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 11 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *ज्ञान को अच्छी रीति धारण कर सदा हर्षित रहे ?*

 

➢➢ *ज्ञान तलवार में याद का जोहर भरा ?*

 

➢➢ *सदा एकांत और सिमरन में व्यस्त रहे ?*

 

➢➢ *हिम्मत का एक कदम बड़ा मदद के हज़ार कदम प्राप्त किये ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *साइन्स वाले भी सोचते हैं ऐसी इन्वेंशन निकाले जो दु:ख समाप्त हो जाए, साधन सुख के साथ दुःख भी देता है। सोचते जरूर है कि दु:ख न हो, सिर्फ सुख की प्राप्ति हो लेकिन स्वयं की आत्मा में अविनाशी सुख का अनुभव नहीं है तो दूसरों को कैसे दे सकते हैं।* आप सबके पास तो सुख का, शान्ति का, निःस्वार्थ सच्चे प्यार का स्टॉक जमा है, तो उसका दान दो।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं दिलाराम बाप की दिल में रहने वाली आत्मा हूँ"*

 

  सदैव अपने को दिलाराम बाप की दिल में रहने वाले अनुभव करते हो? दिलाराम की दिल तख्त है ना। तो दिलतख्तनशीन आत्माएं हैं-ऐसे अपने को समझते हो? सदा तख्त पर रहते हो या कभी उतरते, कभी चढ़ते हो? अगर किसको तख्त मिल जाये तो तख्त कोई छोड़ेगा? *यह तो श्रेष्ठ भाग्य है जो भगवान् के दिलतख्त-नशीन बनने का भाग्य मिला है। इससे बड़ा भाग्य कोई हो सकता है? ऐसे प्राप्त हुए श्रेष्ठ भाग्य को भूल तो नहीं जाते हो? तो सदैव तख्त-नशीन आत्माएं हैं-इस स्मृति में रहो।*

 

  जो दिल में समाया हुआ रहेगा, परमात्म-दिल में समाए हुए को और कोई हिला सकता है? *दिलतख्त-नशीन आत्माएं सदा सेफ हैं। माया के तूफान से भी और प्रकृति के तूफान से भी-दोनों तूफान से सेफ न माया की हलचल हिला सकती है और न प्रकृति की हलचल हिला सकती है।* ऐसे अचल हो? या कभी-कभी अचल, कभी-कभी हिलते हो? यादगार अचलघर है। चंचल-घर तो बना ही नहीं। अनेक बार अचल बने हो। अभी भी अचल हो ना। हलचल में नुकसान होता है और अचल में फायदा है। कोई चीज हिलती रहे तो टूट जायेगी ना।

 

  सदा यह याद रखो कि हम दिलाराम के दिलतख्त-नशीन हैं। यह स्मृति ही तिलक है। तिलक है तो तख्त-नशीन भी हैं। इसीलिए जब तख्त पर बैठते हैं तो पहले राज्य-तिलक देते हैं। तो यह स्मृति का तिलक ही राज्य-तिलक है। तो तिलक भी लगा हुआ है। या मिट जाता है कभी? तिलक कभी आधा रह जाता है और कभी मिट भी जाता है-ऐसे तो नहीं। यह अविनाशी तिलक है, स्थूल तिलक नहीं है। जो तख्त-नशीन होता है, उसको कितनी खुशी होती है, कितना नशा होता है! आजकल के नेताओंको तख्त नहीं मिलता, कुर्सी मिलती है। तो भी कितना नशा रहता है-हमारी पार्टी का राज्य है! वो तो कुर्सी है, आपका तो तख्त है। *तो स्मृति नशा दिलाती है। अगर स्मृति नहीं है तो नशा भी नहीं है। तिल है तो तख्त है। तो चेक करो कि स्मृति का तिलक सदा लगा हुआ है अर्थात् सदा स्मृतिस्वरूप हैं?*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आस्ट्रेलिया वालोंने सेवा तो बढाई है ना। अभी कितने स्थान हैं वहाँ (5) हरेक को राज्य करने के लिए अपनी-अपनी प्रजा तो जरूर बनानी ही है। (विनाश में हम लोगों का क्या होगा?) विनाश में आस्ट्रेलिया सारा एक टापू बन जायेगा। कुछ पानी

में आ जायेगा कुछ ऊपर रह जायेगा। *आप लोग सेफ रहेंगे।*

 

✧  विनाश के पहले ही आप लोगों को आवाज पहुँचेगा। *जब तुम सभी सेफ स्थान पर पहुँच जायेंगे फिर विनाश होगा।* जैसे गायन है भट्ठी में बिल्ली के पूंगरे सेफ रहे। तो *जो बच्चे बाप की याद में रहने वाले हैं, वह विनाश में विनाश नहीं होंगे लेकिन स्वेच्छा से शरीर छोडेगे,* न कि विनाश के सरकमस्टान्सेज के बीच में छोडेगे।

 

✧  *इसके लिए एक बुद्धि की लाइन क्लियर हो और दूसरा अशरीरी बनने का अभ्यास बहुत हो।* कोई भी बात हो तो आप अशरीरी हो जाओ। अपने आप शरीर छोडने का जब संकल्प होगा तो संकल्प किया और चले जायेंगे। इसके लिए बहुत समय से प्रैक्टिस चाहिए।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *जैसे साइंस के साधनों द्वारा दूर की वस्तु समीप अनुभव करते हैं। ऐसे दिव्य बुद्धि द्वारा कितनी ही दूर रहने वाली आत्माओं को समीप अनुभव करेंगे।* जैसे स्थूल में साथ रहने वाली आत्मा को स्पष्ट देखते, बोलते, सहयोग देते और लेते हो, ऐसे चाहे अमेरिका में बैठी हुई आत्मा हो लेकिन दिव्य-दृष्टि, दिव्य दृष्टि ट्रान्स नहीं लेकिन रूहानियत भरी दिव्य दृष्टि - जिस दृष्टि द्वारा नैचुरल रूप में आत्मा और आत्माओं का बाप भी दिखाई देगा। *आत्मा को देखूं। यह मेहनत नहीं होगी, पुरुषार्थ नहीं होगा लेकिन हूँ ही आत्मा, हैं ही सब आत्मायें। शरीर का भान ऐसे खोया हुआ होगा जैसे द्वापर से आत्मा का भान खो गया था।* सिवाए आत्मा के कुछ दिखाई नहीं देगा। आत्मा चल रही है, आत्मा कर रहीं है। *सदा मस्तक मणी के तरफ तन की आँखे वा मन की आँखे जायेंगी। बाप और आत्माएँ- यही स्मृति निरन्तर नैचुरल होगी।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अच्छी रीति पढना"*

 

_ ➳  *मैं रूहानी गॉडली स्टूडेंट रूहानी शिक्षक से रूहानी पढाई पढने रूहानी स्कूल सेंटर पहुँच जाती हूँ... प्यारे बाबा का प्यार से आह्वान करती हूँ...* मीठे बाबा अपने रंग-बिरंगी ज्ञान-योग की किरणों को फैलाते हुए मेरे सम्मुख आ जाते हैं और प्यार से मुझे रूहानी पढाई पढ़ाकर रूहानी शिक्षाएं देते हैं...

 

    *मीठा बाबा अवतरित होकर मेरा भाग्य बनाते हुए कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... *मीठा बाबा धरती पर उतरकर शिक्षक बनकर पढ़ा रहा...* विकारो के काँटों से निकाल दिव्यता का फूल बनाकर सुनहरे सुखो में खिला रहा है... तो इस बहुमूल्य पढ़ाई में माया रावण के हर विघ्नो से सावधान होकर... *सच्चे स्टूडेंट बनकर अपना हर पल ख्याल रखो...*

 

_ ➳  *ईश्वर को हर कदम में अपने साथ पाकर उनकी गोद में सुख पाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा ईश्वर पिता से ज्ञान रत्नों को पाकर देवताओ सी धनवान्, निर्मल और पवित्र बनती जा रही हूँ... *प्यारे बाबा आपने मुझे अपनी मखमली गोद में बिठाया है, और खूबसूरती से सजाया है... रत्नों से मालामाल बना दिया है...*

 

   *प्यारे बाबा मायावी विघ्नों से सावधान करते हुए इस ऊँची पढाई का महत्व समझाते हुए कहते हैं:-* मेरे प्यारे बच्चे... *यह पढ़ाई असाधारण है जो मनुष्य से देवताओ सा दिव्य सहज ही बना देती है... इस सच्ची खुशियो को दिलाने वाली पढ़ाई के रोम रोम से कद्रदान बनो...* माया के हर वार की दूर से ही पहचान शक्तिशाली बनकर हरा दो... हर साँस, संकल्प में याद और पढ़ाई समायी हो ऐसा जुनूनी बन जाओ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा हीरे जैसा भाग्य पाकर अपने जीवन की बागडोर प्यारे बाबा के हाथों में सौंपकर कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपसे अमूल्य खजानो को ज्ञान रत्नों को पाने वाली महान भाग्यवान मणि हूँ... *कभी सोचा भी न था कि... यूँ भगवान सुध लेगा और मुझे बैठ पढ़ायेगा, निखारेगा... कितना प्यारा मीठा यह भाग्य मीठे दिन ले आया है...*

 

   *मेरे बाबा इस अमूल्य ज्ञान से मेरे जीवन की नैया को पार लगाते हुए कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वर पिता के साथ के इन कीमती पलो में... यादो से और ज्ञान रत्नों से बेशुमार दौलत को बाँहों में भरकर, सदा का खुशियो में मुस्कराओ... *यह पढ़ाई ही खुशियो का सच्चा आधार है... इसमे हर साँस को डुबो दो... और विघ्नो से परे रहकर, हर पल इस कीमती पढ़ाई में जुट जाओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा बेहद के बाप से सर्व खजानों की चाबी इस ऊँची पढाई को पाकर कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा ईश्वरीय पढ़ाई से असीम दौलत को पाने वाली जादूगरी को स्वयं में भर रही हूँ... *मै ज्ञान बुलबुल बनकर खुशियो की बगिया में चहक रही हूँ... हर दिल को सच्ची पढ़ाई का गीत सुनाकर माया रावण को रफादफा कर रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अपने लिए स्वयं ही पुरुषार्थ कर ऊँच पद पाना है*"

 

_ ➳  बीजरूप परम पिता परमात्मा की याद से विकर्मो को विनाश कर, *अपनी ऊंच तकदीर बनाने के लिए, अपनी बीज रूप अवस्था में स्वयं को स्थित करने का पुरुषार्थ करते हुए, मैं अपने मन बुद्धि को एकाग्र कर, शरीर से चेतना को समेटते हुए स्वयं को देह से डिटैच करती हूँ और अशरीरी स्थिति में स्थित होकर अपने वास्तविक बीज स्वरूप में टिक जाती हूँ*। अपने इस सत्य स्वरूप में टिकते ही मेरे अंदर छुपे अथाह खजाने, गुण और शक्तियाँ जैसे एक - एक करके मेरे सामने प्रकट होने लगते हैं।

 

_ ➳  एक चमकते हुए सितारे के समान अपने अति सुंदर स्वरुप को निहारते हुए अब मैं स्वयं में समाये उन सभी गुणों, शक्तियों और खजानो का अनुभव कर रही हूँ जिनसे मैं सर्वथा अनजान थी। *जिस शान्ति और सुख को पाने के लिए मैंने स्वयं को देह और देह के झूठे सम्बन्धो में उलझा रखा था और देह भान में आकर जाने अनजाने अनेकानेक विकर्म करती आ रही थी उन सभी विकर्मो को विनाश करने के साथ - साथ और कोई विकर्म अब मुझ से ना हो, इस बात का अब मुझे विशेष ध्यान रखना है*। अपनी ऊँची तकदीर बनाने के लिए अब यही पुरुषार्थ मुझे करना है।

 

_ ➳  मन ही मन स्वयं से यह प्रतिज्ञा करते हुए अपने बीज स्वरूप में स्थित होकर, अपने विकर्मो को दग्ध करने के लिए अब मैं देह की कुटिया से बाहर निकल कर ऊपर आकाश की ओर चल पड़ती हूँ। *अपने गुणों और शक्तियों का आनन्द लेते हुए, एक अति सुंदर रूहानी यात्रा पर चलकर मैं अति शीघ्र पहुँच जाती हूँ अपने घर परमधाम में जहां मेरे बीज रूप शिव पिता परमात्मा रहते हैं*। अपनी बीज रूप अवस्था में स्थित होकर, बीज रूप शिव पिता परमात्मा के पास मैं जैसे ही जा कर बैठती हूँ, उनसे शक्तियों का तेज करेन्ट निकलकर सीधा मुझ आत्मा में प्रवाहित होने लगता है और *योग की एक ऐसी अग्नि प्रज्वलित होने लगती है। जिसमे मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारों की कट जलने लगती है और विकर्म विनाश होने लगते हैं*।

 

_ ➳  अपने चारों और सर्वशक्तियों के करेन्ट से निकलने वाली अग्नि को मैं बहुत ही तीव्र रूप धारण करते हुए स्पष्ट महसूस कर रही हूँ। *ऐसा लग रहा है जैसे मैं आत्मा एक बहुत विशाल अग्नि के घेरे के अंदर बैठी हूँ और मेरे चारों और फैली अग्नि की तपन से मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारो की अलाय पिघलती जा रही है*। मेरी खोई हुई चमक पुनः लौट रही है। स्वयं को मैं बहुत ही लाइट और माइट अनुभव कर रही हूँ। ईश्वरीय शक्तियों से भरपूर सूक्ष्म ऊर्जा का भण्डार बन, अपने चारों और सर्वशक्तियों के दिव्य कार्ब को धारण कर मैं आत्मा परामधाम से नीचे आती हूँ और अपने लाइट माइट फरिश्ता स्वरूप को धारण कर सूक्ष्म वतन में प्रवेश करती हूँ।

 

_ ➳  चारों और फैले चाँदनी जैसे सफ़ेद प्रकाश से प्रकाशित फरिश्तो की इस खूबसूरत दुनिया में अपने सम्पूर्ण स्वरूप को प्राप्त कर अव्यक्त पार्ट बजा रहे ब्रह्मा बाबा के सामने मैं जैसे ही आ कर बैठती हूँ, ऊपर परमधाम से शिव बाबा आते हैं और आकर ब्रह्मा बाबा की भृकुटि में बैठ जाते हैं। *बड़े प्यार से मुझे निहारते हुए बापदादा दृष्टि देकर मुझे नजरों से निहाल कर देते हैं। अपनी सर्वशक्तियाँ, सर्व गुणों और सर्व खजानो से मुझे भरपूर करके बापदादा मेरे हाथ मे मुझे अपनी ऊंच तकदीर लिखने की कलम देकर, अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रख देते हैं*।

 

_ ➳  अपना सर्वश्रेष्ठ भाग्य लिखने की कलम अपने साथ लेकर अपनी ऊंच तकदीर बनाने के लिए, अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर अब मैं घड़ी - घड़ी साकारी सो निराकारी स्वरूप की ड्रिल करते हुए अपने विकर्मो को विनाश करने का पुरुषार्थ कर रही हूँ। *ईश्वरीय सेवा अर्थ साकार सृष्टि पर आकर अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होना और सेवा से उपराम होकर, अपने निराकार स्वरूप में स्थित हो, परमधाम जाकर बीज रूप स्थिति में स्थित होकर, बीज रूप परमात्मा की सर्वशक्तियों की जवालास्वरूप किरणों के नीचे बैठ, विकर्मो को दग्ध करने का पुरुषार्थ अब मैं निरन्तर कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सदा एकान्त और सिमरण में व्यस्त रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं बेहद की वानप्रस्थी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा हिम्मत का एक कदम बढ़ाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा बाप की मदद के हजार कदम बढ़ते हुए अनुभव करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा हिम्मतवान हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  और कई अच्छी-अच्छी बातें सुनाते हैं - *मेरी इच्छा नहीं थी लेकिन किसी को खुश करने के लिए किया! क्या अज्ञानी आत्मायें कभी सदा खुश रह सकती हैंऐसे अभी खुशअभी नाराज़ रहने वाली आत्माओं के कारण अपना श्रेष्ठ कर्म और धर्म छोड़ देते हो जो धर्म के नहीं वह ब्राह्मण दुनिया के नहीं*। *अल्पज्ञ आत्माओं को खुश कर लिया लेकिन सर्वज्ञ बाप की आज्ञा का उल्लंघन किया ना*! तो पाया क्या और गंवाया क्या! जो लोक अब खत्म हुआ ही पड़ा है। चारों ओर आग की लकड़ियाँ बहुत जोर शोर से इकट्ठी हो गई हैं। लकड़ियाँ अर्थात् तैयारियाँ। जितना सोचते हैं इन लकड़ियों को अलग-अलग कर आग की तैयारी को समाप्त कर दें उतना ही लकड़ियों का ढेर ऊँचा होता जाता है। जैसे होलिका को जलाते हैं तो बड़ों के साथ छोटे-छोटे बच्चे भी लकड़ियाँ इकट्ठी कर ले आते हैं। नहीं तो घर से ही लकड़ी ले आते। शौक होता है। तो आजकल भी देखो छोटे-ोटे शहर भी बड़े शौक से सहयोगी बन रहे हैं। तो ऐसे लोक की लाज के लिए अपने अविनाशी ब्राह्मण सो देवता लोक की लाज भूल जाते हो! कमाल करते हो! यह निभाना है या गंवाना है! इसलिए *ब्राह्मण लोक की भी लाज स्मृति में रखो। अकेले नहीं होबड़े कुल के हो तो श्रेष्ठ कुल की भी लाज रखो*।

 

✺ *"ड्रिल :- अज्ञानी आत्माओं को खुश करने के लिए बाप की आज्ञा का उल्लंघन नही करना*"

 

_ ➳  शान्त, मगर निश्चय में अडोल... नदी का किनारा *उमंगों से भरपूर इठलाती... किनारों की मर्यादा में बहती नदी की धारा*... अपने प्रियतम सागर से मिलने को आतुर

गुनगुनाती हुई बहती जा रही है... *सफर लम्बा है, दुश्वारियों से भरा है, मगर प्रेम इन दुश्वारियों से कब डरा है*... नदी की धारा में मोती चुगती दूधिया हंसो की टोली... और *मैं आत्मा हंसिनी, उन्हीं किनारों पर सूर्य की किरणों के रथ पर सवार उतरते अपने शिव प्रियतम को निहारती हुई*... सुनहरें प्रकाश से चमक उठी है नदी की धाराएँ... मन खुशी से मानो गा उठा है... *यूँ खातिर मेरे तुम जो तशरीफ़ लाये, है मुझसे मोहब्बत, ये दिल मेरा गाये*...

 

_ ➳  सोना बरसाती हुई मेरे शिव प्रियतम की किरणें, गहन शान्ति की अनुभूति करा रही है... मेरा मन पूरी तरह शान्ति की चरम अनुभूतियों में डूबा हुआ... *मैं आत्मा ड्रामा के इस चक्र में अपनी जन्म जन्मान्तर की यात्रा का दर्शन करती हुई*... परम धाम में बिन्दु रूप में... शान्ति सागर में गहराई में गोते लगाती हुई... सभी आत्माओं को शान्ति के प्रकंम्पन प्रदान कर रही हूँ...

 

_ ➳  मैं आत्मा देवताई शरीर धारण कर सतयुगी सृष्टि में पार्ट बजा रही हूँ... सम्पूर्ण सुखों का उपभोग करते हुए अब मेरी गिरती कला की शुरूआत हो चुकी है... और मैं आत्मा, स्वयं को रावण की कैद में देख रही हूँ... *मैं बन्दी कैसे बनी, मुझे आहिस्ता- आहिस्ता सब कुछ याद आ रहा है*...

 

_ ➳  मुझे याद आ रहा है... *अज्ञानी रावण को खुश करने के लिए श्रीमत का उल्लंघन करना, मर्यादा की लकीर को लांघकर कुटिया से बाहर कदम रखना... और फिर मेरा मेरे ही वजूद से लम्बा वनवास*... अशोक वाटिका से शोक वाटिका का मेरा आश्रय बन जाना...

 

_ ➳  एक लम्बें इन्तज़ार और भटकन के बाद आज फिर से मेरे शिव प्रियतम ने मुझे ढूँढ लिया है... और मुझे याद दिलाई है मेरे शान्त स्वरूप, सुख स्वरूप की... कानो में धीरे से आकर गुनगुना दिया है... *अकेले नही हो तुम, बडे कुल के हो तो श्रेष्ठ कुल की भी लाज रखना*... मैं आत्मा प्रतिज्ञा कर रही हूँ... *अज्ञानी आत्माओं को खुश करने के लिए मैं अब कभी बाप की आज्ञा का उल्लंघन नही करूँगी...* कभी खुश कभी नाराज़ रहने वाली आत्माओं के लिए मैं अपनी ब्राह्मण कुल का श्रेष्ठ धर्म और कर्म नही छोडूगीँ, अल्पज्ञ के लिए मैं सर्वज्ञ की आज्ञा का उल्लघंन नही करूँगी..

 

_ ➳  *आकाश से फूलों की बारिश करते बाप दादा... मेरे मस्तक पर विजय तिलक लगाते हुए, मेरे सर पर हाथ रखकर मुझे सफलता मूर्त का वरदान दे रहे है*... नदी से निकलकर हंसों की टोली ने मुझे चारों ओर से घेर लिया है... मानों मुझ में और मेरी प्रतिज्ञा में अपना निश्चय प्रकट कर अपनी खुशी जाहिर कर रहे हों... *ये लहरे ये किनारें, ये हंसों की टोली मेरे बाबा की मीठी बोली मेरे श्रेष्ठ कुल का गुणगान कर रही है*...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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