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 11 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *इस सड़ी हुई जुत्ती (शरीर) का अभिमान छोड़ा ?*

 

➢➢ *सवेरे सवेरे उठ बाप को याद करते स्वदर्शन चक्र फिराया ?*

 

➢➢ *शुभ भावना से व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तित किया ?*

 

➢➢ *शांत स्वरुप स्थिति में रह अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति की ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *सारथी अर्थात् आत्म-अभिमानी क्योंकि आत्मा ही सारथी है। ब्रह्मा बाप ने इस विधि से नम्बरवन की सिद्धि प्राप्त की, तो फॉलो फादर करो।* जैसे बाप देह को अधीन कर प्रवेश होते अर्थात् सारथी बनते हैं देह के अधीन नहीं होते, इसलिए न्यारे और प्यारे हैं। ऐसे ही आप सभी ब्राह्मण आत्माएं भी बाप समान सारथी की स्थिति में रहो। *सारथी स्वत: ही साक्षी हो कुछ भी करेंगे, देखेंगे, सुनेंगे और सब-कुछ करते भी माया की लेप-छेप से निर्लेप रहेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं महान आत्मा हूँ"*

 

〰✧  भारत देश की महानता किसके कारण है? आप लोगों के कारण है। क्योंकि देश महान बनता है महान आत्मा द्वारा। तो भारत की सर्व महान आत्माओंमें से महान कौन? आप हैं कि दूसरे हैं? *इतनी महान आत्मायें हैं जो अब चक्कर के समाप्ति में भी भारत महान, आप महान आत्माओंके कारण गाया जाता है। और कोई भी देश में इतनी महान आत्माओंका गायन या पूजन नहीं होता।* चाहे कितने भी नामीग्रामी धर्मात्माएं हो गई हों या राजनेतायें होकर गये हों वा आजकल के जमाने के हिसाब से वैज्ञानिक भी नामीग्रामी हैं लेकिन किसी भी देश में उस देश की इतनी महान आत्माओंके मन्दिर हों, यादगार हों, पूजन हो, गायन हो - वह कहाँ भी नहीं होगा।

 

  चाहे विज्ञान में विदेश बहुत आगे है लेकिन गायन और पूजन में नहीं है। वैज्ञानिकों का या राजनीतिज्ञों का गायन भी होता है लेकिन उस गायन और देवात्माओंके गायन में कितना अन्तर है! ऐसा गायन वहाँ नहीं होता। *तो इतनी भारत की महानता बढ़ाने वाले हम महान आत्मायें हैं - यह नशा कितना श्रेष्ठ है! यहाँ गलीगली में मन्दिर देखेंगे। तो इतना नशा सदा स्मृति में रखो। सुनाया ना आज कि कभी-कभी का भी शब्द समाप्त करो।* अगर कभी-कभी बहुत अच्छे और कभी-कभी हलचल, तो आपके यादगार का पूजन भी कभी-कभी होगा। कई मन्दिरों में हर समय पूजन होता है, हर दिन होता है और कहाँ-कहाँ जब कोई तिथि-तारीख आती है तब होता है। तो कभी-कभी हो गया ना। लेकिन किसका सदा होता है, किसका कभी-कभी, क्यों होता है? क्योंकि इस समय के पुरुषार्थ में जो कभी-कभी लाता है उसका पूजन भी कभी-कभी होता है।

 

  जितना यहाँ विधिपूर्वक अपना श्रेष्ठ जीवन बनाते हैं उतना ही विधिपूर्वक पूजा होती है। तो मैं कौन? यह हरेक स्वयं से पूछे। अगर दूसरा कोई आपको कहेगा कि आपका पुरुषार्थ तेज नहीं लगता तो मानेंगे? या उसको इस बात से हटाने की कोशिश करेंगे। लेकिन अपने आपको तो जो हो जैसे हो वैसे जान सकते हो। इसलिए सदा अपने विधिपूर्वक पुरुषार्थ में लगे रहो। ऐसा नहीं कहो - पुरुषार्थ तो है ही। पुरुषार्थ का प्रत्यक्ष स्वरूप अनुभव हो, दिखाई दे। ऐसे महान हो! भारत की महिमा को सुनते क्या सोचते हो? यह किसकी महिमा हो रही है? *ऐसे महान अनेक बार बने हो तब तो गायन होता है। अब उसको रिपीट कर रहे हैं। बने थे और बनना ही है। सिर्फ रिपीट करना है। तो सहज है ना। चाहे सम्पर्क में आते हो, चाहे स्व के प्रति कर्म करते हो, दोनों में सहज हो। भारीपन न हो। जो मुश्किल काम होता है वह भारी होता है। भारी के कारण ही मुश्किल होता है और जहाँ सहज होगा वहाँ हल्कापन होगा।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सदा ब्राह्मण जीवन का श्रेष्ठ आसन कमल पुष्प सामान स्थिति में स्थित रहते हो? ब्राह्मणों का आसन सदा साथ रहता है तो आप सब ब्राहमण भी सदा आसन पर विराजमान रहते हो? *कमल पुष्प समान स्थिति अर्थात सदा हर कर्मेंद्रियों द्वारा कर्म करते हुए  इंद्रियों के आकर्षण से न्यारे और प्यारे।*

 

✧  सिर्फ स्मृति में न्यारा और प्यारा नहीं, लेकिन ,*हर सेकेण्ड का सर्व कर्म न्यारे और प्यारे स्थिति में हो।* इसी का यादगार आप सबके गायन में अब तक भी भक्त हर कर्म में इन्द्रिय के प्रति महिमा में नयन कमल, मुख कमल, हस्त कमल कह कर गायन करते हैं।

 

✧  तो यह किस समय की स्थिति का आसन है? इस ब्राह्मण जीवन का। अपने आपसे पूछो, *हर कर्म इन्द्रिय कमल हासन बनी हैनयन कमल बने हैं? हस्त कमल बनी है?*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ सभी अपने को देह से न्यारे और बाप के प्यारे अनुभव करते हो ? जितना देह से न्यारे बनते जायेंगे उतना ही बाप के प्यारे बनेंगे। *बाप प्यारा तब लगता है जब देह से न्यारे देही रूप में स्थित होते। तो सदा इसी अभ्यास में रहते हो? जैसे पाण्डवों की गुफायें दिखाते हैं ना, तो गुफायें कोई और नहीं हैं, लेकिन पाण्डव इन्हीं गुफाओं में रहते हैं। इसी को ही कहा जाता है अन्तर्मुखता।* जैसे गुफा के अन्दर रहने से बाहर के वातावरण से परे रहते हैं ऐसे अन्तुर्मुखी अर्थात् सदा देह से न्यारे और *बाप के प्यारे रहने के अभ्यास की गुफा में रहने वाले दुनिया के वातावरण से परे होते, वह वातावरण के प्रभाव में नहीं आ सकते।* तो सदा न्यारे रहो यही अभ्यास चलता रहे इसके सिवाए नीचे नहीं आओ।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  सिर्फ श्रीमत पर चलते रहना"*

 

_ ➳  आबू की पावन धरा पर प्रकर्ति के खुबसूरत नजारो का आनन्द लेते हुए... मुझ आत्मा ने प्यार भरी नजरो से जो आसमानी पिता को निहारा... बच्चों की याद में सदा दीवाने से बाबा... पल भर में मेरी नजरो के समक्ष आ गए... मेने बाबा से कहा :-"मीठे बाबा... अभी तो मेने पुकारा भी नही और आप आ गए... तब मीठे बाबा बोले... *मेरे फूल मेरी ओर निहार भर ले तो, बच्चों के प्यार में व्याकुल... मुझ पिता के कदम धरती की ओर दौड़ पड़ते है.*..

 

   *मेरे दिलबर बाबा मुझे ज्ञान रत्नों की अथाह दौलत से भरते हुए बोले :-* " लाडले मीठे बच्चे... सदा श्रीमत की बाँहों में मुस्कराते रहो... *सच्चा ब्राह्मण बनकर हर कदम पर श्रीमत प्रमाण चलते रहो.*.. तो हर बात का जिम्मेदार ईश्वर पिता ही रहेगा... मनुष्यो की मतो पर चलकर, दुखो में गहरे डूब कर देख लिया... अब श्रीमत का साथ कभी न छोडो..."

 

_ ➳  *मीठे प्यारे बाबा के मुझ आत्मा के कल्याण अर्थ मधुर वचनो को सुनकर मै आत्मा हर्षित हो उठी और बोली :-*  "प्राणों से प्यारे बाबा मेरे... *आपकी समझानी अब मेरे जीवन का ईमान है.*.. मै आत्मा श्रीमत की फूलो भरी राहो पर चलकर...  आलिशान जीवन की स्वामिन् हो गयी हूँ... मीठे बाबा श्रीमत से जीवन कितना प्यारा और खुबसूरत हो गया है..."

 

   *मीठे बाबा प्रेममयी नजरो से मुझे निहार रहे... और अपनी अनन्त किरणों में भिगोते हुए बोले :-* " मीठे प्यारे फूल बच्चे... ईश्वर पिता की तरहा सुखो की व्यवस्था... कोई मनुष्य मात्र कदापि न कर सकेगा... इसलिए श्रीमत की सुखद राहों पर... आँख बन्द करके निश्चिन्त हो चलते रहो... अपनी श्रेष्ठ चलन से ईश्वर पिता का नाम रौशन करो... *कौन मिला है, किसने हाथ थामा है, यह हवाओ में गूंजा दो.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने प्यारे बाबा को मुझ आत्मा के सुख में इस कदर चिंतन में देख भाव विभोर हो गयी और बोली :-* "मेरे मीठे मीठे बाबा... *मेरे प्यारे से भाग्य ने जो आपका साथ और श्रीमत का हाथ दिलवाया है.*.. भला अब उससे विमुख मै आत्मा अब कैसे हो सकती हूँ... मीठे बाबा जनमो से इसी सुख के लिए ही तो तरसी हूँ..."

 

   *मनमीत बाबा मुझे अपनी स्नेहिल बाँहों में भरकर प्यार करते हुए बोले :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... मेरे बच्चों का सुख ही मुझ पिता का लक्ष्य सा है... बच्चे *सदा के सुखी हो जाएँ, फूलो जैसा खिलकर मुस्कराये... यही बागबान पिता की एकमात्र ख्वाहिश है.*.. श्रीमत ही काँटों से फूलो जैसा खिलायेगी और सतयुगी दुनिया का राज्य अधिकार दिलायेगी..."

 

_ ➳  *अपने प्यारे बाबा के दिली उदगार सुनकर मै आत्मा अपने मीठे भाग्य के फखुर में झूम उठी और बोली :-* "ओ दिल के चैन बाबा मेरे... *आपकी श्रीमत मेरे जीवन की साँस है.*.. भला साँस के बिना मेरा क्या वजूद रहेगा... कितने जनमो बाद तो मेने आपको पाया है... अब यह जीवन आपकी अमानत है, आप जेसे चलाएंगे मै वेसे ही चलूंगी बाबा..." ऐसी मीठी रुहरिहानं को दिल में समाकर, मै आत्मा अपने शरीर घर में लौट आई..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सचखण्ड के लिए सच्ची कमाई करनी है*"

 

_ ➳  सचखंड की स्थापना कर, उस सचखंड का मुझे मालिक बनाने वाले अपने सत्य परमपिता परमात्मा बाप के साथ अंदर बाहर सदा सच्चे रहने का प्रोमिस करती हुई मैं मन ही मन विचार करती हूं कि कितने घोर अंधकार में भटक रही है दुनिया! जो रावण की झूठी नगरी झूठखण्ड को सच माने बैठी है। *रावण की झूठी माया ने सबकी बुद्धि को ताला लगा दिया है जो झूठ और सच का निर्णय भी नहीं कर पा रहे*। इस झूठ खंड के विनाशी भौतिक सुख संसाधनों से मिलने वाले अल्पकाल के विनाशी सुखों को ही पाने में लगे हुए हैं। जो अविनाशी सुख इस समय परमात्मा आ कर दे रहे हैं और भविष्य 21 जन्मों के लिए देने वाले हैं उन सुखों को तो यह बेचारे कभी अनुभव ही नहीं कर पाएंगे।

 

_ ➳  यही विचार करते करते मैं अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की सुनहरी यादों में खो जाती हूँ और परमात्म प्यार की मधुर स्मृतियों में खोकर जैसे ही अपने प्यारे मीठे शिव बाबा को याद करती हूं। मैं अनुभव करती हूं स्वयं को बाप दादा के सामने। *मेरे सामने कुर्सी पर लाइट लाइट स्वरुप में बापदादा विराजमान है। मैं एकटक उनकी ओर निहार रही हूं*। उनकी मीठी दृष्टि में अपने लिए समाये असीम प्यार को देख मन ही मन हर्षित हो रही हूं। बाबा के पास बैठकर बाबा के घुटनों में अपना सिर रखकर परमात्म प्यार का असीम सुख ले रही हूं।

 

_ ➳  सिर पर बाबा के हाथों का हल्का - हल्का स्पर्श मुझे परमात्म शक्तियों से भर रहा है। परमात्म बल से भरपूर हो कर मैं स्वयं को एकदम हलका अनुभव कर रही हूं। *आंखों को बंद करके बाबा की गोद मे सिर रख कर परमात्म पालना के दिव्य अलौकिक आनंद में मैं डूबी हुई हूं*। तभी एक बहुत ही खूबसूरत दृश्य मुझे दिखाई देता है। मैं देख रही हूं कि लाइट का सूक्ष्म शरीर धारण कर मैं एक नन्हा फरिश्ता बन बापदादा के साथ कहीं दूर जा रहा हूं। देह और देह की दुनिया पीछे छूटती जा रही है।

 

_ ➳  एक बहुत खुले स्थान पर बाबा मुझे ले आते हैं और मेरी आँखों पर पट्टी बांध कर मेरे साथ आंख मिचौली का खेल खेलने लगते हैं। *आंखों पर पट्टी बांधे अपने नन्हे नन्हे हाथों से मैं बाबा को पकड़ने की कोशिश कर रहा हूँ*। थोड़े प्रयास के बाद मैं बाबा को ढूंढ कर बाबा का हाथ पकड़ कर जैसे ही अपनी आंखों से पट्टी हटाता हूं तो उसी स्थान पर मैं अपना देवताई स्वरूप धारण किये एक नन्हे राजकुमार के रूप में स्वयं को सोने की एक बहुत सुंदर नगरी में देखता हूं।

 

_ ➳  हरे भरे पेड़ पौधे, डालियों पर चहचहाते रंग-बिरंगे खूबसूरत पक्षी, वातावरण में गूंजती कोयल की मधुर आवाज, बागों में नाचते सुंदर मोर, रसभरे फलों से लदे वृक्षों की सुंदर कतारें, सतरंगी छटा बिखेरती सूरज की किरणें, ऐसा मनोरम दृश्य मैं अपनी आंखो से देख रहा हूं। स्वयं को मैं अति सुंदर हीरे जड़ित पोशाक धारण किए एक सुंदर राजकुमार के रूप में बगीचे में अन्य राजकुमारों के साथ खेलता हुआ देख रहा हूं। *बगीचे के बीचो-बीच से गुजरता एक सुंदर पथ जिस पर लाल मखमली कालीन बिछा है जो राजमहल के भीतर तक जा रहा है। यह मेरा राजमहल है जो पूरा सोने का बना है*। स्वर्ण महल के अंदर दास दासियाँ 56 प्रकार के भोजन बना रहे हैं। माँ श्री लक्ष्मी और पिता श्री नारायण मुझे अपनी गोद में उठा कर दुलार कर रहे हैं। शयनकक्ष में माँ मुझे मीठी लोरी सुनाकर सुला रही है।

 

_ ➳  अपने देवताई जीवन का दिन हंसते गाते खेल पाल करते आनंद में मैं व्यतीत कर रहा हूं। *तभी कानों में बाबा की मधुर आवाज सुनाई देती है:- "मेरे राजा बच्चे अपने देवताई राजकुमार स्वरुप को और अपने राजमहल को देखा ना"!इसी सचखण्ड का आपको मालिक बनना है*। बाबा के ये महावाक्य निरन्तर कानो में गूंज रहे हैं और सचखण्ड के सुंदर नज़ारे बार बार आंखों के सामने स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।

 

_ ➳  सचखण्ड के इन सुंदर नजारों को अपनी आंखों में बसाये, सचखण्ड का मालिक बनने का तीव्र पुरुषार्थ करने के लिए *अब मैं फ़रिशता अपनी साकारी देह में अवतरित हो रहा हूँ और साकारी तन में प्रवेश कर अपने संगमयुगी ब्राह्मण स्वरूप को धारण कर रहा हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं शुभ भावना से व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं होलिहंस आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव शान्त स्वरूप स्थिति में स्थित रहती हूँ  ।*

   *मैं शान्त स्वरूप आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ *नष्टोमोहा की निशानी - दोनों सम्बन्धों में न किसी में घृणा होगी, न किसी में लगाव वा झुकाव होगा। अगर किसी से घृणा है तो उस आत्मा के अवगुण वा आपके दिलपसन्द न करने वाले कर्म बारबार आपकी बुद्धि को विचलित करेंगे, न चाहते भी संकल्प में, बोल में,स्वप्न में भी उसी का उल्टा चिन्तन स्वत: ही चलेगा*। याद बाप को करेंगे और सामने आयेगी वह आत्मा। जैसे दिल के झुकाव में लगाव वाली आत्मा न चाहते भी अपने तरफ आकर्षित कर ही लेती है। वह गुण और स्नेह के रूप में बुद्धि को आकर्षित करती है और घृणा वाली आत्मा स्वार्थ की पूर्ति न होने के कारण, स्वार्थ बुद्धि को विचलित करता है। जब तक स्वार्थ पूरा नहीं होता तब तक उस आत्मा के साथ विरोधी संकल्प वा कर्म का हिसाब समाप्त नहीं होता।

➳ _ ➳ *घृणा का बीज है स्वार्थ का रॉयल स्वरूप -चाहिए''। इसको यह करना चाहिए, यह न करना चाहिए,यह होना चाहिए। तो चाहिए' की चाह उस आत्मा से व्यर्थ सम्बन्ध जोड़ देती है। घृणा वाली आत्मा के प्रति सदा व्यर्थ चिन्तन होने के कारण परदर्शन चक्रधारी बन जाते।* लेकिन यह व्यर्थ सम्बन्ध भी नष्टोमोहा' होने नहीं देंगे। मुहब्बत से मोह नहीं होगा लेकिन मजबूरी से। फिर क्या कहते हैं - मैं तो तंग हो गई हूँ। तो जो तंग करता है उसमें बुद्धि तो जायेगी ना। समय भी जायेगा, बुद्धि भी जायेगी और शक्तियाँ भी जायेंगी। तो एक है यह सम्बन्ध।

✺ *"ड्रिल :- किसी से घृणा नहीं रखना*

➳ _ ➳ मैं आत्मा घर में बाबा के कमरे में बैठकर बाबा को याद करती हूं... *मैं आत्मा रूपी हीरा इन इन्द्रियों रूपी कमरों से बने इस शरीर रूपी मकान में, भृकुटी रूपी अलमारी के सुन्दर डिब्बे में चमक रही हूँ...* मैं आत्मा अपने स्व स्वरुप का दर्शन करती हुई स्व चिंतन करती हूं कि मैं आत्मा कई जन्मों से परचिन्तन, परदर्शन करते-करते परतंत्र हो गई थी... व्यर्थ चिन्तन करते-करते परदर्शन चक्रधारी बन गई थी...

➳ _ ➳ मैं आत्मा बाबा से कनेक्शन जोड़ने की कोशिश करती हूँ... *जैसे ही योग लगाती हूँ... वो आत्मायें मेरे सामने आने लगती हैं जिनसे मैं घृणा करती हूँ... जिनसे घृणा है उस आत्मा के अवगुण, मेरे दिलपसन्द न करने वाले कर्म बार-बार मेरी बुद्धि को विचलित करते हैं...* मैं आत्मा घृणा के बीज को स्वार्थ का पानी देकर बढाती चली गई... स्व-परिवर्तन के बजाये दूसरों को परिवर्तित करने की चाह रख उस आत्मा से व्यर्थ सम्बन्ध जोड़कर अपना अमूल्य समय, बुद्धि और शक्तियों को गवां बैठी...

➳ _ ➳ मैं आत्मा बाबा का आह्वान करती हूँ... तुरंत प्यारे बाबा मेरे सामने आ जाते हैं... मुस्कुराते हुए बाबा मुझे दृष्टि देते हैं... बाबा से निकलती दिव्य शक्तिशाली किरणों को स्वयं में ग्रहण कर रही हूँ... *बाबा की मीठी दृष्टि से मुझ आत्मा के अन्दर मिठास भर रहा है... घृणा का बीज खत्म हो रहा है...* मैं आत्मा बाबा की शक्तियों से भरपूर हो रही हूँ...

➳ _ ➳ बाबा मेरे सामने उन आत्माओं को इमर्ज करते हैं जिनसे मैं आत्मा घृणा करती थी... *मैं आत्मा बाबा के सामने अपने किए कर्मों के लिए उन आत्माओं से क्षमा मांगती हूँ... उनके किए कर्मों को अंतर्मन की गहराईयों से क्षमा करती हूँ...* बाबा से मीठी किरणों को लेकर उन आत्माओं को भेजती हूँ... वो आत्मायें भी धीरे-धीरे शांत और मीठे होते जा रहे हैं... अब उन आत्माओं के साथ विरोधी संकल्प वा कर्म का हिसाब समाप्त हो गया है...

➳ _ ➳ मैं आत्मा बिल्कुल हल्का और स्वतंत्र अनुभव कर रही हूँ... *अब मुझ आत्मा के संकल्प में, बोल में, स्वप्न में भी किसी के प्रति घृणा का भाव नहीं है... अब मैं आत्मा सबके प्रति शुभ भावना रखती हूँ... सर्व के लिए मंगल कामना करती हूँ...* किसी के पार्ट के प्रति व्यर्थ चिन्तन नहीं करती हूँ... अब मैं आत्मा ज्ञान की समझ और ड्रामा की समझ से दूसरों के व्यवहार को क्यों, क्या, कैसे के क्वेश्चन्स से जज नहीं करती हूँ... परचिंतन, परदर्शन छोड़ मैं आत्मा स्वचिंतन, स्वदर्शन कर नष्टोमोहा बन गई हूँ...

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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