मा हूँ  ।*

   *मैं निमित्त सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  क्रोध का कारण - *आपके जो संकल्प हैं वो चाहे उल्टे हों,चाहे सुल्टे हों लेकिन पूर्ण नहीं होंगे - तो क्रोध आयेगा*। मानो आप चाहते हो कि कान्फ्रेन्स होती हैफंक्शन होते हैं तो उसमें हमारा भी पार्ट होना चाहिए। आखिर भी हम लोगों को कब चांस मिलेगा? आपकी इच्छा है और आप इशारा भी करते हैं लेकिन आपको चांस नहीं मिलता है तो उस समय चिड़चिड़ापन आता है कि नहीं आता है?

➳ _ ➳  चलोमहाक्रोध नहीं भी करोलेकिन जिसने ना की उनके प्रति व्यर्थ संकल्प भी चलेंगे नातो वह पवित्रता तो नहीं हुई। *आफर करना, विचार देना इसके लिए छुट्टी है लेकिन विचार के पीछे उस विचार को इच्छा के रूप में बदली नहीं करो। जब संकल्प इच्छा के रूप में बदलता है तब चिड़चिड़ापन भी आता है*मुख से भी क्रोध होता है वा हाथ पांव भी चलता है। हाथ पांव चलाना-वह हुआ महाक्रोध। लेकिन  *निस्वार्थ होकर विचार दोस्वार्थ रखकर नहीं कि मैंने कहा तो होना ही चाहिए-ये नहीं सोचो।*

➳ _ ➳  आफर भले करोये रांग नहीं है। लेकिन क्यों-क्या में नहीं जाओ। नहीं तो ईर्ष्या, घृणा - ये एक-एक साथी आता है। इसलिए *अगर पवित्रता का नियम पक्का कियालगाव मुक्त हो गये तो यह भी लगाव नहीं रखेंगे कि होना ही चाहिए। होना ही चाहिएनहीं*। आफर किया ठीक, आपकी निस्वार्थ आफर जल्दी पहुँचेगी। स्वार्थ या ईर्ष्या के वश आफर और क्रोध पैदा करेगी।

✺   *ड्रिल :-  "सेवा में क्रोध मुक्त स्थिति का अनुभव"*

➳ _ ➳  *मन रूपी झील में उठते सकंल्पों को मैं आत्मा साक्षी होकर देख रही हूँ*... मैं देखे जा रही हूँ अपने हर संकल्प रूपी बीज को, *और गहराई से निरीक्षण कर रही हूँ  इसके उत्पन्न होने के कारण का*... आहिस्ता-आहिस्ता संकल्प रूपी लहरें शान्त होती जा रही है... बिल्कुल शान्त... शान्त झील में तैरते किसी हिमशैल के समान, मैं आत्मा अपने आस-पास शीतलता और पावनता का सृजन कर रही हूँ... झिलमिलाते हीरे के समान मैं आत्मा अपनी आभा बिखेर रही हूँ... मेरे मस्तक पर अपनी किरणों का जाल बिखेरते शिव सूर्य, एकदम अद्भुत नजारा है... *सुनहरी किरणों को स्वयं में समाती हुई... स्वयं भी केवल एक सुनहरी किरण बन निकल पडी हूँ अपनी रूहानी चैतन्य यात्रा पर सब कुछ पीछे छोडती हुई...*

➳ _ ➳  मैं आत्मा फरिश्ता रूप धारण कर सूक्ष्म वतन में... सूक्ष्म वतन आज बिल्कुल मधुबन की तरह प्रतीत हो रहा है... वैसा ही बापदादा का कमरा, कुटिया और वही शान्ति स्तम्भ... सुनहरे बादलों के अस्तित्व से बना है ये सुन्दर मधुबन रूपी सूक्ष्म वतन... चारों तरफ घूमते फरिश्ते अपनी-अपनी सेवाओं में मगन... *हिस्ट्री हाॅल में सन्दली पर फरिश्ता रूप में बैठे बापदादा... सेवा के सब्जैक्ट के बारे में इशारा दे रहे हैं, बाबा कहते- महाक्रोध, चिडचिडापन और व्यर्थ संकल्पों का कारण है सेवा में कोई न कोई हद की इच्छा रखना*... बापदादा समझाते जा रहे हैं और उनकी हर बात को गहराई से धारण करता हुआ मैं लौट चला हूँ अपने स्थूल वतन की ओर... मगर मैं महसूस कर रहा हूँ कि अभी भी इस सफर में बापदादा मेरे साथ है...

➳ _ ➳  हम दोनों उतर जाते हैं एक सुन्दर बगीचे में... *गुलाब के फूलों पर मंडराती मधुमक्खियाँ*... *सेवा रूपी शहद का निर्माण करती मधुमक्खियाँ*... मैं गहराई से चिन्तन कर रहा हूँ इन्हें देखकर... और याद आ रहा है उनका शहद पान करने का तरीका... *शहद का पान करती हुई कैसे स्वयं के पंखों और नन्हें पंजों को बचा लेती है उसमें चिपकने से*... ताकि शहद का पान तो करे मगर पंख सलामत रहें...  *मुझे भी अपने मन बुद्धि रूपी पंखों को सेवा रूपी शहद की मिठास में चिपकने से बचाना है... सेवा के विचार और सेवा कार्य सब करते हुए लगाव मुक्त रहना है... लगाव नही होगा तो व्यर्थ सकंल्प, चिडचिडाहट और महाक्रोध से मुक्त रह सकूँगा* तभी एक मधुमक्खी का उडकर मेरे कन्धे पर बैठ जाना और *बापदादा का मुझे देखकर गहराई से मुस्कुराना... मानों वरदान दे रहे हो सदा मन बुद्धि रूपी पंखों को सेवा रूपी शहद में न चिपकने का*...

➳ _ ➳  किस तरह सेवाओं में क्रोध और उसके हर अंश से दूर रह सकता हूँ, इसकी गहरी समझ लिए मैं आत्मा लौट आई हूँ अपनी उसी देह में... देख रही हूँ शान्त और स्थिर मन की उस झील को... जिसमें बहुत कम संकल्प रूपी लहरें हैं, ये संकल्प पहले से मजबूत है *सेवा में लगाव मुक्त और क्रोध मुक्त रहने के*... *संकल्पो में भी बस ट्रस्टी भाव ही बाकी है अब*... 'मेरा मुझमें क्या बाकी, किया हर संकल्प का तुमने तो सृजन... मनबुद्धि और प्राण तुम्हारे, तुमने ही तो दिया ये नवजीवन...'

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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