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 11 / 02 / 18  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *प्रवृति में रहते एक दो को सावधान कर हंस बनकर रहे ?*

 

➢➢ *"मैं आत्मा हूँ" - अंतर्मुखी बन यह अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *तीव्र पुरुषार्थ द्वारा सभी बन्धनों को क्रॉस कर मनोरंजन का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *हर गुण व ज्ञान की बात को अपना निजी संस्कार बनाया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *मन को शक्तिशाली बनाने के लिए, सदा खुशी वा उमंग-उत्साह में रहने के लिए, उड़ती कला का अनुभव करने के लिए रोज यह मन की ड्रिल, एक्सरसाइज करते रहो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं स्वयं के रिगार्ड द्वारा सर्व को रिगार्ड देने वाली पूज्य आत्मा हूँ"*

 

  सभी अपने को पूज्य आत्मायें अनुभव करते हो? *पुजारी से पूज्य बन गये ना! पूज्य को सदा ऊँचे स्थान पर रखते हैं। कोई भी पूजा की मूर्ति होगी तो नीचे धरती पर नहीं रखेंगे। तो आप पूज्य आत्मायें कहाँ रहती हो! ऊपर रहती हो!* भक्ति में भी पूज्य आत्माओंका कितना रिगार्ड रखते हैं। जब जड़ मूर्ति का इतना रिगार्ड है तो आपका कितना होगा?

 

  अपना रिगार्ड स्वयं जानते हो? क्योंकि जितना जो अपना रिगार्ड जानता है उतना दूसरे भी उनको रिगार्ड देते हैं। *अपना रिगार्ड रखना अर्थात् अपने को सदा महान श्रेष्ठ आत्मा अनुभव करना।* तो कभी महान आत्मा से साधारण आत्मा तो नहीं बन जाते हो! पूज्य तो सदा पूज्य होगा ना! आज पूज्य कल अपूज्य नहीं - ऐसे तो नहीं हो ना। सदा पूज्य अर्थात् सदा महान। सदा विशेष।

 

  कई बच्चे सोचते हैं कि हम तो आगे बढ़ रहे हैं लेकिन दूसरे हमको आगे बढ़ने का रिगार्ड नहीं देते हैं। इसका कारण क्या होता? सदा स्वयं अपने रिगार्ड में नहीं रहते हो। *जो अपने रिगार्ड में रहते वह रिगार्ड माँगते नहीं, स्वत: मिलता है। जो सदा पूज्य नहीं उन्हें सदा रिगार्ड नहीं मिल सकता।* अगर मूर्ति अपने आसन को छोड़ दे, या उसे जमीन में रख दें तो उसकी क्या वैल्यु होगी! मूर्ति को मन्दिर में रखें तो सब महान रूप में देखेंगे। तो सदा महान स्थान पर अर्थात् ऊँची स्थिति पर रहो, नीचे नहीं आओ। 

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बापदादा ने देखा कि अमृतवेले मैजारिटी का याद और ईश्वरीय प्राप्तियों का नशा बहुत अच्छा रहता है। लेकिन *कर्मयोगी की स्टेज में जो अमृतवेले का नशा है उससे अन्तर पड जाता है।* कारण क्या है? *कर्म करते, सोल कान्सेस और कर्म कान्सेस दोनों रहता है।*

 

✧  *इसकी विधि है कर्म करते मैं आत्मा, कौन-सी आत्मा, वह तो जानते ही हो, जो भिन्न-भिन्न आत्मा के स्वमान मिले हुए हैं, ऐसी आत्मा करावनहार होकर इन कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म कराने वाली हूँ, यह कर्मेन्द्रियाँ कर्मचारी है लेकिन कर्मचारीयों से कर्म करानेवाली मैं करावनहार न्यारी हूँ। *

 

✧  क्या लौकिक में भी डायरेक्टर अपने साथियों से, निमित सेवा करने वालों से सेवा कराते, डायरेक्शन देते, डयुटी बजाते भूल जाता है कि मैं डायरेक्टर हूँ? तो *अपने को करावनहार शक्तिशाली आत्मा हूँ, यह समझकर कार्य कराओ।* यह आत्मा और शरीर, वह करनहार है वह करावनहार है, यह स्मृति मर्ज हो जाती है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *जैसे कोई बहुत गूढ़ विचार में रहते हैं, कुछ भी करते हैं, चलते, खाते-पीते हैं, लेकिन उनको मालूम नहीं पड़ता है कि कहाँ तक आ पहुँचा हूँ, क्या खाया है। इसी रीति से जिस्म को देखते हुए भी नहीं देखेंगे और अपने उस रूह को देखने में ही बिज़ी होंगे, तो फिर ऐसी अवस्था हो जायेगी जो कोई भी आपसे पूछेगे - यह कैसी थी, तो आपको मालूम नहीं पड़ेगा। ऐसी अवस्था होगी।* लेकिन वह तब होगी जब जिस्मानी चीज को देखते हुए उस जिस्मानी लौकिक चीज को अलौकिक रूप में परिवर्तन करेंगे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  ज्ञान की तलवार में योग के जौहर से विजय पाना"*

 

_ ➳  *मीठे बाबा की मीठी यादो में डूबी हुई मै आत्मा... मीठे बाबा से मिलने वतन में पहुंची... वतन में मीठे बाबा कब से मेरी राह निहार रहे है... मुझे अपनी शक्तियो और गुणो की तरंगो में मालामाल कर रहे है...* मीठे बाबा मुझे अपने हाथो से सजाकर... मेरा श्रुंगार करके, मुझे सतयुगी दुनिया में सुखो का अधिकारी बना रहे है... मीठे बाबा की यादो में मै आत्मा... अशरीरी बनकर मुस्करा रही हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को ज्ञानी और योगी बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *मीठे बाबा के श्रीमत की पालना में ज्ञान और योग के श्रंगार से सज जाओ... देह और देह के भान से परे रहकर, सदा की सुंदरता को अपनाओ...* देह की मिटटी से उपराम होकर, आत्मिक भाव के सौंदर्य से सज धज कर मुस्कराओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा से ज्ञान और योग के खजानो से स्वयं को लबालब करते हुए कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... आपने मुझे अपनी प्यारी गोद में बिठाकर कितना सुंदर बना दिया है... *मै आत्मा विकारो से देह भान से मुक्त होकर भीतरी सौंदर्य से सज गयी हूँ... अपने खोये गुण और शक्तियो को पाकर कितनी धनी बन गयी हूँ..."*

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को ज्ञान और योग की खुशबु से भरते हुए कहते है :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे.... देह के नशे में घिर कर जनमो तक दुखो को झेलते आये हो... *अब इसके दलदल से मन बुद्धि को निकाल कर... मीठे बाबा की यादो में तेजस्वी बनकर, स्वर्ग धरा पर इठलाओ... मीठे बाबा ज्ञान और योग से सुंदर बनाने आये है...* देह से पूरी तरहा ममत्व हटाकर ईश्वरीय यादो में खो जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से असीम खुशियो को पाकर कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... *आपकी प्यारी यादो में सत्य के प्रकाश में मै आत्मा कितनी ओजस्वी बन रही हूँ... आपने मुझे ज्ञान और योग से भरकर मालामाल कर दिया है...* मै आत्मा आपकी यादो आंतरिक सौंदर्य से सजती जा रही हूँ..."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपनी यादो में खुबसूरत बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे.... *ज्ञान और योग से श्रुंगारित होकर अथाह सुखो से भरी दुनिया के मालिक बन जाओ..*. अपने सत्य स्वरूप के नशे में इस कदर खो जाओ... कि देह का आकर्षण ही न रहे... और ईश्वरीय यादो के प्रकाश में इस मिटटी के प्रभाव से पूरी तरहा से मुक्त हो जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के प्यार में फूलो सी खिलकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... *मुझ आत्मा को आपके मीठे साये और साथ ने देवताई सुंदरता से सजाया है... कितना प्यारा और खुबसूरत मेरा भाग्य आपने बनाया है... आपकी मीठी यादो में मै आत्मा स्वर्ग के मीठे सुखो के लिए श्रुंगारित हो रही हूँ...* अपने प्यारे बाबा से मीठी रुहरिहानं कर मै आत्मा साकार वतन में लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- प्रवृति में रहते एक-दो को सावधान कर हंस बन ऊंच पद लेना है*"

 

_ ➳  हंस कंकड़ पत्थर में से भी मोती चुग लेता है और कमल का पुष्प कीचड़ में उगकर भी कीचड़ की गंदगी से एकदम मुक्त, न्यारा और प्यारा रहता है। *ऐसे होली हंस और कमल पुष्प समान न्यारा और प्यारा ही मुझे बनना है मन ही मन अपने आप से बातें करती मैं स्वयं से प्रतिज्ञा करती हूँ कि विकारी दुनिया में रहते हुए भी विकारो के प्रभाव से स्वयं को बचाते हुए सम्पूर्ण निर्विकारी बनने का मेरे प्यारे प्रभु ने जो लक्ष्य मुझे दिया है, उस लक्ष्य को पाने के लिए मुझे स्वयं पर पूरा अटेंशन देना है*। और इसके लिए जरूरी है देह में रहते हुए, अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान अनादि स्वरूप की स्मृति में रह, सबको आत्मा भाई - भाई की दृष्टि से देखने का अभ्यास पक्का करना।

 

_ ➳  यह विचार करते - करते ही अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप की स्मृति में मैं जैसे खो जाती हूँ और स्वयं को देह से एकदम न्यारा अनुभव करने लगती हूँ। *मन बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं स्पष्ट देख रही हूँ जैसे यह देह अलग है और इस देह को चलाने वाली मैं चैतन्य शक्ति इस देह से बिल्कुल अलग हूँ*। अपने इस अति न्यारे और प्यारे स्वरूप पर अब मेरा मन और बुद्धि पूरी तरह एकाग्र हैं। *एक चमकता हुआ चैतन्य सितारा जिसमे से निकल रहा प्रकाश मन को बहुत ही सुखद एहसास करा रहा है, ऐसा अपना स्वरूप देख कर मैं आनन्दित हो रही हूँ*।

 

_ ➳  मुझ आत्मा सितारे से निकल रहे प्रकाश में मेरे अंदर निहित गुणों और शक्तियों का समावेश है जिन्हें मैं प्रकाश की रंग बिरंगी किरणो के रूप में स्वयं से निकलता हुआ देख रही हूँ और अपने इन सातों गुणों सुख, शांति, प्रेम, पवित्रता, ज्ञान और शक्ति का अनुभव करके तृप्त हो रही हूँ। *अपने इस सत्य स्वरूप को देखने और अनुभव करने का सुखद अनुभव मुझे सर्व गुणों और सर्वशक्तियों के सागर मेरे शिव पिता की याद दिला रहा है जिन्होंने आकर ना केवल मुझे मेरे इस सत्य स्वरूप से परिचित करवाया बल्कि मुझे मेरे उस निराकारी घर का भी पता बताया जहाँ अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरुप में मैं आत्मा अपने पिता के साथ रहती थी*।

 

_ ➳  अपने उसी स्वीट साइलेन्स होम को याद करते ही, अपने शिव पिता के सानिध्य में बैठ उनसे मिलन मनाने का मधुर अहसास अब मुझे स्वत: ही मेरे उस परमधाम घर की ओर खींच रहा है। *ऐसा लग रहा है जैसे मेरे प्यारे पिता ने मुझे अपने पास बुलाने के लिए अपनी सर्वशक्तियों रूपी किरणों की बाहें फैला ली है और अपनी बाहों में समाकर मुझे अपने घर ले जा रहें हैं*। देह को छोड़ अपने प्यारे पिता की किरणों रूपी बाहों के झूले में झूलती, असीम आनन्द का अनुभव करती मैं उनके साथ ऊपर आकाश की ओर जा रही हूँ। *चाँद, सितारों से सजे नीलगगन को पार कर, सफेद प्रकाश से प्रकाशित अव्यक्त वतन से होती हुई चैतन्य सितारों की दुनिया अपने परमधाम घर में मैं पहुँचती हूँ*।

 

_ ➳  लाल सुनहरी प्रकाश की यह दुनिया मूल वतन जहाँ चारों ओर चमकती हुई मणियों का आगार है, अपने इस वतन में पहुँच कर मैं आत्मा एक गहन सुकून का अनुभव कर रही हूँ। *जैसे एक बच्चा अपनी माँ की गोद में सुख का अनुभव करता है ऐसे अपने शिव पिता की सर्वशक्तियों की किरणों रूपी गोद मे मैं स्वयं को महसूस करते हुए अतीन्द्रीय सुख का अनुभव कर रही हूँ*। सर्वशक्तियों की रंग बिरंगी शीतल किरणो के रूप में मेरे प्यारे पिता का अगाध प्रेम मुझ पर बरस रहा है। *अपनी पवित्रता की किरणें मुझ पर प्रवाहित करके बाबा मेरे अंदर पवित्रता का बल भर रहें हैं ताकि फिर से साकार वतन में लौट कर पार्ट बजाते हुए मैं हर प्रकार की अपवित्रता के प्रभाव से स्वयं को बचा सकूँ*।

 

_ ➳  पवित्रता का बल स्वयं में भरकर औऱ अपने प्यारे पिता के प्यार की शक्ति अपने साथ लेकर अब मैं परमधाम से वापिस फिर से उसी अव्यक्त वतन से होती हुई, चांद, सितारों की दुनिया से नीचे साकारी दुनिया में आ जाती हूँ। *पवित्रता का और मेरे प्यारे पिता के निस्वार्थ प्यार का बल अब मुझ होली हंस बनाकर, कमल पुष्प समान न्यारा रहने की शक्ति दे रहा है*। कमल आसन पर सदा विराजमान रहते हुए अब मैं अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली सभी आत्माओं को उनके अनादि निराकारी स्वरूप में ही देखती हूँ इसलिए विकारी दुनिया में रहते हुए भी विकारो के प्रभाव से अब मैं सहज ही मुक्त रहती हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं तीव्र पुरुषार्थ द्वारा सर्व बंधनों को क्रॉस कर मनोरंजन का अनुभव करने वाली डबल लाइट आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺  *मैं हर गुण वा ज्ञान की बात को अपना निजी संस्कार बनाने वाली ब्राह्मण आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *अभी अपने मन का टाइमटेबुल फिक्स करो। मन को सदा बिजी रखो, खाली नहीं रखो। फिर मेहनत नहीं करनी पड़ती। ऊँचे-ते-ऊँचे भगवान के बच्चे हो, तो आपका एक-एक सेकण्ड का टाइमटेबुल फिक्स होना चाहिए।* क्यों नहीं बिन्दी लगती, उसका कारण क्या? ब्रेक पावरफुल नहीं है। शक्तियों का स्टाक जमा नहीं है इसीलिए सेकण्ड में स्टाप नहीं कर सकते। कई बच्चे कोशिश बहुत करते हैं, जब बापदादा देखते हैं मेहनत बहुत कर रहे हैं, यह नहीं हो, यह नहीं हो... कहते हैं नहीं हो लेकिन होता रहता है। *बापदादा को बच्चों की मेहनत अच्छी नहीं लगती।*

 

 _ ➳  कारण यह है, जैसे देखा रावण को मारते भी हैं, लेकिन सिर्फ मारने से छोड़ नहीं देते हैं, जलाते हैं और जलाके फिर हड्डियाँ जो हैं, वह आजकल तो नदी में डाल देते हैं। कोई भी मनुष्य मरता है तो हड्डियाँ भी नदी में डाल देते हैं तभी समाप्ति होती है। तो आप क्या करते हो? ज्ञान की प्वाइंटस से, धारणा की प्वाइंटस से उस बात रूपी रावण को मार तो देते हो लेकिन योग अग्नि में स्वाहा नहीं करते हो। और फिर जो कुछ बातों की हड्डियाँ बच जाती है ना - वह ज्ञान सागर बाप को अर्पण कर दो। तीन काम करो - एक काम नहीं करो। आप समझते हो पुरुषार्थ तो किया ना, मुरली भी पढ़ी, 10 बार मुरली पढ़ी फिर भी आ गई क्योंकि आपने योग अग्नि में जलाया नहीं, स्वाहा नहीं किया। अग्नि के बाद नाम निशान गुम हो जाता है फिर उसको भी बाप सागर में डाल दो, समाप्त। इसलिए *इस वर्ष में बापदादा हर बच्चे को व्यर्थ से मुक्त देखने चाहते हैं। मुक्त वर्ष मनाओ। जो भी कमी हो, उस कमी को मुक्ति दो, क्योंकि जब तक मुक्ति नहीं दी है ना, तो मुक्तिधाम में बाप के साथ नहीं चल सकेंगे।*

 

✺   *ड्रिल :-  "पुराने संस्कारों को सम्पूर्ण रीति से समाप्त करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  संगमयुग पर मैं ब्राह्मण आत्मा स्वदर्शन चक्र फिराते हुए अपने देवताई स्वरूप को देखती हूँ... *कितना दिव्य... कितना मनमोहक... स्वरूप है ये मुझ आत्मा का... सूर्य समान तेजस्वी मुख... चंद्रमा समान शीतल काया... मनमोहक मुस्कान...* अपने इस स्वरूप को देख देख मैं बहुत हर्षित हो रही हूँ... फिर उनके गुण और कार्य व्यवहार के बारे में सोचती हूँ की जितना सुंदर रूप है वैसे ही गुण भी रहे होंगे...! फिर मैं आत्मा अपने आप से पूछती हूं कि जब ये मेरा सतयुगी स्वरूप है तो क्या मेरे में ये सब गुण हैं?

 

 _ ➳  जितना जितना मैं विचार मंथन करती जाती हूं... उतना उतना मुझ आत्मा को अपनी कमी कमजोरियों का पता चलता जा रहा है... तब मैं अपने प्यारे बापदादा के पास सूक्ष्म वतन में जाती हूं... बताती हूं... बाबा को अपनी कमी कमजोरियों के बारे में... *बाबा सुनते हैं और मुस्कुराने लगते हैं... मेरे सर पर अपना हाथ रख मुझे दृष्टि देते हैं... फिर बड़े प्यार से मेरे मस्तक पर बिंदु लगा देते हैं... और इस बिंदु के लगते ही जैसे सारी चेतना जागृत हो उठती है...*

 

 _ ➳  मुझ आत्मा में जागृति आती है... बाबा के ज्ञान के पॉइंटस की स्मृति आ जाती है... *मैं तो ऊँच ते ऊँच भगवान की बच्ची हूं... और भगवान के बच्चे मेहनत करें... ये बापदादा को अच्छा नहीं लगता...* अभी मेरे अंदर व्यर्थ भी चलता है, फुल स्टॉप नहीं लगता... मुझे इन सबसे मुक्त होना है... ये समझ में आते ही मैं बाबा से प्रतिज्ञा करती हूं... कि *बाबा अब चाहे जो कुछ भी हो मैं स्वयं को व्यर्थ से मुक्त करके रहूंगी... मुझे आपके साथ मुक्ति धाम में चलना ही है...*

 

 _ ➳  बापदादा से प्रतिज्ञा कर मैं आत्मा आती हूं... अपने कर्मक्षेत्र पर... अब मैं बाबा के कहे अनुसार अपने मन का टाईमटेबल फिक्स कर उसे बिजी रखने के अभ्यास में लग जाती हूं... उसे हर सेकंड बाबा से जोड़ कर रख रही हूं... पॉवरफुल ब्रेक लगा तुरंत नेगेटिव पर बिंदी लगाती हूं... *जो भी मुझ आत्मा के 63 जन्मों के पुराने संस्कार हैं... उन्हें ज्ञान और धारणा के शक्तिशाली पॉइंट्स द्वारा केवल खत्म नहीं करती बल्कि योगाग्नि में भस्म कर रही हूं... और उसकी भस्मी भी अपने पास ना रख बापसागर को दे रही हूं...*

 

 _ ➳  *पुराने स्वभाव और संस्कारों से मुक्त होने का ये अनुभव मुझ आत्मा को उमंग उत्साह से भरपूर कर रहा है...* निरन्तर इन प्रयासों में सफल हो, अब मैं अपने आप को बेहद शक्तिशाली अनुभव कर रही हूं... *मैं गुण और शक्तियों के स्टॉक से भरपूर होती जा रही हूं... मैं ऊँचे से ऊँचे भगवान की बच्ची हूं... अपने को इस ईश्वरीय नशे में रख मैं आत्मा सफलता की सीढ़ियां चढ़ती जा रही हूं... मैं बाप समान समर्थ होती जा रही हूं...* मुझे अपना देवताई स्वरूप साकार होता अनुभव हो रहा है...

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा अपने अनुभव को अन्य आत्माओंं को बाँट कर उन्हें बाप समान बनता देख रही हूं... *सभी अपने पुराने स्वभाव संस्कार को भस्म कर बेहद शान्ति महसूस कर रही हैं... और व्यर्थ से मुक्त हो अपने को बाबा के बहुत करीब पाती हैं... इस के लिए सब बाबा को दिल से धन्यवाद देते हैं...* और बाबा की याद में खो जाते हैं... *मीठे बाबा... मीठे मीठे बाबा...* "मेरे प्यारे बाबा जितना भी शुक्रिया अदा करूं सब कम है..."

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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