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 10 / 09 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सर्व गुणों से अपना श्रृंगार किया ?*

 

➢➢ *"हम नयी दुनिया में ट्रान्सफर हो रहे हैं" - यह स्मृति रही ?*

 

➢➢ *प्रवृति में रहेते मेरेपन का त्याग किया ?*

 

➢➢ *अभिमान से मुक्त रह अपमान की फीलिंग से मुक्त रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *बीजरूप स्थिति या शक्तिशाली याद की स्थिति यदि कम रहती है तो इसका कारण अभी तक लीकेज है, बुद्धि की शक्ति व्यर्थ के तरफ बंट जाती है।* कभी व्यर्थ संकल्प चलेंगे, कभी साधारण संकल्प चलेंगे। जो काम कर रहे हैं उसी के संकल्प में बुद्धि का बिजी रहना इसको कहते हैं साधारण संकल्प। याद की शक्ति या मनन शक्ति जो होनी चाहिए वह नहीं होती इसलिए पावरफुल याद का अनुभव नहीं होता *इसलिए सदा समर्थ संकल्पों में, समर्थ स्थिति में रहो तब शक्तिशाली बीजरूप स्थिति का अनुभव कर सकेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कल्प-कल्प की पूज्य आत्मा हूँ"*

 

✧  अपने को कल्प-कल्प की पूज्य आत्मायें अनुभव करते हो? स्मृति है कि हम ही पूज्य थे, हम ही हैं और हम ही बनेंगे? पूज्य बनने का विशेष साधन क्या है? कौन पूज्य बनते हैं? *जो श्रेष्ठ कर्म करते हैं और श्रेष्ठ कर्मो का भी फाउन्डेशन है पवित्रता। पवित्रता पूज्य बनाती है। अभी भी देखो जो नाम से भी पवित्र बनते हैं तो पूज्य बन जाते हैं। लेकिन पवित्रता सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं। ब्रह्मचर्य व्रत को धारण किया इसमें ही सिर्फ श्रेष्ठ नहीं बनना है।* यह भी श्रेष्ठ है लेकिन साथ में और भी पवित्रता चाहिये।

 

✧  *अगर मन्सा संकल्प में भी कोई निगेटिव संकल्प है तो उसे भी पवित्र नहीं कहेंगे, इसलिए किसी के प्रति भी निगेटिव संकल्प नहीं हो। अगर बोल में भी कोई ऐसे शब्द निकल जाते हैं जो यथार्थ नहीं है तो उसको भी पवित्रता नहीं कहेंगे। यदि संकल्प और बोल ठीक हों लेकिन सम्बन्ध-सम्पर्क में फर्क हो, किससे बहुत अच्छा सम्बन्ध हो और किससे अच्छा नहीं हो तो उसे भी पवित्रता नहीं कहेंगे।* तो ऐसे मन्सा-वाचा-कर्मणा अर्थात् सम्बन्ध-सम्पर्क में पवित्र हो? ऐसे पूज्य बने हो? अगर मानो कोई भी बात में कमी है तो उसको खण्डित कहा जाता है। खण्डित मूर्ति की पूजा नहीं होती है।

 

✧  इसलिए जरा भी मन्सा, वाचा, कर्मणा में खण्डित नहीं हो अर्थात् अपवित्रता न हो, तब कहा जायेगा पूज्य आत्मा। तो ऐसे पूज्य बने हो? जड़ मूर्ति भी खण्डित हो जाती है तो पूजा नहीं होती। उसको पत्थर मानेंगे, मूर्ति नहीं मानेंगे। म्यूजियम में रखेंगे, मन्दिर में नहीं रखेंगे। *तो ऐसे पवित्रता का फाउन्डेशन चेक करो-कोई भी संकल्प आये, तो स्मृति में लाओ कि मैं परम पूज्य आत्मा हूँ। यह याद रहता है या जिस समय कोई बात आती है उस समय भूल जाता है, पीछे याद आता है?* फिर पश्चाताप होता है-ऐसे नहीं करते तो बहुत अच्छा होता। तो सदा पवित्र आत्मा हूँ, पावन आत्मा हूँ। पवित्रता अर्थात् स्वच्छता।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  साइलेन्स की शक्ति के साधनों द्वारा नजर से निहाल कर देंगे। *शुभ संकल्प से आत्माओं के व्यर्थ संकल्पों को समाप्त कर देंगे।* शुभ भावना से बाप की तरफ स्नेह की भावना उत्पन्न करा लेंगे।

 

✧  ऐसे उन आत्माओं को शान्ति की शक्ति से सन्तुष्ट करेंगे, तब आप चैतन्य शान्ति देव आत्माओं के आगे *शान्ति देवा, शान्ति देवा' कह करके महिमा करेंगे और यही अंतिम संस्कार ले जाने के कारण द्वापर में भक्त आत्मा बन आपके जड चित्रों की यह महिमा करेंगे।*

 

✧  यह ट्रैफिक कन्ट्रोल का भी महत्व कितना बडा है और कितना आवश्यक है - यह फिर सुनायेंगे। लेकिन *शान्ति की शक्ति के महत्व को स्वयं जानो और सेवा में लगाओ।* समझा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *जैसे आवाज में आना अति सहज लगता है ऐसे ही आवाज से परे हो जाना इतना सहज है? यह बुद्धि की एक्सरसाइज सदैव करते रहना चाहिए।* जैसे शरीर की एक्सरसाइज शरीर को तन्दरुस्त बनाती है ऐसे आत्मा की एक्सरसाइज आत्मा को शक्तिशाली बनाती है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- याद में रहना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मधुबन प्यारे बाबा की कुटिया में बैठ विचित्र बाबा के चित्र को निहार रही हूँ... मीठे बाबा की मीठी यादों की मीठी फुहारों के बीच बैठ भीग रही हूँ... निराकार बाबा साकार बाबा के द्वारा मुझे दृष्टि देते जा रहे हैं...* बाबा की मीठी दृष्टि से पवित्रता की सफ़ेद किरणें मुझमें समाती जा रही हैं... एक-एक किरण से मेरे अन्दर के विकारों की सारी मैल धुलती जा रही है... मैं आत्मा पावनता से सजधजकर मीठे बाबा के साथ रूह-रिहान करती हूँ...

 

  *प्रेम के भावों में मुझे डुबोकर प्रेम की तरंगो में लहराते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे बच्चे... *मीठे पिता के साये बैठे हो तो प्यार में डूब कर बैठो... यादो के अम्बार को लेकर बैठो... हर धड़कन को ईश्वरीय प्यार में भिगो कर बैठो... तो यह सारा आलम प्यार की तरंगो से खिल उठेगा...* इन मीठी तरंगो को बातो में नातो में न बिखराओ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा पावनता की खुशबू से महकते हुए प्यार के सागर बाबा से कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *आपकी मीठे अहसासो में डूबना कितना सुखद है ह्रदयस्पर्शी है... अपनी बुद्धि को बाहरी नातो में भटकाकर दुःख का स्वाद चख चुकी हूँ...* अब इस मीठे प्यार सागर में खो जाना चाहती हूँ...

 

  *शीतल नैनों की फुलवारी से मेरे मन आँगन को सींचते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे बच्चे... *मीठे पिता और बच्चे की समीपता ही सुंदर सत्य है... जिस संसार को बुद्धि में लिए घूम रहे वह भ्रम है... तो अब एक पल भी इस व्यर्थ में ना लगाओ...* हर साँस को ईश्वरीय प्यार में पिरो दो... और अंतर्मुखी बन प्यार का समां बना दो...

 

_ ➳  *प्रभु की यादों को श्वांसों में निरंतर बहाकर मन में बाबा को बसाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा हर साँस रुपी तार में आपको पिरो ली हूँ... ईश्वरीय प्यार में रंग कर अपनी खूबसूरती को पाकर खिल उठी हूँ... सब जगह से बुद्धि को हटाकर सारा आलम ईश्वरीय प्यार के रंग से भर ली हूँ...

 

  *सारे खजानों को मुझ पर लुटाते हुए सर्व खजानों के सागर मेरे मीठे बाबा कहते हैं:-* प्यारे बच्चे... विश्व पिता सामने आ बैठा है... *सारे खजाने लेकर लुटाने बैठा है... पिता लुटने आया है तो सारा लूट लो... पास में बैठ कर बाहर न भटको वरना खजानो के प्राप्ति का समय हाथो से फिसल जाएगा...* और खालीपन से दामन भर जाएगा... इतना डूब जाओ ईश्वरीय प्यार में कि हवा के कण कण में यह मीठे अहसास समा जाय...

 

_ ➳  *सागर से खजानों को लूटकर खुशियों के अम्बर में अपने भाग्य के सितारे को चमकाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी हो गई हूँ... सारा कचरा बुद्धि से निकाल ली हूँ... *अंतर्मुखी बन यादो में डूब गयी हूँ... मुझे अपने सुनहरे स्वरूप और खूबसूरत पिता के सिवाय कुछ भी याद नही है...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कभी किसी को दुख नही देना है*"

 

_ ➳  दुखों से लिबरेट कर, सबको सुख देने वाले दुख हर्ता सुख कर्ता, सदा कल्याणकारी *अपने सदाशिव भगवान बाप समान मास्टर दुख हर्ता सुख कर्ता बन सबको खुशी देने और डबल अहिंसक बन मन, वचन, कर्म से कभी भी किसी को दुख ना देने का स्वयं से वायदा कर, मैं दया के सागर, सुख के सागर अपने निराकार शिव पिता की याद में अपने मन बुद्धि को एकाग्र करती हूँ* और उनके पास ले जाने वाली अति सुखदायी आंतरिक यात्रा पर धीरे - धीरे अग्रसर होती हूँ। मन और बुद्धि जैसे - जैसे स्थिर होने लगते हैं और जैसे - जैसे एकाग्रता की शक्ति बढ़ने लगती है मुझे मेरा वास्तविक स्वरूप बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देने लगता है।

 

_ ➳  अपनी साकार देह में अपनी दोनों आइब्रोज़ के बीच अपने आपको एक चमकते हुए सितारे के रूप में मैं देख रही हूँ। *उस सितारे में से निकल रहा भीना - भीना प्रकाश मुझे बहुत सुखद एहसास करवा रहा है और उस प्रकाश की सतरँगी किरणों में अपने अंदर निहित सातों गुणों के वायब्रेशन्स को अपने मस्तक से निकल कर, चारो ओर फैलता हुआ मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ*। अपने निज स्वरूप से निकल रहे इन सातों गुणों के वायब्रेशन्स को एक रंग बिरंगे फव्वारे से निकल रही फ़ुहारों के रूप में अपने ही शरीर पर पड़ता हुआ मैं अनुभव कर रही हूँ। 

 

_ ➳  मैं देख रही हूँ जैसे - जैसे ये फुहारें मेरे शरीर पर पड़ रही है मेरे शरीर के सभी अंग एक - एक करके शिथिल हो रहें हैं। अपने आपको मैं एक दम रिलेक्स महसूस कर रही हूँ। *ऐसा लग रहा है जैसे शरीर का भान बिल्कुल समाप्त हो गया है और मैं बिल्कुल अशरीरी हो गई हूँ*। जैसे मक्खन से बाल निकलता है ऐसे इस अशरीरी अवस्था में मैं आत्मा बिल्कुल सहज रीति देह से बिल्कुल न्यारी होकर अब भृकुटि के अकालतख्त को छोड़ उससे बाहर आ गई हूँ। 

 

_ ➳  दैहिक दुनिया के हर बन्धन से मुक्त इस अवस्था मे मैं स्वयं को बहुत हल्का महसूस कर रही हूँ। यह हल्कापन मुझे धरनी के आकर्षण से मुक्त करके, ऊपर की ओर उड़ा रहा है। *धीरे - धीरे मैं चमकता सितारा अपनी खूबसूरत आंतरिक यात्रा के इस पहले को पड़ाव को पार कर अब ऊपर आकाश की ओर जा रहा हूँ*। निरन्तर अपनी मंजिल की ओर बढ़ती हुई मैं चैतन्य शक्ति आत्मा आकाश को पार कर, उससे ऊपर सूक्ष्म वतन को पार करती हुई अब अपनी मंजिल, अपने शांति धाम घर में अपने सुख सागर बाबा के पास पहुँच चुकी हूँ। 

 

_ ➳  बाबा के पास पहुँच कर उनसे आ रही सुख की किरणों के शीतल झरने के नीचे खड़ी होकर मैं स्वयं को उनके सुख की किरणों से भरपूर कर स्वयं को उनके समान मास्टर सुख का सागर बना रही हूँ। *बाबा से आ रही सुख की पीले रंग की शक्तियों का झरना झर - झर करके मेरे ऊपर बहता ही जा रहा है और उन शक्तियों को मैं अपने अन्दर गहराई तक समाती जा रही हूँ*। अपने सुख सागर बाबा से सुख की अनन्त शक्ति अपने अंदर भरकर मैं वापिस साकारी दुनिया में अपने कर्मक्षेत्र पर लौटती हूँ। 

 

_ ➳  अपने सुख सागर बाप से अपने अंदर भरी हुई सुख की शक्ति मुझे बाप समान मास्टर दुख हर्ता सुख कर्ता बना रही है। अपने सम्बन्ध, सम्पर्क में आने वाली हर आत्मा पर रहम की दृष्टि रखते हुए, सुख के वायब्रेशन उन्हें देकर मैं सबको सुख का अनुभव करवा रही हूँ। *कैसे भी स्वभाव संस्कार वाली आत्मा मेरे सम्पर्क में क्यो ना आये, किन्तु डबल अहिंसक बन मन, वचन, कर्म से किसी को भी दुख ना पहुँचाकर, सबके प्रति शुभभावना शुभकामना रखते हुए, मैं मास्टर सुख का सागर बन सबको सुख देकर, सबकी दुआयों की पात्र आत्मा बन रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं प्रवृति में रहते मेरे पन का त्याग करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सच्ची ट्रस्टी आत्मा हूँ।*

   *मैं मायाजीत आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा अभिमान से सदा मुक्त हूँ  ।*

   *मैं आत्मा अपमान की फीलिंग से भी सदा मुक्त हूँ  ।*

   *मैं स्वमानधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  कोई भी बात नीचे ऊपर नहीं समझना। अच्छा है और अच्छा ही रहेगा। *बहुत अच्छा, बहुत अच्छा करते आप भी अच्छे बन जायेंगे और ड्रामा की हर सीन भी अच्छी बन जायेगी क्योंकि आपके अच्छे बनने के वायब्रेशन कैसी भी सीन हो नगेटिव को पाजिटिव में बदल देगीइतनी शक्ति आप बच्चों में है सिर्फ यूज करो।* शक्तियां बहुत हैंसमय पर यूज करके देखो तो बहुत अच्छे-अच्छे अनुभव करेंगे।

 

✺   *ड्रिल :-  "शक्तियों को समय पर यूज कर अच्छे-अच्छे अनुभव करना"*

 

 _ ➳  चारों तरफ हरियाली ही हरियाली ठंडी ठंडी हवाएं... और भीनी-भीनी प्रकृति की खुशबू के बीच... मैं आत्मा एक ऊंचे स्थान पर बैठी हुई हूं... और अपने आप को परमात्मा से मन बुद्धि से जोड़ते हुए... अपने अंदर नई शक्तियां भर रही हूं... *मैं आत्मा अनुभव कर रही हूँ... कि सीधा परमधाम से और शिव परमात्मा से शक्तिशाली किरणें मुझ पर गिर रही है... और मुझ आत्मा में समाती जा रही है... जैसे-जैसे वो किरणें मुझमें समा रही है... मुझे अनुभव हो रहा है की मुझमें अद्भुत शक्तियों का समावेश हो रहा है...* और मैं इस स्थिति को गहराई से फील करते हुए... कुछ देर इस आनंदमय स्थिति में बैठ जाती हूँ...

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा अपने आप को मास्टर सर्वशक्तिमान अवस्था में अनुभव कर रही हूं... *मुझे प्रतीत हो रहा है कि अब मेरे अंदर सभी शक्तियां समा गई है... और मैं अब हर परिस्थिति का दृढ़ता के साथ और पूरे आनंद के साथ सामना कर सकती हूं...* और इसी स्थिति की स्मृति में मैं उस खुशनुमा मनमोहक वातावरण से नई राह पर चलने लगती हूं... चलते-चलते मुझे बहुत ही थकान का अनुभव हो रहा है... और मैं साथ ही यह भी महसूस कर रही हूं... कि अभी मुझे काफी लंबा सफर तय करना है... और इस लंबे सफर पर चल़ने के लिए मुझे सहनशक्ति का उपयोग करना होगा...

 

 _ ➳  और उसी समय मैं आत्मा अपनी मन बुद्धि से संकल्प लेती हूं... कि मैं सफलता मूर्त आत्मा हूं... और इस दृढ़ संकल्प से और पॉजिटिव संकल्प से मैं अंदर ही अंदर यह तय कर लेती हूं... कि मैं फरिश्ता इस मखमली रास्ते पर अपने फूल से कदम रख रही हूं... और मैं अनुभव करती हूं कि चलते-चलते मुझे बिल्कुल भी थकान का अनुभव नहीं हो रहा... और ना ही अपने इस देह का बोझ अनुभव कर पा रही हूं... तभी मैं पीछे मुड़कर देखती हूं... तो मैं आश्चर्यचकित हो जाती हूं... मैं देखती हूं कि मैंने कुछ ही समय में इतना लंबा सफर तय कर लिया है... जिसको करने में मुझे काफी समय लग सकता था... *मैंने अपने अंदर की इस छुपी हुई शक्ति द्वारा अपनी कठिन राह को बहुत ही कोमल बना दिया है... और मैं बहुत आनंदित होती हूं... और मन ही मन अपने परम पिता को धन्यवाद कहती हूं...*

 

 _ ➳  और अब मैं आत्मा अपने अंदर परमात्मा की शक्तियों रूपी आभा अनुभव करते हुए अपनी राह पर चलने लगती हूँ... और मैं अब चलते चलते एक ऐसे स्थान पर आ जाती हूं... जहां पर कुछ आत्माएं आपस में पुरानी दुख देने वाली बातों को चिंतन कर रही हैं... और अपनी स्थिति चिंतामय बना लेती है... उनको देखकर मैं आत्मा एक स्थान पर बैठ जाती हूं... और मनन करती हूं... आज से मैं भी अपनी मजबूत अवस्था बनाऊंगी... इन आत्माओं की तरह चिंतित नहीं होऊँगी... *और मैं समाने की शक्ति को यूज करते हुए... पिछली दुख देने वाली व्यर्थ बातों को अपने अंदर समाते हुए... अपने मन बुद्धि के तार सिर्फ और सिर्फ अपने परमात्मा से जोड़ने का संकल्प लेती हूँ...*   

 

 _ ➳  और जैसे ही मैं आत्मा अपने मन ही मन यह संकल्प लेती हूं... तो मैं अनुभव करती हूं... कि मेरा चित्त एकदम शांत हो गया है... जैसे मन रूपी समन्दर में लहरों के समान हजारों सवाल उमड़े थे... मानो उन सवालों की उठती हुई लहरें... एकदम समंदर में समा गई हो... और समंदर एकदम शांत हो गया हो... और ऐसे ही मैं अपने परमात्मा द्वारा दी हुई हर शक्तियों का सही समय पर उपयोग करते हुए पहुंच जाती हूं अपने बाबा के कमरे में और अपनी रूहानी दृष्टि से और संकल्पों के द्वारा मन-ही-मन बाबा को धन्यवाद कह रही हूँ... और *अब अपने पुरुषार्थ को परमात्मा द्वारा दी हुई शक्तियों और पॉजिटिव संकल्पों से और भी तीव्र कर देती हूं...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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