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 11 / 05 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अतीन्द्रिय सुख का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *बाप से सच्चा लव रखा ?*

 

➢➢ *निश्चिंत स्थिति द्वारा यथार्थ जजमेंट दी ?*

 

➢➢ *मन में सर्व के प्रति कल्याण की भावना रखी ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे पहले-पहले नशा रहता था कि हम इस वृक्ष के ऊपर बैठकर सारे वृक्ष को देख रहे हैं, *ऐसे अभी भी भिन्न-भिन्न प्रकार की सेवा करते हुए तपस्या का बल अपने में भरते रहो। जिससे तपस्या और सेवा दोनों कम्बाइन्ड और एक साथ रहे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सुखदाता की संतान सुखदेव हूँ "*

 

✧  'सदा हर आत्मा को सुख देने वाले सुखदाता बाप के बच्चे हैं' - ऐसा अनुभव करते हो? *सबको सुख देने की विशेषता है ना। यह भी ड्रामा अनुसार विशेषता मिली हुई है। यह विशेषता सभी की नहीं होती। जो सबको सुख देता है, उसे सबकी आशीर्वाद मिलती है।*

 

  *इसलिए स्वयं को भी सदा सुख में अनुभव करते हैं। इस विशेषता से वर्तमान भी अच्छा और भविष्य भी अच्छा बन जायेगा। कितना अच्छा पार्ट है जो सबका प्यार भी मिलता, सबकी आशीर्वाद भी मिलती?*

 

  *इसको कहते हैं 'एक देना हजार पाना'। तो सेवा से सुख देते हो, इसलिए सबका hयार मिलता है। यही विशेषता सदा कायम रखना।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  इस समय सभी कहाँ बैठे हो? *साकारी दुनिया में बैठे हो वा आकारी दुनिया में बैठे हो?* आकारी दुनिया में, इस साकारी दुनिया के आकर्षण से परे अपने को अनुभव करते हो वा आकारी रूप में स्थित होते साकारी दुनिया की कोई भी आकर्षण अपनी तरफ आकर्षित नहीं करती है? साकारी दुनिया के भिन्न - भिन्न प्रकार के आकर्षण से एक सेकण्ड में अपने को न्यारा और बाप का प्यारा बना सकते हो? कर्म करते हुए कर्मबन्धनों से परे, बंधन - युक्त से बन्धन - मुक्त स्थिति का अनुभव करते हो?

 

✧  अभी - अभी आप रूहानी महावीर - महावीरनियों को डायरेक्शन मिले कि *शरीर से परे अशरीरी, आत्म - अभिमानी, बंधन - मुक्त, योग - युक्त बन जाओ तो एक सेकण्ड में स्थित हो सकते हो?* जैसे हठयोगी अपने श्वांस को जितना समय चाहे उतना समय रोक सकते हैं। आप सहजयोगी, स्वतः योगी, सदा योगी, कर्मयोगी, श्रेष्ठ योगी, अपने संकल्प को, श्वास को प्राणेश्वर बाप के ज्ञान के आधार पर जो संकल्प, जैसा संकल्प, जितना समय करना चाहो उतना समय उसी संकल्प में स्थित हो सकते हो?

 

✧  अभी - अभी शुद्ध संकल्प में रमण करना, अभी - अभी एक संकल्प में स्थित होना यह प्रैक्टिस सहज कर सकते हो? *जैसे स्थूल में चलते - चलते अपने को जहाँ चाहे वहाँ रोक सकते हो।* अचल, अडल स्थिति का जो गायन है वह किन्हों का है? तुम महावीर - महावीरनियाँ श्रीमत पर चलने वाले श्रेष्ठ आत्मायें हो ना? श्रीमत के सिवाए और सभी मतें समाप्त हो गई ना? कोई और मत वार तो नहीं करती? मनमत भी वार न करें।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *जैसे बाप ईश्वरीय सेवा-अर्थ व बच्चों को साथ ले जाने की सेवा-अर्थ वा सच्चे भक्तों को बहुत समय के भक्ति का फल देने अर्थ, न्यारे और निराकार होते हुए भी अल्पकाल के लिए आधार लेते हैं व अवतरित होते हैं। ऐसे ही फरिश्ता अर्थात् सिर्फ ईश्वरीय सेवाअर्थ यह साकार ब्राह्मण जीवन मिला है।* धर्म स्थापक, धर्म स्थापना का पार्ट बजाने के लिए आए हैं इसलिए नाम ही शक्ति अवतार - इस समय अवतार हूँ, धर्म स्थापक हूँ। *सिवाए धर्म स्थापन करने के कार्य के और कोई कार्य आप ब्राह्मण अर्थात् अवतरित हुई आत्माओं का है ही नहीं। सदा इसी स्मृति में इसी कार्य में उपस्थित रहने वालों को ही फरिश्ता कहा जाता है।* फरिश्ता डबल लाइट रूप है। एक लाईट अर्थात् सदा ज्योति-स्वरूप। दूसरा लाईट अर्थात् कोई भी पिछले हिसाब-किताब के बोझ से न्यारा अर्थात् हल्का। ऐसे डबल लाईट स्वरूप अपने को अनुभव करते हो?

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  दुःख के बंधन से सुख के सम्बन्ध में जाने की अपार ख़ुशी में रहना"*

 

_ ➳  मीठे बाबा की यादो में खोयी... मै आत्मा अपनी खुशियो के खजाने को गिनने में मशगूल हूँ... और अपनी ईश्वरीय अमीरी को देख देख मुस्करा रही हूँ... कितना प्यारा अनोखी खुशियो से भरा जीवन मीठे बाबा ने सौगात सा दे दिया है... तभी मीठे बाबा पलक झपकते ही वहाँ उपस्थित होकर... मुझे खुशहाल देख जेसे, नयनों से कह रहे... *बच्चों की खुशियो में ही मुझ पिता की खुशियां समायी है.*..

 

   *मीठे बाबा आज खुशियो की बरसात मेरे मन आँगन में बिखराते हुए बोले :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... अब दुःख के दिन खत्म हो गए है... *अब अथाह खुशियो भरे मीठे दिन आ गए है..*. अब ईश्वर पिता जीवन में आ गया है... चारो ओर खुशियो की बरसात है... इस नशे में सदा डूबे रहो कि सुख शांति प्रेम के मीठे पल आये की आये..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा के रूप में भगवान को सम्मुख देख देख पुलकित हूँ और कह रही हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा... *ऐसा प्यारा ईश्वरीय साथ भरा जीवन तो कल्पनाओ में भी कभी न था..*. आज आपको पाने की ख़ुशी से छलक रहा मन... जीवन की सच्चाई है... और मीठे सुख मुझे अपनी बाँहों में पुकार रहे है..."

 

   *प्यारे बाबा मुझे अपनी बाँहों में दुलारते हुए ज्ञान धारा को बहाते हुए बोले :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... जो देवताई सुख कल्पनाओ से परे थे... *ईश्वर पिता उन सुख भरे खजानो को आप बच्चों की राहो में फूलो सा बिखराया है.*.. इस ख़ुशी में सदा झूमते रहो... अपने मीठे सुखो की यादो में खोये रहो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के वरदानों की छत्रछाया में स्वयं को भरपूर करते हुए बोली :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... दुखो के जंगल में सुख की एक बून्द को तरसती... *मै आत्मा आज स्वर्ग की बादशाही पा रही हूँ..*. कितना प्यारा मीठा और खुबसूरत भाग्य है... मै आत्मा आपके सारे खजानो की मालिक बन गयी हूँ..."

 

   *मीठे बाबा रूहानी दृष्टि देते हुए और ज्ञान रत्नों से मुझे श्रंगारते हुए बोले :-* "मीठे लाडले फूल बच्चे... ईश्वरीय श्रीमत पर चलकर जो सुखो की दौलत पायी है... उसके नशे में खोये रहो... संगम की यही खुशियां देवताई सुखो में बदल कर जीवन को खुशियो से महकायेंगी... *इन मीठे पलो के सुख को यादो में चिर स्थायी बनाओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा को अपनी मुस्कराहट से जवाब देते हुए कहती हूँ :-* "मीठे बाबा सच्चे ज्ञान को पाकर सारी भटकन से छूट गयी हूँ और *आपकी छत्रछाया में गुणवान शक्तिवान बनकर सच्ची खुशियो में खिलखिला रही हूँ..*. देवताई सुखो भरा स्वर्ग अपनी तकदीर में लिखवा रही हूँ..." अपनी खुशियो की चर्चा मीठे बाबा से कर मै आत्मा कार्य पर लौट आयी..." इन मीठी ईश्वरीय यादो को दिल में समेट कर मै आत्मा अपने जगत मे आ गयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अतींद्रिय सुख में रहना है*"

 

_ ➳  "अतींद्रिय सुख पूछना है तो गोप गोपियों से पूछो" बाबा के ये महावाक्य स्मृति में आते ही मैं खो जाती हूँ उस अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति में जो अपने गोपीवल्लभ बाप की याद में बैठते ही मैं आत्मा रूपी गोपी प्राप्त करती हूँ। *अपने गोपी वल्लभ बाप के साथ मनाई साकार मिलन की मीठी यादें अब एक - एक करके अनेक चित्रों के रूप में मेरी आँखों के सामने स्पष्ट हो रही हैं*। साकार मिलन का वो सुख मुझे बार - बार उस पावन धरती की याद दिला रहा है और मन रूपी पँछी बार - बार उड़ कर उस स्थान पर जा रहा है।

 

_ ➳  देख रही हूँ अब मैं स्वयं को मधुबन के आंगन में। बाबा की कुटिया के बाहर बने पार्क में मैं बैठी हूँ और एक खूबसूरत दृश्य देख रही हूँ। *सामने नटखट कान्हा मुरली बजा रहें हैं और उस मुरली की मीठी तान सबको मदहोश कर रही है*। गोपियाँ मुरली की मीठी तान को सुन कर अपनी सुध - बुध गंवा कर दौड़ी चली आ रही है। हर गोपी के साथ कान्हा रास करता हुआ दिखाई दे रहा है। *सभी गोपिकाएं एक अलौकिक मस्ती में मस्त हो कर अपने नटखट कान्हा के साथ, नृत्य कर रही हैं*। देखते ही देखते यह दृश्य एक और खूबसूरत दृश्य में परिवर्तित हो जाता है।

 

_ ➳  अब मैं देख रही हूँ स्वयं को डायमण्ड हाल में अपने गोपीवल्लभ बाबा के सामने जो अपने निर्धारित रथ गुलजार दादी की भृकुटि में विराजमान हो कर, उनके मुख से मधुर महावाक्य उच्चारण कर रहें हैं। *वहां उपस्थित सभी आत्मा रूपी गोपिकाएं उन मधुर महावाक्यों को सुन कर, देह के भान से मुक्त, एक अलौकिक रूहानी मस्ती में डूबी हुई दिखाई दे रही हैं*। अपने गोपीवल्लभ बाबा की मीठी मुरली के मधुर महावाक्य मैं आत्मा गोपी एकाग्र हो कर सुन रही हूँ और इन मधुर महावाक्यो के एक - एक शब्द में समाये अपने गोपी वल्लभ बाबा के प्रेम का मैं गहराई तक अनुभव कर रही हूँ। उनके प्रेम का यह मधुर एहसास मुझे असीम सुख की अनुभूति करवा रहा है।

 

_ ➳  मुरली के मधुर महावाक्य उच्चारण करने के साथ - साथ अब मेरे गोपीवल्लभ बाबा अपनी मीठी दृष्टि से मुझे निहाल कर रहें हैं। *उनकी मीठी दृष्टि से आ रही लाइट और माइट पाकर मैं भी लाइट माइट स्वरूप में स्थित हो कर, मास्टर बीजरूप स्थिति का अनुभव कर रही हूँ*। और इस स्थिति में स्थित होते ही अब मै अपने गोपीवल्लभ बाबा को उनके निराकार बीजरूप स्वरूप में अपने बिल्कुल सामने देख रही हूँ। उनसे आ रही सर्वशक्तियाँ चारों और फैल रही है और उनसे निकल रहे वायब्रेशन शांति की गहन अनुभूति करवा रहें हैं।

 

_ ➳  गहन शांति की अनुभूति में गहराई तक खोई मैं आत्मा गोपी धीरे धीरे अपने गोपीवल्लभ बाप के बिल्कुल समीप पहुंच कर अब उनके साथ कम्बाइंड हो जाती हूँ। *इस कम्बाइंड स्थिति में स्थित होते ही अब मैं उनसे आ रही अनन्त शक्तियों को स्वयं में समाता हुआ स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ*। परमात्म शक्तियां मुझ आत्मा में समाकर मुझे बहुत ही शक्तिशाली बना रही हैं। मेरे गोपीवल्लभ का प्रेम उनकी अनन्त किरणों के रूप में निरन्तर मुझ पर बरस रहा है। *ऐसा लग रहा है जैसे सुख का कोई झरना मुझ आत्मा के ऊपर बह रहा है और मैं असीम सुख से भरपूर होती जा रही हूँ*।

 

_ ➳  इस अतीन्द्रिय सुखमय स्थिति का गहराई तक अनुभव करके अब मैं स्वयं को वापिस अपने ब्राह्मण स्वरूप में और अपने गोपी वल्लभ बाप को उनके रथ पर विराजमान देख रही हूँ। *उनकी मीठी याद में समाये अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति को अपने साथ लेकर अब मैं मधुबन से वापिस अपने कर्मक्षेत्र पर लौट रही हूँ*। कर्मयोगी बन, हर कर्म करते अपने मीठे बाबा की याद में रह अब मैं हर समय अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं निश्चित स्थिति द्वारा यथार्थ जजमेंट देने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं निश्चयबुद्धि आत्मा हूँ।*

   *मैं विजयी - रत्न आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव मन में सर्व के प्रति कल्याण की भावना रखती हूँ  ।*

   *मैं विश्व कल्याणकारी आत्मा हूँ  ।*

   *मैं सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  ऐसी समान आत्मा बन्धनमुक्त होने के कारण ऐसे अनुभव करेगी जैसे उड़ता पंछी बन ऊँचे से ऊँचे उड़ते जा रहे हैं और ऊँची स्थिति रूपी स्थान पर स्थित होते अनुभव करेंगे कि यह सब नीचे हैं। मैं सबसे ऊपर हूँ। जैसे विज्ञान की शक्ति द्वारा स्पेस' में चले जाते हैं तो धरनी का आकर्षण नीचे रह जाता है और वह स्वयं को सबसे ऊपर अनुभव करते और सदा हल्का अनुभव करते हैं। *ऐसे साइलेन्स की शक्ति द्वारा स्वयं को विकारों की आकर्षण, वा प्रकृति की आकर्षण सबसे परे उड़ती हुई स्टेज अर्थात् सदा डबल लाइट रूप अनुभव करेंगे। उड़ने की अनुभूति सब आकर्षण से परे ऊँची है। सर्व बन्धनों से मुक्त है। इस स्थिति की अनुभूति होना अर्थात् ऊँची उड़ती कला वा उड़ती हुई स्थिति का अनुभव होना।* चलते-फिरते जा रहे हैं, उड़ रहे हैं, बाप भी बिन्दु, मैं भी बिन्दू, दोनों साथ-साथ जा रहे हैं। समान आत्मा को यह अनुभव ऐसा स्पष्ट होगा जैसे कि देख रहे हैं। अनुभूति के नेत्र द्वारा देखना, दिव्य दृष्टि द्वारा देखने से भी स्पष्ट है, समझा!

 

✺  *"ड्रिल :- उड़ता पंछी स्थिति का अनुभव करना*

 

_ ➳  *मैं आत्मा पंछियों को दाना डालती हुई पेड़ पर बने हुए कबूतर के घोंसले को देखती हूँ...* कबूतर एक-एक दाना अपने बच्चे के मुंह में डालती है... फिर उसको उड़ना सिखाती है... उसका बच्चा पंख फडफडाता है थोडा ऊपर उड़ता है फिर डरकर वापस घोंसले में बैठ जाता है... फिर एक दिन उड़ना सीख जाता है और घोंसले को छोड़ खुले आसमान में उड़ता रहता है... *मुझ आत्मा को उस कबूतर के बच्चे और मुझमें समानता नजर आई...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा पंछी भी इस दुनिया रूपी घोंसले में कब से बैठी हुई थी... मुझ आत्मा रूपी पंछी के पंख कट गए थे...* जिसके कारण मैं आत्मा उड़ना नहीं जानती थी... इस घोंसले को ही अपना घर समझ बैठी थी... और इस घोंसले को ही सजाने में लगी रही... मैं आत्मा घोंसले की पंछी बनकर रह गई थी...

 

_ ➳  *प्यारे बाबा ने आकर मुझ आत्मा पंछी के मुंह में ज्ञान के दाने डालकर, योग की शक्तियों के पंख लगाकर मुझ घोंसले की पंछी को उड़ना सिखा दिया...* मैं आत्मा ज्ञान-योग द्वारा सर्व गुण-शक्तियों से संपन्न बन रही हूँ... मुझ आत्मा के मन की सारी हलचल समाप्त हो रही है... मैं आत्मा साइलेंस का अनुभव कर रही हूँ... सभी विकारों, विकर्मों से मुक्त हो रही हूँ... मैं आत्मा सर्व बन्धनों से मुक्त हो रही हूँ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा साइलेन्स की शक्ति द्वारा सर्व आकर्षणों से परे होकर ऊपर उड़ रही हूँ...* अब मैं आत्मा डबल लाइट स्थिति का अनुभव कर रही हूँ... सभी बोझों से मुक्त होकर सबसे हल्का अनुभव कर रही हूँ... धरनी का आकर्षण नीचे छोड़ मैं आत्मा स्वयं को सबसे ऊपर अनुभव कर रही हूँ... *ऊपर उड़ने की अनुभूति से मैं आत्मा स्वतः और सहज ही माया के सभी आकर्षणों से मुक्त हो रही हूँ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अब बाबा के ही संग-संग रहती हूँ... उनके ही साथ उठती हूँ... चलती हूँ... खाती हूँ... पीती हूँ... सोती हूँ...* हर कर्म सदा बाबा के साथ करते हुए बाप समान स्थिति का अनुभव कर रही हूँ... अब मैं आत्मा सदा बाबा बिंदु के साथ बिंदु बन उडती रहती हूँ... सदा ऊँची उड़ती कला का अनुभव करती रहती हूँ... अनुभूति के नेत्रों द्वारा मैं आत्मा अपने को बाबा के साथ उड़ते हुए स्पष्ट देख रही हूँ... *अब मैं आत्मा दुनिया रूपी घोंसले से आजाद होकर खुले आसमान में उड़ता पंछी होने का अनुभव कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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