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 11 / 04 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *एम ऑब्जेक्ट को सामने रख दैवीगुण धारण किये ?*

 

➢➢ *ड्रामा के हर पार्ट को जानते हुए कोई भी बीती बात का चिंतन तो नहीं किया ?*

 

➢➢ *चारों ही सब्जेक्ट में बाप के दिलपसंद मार्क्स लिए ?*

 

➢➢ *"मैं बाप की... बाप मेरा" - दिल में सदा यही अनहद गीत बजता रहा ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जैसे कोई भी साइन्स के साधन को यूज करेंगे तो पहले चेक करेंगे कि लाइट है या नहीं है। ऐसे जब योग का, शक्तियों का, गुणों का प्रयोग करते हो तो पहले ये चेक करो कि मूल आधार आत्मिक शक्ति, परमात्म शक्ति वा लाइट (हल्की) स्थिति है?* अगर स्थिति और स्वरूप डबल लाइट है तो प्रयोग की सफलता बहुत सहज कर सकते हो।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं विशेष आत्मा हूँ"*

 

✧  सभी सदा अपने को विशेष आत्मायें अनुभव करते हो? सारे विश्व में ऐसी विशेष आत्मायें कितनी होंगी? जो कोटों में कोई गायन है, वह कौन हैं? आप हो ना! तो सदा अपने को कोटों में कोई, कोई में भी कोई ऐसी श्रेष्ठ आत्मायें समझते हो? कभी स्वप्न में भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि इतनी श्रेष्ठ आत्मा बनेंगे लेकिन साकार रूप में अनुभव कर रहे हो। तो सदा अपना यह श्रेष्ठ भाग्य स्मृति में रहता है? *वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य। जो भगवान ने खुदपका भाग्य बनाया है। डायरेक्ट भगवान ने भाग्य की लकीर खींची, ऐसा श्रेष्ठ भाग्य है। जब यह श्रेष्ठ भाग्य स्मृति में रहता है तो खुशी में बुद्धि रूपी पाँव इस पृथ्वी पर नहीं रहते।* ऐसे समझते हो ना।

 

  वैसे भी फरिश्तों के पाँव धरनी पर नहीं होते। सदा ऊपर। तो आपके बुद्धि रूपी पाँव कहाँ रहते हैं? नीचे धरनी पर नहीं। देह-अभिमान भी धरनी है। देह-अभिमान की धरनी से ऊपर रहने वाले। इसको ही कहा जाता है - 'फरिश्ता'। तो कितने टाइटिल हैं - भाग्यवान हैं, फरिश्ते हैं, सिकीलधे हैं - जो भी श्रेष्ठ टाइटिल हैं वह सब आपके हैं। तो इसी खुशी में नाचते रहो। *सिकीलधे धरती पर पाँव नहीं रखते, सदा झूले में रहते। क्योंकि नीचे धरनी पर रहने के अभ्यासी तो 63 जन्म रहे। उसका अनुभव करके देख लिया। धरनी में मिट्टी में रहने से मैले हो गये। और अभी सिकीलधे बने तो सदा धरनी से ऊपर रहना। मैले नहीं, सदा स्वच्छ।*

 

  *सच्ची दिल, साफ दिल वाले बच्चे सदा बाप के साथ रहते हैं। क्योंकि बाप भी सदा स्वच्छ है ना। तो बाप के साथ रहने वाले भी सदा स्वच्छ हैं।* बहुत अच्छा, मिलन मेले में पहुँच गये। लगन ने मिलन मनाने के लिए पहुँचा ही दिया। बापदादा बच्चों को देख खुश होते हैं क्योंकि बच्चे नहीं तो बाप भी अकेला क्या करेगा? भले पधारे अपने घर में। मौज मनाते हुए पहुँच गये।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बाप कब निराशा होते है? परिस्थितयों से घबराते है? तो बच्चे फिर क्यों घबराते है? ज्यादा परिस्थितियों को सामना करने का साकार सबूत भी देखा। कभी उनका घबराहट का रूप देखा? सुनाया था ना कि *सदैव यह याद रखो कि स्नेह में सम्पूर्ण होना है*। कोई मुश्किल नहीं है। स्नेही को सुधा - बुध रहती है? जब अपने आप को मिटा ही दिया फिर यह मुश्किल क्यों? मिटा दिया ना।

  

✧  जो मिट जाते हैं वह जल जाते है। *जितना अपने को मिटाना उतना ही अव्यक्त रुप से मिलना*। मिटना कम तो मिलना भी कम। अगर मेले में भी कोई मिलन न मनाये तो मेला समाप्त हो जायेगा फिर कब मिलन होगा? स्नेह को समानता में बदली करना है। स्नेह को गुप्त और समानता को प्रत्यक्ष करो। सभी समाया हुआ है सिर्फ प्रत्यक्ष करना है। अपने कल्प पहले  के समाये हुए संस्कारों को प्रत्यक्ष करना है।

 

✧  कल्प पहले की अपनी सफलता का स्वरूप याद आता है ना। *अभी सिर्फ समाये हुए को प्रैक्टिकल प्रत्यक्ष रूप में लाओ*। सदैव अपनी सम्पूर्णता का स्वरूप और भविष्य 21 जन्मों का रूप सामने रखना है। कई लोग अपने घर को सजाने के लिए अपने बचपन से लेकर, अपने भिन्न - भिन्न रूपों का यादगार रखते है। तो आप अपने मन मन्दिर में अपने सम्पूर्ण स्वरुप की मूर्ती, भविष्य के अनेक जन्मों की मूर्तियाँ स्पष्ट रूप में सामने रखो। फिर कोई तरफ संकल्प नहीं जायेगा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  निरन्तर देह का भान भूल जाए- उसके लिए हरेक यथाशक्ति नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार मेहनत कर रहे हैं। पढ़ाई का लक्ष्य ही है देह-अभिमान से न्यारे हो देही-अभिमानी बनना। *देह-अभिमान से छूटने के लिए मुख्य युक्ति यह है सदा अपने स्वमान में रहो तो देह-अभिमान मिटता जायेगा। स्वमान में स्व का भान भी रहता है अर्थात् आत्मा का भान। स्वमान - मैं कौन हूँ।* अपने इस संगमयुग के और भविष्य के भी अनेक प्रकार के स्वमान जो समय प्रति समय अनुभव कराए गये हैं, उनमें से अगर कोई भी स्वमान में स्तिथ रहते रहे तो देह - अभिमान मिटता रहे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप है दाता, बच्चों को बाप से कुछ भी मांगने की दरकार नहीं"*

 

_ ➳  *अपने श्रेष्ठ भाग्य और प्राप्तियों के नशे में मगन मैं आत्मा अपने प्यारे शिव प्रियतम की याद में मगन हूँ...* बाबा से मिली प्राप्तियों का सिमरन करते करते मन प्रभु स्नेह में आनंद विभोर हो रहा है... *ईश्वरीय स्नेह में डूबी हुई मैं आत्मा अपने प्यारे बाबा को बड़े प्यार से अपने पास बुला रही हूँ... मेरे दिल की आवाज सुनकर बाबा मेरे सामने आ गए हैं... बाबा का दिव्य तेज समूचे वातावरण को आलोकित कर रहा है...* मैं आत्मा अपने मीठे बाबा को बड़े स्नेह से एकटक नैनो से निहार रही हूँ...

 

  *अपनी दिव्य वाणी से सर्वत्र रूहानियत की खुशबू फैलाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... बाबा बच्चों को सदा अधिकारी रुप में देखना चाहते हैं... *अधिकारी बच्चे 'यह दो यह दो' संकल्प में भी भीख नहीं मांगते... भिखारी का शब्द है दे दो... अधिकारी का शब्द है यह सब अधिकार है... दाता दाता बाप ने बिना मांगे ही सर्व अविनाशी प्राप्तियों का अधिकार दे दिया है... इसलिए सदा स्वराज्य अधिकारी की स्थिति में रहो..."*

 

_ ➳  *ज्ञान सूर्य बाबा की किरणों का स्पर्श पाकर खुशी में खिली हुई सूरजमुखी रूपी मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणेश्वर बाबा... *आपने मुझे भक्ति के मांगने के संस्कारों से मुक्त कर दिया... आपसे मुझे अविनाशी प्राप्तियां हुई हैं... मैं आत्मा उन प्राप्तियों के नशे में मगन हूँ...* सदा अधिकारी पन की स्थिति में स्थित हूँ... सदा स्वराज्य अधिकारी बन ईश्वरीय प्राप्तियों की खुशी में मग्न हूँ..."

 

  *अपनी सतरंगी किरणों से मेरे जीवन को आलोकित करते हुए बाबा कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे बच्चे... बाबा का बनने के बाद *जब आपने स्नेह से मेरा बाबा कहा... तो बाप ने एक शब्द में ही सर्व खजानों का संसार आपको दे दिया... मेरा बाबा कहते ही सभी खजानों के मालिक... अधिकारी बन गए...  मेरा और तेरा यह शब्द सर्व विनाशी दु:ख में चक्र से छुड़ाकर सर्व प्राप्तियों का अधिकारी बना देता है...* सर्व खजानों से भरपूर आत्मा... अधिकारी आत्मा की स्थिति में रहो..."

 

_ ➳  *बाबा के दिव्य ज्ञान को हृदय में आत्मसात करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "जीवन के आधार प्यारे बाबा... मैं आत्मा आप की श्रीमत अनुसार चल रही हूँ... *अब आप ही मेरे संसार हो... आपने मुझे सर्व खजानों का मालिक बना दिया है... अधिकारी बना दिया है... मैं आत्मा अब इसी स्मृति और खुमारी में स्थित हूँ..."*

 

  *अपनी मीठी मीठी शिक्षाओं से जीवन रूपी पुष्प को खिलाने वाले बाबा कहते हैं:-* "प्यारे बच्चे... सदा स्वदर्शन चक्र फिराते रहो... *स्वदर्शन द्वारा प्रसन्नचित अर्थात सर्व प्राप्तियों के अधिकारी बन जाते हैं... स्वप्न में भी बाप के आगे भिखारी रूप नहीं रखना है...* जो स्वत: ही बिना आपके मांगने के अविनाशी और अथाह देने वाला दाता है... उसे कहने की क्या आवश्यकता है... *दाता के बच्चे हो इसी श्रेष्ठ स्मृति में रहो... कभी भिखारी कभी अधिकारी नहीं बनना है... सदा एक श्रेष्ठ संग में रहो... अधीनता वाले संस्कार नहीं हो सदा स्वराज्य अधिकारी के संस्कार हो..."*

 

_ ➳  *बाबा की स्नेह वर्षा में मदमस्त होकर नाचते हुए मयूर रूपी मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मीठे बाबा... मैं हर कदम पर आप की शिक्षाओं को धारण कर रही हूँ... मैं आत्मा स्वदर्शन चक्र फिराकर सदा प्रसन्न और सर्व प्राप्तियों की अधिकारी स्वरुप में स्थित हूँ... सर्व खजानों से भरपूर मैं आत्मा स्वराज्य अधिकारी की स्थिति में स्थित हूँ... *भिखारी और मांगने के संस्कारों से पूरी तरह से मुक्त होकर मैं आत्मा अविनाशी प्राप्तियों की अधिकारी बनती जा रही हूँ... और इसी श्रेष्ठ स्थिति में सदा भरपूर और आनंद मगन स्टेज का अनुभव कर रही हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- ड्रामा के हर पार्ट को जानते हुए कोई भी बीती बात का चिन्तन नही करना है*"

 

_ ➳  एकांत में बैठ, अपने पुरुषार्थ को तीव्र बनाने की युक्तियां निकालते हुए मैं मन ही मन विचार करती हूँ कि विनाशी धन का सौदा करने वाले एक बिजनेसमैन को हर समय केवल अपने बिजनेस को ही ऊंचा उठाने का ख्याल रहता है *लेकिन यहाँ तो सौदा अविनाशी है और सौदा करने वाला भी कोई साधारण मनुष्य नही बल्कि स्वयं भगवान हैं और सौदा भी ऐसा जो एक जन्म के लिए नही बल्कि जन्मजन्मांतर की कमाई कराने वाला है तो एक पक्के बिजनेसमैन की तरह अपने इस अविनाशी सौदे से मुझे भविष्य 21 जन्मो की अविनाशी कमाई करने के लिए, भगवान द्वारा मिले हर खजाने को अब जमा करने का ही पुरुषार्थ करना है* और जमा करने की सहज विधि है बिंदी लगाना।

 

_ ➳  जैसे स्थूल खजाने में भी एक के साथ बिंदी लगाने से खजाना बढ़ता जाता है ऐसे ही अपने इस पुरुषार्थी ब्राह्मण जीवन में मैं आत्मा बिंदी, बाप बिंदी और ड्रामा में जो बीत चुका वह भी फुलस्टॉप अर्थात बिंदी इन तीन बिंदियों की स्मृति का तिलक अपने मस्तक पर हर समय लगा कर रखते हुए मुझे अपने पुरुषार्थ में गैलप करना है। *अपने प्यारे बाबा को साक्षी मान स्वयं से यह दृढ़ प्रतिज्ञा करते ही मैं अनुभव करती हूँ जैसे बापदादा इन तीन स्मृतियों का अविनाशी तिलक देने के लिए मुझे वतन में बुला रहें हैं*।अपनी लाइट की सूक्ष्म आकारी देह के साथ मैं आत्मा अपनी साकारी देह से बाहर निकलती हूँ और अव्यक्त फ़रिश्ता बन अव्यक्त वतन की ओर चल पड़ती हूँ।

 

_ ➳  मुझ फ़रिश्ते से श्वेत रश्मियां निकल - निकल कर चारों और फैल रही हैं। बापदादा से मिलने की लगन में मग्न, अपनी रंग बिरंगी किरणो को चारों और फैलाता हुआ मैं फ़रिश्ता आकाश को पार कर, अब सूक्ष्म वतन में प्रवेश करता हूँ। अपने सामने मैं बाप दादा को देख रहा हूँ। *बापदादा के अनन्त प्रकाशमय लाइट माइट स्वरूप से सर्व शक्तियों की अनन्त किरणें निकल कर पूरे सूक्ष्म वतन में फ़ैल रही हैं। पूरा सूक्ष्म वतन रंग - बिरंगी किरणों के प्रकाश से आच्छादित हो रहा है*। इन्द्रधनुषी रंगों से प्रकाशित सूक्ष्म वतन का यह नजारा मन को असीम आनन्द से भरपूर कर रहा है।

 

_ ➳  इस खूबसूरत दृश्य का आनन्द लेते - लेते, बाहें पसारे खड़े बाबा के मनमोहक स्वरूप को निहारते हुए अब मैं फ़रिश्ता बाबा की बाहों में समाकर बाबा के प्यार से स्वयं को भरपूर करने लिए धीरे - धीरे उनके पास पहुँचता हूँ। मुझे देखते ही बाबा मुझे अपनी बाहों में भरकर अपना असीम प्रेम और स्नेह मुझ पर बरसाने लगते हैं। *अपनी ममतामयी गोद मे बिठाकर अनेक दिव्य अलौकिक अनुभूतियां करवा कर, अपनी स्नेह भरी दृष्टि से मुझे देखते हुए बाबा मेरे अंदर अथाह स्नेह का संचार कर रहें हैं*। ऐसा लग रहा है जैसे बापदादा से स्नेह की सहस्त्रो धारायें एक साथ निकलकर मुझ फ़रिश्ते में समा कर मुझे बाप समान मास्टर स्नेह का सागर बना रही हैं।

 

_ ➳  स्नेह की अविरल धारा मेरे अंदर प्रवाहित कर मुझे असीम शक्तिवान बना कर अब बाबा मेरे मस्तक पर तीन बिंदियों की स्मृति का अविनाशी तिलक लगाकर, बीती को बीती कर पुरुषार्थ में गैलप करने का वरदान देकर मुझे विदा करते हैं। *बापदादा द्वारा मिले तीन बिंदियों की स्मृति के अविनाशी तिलक को अपने मस्तक पर सदा के लिए धारण कर, अपनी सूक्ष्म काया के साथ अब मैं सूक्ष्म वतन से वापिस साकार वतन में आती हूँ और अपने स्थूल शरीर में प्रवेश कर अपने अकालतख्त पर विराजमान हो जाती हूँ*।

 

_ ➳  अपने पुरुषार्थी ब्राह्मण जीवन में इन तीन बिंदियों की स्मृति का तिलक सदा अपने मस्तक पर लगाकर, *स्मृति सो समर्थी स्वरूप बन, बीती को बीती कर, अपने पुरुषार्थ में गैलप करते हुए अब मैं सम्पूर्णता को पाने की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं चारों ही सब्जेक्ट में बाप के दिलपसन्द मार्क्स लेने वाली दिलतख्तनशींन आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं बाप की, बाप मेरा- मैं दिल में सदा यही अनहद गीत बजाने वाली दिलरूबा आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  ब्रह्मा बाप का त्याग ड्रामा में विशेष नूंधा हुआ है। आदि से ब्रह्मा बाप का त्याग और आप बच्चों का भाग्य नूंधा हुआ है। *सबसे नम्बरवन त्याग का एक्ज़ाम्पल ब्रह्मा बाप बना। त्याग उसको कहा जाता है - जो सब कुछ प्राप्त होते हुए त्याग करे। समय अनुसार, समस्याओं के अनुसार त्याग - श्रेष्ठ त्याग नहीं है। शुरू से ही देखो तन, मन, धन, सम्बन्ध, सर्व प्राप्ति होते हुए त्याग किया। शरीर का भी त्याग किया, सब साधन होते हुए स्वयं पुराने में ही रहे।* साधनों का आरम्भ हो गया था। होते हुए भी साधना में अटल रहे। *यह ब्रह्मा की तपस्या आप सब बच्चों का भाग्य बनाकर गई।* ड्रामानुसार ऐसे त्याग का एक्ज़ाम्पल रूप में ब्रह्मा ही बना और इसी त्याग ने संकल्प शक्ति की सेवा का विशेष पार्ट बनाया। जो नये-नये बच्चे संकल्प शक्ति से फास्ट वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं। तो सुना ब्रह्मा के त्याग की कहानी

 

✺  *"ड्रिल :- सब कुछ प्राप्त होते हुए भी त्याग का पार्ट बजाना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा व्यक्त भाव और व्यक्त दुनिया से न्यारी होती हुई... अव्यक्त वतन में अव्यक्त बापदादा से मिलन मनाने पहुँच जाती हूँ...* मैं फरिश्ता बापदादा के सम्मुख बैठ उनको निहार रही हूँ... बापदादा के मस्तक से दिव्य अलौकिक किरणें निकलकर मुझ फरिश्ते पर पड़ रही हैं... *मैं फरिश्ता अलौकिकता का अनुभव कर रही हूँ...*

 

_ ➳  मैं फ़रिश्ता बाप समान बन रही हूँ... *मैं फरिश्ता ब्रहमा बाप समान परमात्म प्यार में लवलीन हो रही हूँ... ब्रह्मा बाप समान त्यागी बन रही हूँ...* मैं आत्मा तन, मन, धन से एक बाबा को समर्पित हो रही हूँ... हर कर्म बाबा की याद में कर रही हूँ... सबकुछ बाबा को सौंपकर हलकी होकर उड़ रही हूँ...

 

_ ➳  मुझ आत्मा का विनाशी धन, वैभव और साधनों की आसक्ति खतम हो रही है... विनाशी संबंधो का मोह मिट रहा है... ये सब नश्वर हैं... मैं आत्मा भी ब्रह्मा बाप समान... *एक बाबा में ही सर्व संबंधो का सुख अनुभव कर रही हूँ... एक की लगन में मगन हो रही हूँ...*

 

_ ➳  मुझ आत्मा का मन विनाशी साधनों से हटकर साधना में लीन हो रहा है... *मैं आत्मा ब्रह्मा बाप के आदर्शों पर चल रही हूँ... ब्रह्मा बाप समान सादगी का जीवन अपना रही हूँ...* फालो फादर कर कदम से कदम मिलाकर चल रही हूँ... *हर कदम में पद्मों की कमाई कर रही हूँ...*

 

_ ➳  मैं आत्मा अब समझ गई हूँ... कि *अल्पकाल के साधनों से सिर्फ अल्पकाल का ही सुख मिलता है...* और अविनाशी बाबा की याद से ही अविनाशी खजानों... अविनाशी सुख की प्राप्ति होती है... *अब मैं आत्मा ब्रह्मा बाप के त्याग के एक्ज़ाम्पल को सामने रख... त्याग की भावना से... श्रेष्ठ कर्म करते हुए... श्रेष्ठ भाग्य बना रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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