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 11 / 10 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *शुद्ध संकल्पों की शक्ति से व्यर्थ को समाप्त किया ?*

 

➢➢ *स्वयं के प्रति व सर्व के प्रति विघन विनाशक बनकर रहे ?*

 

➢➢ *समय, संकल्प और शक्तियों की इकॉनामी की ?*

 

➢➢ *"बालक और मालिक" - दोनों स्थितियों का समान रूप से अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  पुरानी दुनिया में पुराने अन्तिम शरीर में किसी भी प्रकार की व्याधि अपनी श्रेष्ठ स्थिति को हलचल में न लाये। *स्वचिन्तन, ज्ञान-चिन्तन, शुभचिन्तक बनने का चिन्तन ही चले तब कहेंगे कर्मातीत स्थिति।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं विश्व में सबसे ज्यादा श्रेष्ठ भाग्यवान हूँ"*

 

  विश्व में सबसे ज्यादा श्रेष्ठ भाग्यवान अपने को समझते हो? सारा विश्व जिस श्रेष्ठ भाग्य के लिए पुकार रहा है कि हमारा भाग्य खुल जाए... आपका भाग्य तो खुल गया। इससे बड़ी खुशी की बात और क्या होगी! *भाग्यविधाता ही हमारा बाप है - ऐसा नशा है ना! जिसका नाम ही भाग्यविधाता है उसका भाग्य क्या होगा! इससे बड़ा भाग्य कोई हो सकता है? तो सदा यह खुशी रहे कि भाग्य तो हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार हो गया।* बाप के पास जो भी प्रापर्टी होती है, बच्चे उसके अधिकारी होते हैं। तो भाग्यविधाता के पास क्या है? भाग्य का खजाना। उस खजाने पर आपका अधिकार हो गया।

 

  *तो सदैव 'वाह मेरा भाग्य और भाग्य-विधाता बाप'! - यही गीत गाते खुशी में उड़ते रहो। जिसका इतना श्रेष्ठ भाग्य हो गया उसको और क्या चाहिए? भाग्य में सब कुछ आ गया। भाग्यवान के पास तन-मन-धन-जन सब कुछ होता है। श्रेष्ठ भाग्य अर्थात् अप्राप्त कोई वस्तु नहीं। कोई अप्राप्ति है? मकान अच्छा चाहिए, कार अच्छी चाहिए... नहीं। जिसको मन की खुशी मिल गई, उसे सर्व प्राप्तियाँ हो गई!* कार तो क्या लेकिन कारून का खजाना मिल गया! कोई अप्राप्त वस्तु है ही नहीं। ऐसे भाग्यवान हो! विनाशी इच्छा क्या करेंगे। जो आज है, कल है ही नहीं - उसकी इच्छा क्या रखेंगे। इसलिए, सदा अविनाशी खजाने की खुशियों में रहो जो अब भी है और साथ में भी चलेगा। यह मकान, कार वा पैसे साथ नहीं चलेंगे लेकिन यह अविनाशी खजाना अनेक जन्म साथ रहेगा। कोई छीन नहीं सकता, कोई लूट नहीं सकता।

 

  स्वयं भी अमर बन गये और खजाने भी अविनाशी मिल गये! जन्म-जन्म यह श्रेष्ठ प्रालब्ध साथ रहेगी। कितना बड़ा भाग्य है! जहाँ कोई इच्छा नहीं, इच्छा मात्रम् अविद्या है - ऐसा श्रेष्ठ भाग्य भाग्यविधाता बाप द्वारा प्राप्त हो गया। मैं बेफिकर बादशाह हूँ सदा अपने को बेफिकर बादशाह अनुभव करते हो? प्रवृति का या कोई भी कार्य का फिकर तो नहीं रहता है? बेफिकर रहते हो? बेफिकर कैसे बने? सब कुछ तेरा करने से। मेरा कुछ नहीं, सब तेरा है। जब तेरा है तो फिकर किस बात का? *जिन्होंने सब कुछ तेरा किया, वही बेफिकर बादशाह बनते हैं। ऐसे नहीं जो चीज मतलब की है वह मेरी है, जो चीज मतलब की नहीं वह तेरी। जीवन में हर एक बेफिकर रहना चाहता है। जहाँ फिकर नहीं, वहाँ सदा खुशी होगी। तो तेरा कहने से, बेफिकर बनने से खुशी के खजाने भरपूर हो जाते हैं।* बादशाह के पास खजाना भरपूर होता है। तो आप बेफिकर बादशाहों के पास अनगिनत, अखुट, अविनाशी खजाने हैं जो सतयुग में नहीं होंगे।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  इस पुरानी दुनिया की राज्य सभा का हालचाल तो अच्छी तरह से जानते हो - न लॉ है, न ऑर्डर है। लेकिन *आपकी राज्य दरबार लाँ फुल भी है और सदा हाँ जी, जी हाजिर - इस ऑर्डर में चलती है।*

 

✧  जितना राज्य अधिकारी शक्तिशाली है उतना राज्य सहयोगी कर्मचारी भी स्वत: भी सदा इशारे से चलते, *राज्य अधिकारी ने ऑर्डर दिया कि यह नहीं सुनना है और यह नहीं करना है, नहीं बोलना है, तो सेकण्ड में इशारे प्रमाण कार्य करें।* ऐसे नहीं कि आपने आर्डर

किया - नहीं देखो और वह देख करके फिर माफी मांगे कि मेरी गलती हो गई।

 

✧  करने के बाद सोचे तो उसको समझदार साथी कहेंगे? *मन को ऑर्डर दिया कि व्यर्थ नहीं सोचो, सेकण्ड में फुलस्टॉप, दो सेकण्ड भी नहीं लगने चाहिए।* इसको कहा जाता है - युक्ति-युक्त राज्य दरबार। ऐसे राज्य अधिकारी बने हो? रोज राज्य दरबार लगाते हो या जब याद आता है तब ऑर्डर देते हो?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *अनादि, आदि और अन्त - तीनों ही काल स्मृति स्वरूप हैं। विस्मृति तो बीच में आई। तो आदि, अनादि स्वरूप सहज होना चाइये या मध्य का स्वरूप? सोचते हो कि हाँ, मैं आत्मा हूँ लेकिन स्मृति स्वरूप हो चलना, बोलना, देखना उसमें अन्तर पड़ जाता है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सर्व शक्ति सम्पन्न बनना*

 

_ ➳  *हृदय में बाबा की मीठी यादें संजोए हुए... मैं आत्मा मधुबन के प्रांगण में हूँ... दिल में एक दिलाराम बाबा की याद है... नैनों में दिला राम की मूरत समाई हुई है...* मधुबन के प्रांगण में बिल्कुल शांति है... कम्पलीट सायलेंस है... मैं आत्मा सहज ही हिस्ट्री होल की ओर बढ़ती जा रही हूँ... यहां आते ही मैं देखती हूँ... *मेरे मीठे बाबा ब्रह्मा बाबा के तन में विराजमान है... पूरा हॉल बाबा की शक्तिशाली किरणों से चार्ज हो गया है...* मुझे देखते ही सतगुरु बाबा कहते हैं... आओ मेरे लाडले बच्चे... मैं आत्मा बाबा के सामने बैठ जाती हूँ... बाबा की शक्तिशाली दृष्टि से मुझ आत्मा पर... अनवरत रूप से शक्तियां बरसती जा रही हैं...

 

  *अपनी मीठी मीठी शिक्षाओं से मेरे जीवन को संवारते हुए सतगुरु बाबा कहते हैं:-* "मीठे फरमानबरदार बच्चे... अब संपूर्ण स्थिति को प्राप्त करना ही है... संपन्न बने बिना आत्मा कर्मातीत बनकर बाप के साथ नहीं जा सकेगी... *तुम्हें शिव की बारात में पीछे पीछे नहीं आना... शिव के साथ साथ चलना है तो अब अपनी संपन्न स्थिति का आह्वान करो... बाप समान बनने वाले बच्चे ही बाप के साथ जाएंगे..."*

 

_ ➳  *बाबा की शिक्षाओं को जीवन में धारण करती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्यारे सतगुरु बाबा... मैं आत्मा हर कदम में फॉलो फादर कर रही हूँ... ब्रह्मा बाबा ने संपूर्ण बनने का जो पुरुषार्थ किया... मैं आत्मा भी बाबा के नक्शे कदम पर चल रही हूँ... *ब्रह्मा बाबा को फॉलो करते करते... मैं बाप समान संपन्न और संपूर्ण बनने की यात्रा पर... तीव्र गति से आगे बढ़ती जा रही हूँ..."*

 

  *योग ज्वाला में मुझ आत्मा की अलाय को जला सच्चा सोना बनाने वाले पारसनाथ बाबा कहते हैं:-* "मेरे प्यारे फूल बच्चे... क्या अपने पुरुषार्थ की गति से संतुष्ट हो... क्या संबंध संपर्क में आने वाली आत्माओं से... संतुष्टता का सर्टिफिकेट मिल गया है... जो भी सेवा करते हो क्या उस से आप संतुष्ट हो... *यथार्थ विधि से ही सिद्धि प्राप्त होती है... संपन्न बनने वाली आत्मा स्वयं से संतुष्ट होगी... और सर्व आत्माएं भी उससे संतुष्ट होंगी... ऐसी अपनी सूक्ष्म में चेकिंग करो..."*

 

_ ➳  *पारसनाथ बाबा द्वारा दी गई एक एक कसौटी पर स्वयं को कसकर खरा सोना बनती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मीठे प्यारे बाबा... आप करावनहार हो... हम बच्चे तो निमित्त मात्र कर्म कर रहे हैं... *यज्ञ सेवाओं से मैं आत्मा असीम खुशी... अतींद्रिय सुख को प्राप्त करती हुई... सर्व आत्माओं को आप का संदेश दे रही हूँ... ज्ञानगंगा बनकर आप का ज्ञान सबको सुनाती हुई... मैं पूर्ण रूप से संतुष्ट हूँ... व हर्षित स्थिति का अनुभव कर रही हूँ..."*

 

  *अपने हाथ में मेरा हाथ थामे मुझे सतयुगी  दुनिया की सैर कराते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे बच्चे... *राजधानी में ब्रह्मा बाप के साथ साथ आप बच्चों को आना है... बात तो न्यारा और प्यारा ही होगा...* अपने राज्य की वैराइटी प्रकार की आत्माओं को... राज्य अधिकारी, रॉयल फैमिली की अधिकारी, रॉयल प्रजा की अधिकारी, साधारण प्रजा की अधिकारी... *क्या सर्व प्रकार की... वैराइटी आत्माओं को तैयार कर लिया है... ऐसा करने के लिए संपूर्ण पवित्र व निरंतर योगी बनो..."*

 

_ ➳  *सतयुग में कृष्ण के साथ रास रचाती, झूमती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे मीठे प्यारे बाबा... मैं आत्मा निरंतर आपकी यादों में समाए हुए हूँ... निरंतर योगयुक्त स्थिति में हूँ... करावनहार बाप की स्मृति में... ट्रस्टी बनकर सेवा किए जा रही हूँ... मैं आत्मा देख रही हूँ... *निमित्त बन कर की गई सेवा से सब आत्माएं संतुष्ट हैं... और मैं आत्मा स्वयं भी हलकी व खुश हूँ... निरंतर उड़ती कला में जाते हुए... मैं संपन्न और संपूर्ण मूर्त बनती जा रही हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- शुद्ध संकल्पो की शक्ति से व्यर्थ को समाप्त करना*"

 

_ ➳  हर प्रकार के उल्टे सुल्टे संकल्पो से मुक्त, निरसंकल्प स्थिति में स्थित होकर अपने बीज रूप परम पिता परमात्मा के साथ मंगल मिलन मनाने की अतीन्द्रीय सुखमय स्थिति का सुखद अनुभव स्मृति में आते ही बुद्धियोग सहज ही हद से निकल अपने बेहद घर मे लग जाता है और मन फिर से उस सुख को पाने के लिए बेकरार हो उठता है। *और मैं मनमनाभव की स्थिति में स्थित होकर, अपने निराकारी स्वरूप में, सेकेण्ड में देह को छोड़, विदेही बन हद बेहद से पार अपने निर्वाण धाम घर की ओर चल पड़ती हूँ*। वाणी से परें इस निर्वाण धाम घर मे पहुँच कर, निरसंकल्प स्थिति में स्थित होकर, बीज रूप अवस्था मे, मैं आत्मा सर्वशक्तियों और सर्वगुणों के सागर अपने बीज रूप शिव पिता के पास जाकर बैठ जाती हूँ और दिव्य बुद्धि के तीसरे नेत्र से उन्हें निहारने लगती हूँ।

 

_ ➳  अपने निराकार शिव पिता से आ रही सर्व गुणों और सर्वशक्तियों की एक - एक किरण को बड़े प्यार से निहारते हुए इस खूबसूरत और लुभावने दृश्य का मैं भरपूर आनन्द ले रही हूँ। *हर संकल्प से मुक्त, निरसंकल्प स्थिति में स्थित होकर अपने प्यारे मीठे बाबा को एकटक निहारने का यह सुख बहुत ही निराला है*। मन बुद्धि रूपी नेत्र एक सेकण्ड के लिए भी अपने प्यारे बाबा के इस अति सुंदर सुखदायी स्वरूप से हटना नही चाहते। पूरे 5 हजार वर्ष मैं आत्मा अपने पिता परमात्मा से दूर रही, उनके एक दर्शन पाने के लिए मैं कहाँ - कहाँ नही भटकी! और *अब जबकि वो मेरे सामने है तो उनसे इतना लम्बा समय दूर रहने की सारी प्यास मैं आज ही बुझा लेना चाहती हूँ*। स्वयं को पूरी तरह से तृप्त कर लेना चाहती हूँ।

 

_ ➳  इसलिए अपने दिलाराम बाबा को बड़े प्रेम से निहारते हुए, उनके प्रेम की गहराई में मैं आत्मा डूबती जा रही हूँ। स्वयं को मैं उनके ही समान अनुभव कर रही हूँ। *अपने प्यारे पिता की सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों में समाकर, अब मैं उनके बिल्कुल समीप पहुँच गई हूँ और धीरे - धीरे उनकी एक - एक किरण को अब मैं छू रही हूँ*। उनकी एक - एक किरण से मिल रही शक्ति का बल मुझे उनके समान तेजोमय बना रहा है। *संकल्प विकल्प से रहित मास्टर बीज रूप स्थिति में स्थित होकर अपने बीज रूप बाप के साथ मंगल मिलन मनाने का सुख मुझे परम आनन्द की अनुभूति करवा रहा है*।

 

_ ➳  सर्वगुणों और सर्वशक्तियों के शक्तिशाली वायब्रेशन बाबा से निकल - निकल कर चारों ओर फैल रहें हैं। ऐसा लग रहा है जैसे बाबा से सर्व गुणों और सर्वशक्तियों की किरणो की मीठी - मीठी फुहारें मुझ आत्मा पर बरस रही हैं। ये फुहारें शीतलता के साथ - साथ असीम शक्ति भी मुझ आत्मा में भर रही हैं। *परमात्म शक्तियों से भरपूर होकर मैं स्वयं को बहुत ही शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ। निरसंकल्प बीज रूप स्थिति में बीज रूप अपने पिता परमात्मा से मिलने का आनन्दमयी, सुखदायी एहसास अपने साथ लेकर, शक्ति सम्पन्न बन कर अपने निराकारी स्वरूप में मैं आत्मा वापिस लौट आती हूँ* साकारी दुनिया में और अपने पांच तत्वों के बने शरीर में प्रवेश कर जाती हूँ। 

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, उल्टे सुल्टे संकल्पो से मुक्त होने के लिए बुद्धियोग हद बेहद से पार अपने घर परमधाम में लगा कर, परमात्म बल से स्वयं को सदा भरपूर रखने के लिए मैं बार - बार साकारी सो निराकारी की ड्रिल करती रहती हूँ। *"हाथ कर डे, दिल यार डे" इस स्लोगन को अपने जीवन मे धारण कर, साकार तन में रहते हाथों से हर कर्म करते, बुद्धि योग ऊपर लटकाकर परमात्म शक्तियों से मैं स्वयं को भरपूर करती रहती हूँ*। 

 

_ ➳  *परमात्म बल मुझे समर्थ बनाकर समर्थ चिंतन में बिज़ी रहने में विशेष सहयोग दे रहा है। जब चाहे अपना बुद्धि योग हद बेहद से पार, अपने घर मे लगाकर, बाबा की याद से अब मैं अपने हर संकल्प, बोल और कर्म को श्रेष्ठ बना कर उल्टे सुल्टे संकल्पों के बोझ से स्वयं को सहज ही मुक्त कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं 5 विकार रूपी दुश्मन को परिवर्तन कर सहयोगी बनाने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं मायाजीत आत्मा हूँ।*

✺   *मैं जगतजीत आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा रीयल गोल्ड में मेरा पन के अलाए से सदा मुक्त हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा वैल्युबल रीयल गोल्ड हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा मेरे पन को समाप्त करती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  जब काम मिलता है तो लिखने में भी मार्क्स जमा होती हैं। अगर नहीं लिखा तो मार्क्स एकस्ट्रा कम हो गईनुकसान कर दिया। *जो भी डायरेक्शन मिलते हैंडायरेक्ट बाप द्वारा मिलते हैंचाहे निमित्त आत्मायें दादियों द्वारा मिलते हैंउसको रिगार्ड देना अति आवश्यक है।* इसमें न बहाना देनान अलबेलापन करना। आगे के लिए बापदादा बता देता है कि मार्क्स जमा नहीं हुई। *इसलिए इसको महत्व देना अर्थात् महान बनना।* हल्की बात नहीं करो। बच्चे बड़े चतुर हैं, कहेंगे बापदादा तो जानते ही हैं ना। जानते तो हैं लेकिन कहा क्योंजानते हुए कहा ना! तो ऐसे छुड़ाना नहीं चाहिए, *बहुत ऐसे कार्य हैंछोटे-छोटे जिसको हाँ जी करने में एक्स्ट्रा मार्क्स जमा होती हैं।*

 

 _ ➳  *कई ऐसे स्टूडेन्टस हैं जो किसी भी पास्ट के संस्कार के वश बहुत अच्छे उमंग-उत्साह में बढ़ते हैं* लेकिन कोई न कोई सुनहरी धागा, बहुत महीन धागा उनको आगे बढ़ने नहीं देता। वह समझते भी हैं कि यह महीन धागा रहा हुआ हैलेकिन.... लेकिन ही कहेंगे। लेकिन *ऐसे भी पुरुषार्थी हैं जो छोटी-छोटी कामन बातों में हाँ जी करने से मार्क्स ले लेते हैं। और हो सकता है कि वह थोड़ी-थोड़ी मार्क्स इकट्ठी होते हुए वह आगे भी निकल सकते हैं,* ऐसे भी बापदादा के पास एक्जैम्पुल के रूप में हैं *इसलिए सहज तरीका है छोटी-छोटी हाँ जी करने में मार्क्स जमा करते जाओ। कट नहीं करोजमा करो।*

 

✺   *ड्रिल :-  "छोटे-छोटे कार्यों में 'हाँ जी' कर मार्क्स जमा करना"*

 

 _ ➳  *ठंडी-ठंडी हवाओं में, धुन्ध भरे मौसम में नीलाम्बर के नीचे हरी-हरी घास पर विचरण करती मैं दिव्य प्रकाशमय आत्मा...* अपने सुप्रीम टीचर की दी शिक्षाओं पर विचार करती, *मैं आत्मा एक मगन अवस्था में स्थित हूँ... मानों मैं आत्मा ज्ञान सागर में डूबती, ज्ञान के रहस्यों में गोते खा रही हूँ...* और समा गयी हूँ... ज्ञान के गहरे रहस्यों के तल में... एक-एक ज्ञान रत्न रूपी मोती इकट्ठा करती मैं दिव्य आत्मा... एकाएक मुझ आत्मा के सामने एक दृश्य उभरता हैं... मैं आत्मा देख  रही हूँ... एक बहुत उबड़-खाबड रास्ता नजर आ रहा हैं... *जिस पर कुछ यात्री अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे है...*

 

 _ ➳  *मैं आत्मा देख रही हूँ... इस राह पर बीच-बीच में कुछ पत्थर पड़े हुए है... जिन पर लिखा है... "हाँ जी"* मैं प्रकाश पुंज आत्मा इस दृश्य को बड़े ध्यान से देख रही हूँ... कुछ आत्माएँ जिन पत्थर पर हाँ जी लिखा है... उसे रास्ते से अपनी जिम्मेदारी समझते रास्ते से हटाने में लग जाती हैं... और कुछ अन्य आत्माएं उसे देख कर अनदेखा कर उस से आगे बढ़ जाती है... *अचानक एक अजब सीन सामने आता है... जो यात्री हाँ जी वाले पत्थर को हटाने में लगे थे... अचानक वो पत्थर बदलकर एक लिफ्ट बन जाती हैं...* और उस लिफ्ट में वो यात्री बैठ *बाकि यात्रियों से 4 कदम आगे बिना किसी मेहनत के, बिना थके एक नये उमंग के साथ पहुँच जाते है...*

 

 _ ➳  और इस अजब दृश्य को देख मैं आत्मा अपने अनर्तमन की गहराइयों से धीरे-धीरे वापिस आती हूँ... और अब *मैं ज्योति स्वरूप आत्मा अनुभव कर रही हूँ... स्वयं को पांच तत्वों से बने देह में... और मैं आत्मा ज्ञान की कुछ नयी बातों से, उनके रहस्यों की स्पष्टता को पाकर सुप्रीम टीचर की शिक्षाओं को धारणा करने में अपने को और परिपक्व अनुभव कर रही हूँ...* मैं आत्मा मम्मा और ब्रह्मा बाबा उनकी भृकुटि में शिव पिता को सामने पाती हूँ... *लाइट की चमकीली ड्रेस में मम्मा दिव्य आलोक से भरपूर धीरे-धीरे मुझ आत्मा की तरफ आ रही है...* और मम्मा अपना लाइट का हाथ जैसे ही मेरे सिर पर रखती है... *मैं आत्मा दैहिक भान से परे हो जाती हूँ... इस देह और देह की दुनिया की सुध-बुध भूल जाती हूँ... देह से उपराम... अशरीरी हो जाती हूँ...*

 

 _ ➳  *मेरे चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश है... कभी सामने बीज रूप शिव बाबा निराकार स्वरूप में दिख रहे है...* कभी ब्रह्मा बाबा की भृकुटि में शिव बाबा चमकते हुए दिखाई दे रही है... *लग रहा है जैसे लाइट की बारिश मुझ पर हो रही हो...* और मैं आत्मा इस लाइट में भीग कर इसमें समा गई हूँ... *अतिइन्द्रिय सुख के झूले में मैं आत्मा स्वयं को अनुभव कर रही हूँ सर्व शक्तियों और सर्व गुणों से सम्पन्न अनुभव कर रही हूँ...* तभी मेरे सामने मम्मा के जीवन के वृतांत आने लगते है... जिसमें मैं आत्मा स्पष्ट देख रही हूँ... कैसे *मम्मा ने हर छोटी-छोटी बात में भी हाँ जी का पुरूषार्थ किया और कैसे आगे बढ़ी...* और अचानक सभी दृश्य मुझ आत्मा के सामने से गायब हो जाते है... और इन सभी दृश्यों को देख *एक नयी ज्ञान उर्जा का संचार मैं दिव्य आत्मा स्वयं में अनुभव कर रही हूँ... पहले से ज्यादा दिव्यता और मुझ आत्मा का प्रकाश बढ़ गया है... सर्व शक्तियों से सम्पन्न मैं आत्मा अनुभव कर रही हूँ...*

 

 _ ➳  *मैं आत्मा अब देख रही स्वयं को इस सृष्टि रंग मंच पर पार्ट प्ले करते हुए...* अब मैं आत्मा इस धरा पर अपना पार्ट पले कर रही हूँ... मेरे सामने अंतर्मन की गहराइयों में जाकर जो दृश्य मैंने देखा, और मम्मा के जीवन के वृत्तांत मेरे सामने आ रहे है... *मुझ आत्मा को इन सब से प्रेरणा मिल रही है...* मैं दिव्य आत्मा देख रही हूँ... *स्वयं को मैं आत्मा मम्मा समान हर कार्य में, सभी छोटे-छोटे कार्य में भी निश्चय बुद्धि होकर सदा हाँ जी कर आगे बढ़ रही हूँ...* मैं निश्चयबुद्धि आत्मा हाँ जी रुपी लिफ्ट द्वारा तेजी से पुरूषार्थ में आगे बढने का अनुभव कर रही हूँ... *हाँ जी रूपी लिफ्ट को यूज़ कर मैं आत्मा एक नयी आत्मिक उर्जा, और दुआओं की गिफ्ट से स्वयं को भरपूर, हल्का और स्वयं में महानता का अनुभव कर रही हूँ...* मैं सन्तुष्ट महान आत्मा एक नये आत्मिक बल से, नये उंमग के साथ तीव्र गति से आगे बढ़ रही हूँ... *बाबा द्वारा जो निमित्त आत्मा द्वारा जो डायरेक्शन मिल रहे है उसमें मेरा हांजी का पाठ पक्का हो गया है...* इनको महत्व देते हुए, निमित्त को रिगार्ड देते हुए मैं स्वयं को एक महान आत्मा समझ रही हूं... ना कोई  सूक्ष्म महीन बंधन है ना कोई पुराने संस्कारो की खिंचावट... *मैं निश्चिन्तता से सरलता से उमंग-उत्साह से हांजी करते हए अपने मार्क्स जमा करते हुए भाग्य बनाती जा रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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