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 11 / 01 / 17  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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शिवभगवानुवाच :-

➳ _ ➳  रोज रात को सोने से पहले बापदादा को पोतामेल सच्ची दिल का दे दिया तो धरमराजपुरी में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 2*5=10)

 

➢➢ *देह अभिमान की जंजीर काटने का पुरुषार्थ किया ?*

 

➢➢ *बाप समान पतित से पावन बनाने की सेवा की ?*

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∫∫ 2 ∫∫ विशेष अभ्यास (Marks:3*10=30)

 

➢➢ *श्रेष्ठ और शुभ वृत्ति द्वारा वाणी और कर्म को श्रेष्ठ बनाया ?*

 

➢➢ *विदेही व अशरीरी बनने का अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *बेहद की वैराग्य वृत्ति द्वारा चारों और तपस्या का वायुमंडल बनाया ?*

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∫∫ 3 ∫∫ विशेष पुरुषार्थ (Marks: 10)

( इस रविवार की अव्यक्त मुरली से... )

 

➢➢ *सर्व कर्मेन्द्रियों के अधिकारी अर्थात सर्व कर्मों के बंधन से मुक्त बनकर रहे ?*

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∫∫ 4 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

➢➢ *"मीठे बच्चे - 21 जनमो के लिए सदा सुखी बनने के लिए, इस थोड़े समय में देही अभिमानी होने की आदत डालो"*

 

❉   प्यारा बाबा कहे - मेरे मीठे फूल बच्चे... 21 जनमो के मीठे सुख आपकी दहलीज पर आने को बेकरार है... इन सुखो को जीने के लिये अपने सत्य स्वरूप के नशे से भर जाओ... वरदानी संगम पर आत्माअभिमानी के संस्कार को इस कदर पक्का करो कि *अथाह सुख अथाह खुशियां दामन में सदा की सज जाएँ..*.

 

➳ _ ➳  आत्मा कहे - हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा शरीर के भान से निकल कर आत्मा होने की सत्यता से परिपूर्ण होती जा रही हूँ... सातो गुणो से सजधज कर तेजस्वी होती जा रही हूँ... और *नई दुनिया में अनन्त सुखो की स्वामिन् होती जा रही हूँ..*..

 

❉   मीठा बाबा कहे - मीठे प्यारे लाडले बच्चे... देह के भान ने उजले प्रकाश को धुंधला कर दुखो के कंटीले तारो में लहुलहानं सा किया है... अब आत्मिक ओज से स्वयं को भर चलो... *अपने चमकते स्वरूप और गुणो की उसी खूबसूरती से फिर से दमक उठो.*.. तो सुखो के अम्बार कदमो में सदा के बिछ जायेंगे....

 

 ➳ _ ➳  आत्मा कहे - मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में अपनी खोयी चमक वही खूबसूरत रंगत पुनः पाती जा रही हूँ... आत्मा अभिमानी होकर खुशियो में मुस्करा रही हूँ... *मीठे बाबा के प्यार में सतयुगी सुख अपने नाम करवा रही हूँ..*.

 

❉   मेरा बाबा कहे - प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... संगम के कीमती समय में सुखो की जागीर *अपनी बाँहों में भरकर 21 जनमो तक अथाह खुशियों में मुस्कराओ.*.. ईश्वर पिता का सब कुछ अपने नाम कर चलो... और खूबसूरत दुनिया के मालिक बन विश्व धरा पर इठलाओ...

 

➳ _ ➳  आत्मा कहे - हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा कभी यूँ ईश्वर पिता के दिल पर इतराउंगी ... *सब कुछ मेरी मुट्टी में होगा भाग्य इतना खूबसूरत और ईश्वरीय प्यार के जादू में खिलेगा* ऐसा मेने भला कब सोचा था... ये प्यारे से ईश्वरीय पल मुझे 21 जनमो का सुख दिलवा रहे है...

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∫∫ 5 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मैं आत्मा विश्व परिवर्तक हूँ ।"*

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा महान हूँ... मैं पूर्वज आत्मा हूँ... *मैं हीरो पार्टधारी आत्मा हूँ*... मैं परम पवित्र आत्मा हूँ... मैं आत्मा विश्व कल्याणकारी हूँ... विश्व परिवर्तक हूँ... मैं आत्मा इन स्वमानों का अभ्यास करते हुए इस सृष्टि रुपी कल्प वृक्ष के जड़ों में बैठ जाती हूँ...

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा इस कल्प वृक्ष के बीज, प्यारे बाबा से शक्तियां लें रहीं हूँ... मुझ आत्मा की सभी कमी-कमजोरियां बाहर निकलती जा रहीं हैं... व्यर्थ बुरी बातें मन के स्लेट से मिटती जा रहीं हैं... मुझ आत्मा के मन, बुद्धि बिल्कुल साफ होते जा रहें हैं... मैं आत्मा अपनी कमजोर वृत्तियों को मिटाकर *शुभ और श्रेष्ठ वृत्ति धारण* करती जा रहीं हूँ...

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा वरदानों, गुणों, शक्तियों से भरपूर होती जा रहीं हूँ... श्रेष्ठ वृत्ति धारण करने से मुझ आत्मा की दृष्टि और कृत्ति भी शुभ और श्रेष्ठ बनती जा रही हैं... अब मुझ आत्मा को यह सारी सृष्टि श्रेष्ठ नज़र आती हैं... मैं आत्मा सबके गुणों को ही देखती हूँ... मुझ आत्मा की *वाणी और कर्म स्वतः श्रेष्ठ* होते जा रहें हैं...

 

➳ _ ➳  अब मुझ आत्मा की वाणी और हर कर्म में साधारणता मिटकर अलौकिकता भरती जा रहीं हैं... मैं आत्मा बाप समान सिर्फ मीठी वाणी बोलती हूँ... सिर्फ शुभ और श्रेष्ठ कर्म करती हूँ... मैं आत्मा विश्व परिवर्तक की स्टेज पर स्थित होकर *कल्प वृक्ष को शक्तियों से सींच* रहीं हूँ... कल्प वृक्ष के हर पत्ते को बलवान बना रहीं हूँ...

 

➳ _ ➳  मुझ आत्मा की श्रेष्ठ वृत्ति से सारा वायुमंडल भी सतोप्रधान बनते जा रहा है... मैं आत्मा प्रकृतिजीत बनती जा रहीं हूँ... मुझ आत्मा से शुभ और श्रेष्ठ वायब्रेशन चारों ओर फैल रहें हैं... अब मैं आत्मा श्रेष्ठ और शुभ वृत्ति द्वारा वाणी और कर्म को श्रेष्ठ बनाने वाली *विश्व परिवर्तक बन गई* हूँ...

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∫∫ 6 ∫∫ योग अभ्यास (Marks-10)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- विदेही वा अशरीरी बनने के अभ्यास द्वारा किसी के भी मन के भाव को जानना।"*

 

➳ _ ➳   बाबा का पहला-पहला फरमान हैं- स्वयं को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो... मैं आत्मा, बाप के इस पहले पाठ को बार-बार अभ्यास कर पक्का करती हूँ... मैं अशरीरी आई थी, अशरीरी ही वापस जाना हैं... *विदेही बनने से ही मेरे अंदर की सभी आत्मिक शक्तियाँ जागृत होती हैं...*

 

➳ _ ➳   मैं उठते-बैठते, हर कर्म करते ये स्मृति में रखती की... मैं विदेही हूँ... *एक सेकण्ड में शरीर के भान को छोड़... विदेही बन जाती हूँ...* सम्बन्ध-सम्पर्क में हर किसी आत्मा से व्यवहार करते भी मैं अशरीरी स्थिति में रहती हूँ... इससे मुझे अन्य आत्माओं के मन के भाव समझने में मदद मिलती हैं...

 

➳ _ ➳   मैं आत्मा इस शरीर में रहते... इस शरीर से सर्व कर्म कराती हूँ... अब थोड़ी देर के लिए... मैं अपने शरीर को भूल अपने ओरीजिनल स्वरूप में... *जो मैं हूँ... उसमें स्थित हो जाती हूँ... मैं आत्मा हूँ... विदेही हूँ...* किसी से भी बात करते... बीच-बीच में यह स्मृति में लाती हूँ... खुद अशरीरी हो जाती हूँ... और सामने वाले को भी आत्मा देखती हूँ...

 

➳ _ ➳   अशरीर वा विदेही के अभ्यास द्वारा... मैं सभी के मन के भाव जान लेती हूँ... *इससे मैं आत्मा सर्व को सन्तुष्ट कर... सर्व की स्नेही आत्मा बन गई हूँ...* सब के भावनाओं को समझ... सब को सुख देती हूँ...

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∫∫ 7 ∫∫ ज्ञान मंथन (Marks:-10)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

➢➢  *श्रेष्ठ और शुभ वृति द्वारा वाणी और कर्म को श्रेष्ठ बनाने वाले विश्व परिवर्तक होते हैं...  क्यों और कैसे?*

 

❉   श्रेष्ठ और शुभ वृति द्वारा वाणी और कर्म को श्रेष्ठ बनाने वाले विश्व परिवर्तक होते हैं क्योंकि...  जो बच्चे *अपनी कमजोर वृत्तियों को मिटा कर शुभ और श्रेष्ठ वृति धारण करने का व्रत* लेते हैं उन्हें यह सृष्टि भी श्रेष्ठ नज़र आती है।

 

❉   हमें अपनी वृत्ति को सदा ही श्रेष्ठ बनाना है। हमारी वृत्ति जैसी होगी उसी के अनुसार हमारी वाणी और कर्म भी होंगे। अतः सर्व प्रथम हमारी *वृत्ति का श्रेष्ठ होना अति अनिवार्य* है। उसके बाद हमारी वाणी भी श्रेष्ठ हो जायेगी। जैसे हमारे मुख के बोल होंगेवैसे ही हमारे कर्म भी होंगे।

 

❉   हमें अपने कर्मो को श्रेष्ठ बनाने के लिये अपनी वृत्ति को श्रेष्ठ और शुभ बनाना है। हमारी श्रेष्ठ और शुभ वृत्ति हमारे कर्म और वाणी को भी श्रेष्ठ बना देंगे। *अतः हमें अपनी कमजोर वृत्तियों को मिटा देना* है तथा शुभ और श्रेष्ठ वृत्ति को धारण कर लेना है।

 

❉   जो बच्चे अपनी वृति को शुभ व श्रेष्ठ बनाते हैं उन्हें यह सृष्टि भी श्रेष्ठ नज़र आती हैं। क्योंकि हमारी *वृत्ति से हमारी दृष्टि और कृति का भी कनेक्शन* होता है। कोई भी अच्छी वा बुरी बात पहले हमारी वृत्ति में धारण होती है, तब फिर हमारी वाणी और हमारे कर्मों में आती है।

 

❉   अतः हमारी वृत्ति का श्रेष्ठ होनामाना हमारी वाणी और कर्म का भी स्वतः ही श्रेष्ठ होना है क्योंकि हमारी वृत्ति से ही *हमारे वायब्रेशनस् व सम्पूर्ण विश्व का वायुमण्डल भी श्रेष्ठ बनता* है। तभी तो श्रेष्ठ वृत्ति का व्रत धारण करने वाले बच्चे विश्व परिवर्तक स्वतः ही बन जाते हैं।

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∫∫ 8 ∫∫ ज्ञान मंथन (Marks:-10)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

➢➢  *विदेही वा अशरीरी बनने का अभ्यास करो तो किसी के भी मन के भाव को जान लेंगे... क्यों और कैसे* ?

 

❉   एक सेकण्ड भी अव्यक्त स्थिति का अनुभव होता है तो उसका असर काफी समय तक चलता है क्योकि अव्यक्त स्थिति का अनुभव पावरफुल होता है । *अव्यक्त स्थिति से सर्व संकल्प सिद्ध हो जाते हैं* । किन्तु अव्यक्त स्थिति में स्थित रहने के लिए आवश्यक है विदेही वा अशरीरी बनने का अभ्यास क्योकि जितना विदेही बनने का अभ्यास पक्का होता जायेगा संकल्प सिद्धि बढ़ती जायेगी और किसी के भी मन के भावों को जानना सहज हो जायेगा ।

 

❉   जितना विदेही वा अशरीरी बनने का अभ्यास पक्का करते जायेंगे उतना वाणी से परे स्थिति में स्थित रहना सरल होता जायेगा । *आवाज से परे स्थिति में स्थित हो कर जब आवाज में आएंगे* तो उस आवाज में भी अव्यक्त वायब्रेशन का प्रवाह किसी के भी मन के भावों को जानने में सहयोगी बन जायेगा और उसके मन के भावों को जानकर उसे भी अव्यक्त स्थिति का अनुभव करवा कर अविनाशी सम्बन्ध से जोड़ देगा ।

 

❉   जैसे एक विशेष कला के कारण कुछ लोग अपने शरीर के किसी भी अंग को जैसे चाहें, जहां चाहें, जितना समय चाहें मोड़ लेते हैं ऐसे ही विदेही वा अशरीरी बनने का अभ्यास जब पक्का होता जायेगा अर्थात *जब चाहे कर्म करने के लिए देह का आधार लेना और जब चाहे अशरीरी बन जाना* जब यह अभ्यास पक्का होता जायेगा तो बुद्धि की कला का विकास होता जायेगा जिससे सेकण्ड में ही किसी के भी मन के भावों को जानना सहज हो जायेगा ।

 

❉   जैसे स्थूल वस्तु अपनी भिन्न भिन्न रसनाओं का अनुभव कराती है । मिश्री अपनी मिठास का अनुभव करवाती है और *हर गुण वाली वस्तु अपने गुण का अनुभव कराती हुई अपनी तरफ आकर्षित करती है* । ऐसे ही जब हम भी विदेही वा अशरीरी बनने के अभ्यासी बन जायेंगे तो किसी के भी मन के भावों को जान कर उसे अपने निजी स्वरूप के हर गुण की रसना का अनुभव करवा सकेंगे । वर्णन के साथ साथ हर गुण की अनुभूति करवा सकेंगे ।

 

❉   जहां जाना होता है वैसा पुरुषार्थ स्वत: ही चलता है । *हमे भी अपने निराकारी घर वापिस जाना है* और जैसे अशरीरी आये थे वैसे ही अशरीरी बन कर वापिस जाना है इस बात को सदा स्मृति में रखते हुए जितना विदेही वा अशरीरी बनने का अभ्यास करेंगे उतना अव्यक्त स्थिति में स्थित होते जायेंगे और अव्यक्त फ़रिश्ते बन किसी के भी मन की बात को जान उसे भी व्यक्त भाव से परे स्थिति में स्थित कर देंगे ।

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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