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 10 / 11 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ उमंग और उत्साह का अनुभव किया ?

 

➢➢ स्वयं को बाप के संग का रंग लगाया ?

 

➢➢ पुराने स्वभाव संस्कार योग अग्नि से भस्म किये ?

 

➢➢ दृष्टि की पिचकारी द्वारा आत्माओं पर सुख, शांति, प्रेम का रंग लगाया ?

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  ✰ अव्यक्त पालना का रिटर्न

         ❂ तपस्वी जीवन

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〰✧  सम्पूर्ण फरिश्ता वा अव्यक्त फरिश्ता की डिग्री लेने के लिए सर्व गुणों में फुल बनो। नालेजफुल के साथ-साथ फेथफुल, पावरफुल, सक्सेसफुल बनो। अभी नाजुक समय में नाजों से चलना छोड़ विकर्मो और व्यर्थ कर्मो को अपने विकराल रुप (शक्ति रुप) से समाप्त करो।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?

 

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अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए

             ❂ श्रेष्ठ स्वमान

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   "मैं कर्मयोगी श्रेष्ठ आत्मा हूँ"

 

  स्वयं को कर्मयोगी श्रेष्ठ आत्मा अनुभव करते हो? कर्मयोगी आत्मा सदा कर्म का प्रत्यक्ष फल स्वत: ही अनुभव करती है।

 

  प्रत्यक्षफल - 'खुशी' और 'शक्ति'। तो कर्मयोगी आत्म अर्थात् प्रत्यक्षफल 'खुशी' औरा 'शक्ति' अनुभव करने वाली।

 

  बाप सदा बच्चों को प्रत्यक्षफल प्राप्त कराने वाले हैं। अभी-अभी कर्म किया, कर्म करते खुशी और शक्ति का अनुभव किया! तो ऐसी कर्मयोगी आत्मा हूँ - इसी स्मृति से आगे बढ़ते रहो।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?

 

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         रूहानी ड्रिल प्रति

अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं

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✧  सभी एक सेकण्ड में अशरीरी स्थिति का अनुभव कर सकते हो? या टाइम लगेगा? आप राजयोगी हो, राजयोगी का अर्थ क्या है? राजा हो ना। तो शरीर आपका क्या है? कर्मचारी है ना! तो सेकण्ड में अशरीरी क्यों नहीं हो सकते? ऑर्डर करो - अभी शरीर-भान में नहीं आना है, तो नहीं मानेगा शरीर? राजयोगी अर्थात मास्टर सर्वशक्तिवान कर्मबंधन को भी नहीं तोड सकते तो मास्टर सर्वशक्तिवान कैसे कहला सकते?

 

✧  कहते तो यही हो ना कि हम मास्टर सर्वशक्तिवान हैं तो इसी अभ्यास को बढ़ाते चलो। राजयोगी अर्थात राजा बन इन कर्मेन्द्रियों को अपने ऑर्डर में चलाने वाले। क्योंकि अगर ऐसा अभ्यास नहीं होगा तो लास्ट टाइम पास विद ऑनर कैसे बनेंगे! धक्के से पास होना है या पास विद ऑनर' बनना है? जैसे शरीर में आना सहज है, सेकण्ड भी नहीं लगता है।

 

✧  क्योंकि बहुत समय का अभ्यास है। ऐसे शरीर से परे होने का भी अभ्यास चाहिए और बहुत समय का अभ्यास चाहिए। लक्ष्य श्रेष्ठ है तो लक्ष्य के प्रमाण पुरुषार्थ भी श्रेष्ठ करना है। सारे दिन में यह बार-बार प्रेक्टिस करो - अभी-अभी शरीर में हैं, अभी-अभी शरीर से न्यारे अशरीरी है। लास्ट सो फास्ट और फर्स्ट आने के लिए फास्ट पुरुषार्थ करना पडे।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?

 

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         ❂ अशरीरी स्थिति प्रति

अव्यक्त बापदादा के इशारे

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〰✧  जैसे इस वक्त जिसके साथ स्नेह होता है, वह कहाँ विदेश में भी है तो उनका मन ज़्यादा उस तरफ़ रहता है। जिस देश में वह होता है उस देश का वासी अपने को समझते हैं। वैसे ही तुमको अब सूक्ष्मवतनवासी बनना है। सूक्ष्मवतन को स्थूलवतन में इमर्ज करते हो वा खुद सूक्ष्मवतन में साथ समझते हो? क्या अनुभव है?  सूक्ष्मवतनवासी बाप को यहाँ इमर्ज करते हो वा अपने को भी सूक्ष्मवतनवासी बना कर साथ रहते हो? बापदादा तो यही समझते हैं कि स्थूल वतन में रहते भी सूक्ष्मवतनवासी बन जाते। यहाँ भी जो बुलाते हो, यह भी सूक्ष्मवतन के वातावरण में ही सूक्ष्म से सर्विस ले सकते हो।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- संगमयुग उत्सव का युग है"

➳ _ ➳ मिट्टी के खिलौने से खेले अब गुज़र गया इक जमाना, ज्ञान रत्नों से खेलना जब से उसने सिखाया है, नाज़ होने लगा है खुद पर अब तो, फरिश्ता और देवता रूप का दीदार कुछ यूँ कराया है... ये ईश्वरीय जन्म, ये ईश्वर की गोद और हर सम्बन्ध में मेरे अंग संग रहता है अब वो... रूहानी मौजों का युग है ये संगम... अनुभवो में डूबी हर रूह का अनुभव यही कहता है अब... इसी ईश्वरीय बचपन की सलोनी सी पालना देते बापदादा बैठे है मेरे सम्मुख... और अनुभव करा रहे है संगमयुग की मौजों का...

❉ श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ स्वमानों की माला मेरे गले में पहनाते हुए बापदादा बोले:- "ईश्वरीय पालना में पलने वाली मीठी बच्ची... संगम युग के ये दिन बडे ते बडे मौज मनाने के दिन है... क्या इन दिनों का, ईश्वरीय जन्म और ईश्वरीय पालना का नशा रहता है आपको... सारें कल्प में ये सबसे भाग्यशाली समय है... एक एक संकल्प बेशकीमती हो गया है आपका... आप प्रभु प्यार और दिल तख्त की अधिकारी हो गई हो... हद की दुनिया से निकल कर अब बेहद में भी प्यारी हो गई हो"...

➳ _ ➳ ईश्वरीय स्वमानों का स्वरूप बनती, संगमयुगी मौजो में पलती मैं आत्मा, बापदादा से बोली:- "मीठे बाबा... आपके स्नेह ने बेहद का प्यारा बनाया है... कभी माँ की तरह उंगली पकड कर चलना सिखाया... तो सदगुरू बन मुक्ति की राह दिखाई है... हर संबंध सुखदायी हुआ है... हर तरफ अब तो मौजो की शहनाई है... सर्व सम्बन्धों का ये अविनाशी सुख सतयुगी सुखों से भी बढकर है... ये प्रभु मिलन के ये चन्द लम्हें और इन बडे ते बडे दिनो की सौगातें अनमोल है"...

❉ अनमोल खजानों से भरपूर कर मेरे हर दिन को बडा बनाने वाले बाप दादा मुझ आत्मा से बोलें:- "मीठी बच्ची... कल्पवृक्ष के थुर में चमकती आप मणि पूरे कल्पवृक्ष को जगमगा रही हो, संगम युग की इस अमृत वेला में संकल्पों की सिद्धि का वरदान पाया है आपने... कलयुगी घोर अंधेरी रात में नींद में सोई आत्माओं को इस संगम के अमृत वेले में लेकर आओं, बहुत सो चुकी है माया की नींद अब, इसी संकल्प शक्ति से उनको भी जगाओं"...

➳ _ ➳ मौजों के संसार सदा रूहानी मौजों में रहने वाली मैं सन्तुष्ट मणि आत्मा बोली:- "मेरे मीठे बाबा... ये क्रिसमस का उत्सव ये कल्पवृक्ष का थुर, ये जगमगाते चैतन्य सितारों की झिलमिल... आपके आने से ही तो कायम है... ये बडे दिन की सौगाते... और ये मौजो भरी बहारें... जिनमे अब हम दिन रात झूल रहे है... क्या होता है रंजो गम अब तो नामोनिशान तक भूल रहे है... प्रभु मिलन के ये दिन कल्प में एक बार ही मिलें है... पाकर प्यार आपका... हम तो खिलें-खिलें है..."

❉ सेवा के निमित्त बना मेरा भाग्य बनाने वाले रहम दिल बापदादा मुझ आत्मा से बोलें:- "मेरी श्रेष्ठ रूहानी बच्ची... आपकी खुशियों के पैमाने अब भर कर लबालब हो गये है... बूँद बूँद सुख को तरसती आत्माओं के प्रति रहमभाव से कितना भरी हो, खुलकर बरसो इस सूखे रेगिस्तान पर... आप तो सुखो से भरपूर हो, रिमझिम बरसती सी बदरी हो... जो पाया है उसको अब बढाते जाओं... रहम के फरिश्तें बन... अब औरों को भी देते जाओं"...

➳ _ ➳ शुभभावनाओं से भरपूर स्नेह की मीठी बरसात करती मैं आत्मा बापदादा से बोली:- "बडे ते बडे दिन की सौगातो से मेरा दामन भरने वाले मीठे बाबा... आपकी प्रेरणा और आपका मार्गदर्शन पाकर मैं निमित्त आत्मा इस देह और दुनिया में रहने का उद्देश्य पा रही हूँ... अकेली नही हूँ इन राहों पर मैं, अपने संग देवकुल की आत्माओं का विशाल काफिला ला रही हूँ... ये कल्पवृक्ष का थुर, और संगम का ये बडे ते बडा दिन... अब हर आत्मा को लुभा रहा है... और मै देख रही हूँ बापदादा की नजरों से बरसते स्नेह के सागर को... जो मुझ आत्मा को बाप समान फरिश्ता बना रहा है"...

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- स्वयं को बाप के संग का रंग लगाना"

➳ _ ➳ अपने दिलाराम बाबा को साथ लिए, उनकी सर्वशक्तियों की छत्रछाया के नीचे, मैं एक पार्क में टहल रही हूँ। टहलते - टहलते मैं कोने में रखे एक बेंच पर बैठ जाती हूँ और अपनी आंखों को बंद करके अपने दिलाराम बाबा की सर्वशक्तियों की शीतल छाया का आनन्द लेने लगती हूँ। उस मधुर आनन्द में खोई हुई मैं एक दृश्य देखती हूँ कि जैसे मैं एक छोटी सी बच्ची बन पार्क में एक झूले पर बैठी झूला झूल रही हूँ। झूला झूलने में मैं इतनी मगन हो जाती हूँ कि कब अंधेरा हो जाता है और सभी पार्क से चले जाते हैं, पता ही नही पड़ता।

➳ _ ➳ अंधेरे में स्वयं को अकेला पाकर मैं डर से कांप रही हूँ, रो रही हूँ और रोते - रोते बाबा - बाबा बोल रही हूँ। तभी दूर से मैं देखती हूँ एक बहुत तेज लाइट तेजी से मेरी ओर आ रही है। वो लाइट मेरे बिल्कुल समीप आ कर रुक जाती है। देखते ही देखते वो लाइट एक बहुत सुंदर आकार धारण कर लेती है और उसके मुख से मधुर आवाज आती है:- "मेरे बच्चे डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ" यह कहकर वो लाइट का फ़रिशता मुझे अपनी बाहों में उठा कर मुझे मेरे घर छोड़ देता है। इस दृश्य को देखते - देखते मैं विस्मय से अपनी आंखें खोलती हूँ और इस दृश्य को याद करते हुए मन ही मन स्वयं को स्मृति दिलाती हूँ कि मेरा बाबा सदा मेरे अंग - संग है।

➳ _ ➳ इस स्मृति में मैं जैसे ही स्थित होती हूँ मैं स्वयं को अपने निराकारी ज्योति बिंदु स्वरूप में अपने निराकार शिव बाबा के साथ कम्बाइंड अनुभव करती हूँ। कम्बाइन्ड स्वरूप की इस स्थिति में मैं मन बुद्धि रूपी नेत्रों से पार्क के खूबसूरत दृश्य को देख रही हूँ। मेरे दिलाराम बाबा की लाइट माइट पूरे पार्क में फैली हुई है। उनकी शक्तियों की रंग बिरंगी किरणे चारों और फैल कर परमधाम जैसे अति सुंदर दृश्य का निर्माण कर रही है।

➳ _ ➳ ऐसा लग रहा है जैसे पार्क का वह दृश्य परमधाम का दृश्य बन गया है। वहां उपस्थित सभी देहधारी मनुष्यों के साकार शरीर लुप्त हो गए हैं और चारों और चमकती हुई निराकारी ज्योति बिंदु आत्मायें दिखाई दे रही हैं। मैं आत्मा स्वयं को साक्षी स्थिति में अनुभव कर रही हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे कि मैं संकल्प मात्र भी देह से अटैच नही हूँ। कितनी न्यारी और प्यारी अवस्था है यह। आलौकिक सुखमय स्थिति में मैं सहज ही स्थित होती जा रही हूँ। निर्संकल्प हो कर, बिंदु बन अपने बिंदु बाप को मैं निहार रही हूँ। उन्हें देखने का यह सुख कितना आनन्द देने वाला है। बहुत ही निराला और सुंदर अनुभव है यह।

➳ _ ➳ बिंदु बाप के सानिध्य में मैं बिंदु आत्मा उनकी सर्वशक्तियों को स्वयं में समा रही हूँ। उनकी सर्वशक्तियों रूपी किरणों की मीठी - मीठी फुहारे मुझे असीम बल प्रदान कर रही हैं। उनकी शीतल किरणों की छत्रछाया में गहन शीतलता की अनुभूति कर रही हूँ। आत्मा और परमात्मा का यह मंगल मिलन चित को चैन और मन को आराम दे रहा है। बाबा से आती सर्वशक्तियों को स्वयं में समाकर मैं शक्तियों का पुंज बन गई हूँ और बहुत ही शक्तिशाली स्थिति का अनुभव कर रही हूँ। यह सुखद अनुभूति करके, अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर, अपने बाबा को अपने संग ले कर वापिस अपने कर्म क्षेत्र पर लौट रही हूँ।

➳ _ ➳ बाबा के संग में रह अब मैं निर्भय हो कर जीवन मे आने वाली हर परिस्थिति को सहज रीति पार करते हुए निरन्तर आगे बढ़ रही हूँ। "स्वयं भगवान मेरे संग है" यह स्मृति मुझमे असीम बल भर देती है और मैं अचल अडोल बन माया के हर तूफान का सामना कर, माया पर सहज ही विजय प्राप्त कर लेती हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺  मैं ऊंचा बाप, ऊंचे हम और ऊंचा कार्य इस स्मृति से शक्तिशाली बनने वाली बाप समान आत्मा हूँ ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ मैं संपूर्णता के दर्पण में सूक्ष्म लगावों को चेक करके मुक्त होने वाली आत्मा हूँ ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  आज सर्व श्रेष्ठ भाग्य विधातासर्व शक्तियों के दाता बापदादा चारों ओर के सर्व बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं। चाहे मधुबन में सम्मुख में हैंचाहे देश विदेश में याद में सुन रहे हैंदेख रहे हैंजहाँ भी बैठे हैं लेकिन दिल से सम्मुख हैं। उन सब बच्चों को देख बापदादा हर्षित हो रहे हैं। आप सभी भी हर्षित हो रहे हो ना! बच्चे भी हर्षित और बापदादा भी हर्षित । और यही दिल का सदा का सच्चा हर्ष सारी दुनिया के दु:खों को दूर करने वाला है। यह दिल का हर्ष आत्माओं को बाप का अनुभव कराने वाला है क्योंकि बाप भी सदा सर्व आत्माओं के प्रति सेवाधारी है और आप सब बच्चे बाप के साथ सेवा साथी हैं। साथी हैं ना! बाप के साथी और विश्व के दु:खों को परिवर्तन कर सदा खुश रहने का साधन देने की सेवा में सदा उपस्थित रहते हो। सदा सेवाधारी हो। सेवा सिर्फ चार घण्टा, छ: घण्टा करने वाले नहीं हो। हर सेकण्ड सेवा की स्टेज पर पार्ट बजाने वाले परमात्म-साथी हो।

 

✺   ड्रिल :-  "दिल का सदा का सच्चा हर्ष अनुभव करना"

 

 _ ➳  मैं आत्मा रूपी सूरजमुखी फूल एकांत में बैठी हूँ... मैं मन और बुद्धि द्वारा एक बगीचे में पहुँचती हूँ... वाह! कितना सुंदर नज़ारा हैं... चारों तरफ हरियाली ही हरियाली हैं... पेड़, पौधें, पक्षी सभी मन को लुभा रहे हैं... वहाँ सभी मनुष्यात्मायें रूपी फूलों के पास धन (जल), समय (श्वास) और मित्र-सम्बन्धी ( मिट्टी) सब हैं परंतु तब भी सब मुरझाये हुए और दुःखी हैं... क्योंकि बाबा रूपी सूरज की पवित्र किरणें उनपर नहीं पड़ी हैं...

 

_ ➳  सभी बाबा का इंतज़ार कर रहे कि कब वो आये और हमे किरणें दें... अचानक ऊपर आकाश से बाबा रूपी सूरज की तेज़ पवित्र किरणें मुझपर पड़ती हैं और मैं अपना मुख उनकी ओर कर लेती हूँ... जहाँ-जहाँ बाबा की किरणें पड़ रही हैं, वहाँ-वहाँ मेरा मुख होता जा रहा हैं... मेरी शक्तियों रूपी पंखुड़ियाँ खुल चुकी हैं... मैं पवित्रता की किरणों से सच्चे हर्ष का अनुभव कर रही हूँ... मैं आत्मा भी बाप समान हर्षित हो रही हूँ...

 

_ ➳  मैं बाबा से किरणें लेकर उन मुरझाई हुई मनुष्यात्माओं पर न्यौछावर कर रही हूँ... हर एक आत्मा खिल उठी हैं... जो आत्मायें काँटों से भरी हुई थी, एक ही परिवार में रहकर मुख फेर लेती थी, वह भी कोमल बन चुकी हैं... जो दुःखों के कारण रोते-रुलाते रहते थे वो आज बाबा की किरणों से बेहद हर्षित हो रहे है... अब किसी का भी चेहरा मुरझाया हुआ नहीं हैं...

 

 _ ➳  अब मैं हर सेकंड सेवा में बाबा की साथी हूँ... मैं आत्मा अब सेवा के अलावा और कोई संकल्प नहीं चलाती हूँ... मेरी अब यही शुभ भावना रहती हैं कि सर्व आत्मायें भी बाबा के वर्से के अधिकारी बन जाए और इस रावण की दुनिया से छूट जाए... मैं आत्मा अब कभी भी दुःखी होकर कोई भी डिस सर्विस नहीं करती हूँ... मैं सुख, शांति का अनुभव कर रही हूँ... मैं अपने पवित्र संकल्पों का प्रभाव सर्व आत्माओं तक पहुँचा रही हूँ...

 

 _ ➳  मैं आत्मा अमृतवेले के समय उठते ही एक स्वमान का अभ्यास करती हूँ कि मैं हर्षितमुख आत्मा हूँ... याद की शक्ति द्वारा मैं उड़ता पंछी अनुभव कर रही हूँ और सर्व आत्माओं को भी अनुभव करा रही हूँ... कोई भी हलचल हो जाए, मैं हमेशा उस हलचल से डिटैच होकर रहती हूँ... उसको ड्रामा समझकर भूल जाती हूँ... अब मैं कोई भी अपवित्र संकल्प नहीं करती जिससे मेरी खुशी चली जाए...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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