━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 12 / 01 / 17  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

शिवभगवानुवाच :-

➳ _ ➳  रोज रात को सोने से पहले बापदादा को पोतामेल सच्ची दिल का दे दिया तो धरमराजपुरी में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 2*5=10)

 

➢➢ *मात-पिता की आज्ञाओं को अमल में लाये ?*

 

➢➢ *मौत के पहले बाप के पास स्वयं को इनश्योर किया ?*

────────────────────────

 

∫∫ 2 ∫∫ विशेष अभ्यास (Marks:3*10=30)

 

➢➢ *समर्पण भाव से सेवा करते सफलता प्राप्त की ?*

 

➢➢ *सदा स्वमान की सीट पर रह सर्व शक्तियों को आर्डर प्रमाण चलाया ?*

 

➢➢ *मास्टर ज्ञान सूर्य बन आत्माओं को शक्तिशाली किरणों की अनुभूति कराई ?*

────────────────────────

 

∫∫ 3 ∫∫ विशेष पुरुषार्थ (Marks: 10)

 

➢➢ *आज बाकी दिनों के मुकाबले एक घंटा अतिरिक्त योग + मनसा सेवा की ?*

────────────────────────

 

∫∫ 4 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

➢➢ *"मीठे बच्चे - यह तुम्हारी वान प्रस्थ अवस्था है इसलिए एक बाप को याद करना है, निर्वाणधाम में चलने की तैयारी करनी है"*

 

❉   प्यारा बाबा कहे - मेरे मीठे फूल बच्चे... बहुत पराये दुःख देख चले... मेरे खुशनुमा फूल देह के भान में कांटे से हो चले... *अब बागबाँ बाबा को यादकर उसी खुशबु से फिर से भर चलो.*.. अपने मीठे घर शान्तिधाम में... पिता का हाथ थामे मुस्कराते हुए चलने की तैयारी में जुट चलो...

 

➳ _ ➳  आत्मा कहे - हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा देह के झूठ आवरण के दायरे से निकल सत्य के प्रकाश में अपनी प्रकाशित अवस्था को पाकर गुणो और शक्तियो से भरपूर होती जा रही हूँ.... *यादो में अपनी खोयी रंगत को पाकर मीठे बाबा संग घर चलने को तैयार हो रही हूँ.*..

 

❉   मीठा बाबा कहे - मीठे प्यारे लाडले बच्चे... अब दुःख का खेल पूरा हो चला और *सुखो के गीत गुनगुनाने का मौसम दिल के करीब है..*. इसलिए आत्मस्वरूप में गहरे डूब जाओ... वानप्रस्थ अवस्था है तो मीठे बाबा के साथ अपने शांत घर में शान से चलने की तैयारी करो...

 

 ➳ _ ➳  आत्मा कहे - मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी प्यारी यादो में कितनी खुबसूरत और प्यारी होकर घर चलने को आमादा हूँ... यादो में गहरे खोकर एवररेड्डी बन चली हूँ... *संसार की हर बात से परे ईश्वरीय प्यार के झूले में झूल रही हूँ.*..

 

❉   मेरा बाबा कहे - प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... अब स्वयं को सब जगह से समेट कर ईश्वर पिता की मीठी यादो में गहरे उतर जाओ... यह यादे ही सच्चा सहारा है... *अब अपने घर चलना है और फिर सजधज कर मीठे सुखो में चहकना है.*.. तो हर बात से न्यारे होकर प्यारे पिता के प्यार में खो जाओ...

 

➳ _ ➳  आत्मा कहे - हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा सत्य पिता की सच्ची यादो में प्रतिपल निखरती जा रही हूँ... *इन यादो में घर चलने से पूर्व अपनी सतोप्रधान अवस्था को पुनः पाती जा रही हूँ.*.. मीठे बाबा ने मेरे स्वागत को मीठे सुख सजाये है...

────────────────────────

 

∫∫ 5 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मैं आत्मा सच्चा सेवाधारी हूँ ।"*

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा जन्मों-जन्मों से स्वार्थवश तेरे-मेरे के चक्रव्यूह में उलझ गई थी... मुझ आत्मा ने यह समझ लिया था कि ये देह मैं हूँ... देह के सम्बन्ध मेरे हैं... विनाशी पदार्थ, विनाशी दुनिया मेरी है... ये मेरा काम है... मेरा विचार है... यह मेरी फर्ज अदाई है... ऐसे मेरा-मेरा करते मैं आत्मा मेरेपन की भावना से ग्रसित हो गई... मैं आत्मा विनाशी दुनिया से मोह उत्पन्न कर ली थी... अब प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को *सत्य ज्ञान देकर स्मृति स्वरूप* बनाया...

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा *एकांत में एकाग्रता से अंतर्मुखी* होकर बैठती हूँ... मैं आत्मा इस देहभान से, देह की दुनिया से न्यारी होकर अपने भृकुटि की कुटिया में बैठ जाती हूँ... मैं आत्मा अपने स्वगुणों को स्मृति में लाती हूँ... मैं आत्मा ज्ञान स्वरूप, शांत स्वरूप, पवित्र स्वरूप, प्रेम, सुख, आनंद स्वरूप, सर्व शक्ति स्वरूप हूँ...

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा अपने भृकुटि की कुटिया से धीरे-धीरे बाहर निकल आसमान में... चाँद, सितारों की दुनिया से पार *रुहानी मंदिर परमधाम में, शिवालय में* ज्ञान सूर्य के सामने बैठ जाती हूँ... ज्ञान सूर्य की किरणों से मुझ आत्मा के मैं, मेरेपन के भाव ख़त्म होते जा रहें हैं... मैं आत्मा दिव्य गुणों, शक्तियों को धारण कर दिव्य गुणधारी बनती जा रहीं हूँ...

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा स्मृति स्वरूप बन तन, मन, धन सब कुछ प्यारे बाबा को सौंप कर *निर्मान और नष्टमोहा* बन रहीं हूँ... समर्पण भाव को धारण कर रहीं हूँ... अब मैं आत्मा सदा इसी स्मृति में रहती हूँ कि मैं निमित्त हूँ... यह मेरा घर नहीं, सेवा स्थान है... मैं आत्मा सच्चा सेवाधारी बन सेवा कर रहीं हूँ...

 

➳ _ ➳  मैं सिर्फ निमित्त करनहार हूँ... करन-करावनहार बाबा हैं... मैं इस विनाशी दुनिया में मेहमान हूँ... मुझ आत्मा का देह, देह के सम्बन्ध, पदार्थ भी मेरे नहीं हैं... मुझ आत्मा को अपना पार्ट बजाकर अपने रुहानी घर वापस जाना है... अब मैं आत्मा समर्पण भाव से सेवा करते सफलता प्राप्त करने वाली *सच्चा सेवाधारी बन गई* हूँ...

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ योग अभ्यास (Marks-10)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सदा अपने स्वमान की सीट पर रह  सर्व शक्तियां आर्डर प्रमाण चलाना।"*

 

➳ _ ➳   *मैं आत्मा सदा अपने स्वमान में रहती हूँ...* मैं आत्मा सतोगुणी हूँ... स्वमान में रह अपने सब गुणों और शक्तियों को इमर्ज करती हूँ... स्वमान की सीट पर रह सभी शक्तियों को आर्डर प्रमाण चलाती हूँ...

 

 ➳ _ ➳   जब कोई अपनी पोजीशन पर रहता हैं, तभी अपने सभी पॉवर्स को यूज़ कर सकता हैं... ऐसे मैं आत्मा भी अपनी स्वमान की पोजिशन पर विराजमान होने से सभी शक्तियाँ मेरा ऑर्डर मानती हैं... *शिवबाबा द्वारा मुझे स्वमान का तोहफा मिला हैं...*

 

➳ _ ➳   *स्वमान की सीट पर सेट रहने से शिवबाबा के सदा साथ हूँ...* मैं अपने ओरीजिनल स्वरूप में स्थित... देही अभिमानी हो हर कर्म करते... स्वमान को स्मृति में रखती हूँ... बाबा की मुरली से मुझे स्वमान का खजाना मिलता हैं...

 

➳ _ ➳   स्वमान में रहने से मेरा आत्मविश्वास बढ़ता हैं... और कोई भी दुनिया की बातों का बन्धन नहीं होता... कोई हद नहीं होती... मैं निर्बन्धन... *मास्टर सर्वशक्तिमान बन कदम-कदम पर सफलता हासिल करती हूँ...*

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ ज्ञान मंथन (Marks:-10)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

➢➢  *समर्पण भाव से सेवा करते सफलता प्राप्त करने वाले सच्चे सेवाधारी होते हैं...  क्यों और कैसे?*

 

❉   समर्पण भाव से सेवा करते सफलता प्राप्त करने वाले सच्चे सेवाधारी होते हैं क्योंकि...  *सच्चे सेवाधारी वह हैं जो समर्पण भाव से सेवा* करते हैं। हमारी सेवाओं में ज़रा भी मेरेपन का भाव न हो। जहाँ मेरापन होता हैवहाँ पर सफलतायें भी नहीं होती है।

 

❉   हमारी सेवाओं में कभी भी मेरेपन का भाव नहीं उत्पन्न होना चाहिये। अगर हमारी सेवाओं में मेरेपन का तनिक भी भाव उत्त्पन्न होता है तो!  उस भाव को सम्पूर्ण समर्पण भाव नहीं कहेँगेँ और न ही उन्हें सच्चे सेवाधारी ही कहेंगे। क्योंकि *सच्चे सेवाधारी तो स्वयं को केवल निमित्तमात्र* ही समझते हैं।

 

❉   उनकी सोच में सदा यही होता है कि... करण करावन हार करवा रहा है। इसमें मेरा कुछ भी नहीं है। मैं तो केवल निमित्तमात्र हूँ। सेवा में हमारा ज़रा भी मेरापन न हो। अतः जब हमारी सेवाओं में से मेरापन सदा के लिये समाप्त हो जायेगा तो!  हमारी *सफलतायें भी निश्चित रूप से स्वतः ही होती रहेंगी।*

 

❉   जब कोई भी व्यक्ति यह बात सोच लेता है कि...   यह कार्य मेरे कारण हुआ है। ये मेरा विचार है। ये मेरा फर्ज़ है। इस फर्ज को मुझे ही अदा करना है। तो *इस प्रकार से यह मेरापन आना ही अर्थात!  *मोह का उत्पन्न* होना है। अतः स्वयं को सदा ही अपनेपन या मेरेपन से मुक्त रखना है।

 

❉   लेकिन कहीं भी रहते सदा स्मृति में यही रहे कि मैं निमित्त मात्र हूँ। ये मेरा घर नहीं है बल्कि!  ये तो सेवा का स्थान है। तो!   इस प्रकार के विचार हमें *समर्पण भाव से निर्माण और नष्टोमोहा* बन कर सम्पूर्ण सफलता को प्राप्त करवा देंगें। तभी तो कहा गया है कि... समर्पण भाव से सेवा करते सफलता प्राप्त करने वाले सच्चे सेवाधारी होते हैं।

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ ज्ञान मंथन (Marks:-10)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

➢➢  *सदा अपने स्वमान की सीट पर रहो तो सर्व शक्तियां आर्डर मानती रहेंगी... क्यों और कैसे* ?

 

 ❉   सर्वशक्तिवान बाप द्वारा जो सर्व शक्तियों की, सर्व नॉलेज की और स्व पर राज्य करने की अथॉरिटी मिली है । उस नॉलेज की अथॉरिटी को सदा स्मृति में रख जो पावरफुल स्वरूप की स्टेज पर सदा स्थित रहते हैं । सदा श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर सेट रहते हैं । वे बाप द्वारा मिली सर्वशक्तियों की अथॉरिटी से ऐसे शक्ति सम्पन्न बन जाते हैं कि *सभी शक्तियां सहज ही उनके ऑर्डर प्रमाण चलने लगती है* । और वे समय प्रमाण सर्व शक्तियों का प्रयोग कर स्वयं अपने तथा अनेकों के कल्याण के निमित बन जाते हैं ।

 

❉   जैसे कोई बड़ा ऑफिसर व राजा जब अपने पद की ऊँची सीट पर स्थित होता है तो उसके नीचे काम करने वाले सभी अधिकारी उसे सम्मान देते हैं । लेकिन जब वह उस सीट से नीचे उतर जाता है अर्थात *उसका राजाई पद समाप्त हो जाता है तो कोई भी उसका ऑर्डर नहीं मानता* । ठीक इसी प्रकार जो श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर सदा सेट रहते हैं तो सर्व शक्तियां उनकी सेवा में सदा हाज़िर रहती है जिससे वे सर्वशक्तियों को अपने ऑर्डर प्रमाण चला कर स्वयं अपना तथा सर्व आत्माओं का कल्याण करते रहते हैं ।

 

❉   जो सदा श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर सेट हो कर साधना में मग्न रहते हैं और साधना द्वारा आत्मा की तीन शक्तियों मन, बुद्धि और संस्कार को अपने कंट्रोल में कर, कर्मेन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर, स्वराज्य अधिकारी बनते हैं । वे मास्टर सर्वशक्तिवान बन *सर्वशक्तियों को अपने ऑर्डर प्रमाण जब और जैसे प्रयोग करना चाहें, कर सकते हैं* । मास्टर सर्वशक्तिवान बन सर्व शक्तियों की अथॉरिटी से वे माया को भी अपनी दासी बना लेते हैं और प्रकृतिपति बन प्रकृति पर भी जीत पा लेते हैं ।

 

❉   जैसे कोई भी आक्यूपेशन वाले जब अपनी सीट पर सेट होते हैं तो वह आक्यूपेशन के गुण, कर्तव्य ऑटोमेटिक इमर्ज होते हैं जो उसके पद के रुतबे को दूसरों के सामने प्रकट करते हैं । ठीक इसी प्रकार जब हम भी अपने श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर सेट रहेंगे तो *हर गुण, हर शक्ति और हर प्रकार का नशा स्वत: ही इमर्ज रहेगा* और यही नशा और निश्चय कोई भी परिस्थिति आने पर उस परिस्थिति में घबराने के बजाय शक्ति स्वरूप बना कर सर्व शक्तियों की अथॉरिटी से सेकण्ड में उस परस्थिति से बाहर ले आएगा ।

 

❉   स्मृति से स्थिति निर्धारित होती है और स्थिति से कर्म निर्धारित होते हैं इसलिए कहा जाता है कि जैसी स्मृति होती है वैसी स्थिति होती है और जैसी स्थिति होती है वैसे ही कर्म होते हैं । स्थिति अगर कमजोर है तो कर्म में भी कमजोरी आ जाती है । तो *श्रेष्ठ कर्म का आधार है श्रेष्ठ स्थिति* । इसलिए जो सदा अपने श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर सेट रहते हैं *उनकी स्थिति सदा शक्तिशाली रहती है* । और अपनी सर्वश्रेष्ठ शक्तिशाली स्व स्थिति से वे सर्वशक्तियों को जैसे चाहे अपने ऑर्डर प्रमाण चला सकते हैं ।

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━