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 12 / 01 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *यज्ञ सेवा में हड्डियां दी ?*

 

➢➢ *निश्चयबुधी बन कमजोर संकल्पों की जाल को समाप्त किया ?*

 

➢➢ *तीसरा ज्वालामुखी नेत्र खोल माया को शक्तिहीन बनाया ?*

 

➢➢ *जहां चाहो, जैसे चाहो, जितना समय चाहो मन को एकाग्र किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अगर संकल्प शक्ति कन्ट्रोल में नहीं आती तो अशरीरी भव का इन्जेक्शन लगा दो। बाप के पास बैठ  जाओ। तो संकल्प शक्ति व्यर्थ नहीं उछलेगी।* अभी व्यक्त में रहते अव्यक्त में उड़ते रहो। उड़ना सीखो। सदा अव्यक्त वतन में विदेही स्थिति में उड़ते रहो, अशरीरी स्टेज पर उड़ते रहो।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कदम में पदमों की कमाई जमा करने वाली विशेष आत्मा हूँ"*

 

  सदा हर कदम में पदमों की कमाई जमा करने का साधन है। *हर कदम में अपने को विशेष आत्मा समझो, तो जैसी स्मृति होगी वैसी स्थिति स्वत: हो जायेगी। कर्म भी विशेष हो जायेंगे। तो सदा यह स्मृति रहे कि मैं विशेष आत्मा हूँ क्योंकि आप ने अपना बना लिया।* इससे बड़ी विशेषता और क्या हो सकती है?

 

  *भगवान के बच्चे बन जाना, यह सबसे बड़ी विशेषता है। सदा इसी स्मृति में रहना अर्थात् पदमों की कमाई जमा करना। किसके बने और क्या बने हैं यह भी याद रखो ते कमाई होती रहेगी।*

 

  *विश्व के आत्माओंकी निगाह आपके ऊपर है, इतनी ऊंचे ते ऊंची आत्माएं हो, तो सदा हर पार्ट बजाने, उठते, बैठते, चलते इस स्मुति मे रहो कि हम स्टेज पर पार्ट बजा रहे हैं। यह ब्राह्मण जीवन है ही आदि से अन्त तक स्टेज के ऊपर पार्ट बजाने वाले।* जब सदा यह स्मृति रहेगी कि मैं बेहद विश्व की स्टेज पर हूँ तो स्वत: हर कर्म के ऊपर अटेन्शन रहेगा। इतना अटेन्शन रखकर कर्म करेंगे तो कमाई जमा होती रहेगी।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जो बापदादा ने अभ्यास सुनाया, मन सेकण्ड में एकाग्र हो जाए, क्योंकि *समस्या अचानक आती है और उसी समय अगर मनोबल है, तो समस्या समाप्त हो जाती है* लेकिन समस्या एक पढाई पढाने वाली बन जाती है।

 

✧  *इसलिए सभी मन-बुद्धि को अभी-अभी एकाग्र करो।* देखो होता है। (बापदादा ने ड़ि्ल कराई) *ऐसे सारे दिन में अभ्यास करते रहो।* अच्छा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *साइलेंस पॉवर प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  अब तक वाणीमूर्त बने हो फिर बनेंगे साक्षात्कार मूर्त। अभी *वाणी से औरों को साक्षात्कार होता है लेकिन फिर होगा सायलेन्स से साक्षात्कार।* जब बनेंगे तो सभी के मुख से क्या निकलेगा? यह जो गायन है ना कि सभी परमात्मा के रूप हैं, यह गायन संगम पर ही प्रैक्टिकल में होता है। भक्तिमार्ग में जो भी बातें चली हैं वह संगम की बातों को मिक्स किया है। *तुम्हारी अन्त में यह स्थिति आती है, जो सभी में साक्षात् बापदादा की मूर्त महसूस होगी।*

〰✧  आजकल साइंस वाले भी विस्तार को समेटने का ही पुरुषार्थ कर रहे हैं। *साइन्स पावर वाले भी तुम सायलेंस की शक्ति वालों से कॉपी करते हैं।* जैसे-जैसे साइलेंस की शक्ति सेना पुरुषार्थ करती है वैसा ही वह भी पुरुषार्थ कर रहे हैं।
साइलेन्स पावर पहले साइलेंस की शक्ति सेना इन्वेन्शन करती है फिर साइंस अपने रूप से इन्वेन्शन करती है। *जैसे-जैसे यहाँ रिफाइन होते जाते हैं वैसे ही साइंस भी रिफाइन होती जाती है।*

〰✧  जो बातें पहले उन्हों को भी असम्भव लगती थी वह अब सम्भव होती जा रही हैं। वैसे ही यहाँ भी असम्भव बातें सरल और सम्भव होती जाती है। *अब मुख्य पुरुषार्थ यही करना है कि आवाज में लाना जितना सहज है उतना ही आवाज से परे जाना सहज हो।* इसको ही सम्पूर्ण स्थिति के समीप की स्थिति कहा जाता है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सबको बाप की याद दिलाना और ज्ञान दान देना"*

 

_ ➳  मैं आत्मा डायमण्ड हॉल में बैठी हूँ... मेरे सामने दादी के तन में अव्यक्त बापदादा विराजमान हैं... *पूरे हॉल में बस मैं और मेरा बाबा... बाबा की लगन में मैं फरिश्ता बड़े स्नेह से बापदादा को निहार रहा हूँ...*  उनसे दृष्टि ले रहा हूँ...  बापदादा की ने अपना प्यार भरा हाथ मेरे सिर पर फिरा रहे हैं... बापदादा की दृष्टि और हाथ रखने से मेरे जन्म जन्म के विकर्म दग्ध हो गए हैं... मैं फरिश्ता बिल्कुल हल्का... डबल लाइट हो गया हूँ... *मेरे कान अव्यक्त बापदादा की मीठी आवाज... उनकी प्यार भरी शिक्षाएं सुनने को लालायित हो रहे हैं...*

 

  *ज्ञान की शीतल तरंगों में मुझ आत्मा को डुबोते हुए ज्ञान सागर बाबा कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे प्यारे बच्चे... कलयुगी दु:ख तपन, कष्टों की दलदल से बाबा निकालने के लिए आये हैं और नवीन सतयुगी संपूर्ण सुखों की दुनिया की रचना करते हैं... जहां तुम अपार सुख पाते हो... *बाबा तुम्हें नॉलेज देकर नयी दुनिया के लायक बना रहे हैं... ज्ञान की इन पॉइंट्स का मन ही मन मनन चिंतन करते रहो... व दूसरों को भी यह ज्ञान सुनाते रहो..."*

 

_ ➳  *बाबा के मीठे बोल सुनकर गदगद होती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणेश्वर मीठे बाबा... आप का हम बच्चों से कितना प्यार है जो आप हमें हमारे कष्टों से छुड़ाने के लिए कितनी मेहनत करते हैं... *आप हमें रूहानी ज्ञान रत्न देते हैं... बाबा मैं आपकी शिक्षाओं का स्वरुप बनती जा रही हूँ...  ज्ञान की हर पॉइंट पर मनन कर रही हूँ... तथा यह ज्ञान सभी तक पहुंचा रही हूँ..."*

 

  *ज्ञान रुपी स्वाति नक्षत्र की बूंदें बरसाकर मुझे बहुमूल्य मोती बनाने वाले बाबा कहते हैं:-* "मीठे मीठे फूल बच्चे... बाबा जो तुम्हें ज्ञान देते हैं... जो तुम्हे समझानी देते हैं... उसे तुम औरो को समझाने की सर्विस करते रहो... *ज्ञान धन का दान करते रहो... इससे तुम्हे अपार खुशी रहेगी... सर्व की आशीर्वाद मिलेगी और बाबा की याद भी भूलेगी नहीं... निरंतर एक की लगन में मगन रहेंगे..."*

 

_ ➳  *ज्ञान सागर के ज्ञान को सर्वत्र फैलाती हुई ज्ञान गंगा रूपी मैं आत्मा कहती हूँ:-* "नयनों के नूर मीठे बाबा... आपके स्नेह और उपकारों को याद करते-करते मेरी आंखें नम हो जाती है... बाबा आपके इन ज्ञान रत्नों का मैं सभी आत्मा सभी को दान कर रही हूँ... अपार खुशी का अनुभव कर रही हूँ... इस *सर्विस में बिजी रहने से व्यर्थ से किनारा हो गया है... और मैं आत्मा निरंतर एक की ही याद में मगन होकर झूम रही हूँ..."*

 

  *ज्ञान रत्नों से मुझे मालामाल बनाने वाले रत्नागर बाबा कहते हैं:-* "मेरे प्यारे प्यारे बच्चे... ज्ञान दिए धन न खुटे... इस ज्ञान धन की विशेषता है... जितना दान करोगे, उतना बढ़ता ही जाएगा... साथ ही खुशी का पारा भी चढ़ता जाएगा... *औरों की आशीर्वाद तुम्हारे सिर पर होगी... वे कहेंगे ऐसे पण्डे पर हम बलिहार जाएं... जिसने हमें स्वर्ग का रास्ता बताया... ज्ञान दान से तुम्हें सर्व की दुआयें और स्नेह मिलता रहेगा..."*

 

_ ➳  *ज्ञान रूपी सच्चे मोती को चुगने वाली मैं हँसबुद्धि आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे दिलाराम मीठे बाबा... *मैं आत्मा आपके संदेश को विश्व में सभी आत्माओं तक पहुंचाने की सेवा कर रही हूँ... ज्ञान दान से यह ज्ञान धन बढ़ता ही जा रहा है...* और मैं आत्मा खुशी के झूले में झूल रही हूँ... *सर्व आत्माओं की मुझे दुआयें, स्नेह और सहयोग मिल रहा है...* सभी के दिलों में एक बाप की प्रत्यक्षता हो रही है... शुक्रिया बाबा, शुक्रिया..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- यज्ञ सेवा में हड्डियां देनी हैं*"

 

_ ➳  कर्मयोगी बन कर्म करते करते मैं बाबा के गीत सुन रही हूं। तभी गीत में एक पंक्ति आती हैं:- "बच्चो में संकल्प जो आये, वरदाता ही भागे आये"। गीत की इन पंक्तियों को सुनते ही मन में अपने शिव पिता परमात्मा से मिलने का संकल्प उतपन्न हो उठता है और *अपने शिव पिता परमात्मा से मिलने की इच्छा मन मे लिए, अशरीरी स्थिति में स्थित हो कर, मैं अपने मन बुद्धि को अपने शिव पिता परमात्मा पर एकाग्र करके उन्हें अपने पास आने का आग्रह करती हूं* और देखती हूँ परमधाम से एक चमकता हुआ ज्योतिपुंज नीचे की ओर आ रहा हैं जिसमे से अनन्त शक्तियों की किरणें निकल - निकल कर चारों और फैल रही हैं।

 

_ ➳  धीरे - धीरे वह ज्योतिपुंज सूक्ष्म लोक में पहुंच कर ब्रह्मा तन में प्रवेश कर जाता है और कुछ ही क्षणों में मैं अपने परमप्रिय परम पिता परमात्मा को उनके आकारी रथ के साथ अपने सम्मुख पाती हूँ। अब मैं देख रही हूं बापदादा को अपने सामने। *उनके आने से वायुमण्डल में चारों ओर जैसे एक रूहानी मस्ती छा गई है। उनसे आ रही शक्तिशाली किरणे मुझ पर पड़ रही है और उन शक्तिशाली किरणों का औरा मुझे विदेही स्थिति का अनुभव करवा रहा है*। मेरा साकार जैसे जड़ हो गया है और उसमें से एक लाइट का सूक्ष्म आकारी शरीर बाहर निकल आया है।

 

_ ➳  अपने इस सूक्ष्म आकारी लाइट के फरिश्ता स्वरूप में मैं स्वयं को बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूँ। बापदादा बड़े प्यार से मुस्कराते हुए अपना हाथ मेरी और बढ़ा रहे हैं। बाबा के हाथ मे जैसे ही मैं अपना हाथ रखती हूं।बाबा मेरा हाथ थाम कर मुझे इस साकारी दुनिया से लेकर दूर चल पड़ते हैं। *हर प्रकार की भीड़ - भाड़ से अलग एक बहुत बड़े खुले स्थान पर बाबा मुझे ले आते हैं। बड़े प्यार से मैं बाबा को निहारते हुए इस अलौकिक मिलन का आनन्द ले रही हूं*। तभी अचानक मैं देखती हूँ वो पूरा खुला स्थान जैसे एक बहुत बड़ा कुंड है और उस कुंड में अग्नि की विशाल लपटे निकल रही हैं जो आसमान को छू रही हैं। हैरान हो कर मैं बाबा की ओर देखती हूँ।

 

_ ➳  बाबा मेरा हाथ थामे मुझे उस कुंड के बिल्कुल नजदीक ले आते हैं। मनमनाभव का मंत्र दे कर बाबा मुझे उस स्थिति में स्थित करके, अपनी शक्तिशाली किरणे मुझ पर प्रवाहित करने लगते हैं। *मैं देख रही हूं बाबा के मस्तक से, बाबा की दृष्टि से शक्तियों की जवालस्वरूप धाराओं को निकलते हुए*। इन जवालस्वरूप धाराओं रूपी योग अग्नि से निकल रही ज्ञान और योग की पावन किरणे अब मुझ पर पड़ रही हैं और मेरे अंदर से 5 विकारों के भूत एक - एक करके बाहर निकल रहें हैं और इस योग अग्नि में जल कर स्वाहा हो रहें हैं। *इन भूतों के स्वाहा होते ही मेरा स्वरूप जैसे बदल रहा है*। मैं दैवी गुणों से सम्पन्न होने लगा हूँ।

 

_ ➳  अब मेरे मन की सारी दुविधा मिट चुकी है। मैं जान गई हूं कि यह विशाल कुंड बेहद का रुद्र ज्ञान यज्ञ है जो परमात्मा ने स्वयं आ कर रचा है। *इस रुद्र ज्ञान यज्ञ से प्रज्ज्वलित होने वाली विनाश ज्वाला में सारी पुरानी दुनिया, पुराने संस्कार जल कर भस्म हो जाएंगे और उसके बाद नया दैवी स्वराज्य स्थापन हो जाएगा*। जहां सभी दैवी गुण वाले मनुष्य अर्थात देवी देवताओं का राज्य होगा। लेकिन देवी देवताओं की इस दुनिया के आने से पहले परमात्मा द्वारा रचे इस रुद्र ज्ञान यज्ञ की सम्भाल करना मेरी जिम्मेवारी है। इस जिम्मेवारी को पूरा करने के लिए मैं फ़रिशता अब अपने ब्राह्मण स्वरूप में लौट आता हूँ।

 

_ ➳  बाबा की श्रीमत पर चल कर, बाबा द्वारा रचे इस अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ की बड़े प्यार से और सच्चे दिल से संभाल करना ही अब मेरे इस ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य है। और इस लक्ष्य को पाने के लिये अब मैं अपना तन - मन - धन ईश्वरीय यज्ञ में लगा कर सम्पूर्ण समर्पण भाव इस यज्ञ को चलाने के निमित बन गई हूं। *परमात्मा बाप द्वारा रचे हुए इस अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ में सहयोगी बनने के लिए बाप से मैंने जो पवित्रता की प्रतिज्ञा की है उस प्रतिज्ञा को मन, वचन, कर्म से पूरा करने के पुरुषार्थ में अब मैं सदा तत्पर रहती हूं*। मनसा-वाचा-कर्मणा अपवित्रता का अंश भी मुझमे ना आये इस बात पर पूरा अटेंशन देते हुए, यज्ञ रक्षक बन यज्ञ की सच्चे दिल से मैं सम्भाल कर रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं तीसरा, ज्वालामुखी नेत्र खुला रख कर माया को शक्तिहीन बनाने वाली शक्तिशाली आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं निश्चयबुद्धि बन कमजोर संकल्पों की जाल को समाप्त करने वाली सफलता सम्पन्न आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳   बापदादा को राजी करना बहुत सहज है। बापदादा को राजी करने का सहज साधन है 'सच्ची दिल'। *सच्ची दिल पर साहेब राजी है। हर कर्म में सत्यवादी।* सत्यता महानता है। *जो सच्ची दिल वाला हैवह सदा संकल्प, वाणी और कर्म में, सम्बन्ध-सम्पर्क में राजयुक्त होगा* अर्थात् राज को समझ करने वालेचलने वालेऔर हम कहाँ तक राजयुक्त हैं - उसको परखने की निशानी है - *अगर राज जानता है तो वह कभी भी अपने स्व-स्थिति से नाराज नहीं होगा* अर्थात् दिलशिकस्त नहीं होगा और *संकल्प में भी, वृत्ति से भीस्मृति से भी, दृष्टि से भी किसी को नाराज नहीं करेगा,* क्योंकि वो सबके वा अपने संस्कार-स्वभाव को जानने वाला राजयुक्त है। तो *बाप को राजी करने की विधि है - राजयुक्त चलना और राजयुक्त अर्थात् न अपने अन्दर नाराजगी आयेन औरों को नाराज करे।*   

 

✺   *ड्रिल :-  "राजयुक्त होकर बापदादा को सहज राजी करना"*

 

 _ ➳  इस साकार लोक में... अपने कर्म क्षेत्र के... सभी कार्यों को समाप्त कर... मैं आत्मा इस संगमयुग की... सुहानी बेला के शुभचिंतन में खो गई हूँ... स्नेह सागर और नदियों के संगम में... खुशियों भरे... मौज मनाने वाले... मेले का आनंद ले रही हूँ... बापदादा के संग मिलन मेले का श्रेष्ठ भाग्य... अनुभव कर हर्षित हो रही हूँ... स्नेह सुधा बरसाते हुए मेरे बाबा... मुझे भी अपने समान स्नेही बना कर... धन्य धन्य कर रहे हैं... बापदादा से... *कभी सूर्य समान उज्जवल... शक्तिशाली किरणें लेती हुई... कभी चंद्रमा जैसी शीतल चांदनी लेती हुई...* मैं आत्मा अपने श्रेष्ठ भाग्य के गीत गाती ही जा रही हूँ...

 

 _ ➳  मुझ सच्ची दिल वाली... स्नेही आत्मा ने... दिलाराम बाप को राजी कर लिया है... *दिलाराम बाप... इस सच्ची दिल में... याद के रूप में... सदा के लिए ठहर गए हैं...* सदा ही बाप के साथ का अनुभव करती हुई... स्वयं को बाप के समीप अनुभव कर रही हूँ... मैं आत्मा फरिश्ता स्वरुप में... स्नेह के सागर से... मिलन मनाने के... उमंग-उत्साह में उड़ती और उड़ाती ही रहती हूँ...

 

 _ ➳  हर कर्म सत्यता से करती हुई... मैं सत्यवादी आत्मा... अपने बाबा की दिलतख्तनशीन बन गई हूँ... सत्यता महानता है... सदा संकल्प... वाणी और कर्म में... सत्यता की शक्ति धारण करके... *सर्व के साथ सत्यता से... सभ्यतापूर्वक... स्नेह व सम्मान से व्यवहार कर रही हूँ... स्वस्थिति को श्रेष्ठ बना कर...* सर्व का सम्मान... सहज ही प्राप्त करती जा रही हूँ...

 

 _ ➳  *ड्रामा के... सृष्टि चक्र के... राज़ को जान कर... समझकर... निश्चिंत हो गई हूँ...* साक्षीपन की स्थिति में रहकर... हर परिस्थिति के खेल को देख रही हूँ... देख कर आनंदित हो रही हूँ... समय के राज़ को जान कर... हर धोखे से स्वयं को बचा लिया है... अचल अडोल अवस्था से... नम्रतापूर्वक... संबंध संपर्क में आने वाली... हर आत्मा की पालना... बहुत ही स्नेह से... शांति से कर रही हूँ...

 

 _ ➳  स्मृति स्वरूप बन कर... सृष्टि चक्र समझ कर... अपने पार्ट को देखते हुए.. आनंदविभोर हो रही हूँ... हर्षित हो रही हूँ... दूसरी आत्माओं के संस्कार स्वभाव को भी जान कर... अपना पार्ट कुशलता से बजा रही हूँ... मुझ एकरस स्थिति वाली आत्मा के... वाणी व्यवहार से... हर दूसरी आत्मा... संतुष्ट व हर्षित दिखाई दे रही है... श्रेष्ठ स्वस्थिति द्वारा... विश्व में स्नेह व शांति का... प्रकंपन देते हुए... विश्व सेवा करती जा रही हूँ... *मेरे प्यारे बापदादा भी... मुझ सच्ची दिल वाली... राजयुक्त आत्मा पर... सहज ही राज़ी हैं...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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