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 11 / 02 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *विघन रुपी तूफ़ान से डरे तो नहीं ?*

 

➢➢ *अपना बुधीयोग स्वीट होम में लगाए रखा ?*

 

➢➢ *अपने भाग्य और भाग्यविधाता की स्मृति में रहे ?*

 

➢➢ *माया की आकर्षण से न्यारे और बाप के स्नेह में प्यारे बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *मन को शक्तिशाली बनाने के लिए, सदा खुशी वा उमंग-उत्साह में रहने के लिए, उड़ती कला का अनुभव करने के लिए रोज यह मन की ड्रिल, एक्सरसाइज करते रहो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं स्वयं के रिगार्ड द्वारा सर्व को रिगार्ड देने वाली पूज्य आत्मा हूँ"*

 

  सभी अपने को पूज्य आत्मायें अनुभव करते हो? *पुजारी से पूज्य बन गये ना! पूज्य को सदा ऊँचे स्थान पर रखते हैं। कोई भी पूजा की मूर्ति होगी तो नीचे धरती पर नहीं रखेंगे। तो आप पूज्य आत्मायें कहाँ रहती हो! ऊपर रहती हो!* भक्ति में भी पूज्य आत्माओंका कितना रिगार्ड रखते हैं। जब जड़ मूर्ति का इतना रिगार्ड है तो आपका कितना होगा?

 

  अपना रिगार्ड स्वयं जानते हो? क्योंकि जितना जो अपना रिगार्ड जानता है उतना दूसरे भी उनको रिगार्ड देते हैं। *अपना रिगार्ड रखना अर्थात् अपने को सदा महान श्रेष्ठ आत्मा अनुभव करना।* तो कभी महान आत्मा से साधारण आत्मा तो नहीं बन जाते हो! पूज्य तो सदा पूज्य होगा ना! आज पूज्य कल अपूज्य नहीं - ऐसे तो नहीं हो ना। सदा पूज्य अर्थात् सदा महान। सदा विशेष।

 

  कई बच्चे सोचते हैं कि हम तो आगे बढ़ रहे हैं लेकिन दूसरे हमको आगे बढ़ने का रिगार्ड नहीं देते हैं। इसका कारण क्या होता? सदा स्वयं अपने रिगार्ड में नहीं रहते हो। *जो अपने रिगार्ड में रहते वह रिगार्ड माँगते नहीं, स्वत: मिलता है। जो सदा पूज्य नहीं उन्हें सदा रिगार्ड नहीं मिल सकता।* अगर मूर्ति अपने आसन को छोड़ दे, या उसे जमीन में रख दें तो उसकी क्या वैल्यु होगी! मूर्ति को मन्दिर में रखें तो सब महान रूप में देखेंगे। तो सदा महान स्थान पर अर्थात् ऊँची स्थिति पर रहो, नीचे नहीं आओ। 

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बापदादा ने देखा कि अमृतवेले मैजारिटी का याद और ईश्वरीय प्राप्तियों का नशा बहुत अच्छा रहता है। लेकिन *कर्मयोगी की स्टेज में जो अमृतवेले का नशा है उससे अन्तर पड जाता है।* कारण क्या है? *कर्म करते, सोल कान्सेस और कर्म कान्सेस दोनों रहता है।*

 

✧  *इसकी विधि है कर्म करते मैं आत्मा, कौन-सी आत्मा, वह तो जानते ही हो, जो भिन्न-भिन्न आत्मा के स्वमान मिले हुए हैं, ऐसी आत्मा करावनहार होकर इन कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म कराने वाली हूँ, यह कर्मेन्द्रियाँ कर्मचारी है लेकिन कर्मचारीयों से कर्म करानेवाली मैं करावनहार न्यारी हूँ। *

 

✧  क्या लौकिक में भी डायरेक्टर अपने साथियों से, निमित सेवा करने वालों से सेवा कराते, डायरेक्शन देते, डयुटी बजाते भूल जाता है कि मैं डायरेक्टर हूँ? तो *अपने को करावनहार शक्तिशाली आत्मा हूँ, यह समझकर कार्य कराओ।* यह आत्मा और शरीर, वह करनहार है वह करावनहार है, यह स्मृति मर्ज हो जाती है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *जैसे कोई बहुत गूढ़ विचार में रहते हैं, कुछ भी करते हैं, चलते, खाते-पीते हैं, लेकिन उनको मालूम नहीं पड़ता है कि कहाँ तक आ पहुँचा हूँ, क्या खाया है। इसी रीति से जिस्म को देखते हुए भी नहीं देखेंगे और अपने उस रूह को देखने में ही बिज़ी होंगे, तो फिर ऐसी अवस्था हो जायेगी जो कोई भी आपसे पूछेगे - यह कैसी थी, तो आपको मालूम नहीं पड़ेगा। ऐसी अवस्था होगी।* लेकिन वह तब होगी जब जिस्मानी चीज को देखते हुए उस जिस्मानी लौकिक चीज को अलौकिक रूप में परिवर्तन करेंगे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना"*

 

_ ➳  जीवन अपनी गति से चलते ही जा रहा था... कि अचानक जनमो के पुण्यो का फल सामने आ गया... मन्दिरो में प्रतिमा में खुदा छुपा था... *वह मेरा मीठा बाबा बनकर सामने आ गया..*. और जीवन सच्चे प्यार का पर्याय बन गया... ईश्वरीय प्रेम को पाकर मै आत्मा... दुखो की तपिश की भूल निर्मल हो गयी... मीठे बाबा के प्यार की मीठी अनुभूतियों में डूबी हुई मै आत्मा... बाबा की यादो में खोई सी, ठिठक जाती हूँ... और देखती हूँ... सम्मुख मेरा बाबा बाहें फैलाये मुस्करा रहा है...

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को बेहद के सुखो का अधिकारी बनाते हुए कहते है:-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *अपने समय साँस और संकल्पों को निरन्तर मीठे बाबा की मीठी यादो में पिरो दो..*. यह यादे ही असीम सुखो का खजाना दिलायेगी... मीठे बाबा की यादो में सतोप्रधान बन बाबा संग घर चलने की तैयारी करो... सिर्फ और सिर्फ मीठे बाबा को हर पल याद करो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा को अपनी बाँहों में भरकर कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... *अब जो मीठे भाग्य ने आपका हाथ और साथ मुझ आत्मा को दिलाया है.*.. मै आत्मा हर घड़ी हर पल आपकी ही यादो में खोयी हुई हूँ... देह और देहधारियों के ख्यालो से निकल कर अपने मीठे बाबा की मधुर यादो में मगन हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को अनन्त शक्तियो से भरते हुए कहते है :-* "मीठे लाडले बच्चे... ईश्वर पिता की यादो में निरन्तर खो जाओ... इन यादो में गहरे डूबकर, स्वयं को असीम सुखो से भरी खुबसूरत दुनिया का मालिक बनाओ... और *यादो में सतोप्रधान बनकर, विश्व धरा पर देवताई ताजोतख्त को पाओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने प्यारे बाबा से अमूल्य ज्ञान खजाने को पाकर, खुशियो से भरपूर होकर कहती हूँ :-* " मीठे मीठे बाबा मेरे... मै आत्मा आपको पाकर कितनी खुशनसीब हो गयी हूँ.. श्रीमत को पाकर ज्ञानधन से भरपूर हो, मालामाल हो गयी हूँ... *आपके खुबसूरत साथ को पाकर सत्य से निखर गयी हूँ.*.."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को बेहद के सतोप्रधान पुरुषार्थ के लिए उमंगो से सजाते हुए कहते है :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... यह *अंतिम जन्म में देह के भान और परमत से निकल कर, आत्मिक सुख की अनुभूतियों में खो जाओ..*. हर साँस ईश्वरीय यादो में लगाओ... यह यादे ही समर्थ बना साथ निभाएगी... देह धारियों के याद खाली कर ठग जायेंगी... इसलिए हर पल यादो को गहरा करो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने शानदार भाग्य पर मुस्कराते हुए मीठे बाबा से कहती हूँ :-* "प्यारे प्यारे बाबा मेरे... मेरे हाथो में अपना हाथ देकर, *आपने मुझे कितना असाधारण बना दिया है... ईश्वरीय खूबसूरती से सजाकर, मुझे पूरे विश्व में अनोखा बना दिया है.*.. मै आत्मा रग रग से आपकी यादो में डूबी हुई दिल से शुक्रिया कर रही हूँ..."मीठे बाबा को अपने प्यार की कहानी सुनाकर, मै आत्मा... साकारी तन में लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- यह पुरानी दुनिया विनाश हुई पड़ी है इसलिए इससे अपने आपको अलग समझना है*"

 

_ ➳  साक्षीदृष्टा बन ज्ञान के दिव्य नेत्र से मैं जैसे ही इस सृष्टि को देखती है यह सम्पूर्ण सृष्टि मुझे एक विशाल रंगमंच, एक नाटकशाला के रुप में दिखाई देती है जिस पर बेहद का नाटक चल रहा है। *मैं देख रही हूँ कि जैसे - जैसे इस नाटक में जिसका पार्ट है अपने - अपने समय अनुसार वो आत्मा परमधाम से नीचे आ रही है और मनुष्य शरीर धारण कर अपना पार्ट बजा रही है*। जिस आत्मा को जैसा पार्ट मिला है वो अपने उस पार्ट को एकदम एक्यूरेट बजा रही है।

 

_ ➳  इस दृश्य को देखते - देखते मैं विचार करती हूँ कि 5 हजार वर्ष से चल रहा यह नाटक अब पूरा हो रहा है। सब पार्टधारियों को अपना पार्ट बजा कर अब वापिस अपने धाम लौटना है और *अब जबकि बाबा ने आकर हमे इस सत्यता का बोध करवा दिया है कि यह पुरानी दुनिया अब जल्दी ही समाप्त होनी है तो अब हमें उनके फरमान पर चल इस पुरानी दुनिया से उपराम रहने का पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिए* नही तो देह और देह की इस झूठी दुनिया के चक्रव्यूह में फंस कर अपनी तकदीर को लकीर लगा बैठेंगे और इस बेहद नाटक में फिर कल्प - कल्प के लिए हमारा ऐसा ही पार्ट निर्धारित हो जायेगा।

 

_ ➳  यही वह समय है जबकि स्वयं भाग्य विधाता बाप आये हुए हैं और आकर श्रेष्ठ मत देकर हमारा सर्वश्रेष्ठ भाग्य बना रहें हैं। तो ऐसे बाप की श्रीमत पर अच्छी रीति चल इस अन्तिम समय मे अब मुझे इस पुरानी दुनिया से उपराम रहने का तीव्र पुरुषार्थ अवश्य करना है। *इस देह और देह की इस दुनिया से जुड़ा हर सम्बन्ध नश्वर और दुख देने वाला ही तो है और भगवान के साथ जुड़ा हर सम्बन्ध अपरमअपार सुख देने वाला है*। यह स्मृति आते ही मन में इस पुरानी दुनिया के लिये वैराग्य उतपन्न होने लगता है और मन अपने प्यारे बाबा की तरफ खिंचने लगता है। *उनके प्यार का वो एहसास याद आते ही मन बुद्धि देह और देह की दुनिया से उपराम हो कर शिव पिता पर एकाग्र हो जाते हैं*।

 

_ ➳  मन बुद्धि की तार बाबा के साथ जुड़ते ही मैं अनुभव करती हूँ जैसे परमधाम से परमात्म लाइट सीधी मुझ आत्मा के साथ आ कर कनेक्ट हो गई हैं। *शक्तियों का तेज करंट मुझ आत्मा में प्रवाहित होने लगा है जो मुझे इस देह से उपराम कर, ऊपर अपनी ओर खींच रहा है*। इस परमात्म लाइट के साथ कनेक्ट होकर अब मैं आत्मा देह से निकल कर इस लाइट के साथ - साथ ऊपर जा रही हूँ। यह परमात्म लाइट मुझे खींच कर 5 तत्वों की इस दुनिया से पार ले कर जा रही है। *साकारी  और आकारी दोनों दुनियाओं को पार कर अब मैं अपने शिव पिता की सर्वशक्तियों की इस लाइट के साथ पहुँच गई हूँ परमधाम उनके पास*।

 

_ ➳  अनन्त शक्तियों का पुंज, वो पॉवर हाउस मेरे शिव पिता परमात्मा अब मेरे बिल्कुल समीप है उनकी समस्त पॉवर उनकी सर्वशक्तियों की किरणों के रूप में मुझ आत्मा पर पड़ रही हैं। *मुझ आत्मा की बैटरी चार्ज हो रही है और मैं लाइट हाउस बनती जा रही हूँ*। परमात्म लाइट स्वयं में भर कर मैं अपने आप को बहुत ही शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ। ऊर्जा का भण्डार बन, वापिस साकारी लोक में आ कर अपने साकारी तन में विराजमान हो कर इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर अब मैं अपना पार्ट फिर से बजा रही हूँ।

 

_ ➳  "सृष्टि का यह नाटक अब पूरा हो रहा है" यह स्मृति मुझे देह और देह की दुनिया से उपराम बनाती जा रही है। *देह और देह के सम्बन्धियों के बीच रहते, उनसे तोड़ निभाते, बुद्धि का योग अपने शिव पिता के साथ जोड़, मन बुद्धि से अब मैं ऊपर वास करती रहती हूँ और अपने शिव पिता के प्यार से स्वयं को सदा भरपूर रखते हुए, नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप बन कर रहती हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं अपने भाग्य और भाग्य विधाता की स्मृति द्वारा सर्व उलझनों से मुक्त रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं मास्टर रचयिता आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं कमल आसनधारी आत्मा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव माया के आकर्षण से न्यारी हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा बाप के स्नेह में प्यारी श्रेष्ठ कर्मयोगी हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *अभी अपने मन का टाइमटेबुल फिक्स करो। मन को सदा बिजी रखो, खाली नहीं रखो। फिर मेहनत नहीं करनी पड़ती। ऊँचे-ते-ऊँचे भगवान के बच्चे हो, तो आपका एक-एक सेकण्ड का टाइमटेबुल फिक्स होना चाहिए।* क्यों नहीं बिन्दी लगती, उसका कारण क्या? ब्रेक पावरफुल नहीं है। शक्तियों का स्टाक जमा नहीं है इसीलिए सेकण्ड में स्टाप नहीं कर सकते। कई बच्चे कोशिश बहुत करते हैं, जब बापदादा देखते हैं मेहनत बहुत कर रहे हैं, यह नहीं हो, यह नहीं हो... कहते हैं नहीं हो लेकिन होता रहता है। *बापदादा को बच्चों की मेहनत अच्छी नहीं लगती।*

 

 _ ➳  कारण यह है, जैसे देखा रावण को मारते भी हैं, लेकिन सिर्फ मारने से छोड़ नहीं देते हैं, जलाते हैं और जलाके फिर हड्डियाँ जो हैं, वह आजकल तो नदी में डाल देते हैं। कोई भी मनुष्य मरता है तो हड्डियाँ भी नदी में डाल देते हैं तभी समाप्ति होती है। तो आप क्या करते हो? ज्ञान की प्वाइंटस से, धारणा की प्वाइंटस से उस बात रूपी रावण को मार तो देते हो लेकिन योग अग्नि में स्वाहा नहीं करते हो। और फिर जो कुछ बातों की हड्डियाँ बच जाती है ना - वह ज्ञान सागर बाप को अर्पण कर दो। तीन काम करो - एक काम नहीं करो। आप समझते हो पुरुषार्थ तो किया ना, मुरली भी पढ़ी, 10 बार मुरली पढ़ी फिर भी आ गई क्योंकि आपने योग अग्नि में जलाया नहीं, स्वाहा नहीं किया। अग्नि के बाद नाम निशान गुम हो जाता है फिर उसको भी बाप सागर में डाल दो, समाप्त। इसलिए *इस वर्ष में बापदादा हर बच्चे को व्यर्थ से मुक्त देखने चाहते हैं। मुक्त वर्ष मनाओ। जो भी कमी हो, उस कमी को मुक्ति दो, क्योंकि जब तक मुक्ति नहीं दी है ना, तो मुक्तिधाम में बाप के साथ नहीं चल सकेंगे।*

 

✺   *ड्रिल :-  "पुराने संस्कारों को सम्पूर्ण रीति से समाप्त करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  संगमयुग पर मैं ब्राह्मण आत्मा स्वदर्शन चक्र फिराते हुए अपने देवताई स्वरूप को देखती हूँ... *कितना दिव्य... कितना मनमोहक... स्वरूप है ये मुझ आत्मा का... सूर्य समान तेजस्वी मुख... चंद्रमा समान शीतल काया... मनमोहक मुस्कान...* अपने इस स्वरूप को देख देख मैं बहुत हर्षित हो रही हूँ... फिर उनके गुण और कार्य व्यवहार के बारे में सोचती हूँ की जितना सुंदर रूप है वैसे ही गुण भी रहे होंगे...! फिर मैं आत्मा अपने आप से पूछती हूं कि जब ये मेरा सतयुगी स्वरूप है तो क्या मेरे में ये सब गुण हैं?

 

 _ ➳  जितना जितना मैं विचार मंथन करती जाती हूं... उतना उतना मुझ आत्मा को अपनी कमी कमजोरियों का पता चलता जा रहा है... तब मैं अपने प्यारे बापदादा के पास सूक्ष्म वतन में जाती हूं... बताती हूं... बाबा को अपनी कमी कमजोरियों के बारे में... *बाबा सुनते हैं और मुस्कुराने लगते हैं... मेरे सर पर अपना हाथ रख मुझे दृष्टि देते हैं... फिर बड़े प्यार से मेरे मस्तक पर बिंदु लगा देते हैं... और इस बिंदु के लगते ही जैसे सारी चेतना जागृत हो उठती है...*

 

 _ ➳  मुझ आत्मा में जागृति आती है... बाबा के ज्ञान के पॉइंटस की स्मृति आ जाती है... *मैं तो ऊँच ते ऊँच भगवान की बच्ची हूं... और भगवान के बच्चे मेहनत करें... ये बापदादा को अच्छा नहीं लगता...* अभी मेरे अंदर व्यर्थ भी चलता है, फुल स्टॉप नहीं लगता... मुझे इन सबसे मुक्त होना है... ये समझ में आते ही मैं बाबा से प्रतिज्ञा करती हूं... कि *बाबा अब चाहे जो कुछ भी हो मैं स्वयं को व्यर्थ से मुक्त करके रहूंगी... मुझे आपके साथ मुक्ति धाम में चलना ही है...*

 

 _ ➳  बापदादा से प्रतिज्ञा कर मैं आत्मा आती हूं... अपने कर्मक्षेत्र पर... अब मैं बाबा के कहे अनुसार अपने मन का टाईमटेबल फिक्स कर उसे बिजी रखने के अभ्यास में लग जाती हूं... उसे हर सेकंड बाबा से जोड़ कर रख रही हूं... पॉवरफुल ब्रेक लगा तुरंत नेगेटिव पर बिंदी लगाती हूं... *जो भी मुझ आत्मा के 63 जन्मों के पुराने संस्कार हैं... उन्हें ज्ञान और धारणा के शक्तिशाली पॉइंट्स द्वारा केवल खत्म नहीं करती बल्कि योगाग्नि में भस्म कर रही हूं... और उसकी भस्मी भी अपने पास ना रख बापसागर को दे रही हूं...*

 

 _ ➳  *पुराने स्वभाव और संस्कारों से मुक्त होने का ये अनुभव मुझ आत्मा को उमंग उत्साह से भरपूर कर रहा है...* निरन्तर इन प्रयासों में सफल हो, अब मैं अपने आप को बेहद शक्तिशाली अनुभव कर रही हूं... *मैं गुण और शक्तियों के स्टॉक से भरपूर होती जा रही हूं... मैं ऊँचे से ऊँचे भगवान की बच्ची हूं... अपने को इस ईश्वरीय नशे में रख मैं आत्मा सफलता की सीढ़ियां चढ़ती जा रही हूं... मैं बाप समान समर्थ होती जा रही हूं...* मुझे अपना देवताई स्वरूप साकार होता अनुभव हो रहा है...

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा अपने अनुभव को अन्य आत्माओंं को बाँट कर उन्हें बाप समान बनता देख रही हूं... *सभी अपने पुराने स्वभाव संस्कार को भस्म कर बेहद शान्ति महसूस कर रही हैं... और व्यर्थ से मुक्त हो अपने को बाबा के बहुत करीब पाती हैं... इस के लिए सब बाबा को दिल से धन्यवाद देते हैं...* और बाबा की याद में खो जाते हैं... *मीठे बाबा... मीठे मीठे बाबा...* "मेरे प्यारे बाबा जितना भी शुक्रिया अदा करूं सब कम है..."

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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