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 11 / 02 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बेहद की घड़ी को सदा याद रखा ?*

 

➢➢ *पैसे आदि जो हैं, उन्हें सफल कर बाप से पूरा पूरा वर्सा लिया ?*

 

➢➢ *सवा उन्नति द्वारा सेवा में उन्नति की ?*

 

➢➢ *"सोचना, बोलना और करना" समान बनाया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *मन को शक्तिशाली बनाने के लिए, सदा खुशी वा उमंग-उत्साह में रहने के लिए, उड़ती कला का अनुभव करने के लिए रोज यह मन की ड्रिल, एक्सरसाइज करते रहो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं स्वयं के रिगार्ड द्वारा सर्व को रिगार्ड देने वाली पूज्य आत्मा हूँ"*

 

  सभी अपने को पूज्य आत्मायें अनुभव करते हो? *पुजारी से पूज्य बन गये ना! पूज्य को सदा ऊँचे स्थान पर रखते हैं। कोई भी पूजा की मूर्ति होगी तो नीचे धरती पर नहीं रखेंगे। तो आप पूज्य आत्मायें कहाँ रहती हो! ऊपर रहती हो!* भक्ति में भी पूज्य आत्माओंका कितना रिगार्ड रखते हैं। जब जड़ मूर्ति का इतना रिगार्ड है तो आपका कितना होगा?

 

  अपना रिगार्ड स्वयं जानते हो? क्योंकि जितना जो अपना रिगार्ड जानता है उतना दूसरे भी उनको रिगार्ड देते हैं। *अपना रिगार्ड रखना अर्थात् अपने को सदा महान श्रेष्ठ आत्मा अनुभव करना।* तो कभी महान आत्मा से साधारण आत्मा तो नहीं बन जाते हो! पूज्य तो सदा पूज्य होगा ना! आज पूज्य कल अपूज्य नहीं - ऐसे तो नहीं हो ना। सदा पूज्य अर्थात् सदा महान। सदा विशेष।

 

  कई बच्चे सोचते हैं कि हम तो आगे बढ़ रहे हैं लेकिन दूसरे हमको आगे बढ़ने का रिगार्ड नहीं देते हैं। इसका कारण क्या होता? सदा स्वयं अपने रिगार्ड में नहीं रहते हो। *जो अपने रिगार्ड में रहते वह रिगार्ड माँगते नहीं, स्वत: मिलता है। जो सदा पूज्य नहीं उन्हें सदा रिगार्ड नहीं मिल सकता।* अगर मूर्ति अपने आसन को छोड़ दे, या उसे जमीन में रख दें तो उसकी क्या वैल्यु होगी! मूर्ति को मन्दिर में रखें तो सब महान रूप में देखेंगे। तो सदा महान स्थान पर अर्थात् ऊँची स्थिति पर रहो, नीचे नहीं आओ। 

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बापदादा ने देखा कि अमृतवेले मैजारिटी का याद और ईश्वरीय प्राप्तियों का नशा बहुत अच्छा रहता है। लेकिन *कर्मयोगी की स्टेज में जो अमृतवेले का नशा है उससे अन्तर पड जाता है।* कारण क्या है? *कर्म करते, सोल कान्सेस और कर्म कान्सेस दोनों रहता है।*

 

✧  *इसकी विधि है कर्म करते मैं आत्मा, कौन-सी आत्मा, वह तो जानते ही हो, जो भिन्न-भिन्न आत्मा के स्वमान मिले हुए हैं, ऐसी आत्मा करावनहार होकर इन कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म कराने वाली हूँ, यह कर्मेन्द्रियाँ कर्मचारी है लेकिन कर्मचारीयों से कर्म करानेवाली मैं करावनहार न्यारी हूँ। *

 

✧  क्या लौकिक में भी डायरेक्टर अपने साथियों से, निमित सेवा करने वालों से सेवा कराते, डायरेक्शन देते, डयुटी बजाते भूल जाता है कि मैं डायरेक्टर हूँ? तो *अपने को करावनहार शक्तिशाली आत्मा हूँ, यह समझकर कार्य कराओ।* यह आत्मा और शरीर, वह करनहार है वह करावनहार है, यह स्मृति मर्ज हो जाती है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *जैसे कोई बहुत गूढ़ विचार में रहते हैं, कुछ भी करते हैं, चलते, खाते-पीते हैं, लेकिन उनको मालूम नहीं पड़ता है कि कहाँ तक आ पहुँचा हूँ, क्या खाया है। इसी रीति से जिस्म को देखते हुए भी नहीं देखेंगे और अपने उस रूह को देखने में ही बिज़ी होंगे, तो फिर ऐसी अवस्था हो जायेगी जो कोई भी आपसे पूछेगे - यह कैसी थी, तो आपको मालूम नहीं पड़ेगा। ऐसी अवस्था होगी।* लेकिन वह तब होगी जब जिस्मानी चीज को देखते हुए उस जिस्मानी लौकिक चीज को अलौकिक रूप में परिवर्तन करेंगे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ *"ड्रिल :- अपार ख़ुशी में रहना"*

➳ _ ➳ अपने मीठे भाग्य के नशे में झूमती हुई मै आत्मा... सोच रही हूँ कि कब सोचा था... *यह जीवन ईश्वरीय हाथो में देवत्व की प्रतिमा सा सज जायेगा.*.. भगवान की सबसे सुन्दरतम रचना देवता बनकर मै आत्मा... सुखो की नगरी में राज्य करूंगी... *यह तो सपने भी नही थे,जो आज जीवन का... खुबसूरत सत्य बनकर, मुझे असीम ख़ुशी से सराबोर कर रहा है*.. जो भगवान की बपौती है.. वह सारी जागीरे मेरे द्वार पर सजी है... और *मै मालिक बनकर, उनका भरपूर लुत्फ़ उठाने वाली भाग्यवान हूँ.*.. स्वयं ईश्वर मेरे समक्ष उपस्थित है... और मै जो कहती हूँ करता जा रहा है... *मेरे हाथो में ईश्वरीय हाथ आ गया है, और कदमो तले सुख के फूल बिखरे है... वाह रे प्यारे भाग्य मेरे*...

❉ *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपनी प्रेम तरंगो में रूहानी बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... भगवान को पाने वाले खुबसूरत भाग्य के धनी हो... कितना मीठा भाग्य है की ईश्वर *पिता सम्मुख हाजिर नाजिर है... और स्वर्ग की सौगात हथेली पर सजाकर ले आये है.*. सदा इन मीठी यादो में रहकर, अपने मीठे भाग्य के नशे में झूम जाओ... सदा अपार खुशियो में मुस्कराओ..."

➳ _ ➳ *मै आत्मा मीठे बाबा से ईश्वरीय जागीर को अपनी बाँहों में भरकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपको पाकर, जमी आसमाँ को बाँहों में समाकर मुस्करा रही हूँ... *मुझे दिव्यता से संवारने, अपना सब कुछ मुझे देने, भगवान धरती पर आ गया है.*.. यह मेरे भाग्य की कितनी निराली शान है..और भला मुझे क्या चाहिए..."

❉ *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को ज्ञान योग से श्रंगारित कर देवात्मा बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे,... सदा मीठी खुशियो में नाचते रहो... कि *ईश्वर की गोद में पलने वाली, उनकी बाँहों में झूलने वाली, शानदार किस्मत की धनी, मै आत्मा हूँ..*.मीठा बाबा असीम सुखो का उपहार बहिश्त... आपके लिए ही तो लाया है... इससे बड़ी ख़ुशी भला और क्या होगी... सदा इन मीठी स्मर्तियो में डूबे रहो..."

➳ _ ➳ *मै आत्मा प्यारे बाबा से सर्व शक्तियो की मालिक बनकर कहती हूँ :-* "प्यारे प्यारे बाबा... मै आत्मा भगवान को पाकर भी खुश नही रहूंगी, तो भला कब रहूंगी... यही तो मेरी जनमो की चाहत थी... कि मात्र एक झलक मै आत्मा भगवान की पाऊं... *आज साक्षात् भगवान के सम्मुख बेठ, अथाह ज्ञान रत्नों से मालामाल हो रही हूँ... यह कितना अनोखा मेरा भाग्य है.*.."

❉ *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को खुशनसीब आत्मा के नशे से भरते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... ईश्वर पिता परमधाम से उतरकर, सारे खजाने और खानों को लेकर, सुखो और खुशियो से लबालब करने आये है... तो इन मीठी प्राप्तियों की यादो में रहकर... सदा खुशियो के शिखर पर सजे रहो... *भगवान गुणो और शक्तियो के सौंदर्य से, खुबसूरत बना रहा है... इन सच्ची खुशियो में सदा पुलकित रहो.*.."

➳ _ ➳ *मै आत्मा प्यारे बाबा के प्यार में खुशनुमा फूल बनकर, खिलते हुए कहती हूँ:-* मीठे प्यारे बाबा मेरे... मै आत्मा सच्ची खुशियो को सदा ही तरसती रही... देह की मिटटी में लथपथ होकर, आपसे पायी सुखो की जागीर को खो चुकी थी... *अब भाग्य ने मुझे वरदानी संगम युग में पुनः आपसे मिलवाकर.. असीम खुशियो से जीवन सजाया है.*..आपको पाकर मेने तो सब कुछ पा लिया है..." मीठे बाबा से खुशियो की सम्पत्ति लेकर मै आत्मा... अपने कर्मक्षेत्र में आ गयी...

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- यज्ञ की सम्भाल करने के लिए सच्चा - सच्चा ब्राह्मण बनना है*"
 
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कर्मयोगी बन कर्म करते करते मैं बाबा के गीत सुन रही हूं। तभी गीत में एक पंक्ति आती हैं:- "बच्चो में संकल्प जो आये, वरदाता ही भागे आये"। गीत की इन पंक्तियों को सुनते ही मन में अपने शिव पिता परमात्मा से मिलने का संकल्प उतपन्न हो उठता है और *अपने शिव पिता परमात्मा से मिलने की इच्छा मन मे लिए, अशरीरी स्थिति में स्थित हो कर, मैं अपने मन बुद्धि को अपने शिव पिता परमात्मा पर एकाग्र करके उन्हें अपने पास आने का आग्रह करती हूं* और देखती हूँ परमधाम से एक चमकता हुआ ज्योतिपुंज नीचे की ओर आ रहा हैं जिसमे से अनन्त शक्तियों की किरणें निकल - निकल कर चारों और फैल रही हैं।
 
➳ _ ➳ 
धीरे - धीरे वह ज्योतिपुंज सूक्ष्म लोक में पहुंच कर ब्रह्मा तन में प्रवेश कर जाता है और कुछ ही क्षणों में मैं अपने परमप्रिय परम पिता परमात्मा को उनके आकारी रथ के साथ अपने सम्मुख पाती हूँ। अब मैं देख रही हूं बापदादा को अपने सामने। *उनके आने से वायुमण्डल में चारों ओर जैसे एक रूहानी मस्ती छा गई है। उनसे आ रही शक्तिशाली किरणे मुझ पर पड़ रही है और उन शक्तिशाली किरणों का औरा मुझे विदेही स्थिति का अनुभव करवा रहा है*। मेरा साकार जैसे जड़ हो गया है और उसमें से एक लाइट का सूक्ष्म आकारी शरीर बाहर निकल आया है।
 
➳ _ ➳ 
अपने इस सूक्ष्म आकारी लाइट के फरिश्ता स्वरूप में मैं स्वयं को बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूँ। बापदादा बड़े प्यार से मुस्कराते हुए अपना हाथ मेरी और बढ़ा रहे हैं। बाबा के हाथ मे जैसे ही मैं अपना हाथ रखती हूं।बाबा मेरा हाथ थाम कर मुझे इस साकारी दुनिया से लेकर दूर चल पड़ते हैं। *हर प्रकार की भीड़ - भाड़ से अलग एक बहुत बड़े खुले स्थान पर बाबा मुझे ले आते हैं। बड़े प्यार से मैं बाबा को निहारते हुए इस अलौकिक मिलन का आनन्द ले रही हूं*। तभी अचानक मैं देखती हूँ वो पूरा खुला स्थान जैसे एक बहुत बड़ा कुंड है और उस कुंड में अग्नि की विशाल लपटे निकल रही हैं जो आसमान को छू रही हैं। हैरान हो कर मैं बाबा की ओर देखती हूँ।
 
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बाबा मेरा हाथ थामे मुझे उस कुंड के बिल्कुल नजदीक ले आते हैं। मनमनाभव का मंत्र दे कर बाबा मुझे उस स्थिति में स्थित करके, अपनी शक्तिशाली किरणे मुझ पर प्रवाहित करने लगते हैं। *मैं देख रही हूं बाबा के मस्तक से, बाबा की दृष्टि से शक्तियों की जवालस्वरूप धाराओं को निकलते हुए*। इन जवालस्वरूप धाराओं रूपी योग अग्नि से निकल रही ज्ञान और योग की पावन किरणे अब मुझ पर पड़ रही हैं और मेरे अंदर से 5 विकारों के भूत एक - एक करके बाहर निकल रहें हैं और इस योग अग्नि में जल कर स्वाहा हो रहें हैं। *इन भूतों के स्वाहा होते ही मेरा स्वरूप जैसे बदल रहा है*। मैं दैवी गुणों से सम्पन्न होने लगा हूँ।
 
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अब मेरे मन की सारी दुविधा मिट चुकी है। मैं जान गई हूं कि यह विशाल कुंड बेहद का रुद्र ज्ञान यज्ञ है जो परमात्मा ने स्वयं आ कर रचा है। *इस रुद्र ज्ञान यज्ञ से प्रज्ज्वलित होने वाली विनाश ज्वाला में सारी पुरानी दुनिया, पुराने संस्कार जल कर भस्म हो जाएंगे और उसके बाद नया दैवी स्वराज्य स्थापन हो जाएगा*। जहां सभी दैवी गुण वाले मनुष्य अर्थात देवी देवताओं का राज्य होगा। लेकिन देवी देवताओं की इस दुनिया के आने से पहले परमात्मा द्वारा रचे इस रुद्र ज्ञान यज्ञ की सम्भाल करना मेरी जिम्मेवारी है। इस जिम्मेवारी को पूरा करने के लिए मैं फ़रिशता अब अपने ब्राह्मण स्वरूप में लौट आता हूँ।
 
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बाबा की श्रीमत पर चल कर, बाबा द्वारा रचे इस अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ की बड़े प्यार से और सच्चे दिल से संभाल करना ही अब मेरे इस ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य है। और इस लक्ष्य को पाने के लिये अब मैं अपना तन - मन - धन ईश्वरीय यज्ञ में लगा कर सम्पूर्ण समर्पण भाव इस यज्ञ को चलाने के निमित बन गई हूं। *परमात्मा बाप द्वारा रचे हुए इस अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ में सहयोगी बनने के लिए बाप से मैंने जो पवित्रता की प्रतिज्ञा की है उस प्रतिज्ञा को मन, वचन, कर्म से पूरा करने के पुरुषार्थ में अब मैं सदा तत्पर रहती हूं*। मनसा-वाचा-कर्मणा अपवित्रता का अंश भी मुझमे ना आये इस बात पर पूरा अटेंशन देते हुए, यज्ञ रक्षक बन यज्ञ की सच्चे दिल से मैं सम्भाल कर रही हूँ।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं स्व-उन्नति करने वाली आत्मा हूँ।*
✺   *मैं सेवा में उन्नति करने वाली आत्मा हूँ।*
✺   *मैं सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ *मैं समीप आने वाली आत्मा हूँ ।*
✺ *मैं आत्मा सोचना-बोलना और करना समान बनाती हूँ ।*
✺ *मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *अभी अपने मन का टाइमटेबुल फिक्स करो। मन को सदा बिजी रखो, खाली नहीं रखो। फिर मेहनत नहीं करनी पड़ती। ऊँचे-ते-ऊँचे भगवान के बच्चे हो, तो आपका एक-एक सेकण्ड का टाइमटेबुल फिक्स होना चाहिए।* क्यों नहीं बिन्दी लगती, उसका कारण क्या? ब्रेक पावरफुल नहीं है। शक्तियों का स्टाक जमा नहीं है इसीलिए सेकण्ड में स्टाप नहीं कर सकते। कई बच्चे कोशिश बहुत करते हैं, जब बापदादा देखते हैं मेहनत बहुत कर रहे हैं, यह नहीं हो, यह नहीं हो... कहते हैं नहीं हो लेकिन होता रहता है। *बापदादा को बच्चों की मेहनत अच्छी नहीं लगती।*

 

 _ ➳  कारण यह है, जैसे देखा रावण को मारते भी हैं, लेकिन सिर्फ मारने से छोड़ नहीं देते हैं, जलाते हैं और जलाके फिर हड्डियाँ जो हैं, वह आजकल तो नदी में डाल देते हैं। कोई भी मनुष्य मरता है तो हड्डियाँ भी नदी में डाल देते हैं तभी समाप्ति होती है। तो आप क्या करते हो? ज्ञान की प्वाइंटस से, धारणा की प्वाइंटस से उस बात रूपी रावण को मार तो देते हो लेकिन योग अग्नि में स्वाहा नहीं करते हो। और फिर जो कुछ बातों की हड्डियाँ बच जाती है ना - वह ज्ञान सागर बाप को अर्पण कर दो। तीन काम करो - एक काम नहीं करो। आप समझते हो पुरुषार्थ तो किया ना, मुरली भी पढ़ी, 10 बार मुरली पढ़ी फिर भी आ गई क्योंकि आपने योग अग्नि में जलाया नहीं, स्वाहा नहीं किया। अग्नि के बाद नाम निशान गुम हो जाता है फिर उसको भी बाप सागर में डाल दो, समाप्त। इसलिए *इस वर्ष में बापदादा हर बच्चे को व्यर्थ से मुक्त देखने चाहते हैं। मुक्त वर्ष मनाओ। जो भी कमी हो, उस कमी को मुक्ति दो, क्योंकि जब तक मुक्ति नहीं दी है ना, तो मुक्तिधाम में बाप के साथ नहीं चल सकेंगे।*

 

✺   *ड्रिल :-  "पुराने संस्कारों को सम्पूर्ण रीति से समाप्त करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  संगमयुग पर मैं ब्राह्मण आत्मा स्वदर्शन चक्र फिराते हुए अपने देवताई स्वरूप को देखती हूँ... *कितना दिव्य... कितना मनमोहक... स्वरूप है ये मुझ आत्मा का... सूर्य समान तेजस्वी मुख... चंद्रमा समान शीतल काया... मनमोहक मुस्कान...* अपने इस स्वरूप को देख देख मैं बहुत हर्षित हो रही हूँ... फिर उनके गुण और कार्य व्यवहार के बारे में सोचती हूँ की जितना सुंदर रूप है वैसे ही गुण भी रहे होंगे...! फिर मैं आत्मा अपने आप से पूछती हूं कि जब ये मेरा सतयुगी स्वरूप है तो क्या मेरे में ये सब गुण हैं?

 

 _ ➳  जितना जितना मैं विचार मंथन करती जाती हूं... उतना उतना मुझ आत्मा को अपनी कमी कमजोरियों का पता चलता जा रहा है... तब मैं अपने प्यारे बापदादा के पास सूक्ष्म वतन में जाती हूं... बताती हूं... बाबा को अपनी कमी कमजोरियों के बारे में... *बाबा सुनते हैं और मुस्कुराने लगते हैं... मेरे सर पर अपना हाथ रख मुझे दृष्टि देते हैं... फिर बड़े प्यार से मेरे मस्तक पर बिंदु लगा देते हैं... और इस बिंदु के लगते ही जैसे सारी चेतना जागृत हो उठती है...*

 

 _ ➳  मुझ आत्मा में जागृति आती है... बाबा के ज्ञान के पॉइंटस की स्मृति आ जाती है... *मैं तो ऊँच ते ऊँच भगवान की बच्ची हूं... और भगवान के बच्चे मेहनत करें... ये बापदादा को अच्छा नहीं लगता...* अभी मेरे अंदर व्यर्थ भी चलता है, फुल स्टॉप नहीं लगता... मुझे इन सबसे मुक्त होना है... ये समझ में आते ही मैं बाबा से प्रतिज्ञा करती हूं... कि *बाबा अब चाहे जो कुछ भी हो मैं स्वयं को व्यर्थ से मुक्त करके रहूंगी... मुझे आपके साथ मुक्ति धाम में चलना ही है...*

 

 _ ➳  बापदादा से प्रतिज्ञा कर मैं आत्मा आती हूं... अपने कर्मक्षेत्र पर... अब मैं बाबा के कहे अनुसार अपने मन का टाईमटेबल फिक्स कर उसे बिजी रखने के अभ्यास में लग जाती हूं... उसे हर सेकंड बाबा से जोड़ कर रख रही हूं... पॉवरफुल ब्रेक लगा तुरंत नेगेटिव पर बिंदी लगाती हूं... *जो भी मुझ आत्मा के 63 जन्मों के पुराने संस्कार हैं... उन्हें ज्ञान और धारणा के शक्तिशाली पॉइंट्स द्वारा केवल खत्म नहीं करती बल्कि योगाग्नि में भस्म कर रही हूं... और उसकी भस्मी भी अपने पास ना रख बापसागर को दे रही हूं...*

 

 _ ➳  *पुराने स्वभाव और संस्कारों से मुक्त होने का ये अनुभव मुझ आत्मा को उमंग उत्साह से भरपूर कर रहा है...* निरन्तर इन प्रयासों में सफल हो, अब मैं अपने आप को बेहद शक्तिशाली अनुभव कर रही हूं... *मैं गुण और शक्तियों के स्टॉक से भरपूर होती जा रही हूं... मैं ऊँचे से ऊँचे भगवान की बच्ची हूं... अपने को इस ईश्वरीय नशे में रख मैं आत्मा सफलता की सीढ़ियां चढ़ती जा रही हूं... मैं बाप समान समर्थ होती जा रही हूं...* मुझे अपना देवताई स्वरूप साकार होता अनुभव हो रहा है...

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा अपने अनुभव को अन्य आत्माओंं को बाँट कर उन्हें बाप समान बनता देख रही हूं... *सभी अपने पुराने स्वभाव संस्कार को भस्म कर बेहद शान्ति महसूस कर रही हैं... और व्यर्थ से मुक्त हो अपने को बाबा के बहुत करीब पाती हैं... इस के लिए सब बाबा को दिल से धन्यवाद देते हैं...* और बाबा की याद में खो जाते हैं... *मीठे बाबा... मीठे मीठे बाबा...* "मेरे प्यारे बाबा जितना भी शुक्रिया अदा करूं सब कम है..."

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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