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 10 / 09 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सतयुगी दुनिया को याद कर आपार ख़ुशी में रहे ?*

 

➢➢ *स्पिरिचुअल लीडर का टाइटल लिया ?*

 

➢➢ *कर्म करते हुए कर्म के बंधन से मुक्त रहे ?*

 

➢➢ *एकरस स्थिति के श्रेष्ठ आसन पर विराजमान रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *बीजरूप स्थिति या शक्तिशाली याद की स्थिति यदि कम रहती है तो इसका कारण अभी तक लीकेज है, बुद्धि की शक्ति व्यर्थ के तरफ बंट जाती है।* कभी व्यर्थ संकल्प चलेंगे, कभी साधारण संकल्प चलेंगे। जो काम कर रहे हैं उसी के संकल्प में बुद्धि का बिजी रहना इसको कहते हैं साधारण संकल्प। याद की शक्ति या मनन शक्ति जो होनी चाहिए वह नहीं होती इसलिए पावरफुल याद का अनुभव नहीं होता *इसलिए सदा समर्थ संकल्पों में, समर्थ स्थिति में रहो तब शक्तिशाली बीजरूप स्थिति का अनुभव कर सकेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कल्प-कल्प की पूज्य आत्मा हूँ"*

 

✧  अपने को कल्प-कल्प की पूज्य आत्मायें अनुभव करते हो? स्मृति है कि हम ही पूज्य थे, हम ही हैं और हम ही बनेंगे? पूज्य बनने का विशेष साधन क्या है? कौन पूज्य बनते हैं? *जो श्रेष्ठ कर्म करते हैं और श्रेष्ठ कर्मो का भी फाउन्डेशन है पवित्रता। पवित्रता पूज्य बनाती है। अभी भी देखो जो नाम से भी पवित्र बनते हैं तो पूज्य बन जाते हैं। लेकिन पवित्रता सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं। ब्रह्मचर्य व्रत को धारण किया इसमें ही सिर्फ श्रेष्ठ नहीं बनना है।* यह भी श्रेष्ठ है लेकिन साथ में और भी पवित्रता चाहिये।

 

✧  *अगर मन्सा संकल्प में भी कोई निगेटिव संकल्प है तो उसे भी पवित्र नहीं कहेंगे, इसलिए किसी के प्रति भी निगेटिव संकल्प नहीं हो। अगर बोल में भी कोई ऐसे शब्द निकल जाते हैं जो यथार्थ नहीं है तो उसको भी पवित्रता नहीं कहेंगे। यदि संकल्प और बोल ठीक हों लेकिन सम्बन्ध-सम्पर्क में फर्क हो, किससे बहुत अच्छा सम्बन्ध हो और किससे अच्छा नहीं हो तो उसे भी पवित्रता नहीं कहेंगे।* तो ऐसे मन्सा-वाचा-कर्मणा अर्थात् सम्बन्ध-सम्पर्क में पवित्र हो? ऐसे पूज्य बने हो? अगर मानो कोई भी बात में कमी है तो उसको खण्डित कहा जाता है। खण्डित मूर्ति की पूजा नहीं होती है।

 

✧  इसलिए जरा भी मन्सा, वाचा, कर्मणा में खण्डित नहीं हो अर्थात् अपवित्रता न हो, तब कहा जायेगा पूज्य आत्मा। तो ऐसे पूज्य बने हो? जड़ मूर्ति भी खण्डित हो जाती है तो पूजा नहीं होती। उसको पत्थर मानेंगे, मूर्ति नहीं मानेंगे। म्यूजियम में रखेंगे, मन्दिर में नहीं रखेंगे। *तो ऐसे पवित्रता का फाउन्डेशन चेक करो-कोई भी संकल्प आये, तो स्मृति में लाओ कि मैं परम पूज्य आत्मा हूँ। यह याद रहता है या जिस समय कोई बात आती है उस समय भूल जाता है, पीछे याद आता है?* फिर पश्चाताप होता है-ऐसे नहीं करते तो बहुत अच्छा होता। तो सदा पवित्र आत्मा हूँ, पावन आत्मा हूँ। पवित्रता अर्थात् स्वच्छता।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  साइलेन्स की शक्ति के साधनों द्वारा नजर से निहाल कर देंगे। *शुभ संकल्प से आत्माओं के व्यर्थ संकल्पों को समाप्त कर देंगे।* शुभ भावना से बाप की तरफ स्नेह की भावना उत्पन्न करा लेंगे।

 

✧  ऐसे उन आत्माओं को शान्ति की शक्ति से सन्तुष्ट करेंगे, तब आप चैतन्य शान्ति देव आत्माओं के आगे *शान्ति देवा, शान्ति देवा' कह करके महिमा करेंगे और यही अंतिम संस्कार ले जाने के कारण द्वापर में भक्त आत्मा बन आपके जड चित्रों की यह महिमा करेंगे।*

 

✧  यह ट्रैफिक कन्ट्रोल का भी महत्व कितना बडा है और कितना आवश्यक है - यह फिर सुनायेंगे। लेकिन *शान्ति की शक्ति के महत्व को स्वयं जानो और सेवा में लगाओ।* समझा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *जैसे आवाज में आना अति सहज लगता है ऐसे ही आवाज से परे हो जाना इतना सहज है? यह बुद्धि की एक्सरसाइज सदैव करते रहना चाहिए।* जैसे शरीर की एक्सरसाइज शरीर को तन्दरुस्त बनाती है ऐसे आत्मा की एक्सरसाइज आत्मा को शक्तिशाली बनाती है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- रूहानी बाप से नई-नई रूहानी बातें सुनना"*

 

_ ➳  तकदीर जगाकर आई हूँ, मैं एक नई दुनिया बसाकर आई हूँ... मैं आत्मा सेण्टर में बैठकर ये मुरली गीत सुनते हुए प्यारे बाबा की यादों में खो जाती हूँ... मैं आत्मा रोज रूहानी स्कूल में रूहानी गॉडली स्टूडेंट बनकर रूहानी शिक्षक से रूहानी पढाई पढने आती हूँ... मुझे राजाओं का राजा बनाने के लिए मीठे बाबा परमधाम से आकर सुप्रीम शिक्षक बन रोज पढ़ाते हैं... *मैं आत्मा प्यारे बाबा का आह्वान करती हूँ... और उनकी मीठी मीठी रूहानी शिक्षाओं को अपने बुद्धि रूपी झोली में धारण करती हूँ...*  

 

   *राजाई तकदीर बनाने ज्ञान योग से श्रृंगार करते हुए मेरे प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वर पिता की यादे ही खूबसूरत श्रेष्ठतम जीवन का सच्चा सच्चा आधार है... पिता ही सच्चा सहारा है और जनमो के दुखो से सदा का सुखी बनाने वाला जादूगर है... उसके प्यार के साये तले श्रेष्ठ तकदीर सजा लो... *ज्ञान रत्नों से दामन जगमगा लो... और सदा सुखो के फूलो भरे बगीचे में मौज मनाओ...*

 

_ ➳  *नई दुनिया में राजाओं का राजा बनने शिव पिता से सत्य ज्ञान पाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... *मै आत्मा ईश्वर पिता को शिक्षक रूप में पाकर ज्ञान रत्नों की खान से सुखो भरी सुंदर तकदीर  दामन में सजा अतीन्द्रिय आनंद में डूबी हूँ...* ईश्वर पिता से पा रही अपनी राजाई की यादो में पुलकित हूँ...

 

   *ज्ञान चंद्रमा बन ज्ञान का प्रकाश फैलाकर ऊँची तकदीर बनाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... देह के विनाशी बन्धनों ने सुंदर तकदीर को दुखो का जंगल बना उलझा दिया... अब ईश्वरीय यादो से उलझे जीवन को मखमली रेशम सा सुलझाओ... *ज्ञान रत्नों से हर पल खेलते हुए बुद्धि को अथाह खजानो से लबालब करो... और वही देवताई जगमगाता सौंदर्य पाकर मुस्कराओ...*

 

_ ➳  *जीवन में सबकुछ पाकर पाना था सो पा लिया के गीत गाती सागर सी लहराती मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा ने कभी ख्वाबो में भी न सोचा था कि दुखो से मुक्त हो पाऊँगी... आपने प्यारे बाबा कितना मीठा खिला जीवन बना दिया है... *ज्ञान का अथाह खजाना देकर मुझे रोमांचित कर दिया है... अपनी मीठी यादो की खुशबु से सुवासित कर दिया है...*

 

   *मन भावन मनमीत मेरा बाबा मेरे जीवन आंगन में खुशियों के मोती बरसाते हुए कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वर पिता के पास सुखो भरी तकदीर जगाने ही तो आये हो... जो प्राप्त नही था जीवन में वही सुख शांति पाने ईश्वरीय बाँहों में खिलने मुस्कराने महकने आये हो... *तो हर साँस संकल्प को मीठी यादो में... खूबसूरत निराली सत्य पढ़ाई में झोंक दो... मीठे बाबा की यादो में तकदीर को खिला दो...*

 

_ ➳  *मन में बाबा को बसाकर उनके कदमों में कदम रख पद्मों की कमाई करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा मीठे बाबा की यादो से अपनी राजाई को पाने वाली सुखदायी स्वर्ग की अधिकारी बनती जा रही हूँ...* अपने उजले चमकीले स्वरूप में जगमगाती हुई... ईश्वरीय ज्ञान से छलकती हुई प्रतिपल देवताई सौंदर्य से निखरती जा रही हूँ...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप जो गुह्य रमणिक बाते सुनाते हैं उन्हे धारण कर सबको समझाना है*"

 

_ ➳  ज्ञान के सागर, अपने शिव पिता परमात्मा द्वारा दिये अविनाशी ज्ञान रत्नों को अपने जीवन मे धारण करने और ज्ञान रत्नों से अपना श्रृंगार करने के लिए, अपने गॉडली स्टूडेंट स्वरूप में स्थित होकर मैं ब्राह्मण आत्मा अपने गॉडली विश्व विद्यालय में पहुँचती हूँ और क्लास रूम में जाकर बैठ जाती हूँ। *कुछ ही क्षणों में ज्ञान सागर अपने शिव पिता को अपनी ब्रह्मा माँ के साथ, शिक्षक के रूप में अपने उस क्लासरूम में मैं प्रवेश करते हुए अनुभव करती हूँ*। उनकी सर्वशक्तियों की अनन्त किरणो को ज्ञान की शीतल फ़ुहारों के रूप में अपने ऊपर बरसता हुआ मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ जो मेरे अन्दर एक अलौकिक रूहानी नशे का संचार कर रहा है। 

 

_ ➳  एक दिव्य अलौकिक मस्ती में डूबी ज्ञान के दिव्य चक्षु से मैं अपने सामने विराजमान बापदादा को देख रही हूँ और उनके मुख कमल से उच्चारित ज्ञान रत्नों को अपनी बुद्धि में धारण कर रही हूँ। *ऐसा लग रहा है जिसे ज्ञान सागर मेरे शिव पिता ज्ञान के अखुट ख़ज़ाने मुझ पर लुटा रहें हैं और मेरी ब्रह्मा माँ ज्ञान के मोती चुन - चुन कर उनसे मेरा श्रृंगार कर रही है, दिव्य गुणों से मुझे सजा रही है*। बापदादा के मुख कमल से निकल रहे अविनाशी ज्ञान रत्नों के साथ - साथ उनके मस्तक से निकल रहा शक्तियों का फव्वारा मेरे ऊपर बरस रहा है और मुझे ऐसे अनुभव करवा रहा है जैसे ज्ञान की रिमझिम फुहारें मेरे ऊपर पड़ रही हैं और इस ज्ञान बरसात में स्नान कर मैं ज्ञान रत्नों से सजी गुणमूर्त आत्मा बनती जा रही हूँ।

 

_ ➳  अविनाशी ज्ञान रत्नों से मेरा श्रृंगार कर, अब बापदादा वापिस अपने अव्यक्त वतन लौट रहें हैं और मैं ब्राह्मण आत्मा ज्ञान की शक्ति से स्वयं को भरपूर करने के लिए अपने निराकारी बिंदु स्वरूप में स्थित हो कर अब ऊपर परमधाम की ओर जा रही हूँ। *अपने अति सुंदर, उज्ज्वल स्वरूप में, दिव्य गुणों की महक चारों और फैलाते हुए, ज्ञान सागर अपने शिव पिता से मिलने की लगन में मगन मैं आत्मा उमंग - उत्साह के पंख लगा कर, ऊपर आकाश की ओर उड़ती जा रही हूँ*। ज्ञान की दिव्य अलौकिक रूहानी मस्ती से भरपूर मैं चैतन्य शक्ति अब नीले गगन को पार करते हुए, फ़रिशतो की दुनिया से भी परें, अपने उस परमधाम घर में प्रवेश करती हूँ जहाँ पहुंचते ही गहन शान्ति का मैं अनुभव करने लगती हूँ।

 

_ ➳  आत्माओं की इस निराकारी दुनिया मे देह से जुड़ी मन को अशांत करने वाली कोई बात नही, ऐसे अपने शांतिधाम घर मे पहुंच कर, गहन शांति का अनुभव करते - करते मैं आत्मा *अब अपने बुद्धि रूपी बर्तन को शुद्ध बनाने और उसे ज्ञान की शक्ति से भरपूर करने के लिए अब अपने ज्ञान सागर शिव पिता के पास पहुँचती हूँ और उनसे निकल रही ज्ञान की शक्ति के रंगीन फव्वारे के नीचे जा कर बैठ जाती हूँ*। अनन्त रंग बिरंगी किरणों के रूप में ज्ञान सागर मेरे शिव पिता के ज्ञान की वर्षा मुझ पर हो रही है। ऐसा लग रहा है जैसे बाबा के ज्ञान की शक्ति को अपने अंदर समाकर मैं ज्ञान रत्नों से भरपूर होकर, मास्टर ज्ञान सागर बन गई हूँ। 

 

_ ➳  अपनी बुद्धि रूपी झोली में ज्ञान का अखुट भण्डार जमा कर, ज्ञान की शक्ति से सम्पन्न बनकर अब मैं अपना और दूसरों का ज्ञान श्रृंगार करने के लिए वापिस साकारी दुनिया में लौट रही हूँ। *अपने ब्राह्मण स्वरूप में अब मैं स्थित हूँ और ज्ञानसागर अपने शिव पिता के ज्ञान की शीतल लहरों के अहसास को अभी भी अनुभव कर रही हूँ। बाबा के ज्ञान की शक्ति से अपनी बुद्धि को रिफाइन कर, ज्ञान के अखुट खजाने को अब मैं अपने

कर्मक्षेत्र और कार्य व्यवहार में प्रयोग कर, अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली सभी आत्माओं का ज्ञान श्रृंगार कर रही हूँ*।परमात्म ज्ञान को अपने जीवन मे हर जगह प्रयोग कर, अपने हर संकल्प, बोल और कर्म को व्यर्थ से मुक्त कर समर्थ आत्मा बन अब मैं सबको समर्थ बना रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं कर्म करते हुए कर्म के बन्धन से मुक्त रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सहजयोगी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव एकरस स्थिति के श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हूँ  ।*

   *मैं तपस्वी आत्मा हूँ  ।*

   *मैं संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  कोई भी बात नीचे ऊपर नहीं समझना। अच्छा है और अच्छा ही रहेगा। *बहुत अच्छा, बहुत अच्छा करते आप भी अच्छे बन जायेंगे और ड्रामा की हर सीन भी अच्छी बन जायेगी क्योंकि आपके अच्छे बनने के वायब्रेशन कैसी भी सीन हो नगेटिव को पाजिटिव में बदल देगीइतनी शक्ति आप बच्चों में है सिर्फ यूज करो।* शक्तियां बहुत हैंसमय पर यूज करके देखो तो बहुत अच्छे-अच्छे अनुभव करेंगे।

 

✺   *ड्रिल :-  "शक्तियों को समय पर यूज कर अच्छे-अच्छे अनुभव करना"*

 

 _ ➳  चारों तरफ हरियाली ही हरियाली ठंडी ठंडी हवाएं... और भीनी-भीनी प्रकृति की खुशबू के बीच... मैं आत्मा एक ऊंचे स्थान पर बैठी हुई हूं... और अपने आप को परमात्मा से मन बुद्धि से जोड़ते हुए... अपने अंदर नई शक्तियां भर रही हूं... *मैं आत्मा अनुभव कर रही हूँ... कि सीधा परमधाम से और शिव परमात्मा से शक्तिशाली किरणें मुझ पर गिर रही है... और मुझ आत्मा में समाती जा रही है... जैसे-जैसे वो किरणें मुझमें समा रही है... मुझे अनुभव हो रहा है की मुझमें अद्भुत शक्तियों का समावेश हो रहा है...* और मैं इस स्थिति को गहराई से फील करते हुए... कुछ देर इस आनंदमय स्थिति में बैठ जाती हूँ...

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा अपने आप को मास्टर सर्वशक्तिमान अवस्था में अनुभव कर रही हूं... *मुझे प्रतीत हो रहा है कि अब मेरे अंदर सभी शक्तियां समा गई है... और मैं अब हर परिस्थिति का दृढ़ता के साथ और पूरे आनंद के साथ सामना कर सकती हूं...* और इसी स्थिति की स्मृति में मैं उस खुशनुमा मनमोहक वातावरण से नई राह पर चलने लगती हूं... चलते-चलते मुझे बहुत ही थकान का अनुभव हो रहा है... और मैं साथ ही यह भी महसूस कर रही हूं... कि अभी मुझे काफी लंबा सफर तय करना है... और इस लंबे सफर पर चल़ने के लिए मुझे सहनशक्ति का उपयोग करना होगा...

 

 _ ➳  और उसी समय मैं आत्मा अपनी मन बुद्धि से संकल्प लेती हूं... कि मैं सफलता मूर्त आत्मा हूं... और इस दृढ़ संकल्प से और पॉजिटिव संकल्प से मैं अंदर ही अंदर यह तय कर लेती हूं... कि मैं फरिश्ता इस मखमली रास्ते पर अपने फूल से कदम रख रही हूं... और मैं अनुभव करती हूं कि चलते-चलते मुझे बिल्कुल भी थकान का अनुभव नहीं हो रहा... और ना ही अपने इस देह का बोझ अनुभव कर पा रही हूं... तभी मैं पीछे मुड़कर देखती हूं... तो मैं आश्चर्यचकित हो जाती हूं... मैं देखती हूं कि मैंने कुछ ही समय में इतना लंबा सफर तय कर लिया है... जिसको करने में मुझे काफी समय लग सकता था... *मैंने अपने अंदर की इस छुपी हुई शक्ति द्वारा अपनी कठिन राह को बहुत ही कोमल बना दिया है... और मैं बहुत आनंदित होती हूं... और मन ही मन अपने परम पिता को धन्यवाद कहती हूं...*

 

 _ ➳  और अब मैं आत्मा अपने अंदर परमात्मा की शक्तियों रूपी आभा अनुभव करते हुए अपनी राह पर चलने लगती हूँ... और मैं अब चलते चलते एक ऐसे स्थान पर आ जाती हूं... जहां पर कुछ आत्माएं आपस में पुरानी दुख देने वाली बातों को चिंतन कर रही हैं... और अपनी स्थिति चिंतामय बना लेती है... उनको देखकर मैं आत्मा एक स्थान पर बैठ जाती हूं... और मनन करती हूं... आज से मैं भी अपनी मजबूत अवस्था बनाऊंगी... इन आत्माओं की तरह चिंतित नहीं होऊँगी... *और मैं समाने की शक्ति को यूज करते हुए... पिछली दुख देने वाली व्यर्थ बातों को अपने अंदर समाते हुए... अपने मन बुद्धि के तार सिर्फ और सिर्फ अपने परमात्मा से जोड़ने का संकल्प लेती हूँ...*   

 

 _ ➳  और जैसे ही मैं आत्मा अपने मन ही मन यह संकल्प लेती हूं... तो मैं अनुभव करती हूं... कि मेरा चित्त एकदम शांत हो गया है... जैसे मन रूपी समन्दर में लहरों के समान हजारों सवाल उमड़े थे... मानो उन सवालों की उठती हुई लहरें... एकदम समंदर में समा गई हो... और समंदर एकदम शांत हो गया हो... और ऐसे ही मैं अपने परमात्मा द्वारा दी हुई हर शक्तियों का सही समय पर उपयोग करते हुए पहुंच जाती हूं अपने बाबा के कमरे में और अपनी रूहानी दृष्टि से और संकल्पों के द्वारा मन-ही-मन बाबा को धन्यवाद कह रही हूँ... और *अब अपने पुरुषार्थ को परमात्मा द्वारा दी हुई शक्तियों और पॉजिटिव संकल्पों से और भी तीव्र कर देती हूं...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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