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 12 / 01 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बहुत बहुत क्षीर खंड होकर रहे ?*

 

➢➢ *किसी भी देहधारी की स्तुति तो नहीं की ?*

 

➢➢ *अपने अव्यक्त शांत स्वरुप द्वारा वातावरण को अव्यक्त बनाया ?*

 

➢➢ *सम्पूरण सत्यता को अपनाया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अगर संकल्प शक्ति कन्ट्रोल में नहीं आती तो अशरीरी भव का इन्जेक्शन लगा दो। बाप के पास बैठ  जाओ। तो संकल्प शक्ति व्यर्थ नहीं उछलेगी।* अभी व्यक्त में रहते अव्यक्त में उड़ते रहो। उड़ना सीखो। सदा अव्यक्त वतन में विदेही स्थिति में उड़ते रहो, अशरीरी स्टेज पर उड़ते रहो।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कदम में पदमों की कमाई जमा करने वाली विशेष आत्मा हूँ"*

 

  सदा हर कदम में पदमों की कमाई जमा करने का साधन है। *हर कदम में अपने को विशेष आत्मा समझो, तो जैसी स्मृति होगी वैसी स्थिति स्वत: हो जायेगी। कर्म भी विशेष हो जायेंगे। तो सदा यह स्मृति रहे कि मैं विशेष आत्मा हूँ क्योंकि आप ने अपना बना लिया।* इससे बड़ी विशेषता और क्या हो सकती है?

 

  *भगवान के बच्चे बन जाना, यह सबसे बड़ी विशेषता है। सदा इसी स्मृति में रहना अर्थात् पदमों की कमाई जमा करना। किसके बने और क्या बने हैं यह भी याद रखो ते कमाई होती रहेगी।*

 

  *विश्व के आत्माओंकी निगाह आपके ऊपर है, इतनी ऊंचे ते ऊंची आत्माएं हो, तो सदा हर पार्ट बजाने, उठते, बैठते, चलते इस स्मुति मे रहो कि हम स्टेज पर पार्ट बजा रहे हैं। यह ब्राह्मण जीवन है ही आदि से अन्त तक स्टेज के ऊपर पार्ट बजाने वाले।* जब सदा यह स्मृति रहेगी कि मैं बेहद विश्व की स्टेज पर हूँ तो स्वत: हर कर्म के ऊपर अटेन्शन रहेगा। इतना अटेन्शन रखकर कर्म करेंगे तो कमाई जमा होती रहेगी।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जो बापदादा ने अभ्यास सुनाया, मन सेकण्ड में एकाग्र हो जाए, क्योंकि *समस्या अचानक आती है और उसी समय अगर मनोबल है, तो समस्या समाप्त हो जाती है* लेकिन समस्या एक पढाई पढाने वाली बन जाती है।

 

✧  *इसलिए सभी मन-बुद्धि को अभी-अभी एकाग्र करो।* देखो होता है। (बापदादा ने ड़ि्ल कराई) *ऐसे सारे दिन में अभ्यास करते रहो।* अच्छा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *साइलेंस पॉवर प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  अब तक वाणीमूर्त बने हो फिर बनेंगे साक्षात्कार मूर्त। अभी *वाणी से औरों को साक्षात्कार होता है लेकिन फिर होगा सायलेन्स से साक्षात्कार।* जब बनेंगे तो सभी के मुख से क्या निकलेगा? यह जो गायन है ना कि सभी परमात्मा के रूप हैं, यह गायन संगम पर ही प्रैक्टिकल में होता है। भक्तिमार्ग में जो भी बातें चली हैं वह संगम की बातों को मिक्स किया है। *तुम्हारी अन्त में यह स्थिति आती है, जो सभी में साक्षात् बापदादा की मूर्त महसूस होगी।*

〰✧  आजकल साइंस वाले भी विस्तार को समेटने का ही पुरुषार्थ कर रहे हैं। *साइन्स पावर वाले भी तुम सायलेंस की शक्ति वालों से कॉपी करते हैं।* जैसे-जैसे साइलेंस की शक्ति सेना पुरुषार्थ करती है वैसा ही वह भी पुरुषार्थ कर रहे हैं।
साइलेन्स पावर पहले साइलेंस की शक्ति सेना इन्वेन्शन करती है फिर साइंस अपने रूप से इन्वेन्शन करती है। *जैसे-जैसे यहाँ रिफाइन होते जाते हैं वैसे ही साइंस भी रिफाइन होती जाती है।*

〰✧  जो बातें पहले उन्हों को भी असम्भव लगती थी वह अब सम्भव होती जा रही हैं। वैसे ही यहाँ भी असम्भव बातें सरल और सम्भव होती जाती है। *अब मुख्य पुरुषार्थ यही करना है कि आवाज में लाना जितना सहज है उतना ही आवाज से परे जाना सहज हो।* इसको ही सम्पूर्ण स्थिति के समीप की स्थिति कहा जाता है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- बहुत समय के बाद फिर से बाप से मिलना"

 

_ ➳ जब से बाबा मिला हैं... जीवन जैसे मधुर रागिनी सा बन गया हैं... कांटो की शैया... फूलों की सेज बन गई हैं... मायूस दिन खुशियों के खजाने में परिवर्तित हो गए हैं... कदम कदम पर बाबा का साथ और सिर्फ शिवबाबा की श्रीमत पर चल... मैं आत्मा रूहानी अमीर बन गई हूँ... ज्ञान रत्नों से बाबा ने मेरी झोली भर दी हैं... खुशियों के ख़जाने को उभरता हुआ देख मैं आत्मा... भावविभोर होकर पहुँचती हूँ पांडव भवन में... जहाँ मेरे बाबा को आवाज देना नहीं पड़ता हैं... उनकी प्रत्यक्षता स्वतः ही हो जाती हैं... ऐसे मेरे बाबा से मिलने उड़ करके पहुँच गई हूँ... बाबा की कुटिया में...

 

दुःखो का सौदा खुशियों में करने वाले मेरे सौदागर बाबा ने मुझ आत्मा को सुखों से नवाजते हुए कहा:- "मेरी प्यारी फूल बच्ची... मैं आया हूँ... ज्ञान रत्नों से झोली भरने तेरी... देख तेरा दामन श्रीमत की पालना से जगमगा रहा हैं... मुझ एक बाप की यादों में अपने सतयुगी भविष्य को महफूज़ करने वाली सौभाग्यशाली आत्मा हो... स्थूल ख़ज़ानों के मोह से परे... ज्ञानी तू महान आत्मा हो..."

 

_ ➳ अपने बाबा का हाथ मेरे सर पर रखती मैं आत्मा भीगी नयनों से उन्हें निहारती कहती हूँ:- "मेरे प्यारे बाबा... खुद को भूली तभी तो तुझे जान पाई हूँ... तू तो हर स्वास में समाया हैं... तेरा प्यार तेरा दुलार कैसे कोई भूल पाता हैं... उंगली पकड़ कर चलना जो तूने सिखाया... खुद को मिटा कर... तुझ में समाने लगी हूँ... आप समान बनाने वाली तेरी श्रीमत को... पलकों में बिठाया हैं..."

 

मंद मंद मुस्कुराते मेरे बाबा अपने हाथों से मुझ आत्मा को विजयी भव का तिलक लगाके कहते हैं:- "मेरी सच्चा सोना बच्ची... पास विद ऑनर का सर्टिफिकेट लेने वाली कोटो में कोई ब्राह्मण आत्मा हो... श्रीमत पर संग संग चलने वाली मेरा साया हो तुम... ज्ञान रत्नों को दामन में सजा कर दान करने वाली महादानी आत्मा हो... पवित्र फूलों की खुशबू से सजी... पवित्रता की देवी... मेरे दिलतख्तनशींन हों..."

 

_ ➳ परमात्म गोद मे पली में खुशनसीब आत्मा बाबा के प्यार में रंगी रंगबिरंगी रंगों को बिखेरती बाबा से कहती हूँ:- "मेरे रूहानी पिता... मुझ को अपने वर्से की अधिकारी बनाकर... मालामाल कर दिया... पालना श्रीमत की... स्वराज्य अधिकारी बना रहा... रूहानी रंग में तरबतर मैं आत्मा... खुद को भूल आप की ही यादो में खोई रहती हूँ... गुणों की खान मेरे बाबा आप ने मुझ को भी गुणाधिकारी बना दिया हैं..."

 

नयनों से शक्तियो रूपी किरणों की बौछार करते मेरे बाबा मुझे पल पल अपने होने का अहसास दिलाकर मुझसे कह रहे हैं:- "मेरी राजदुलारी लाडली बच्ची... नयनों की नूर... मैं आया ही हूँ... दूर देश से... स्वराज्य अधिकार दिलाने... अपने सिकीलधे बच्चों से मिलने... कल्प के बिछुड़े बच्चों से मिलने... ज्ञान गुणों से श्रृंगार करने... श्रीमत पे चल सच्चा सोना बनाने... ज्ञान... गुण... शक्तियो का स्वयंवर रचने..."

 

_ ➳ अपने भाग्य की रेखा को अपने हाथों बनता महसूस करती मैं आत्मा अपने स्वराज्य अधिकारी पद को इमर्ज होता देख बाबा से कहती हूँ:- "बागबाँ मेरी जीवन बगिया के... आप का कोटि बार शुक्रिया जो आपने अपना बनाया... अपनी श्रीमत की पालना के हकदार बनाया... ज्ञान...गुण... शक्तियों की वारिस हकदार बनाया... जीवन को गुल गुल बनाने वाले मेरे पिता... तेरी श्रीमत इस संगमयुग में हीरे तुल्य हैं... बाबा से ज्ञान रत्नों से झोली भर मैं आत्मा वापिस अपने स्थूल देह में प्रवेश करती हूँ..."

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- किसी भी देहधारी की स्तुति नही करनी है*"

 

_ ➳  इस नश्वर देह और इस देह से जुड़ी हर वस्तु के चिंतन से मैं जैसे ही अपने मन बुद्धि को हटा कर अपने वस्तविक सत्य स्वरूप के बारे में विचार करती हूँ तो मन बुद्धि स्वत: ही मेरे उस सत्य स्वरूप पर एकाग्र होने लगते है और मैं मन बुद्धि के दिव्य नेत्रों से अपने उस अति सुंदर स्वरूप को देख कर आनन्द विभोर हो उठती है। *आहा! कितना सुंदर, चमकता हुआ, जगमग करता हुआ, दिव्य ज्योतिर्मय स्वरूप है मेरा*। अपने इस अति सुन्दर सलौने स्वरूप को मैं ज्ञान के दिव्य चक्षु से देख रही हूँ और इसमें समाये अपने सातों गुणों और अष्ट शक्तियों का गहराई तक अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  मैं देख रही हूँ मुझ आत्मा के सातों गुण सतरंगी किरणों के रूप में चारों ओर फैल कर अपनी अद्भुत छटा बिखरते हुए आस पास के वायुमण्डल को भी सतोगुणी बना रहे हैं। *किरणों का प्रवाह मुझ आत्मा से मेरे पूरे शरीर मे होता हुआ अब धीरे - धीरे बाहर तक फैलने लगा है*। एक दिव्य आलौकिक रूहानी मस्ती चारों और फैलती जा रही है। *चारों और अपने गुणों की किरणें फैलाता हुआ मुझे मेरा यह सतोगुणी स्वरूप एक सतरंगी खिले हुए रूहे गुलाब की तरह दिखाई दे रहा है जिसमे से निकल रही रूहानियत की खुशबू पूरे वायुमण्डल को रूहानी सुगन्ध से भर रही है*।

 

_ ➳  ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे मैं किसी सुगन्धित फूंलो के खिले हुए उपवन में पहुँच गई हूँ जहां चारों ओर फैली दिव्यता मन बुद्धि को दिव्य बना कर, *देह और देह की दुनिया से किनारा कराए, उस दिव्य लोक की ओर ले कर जा रही है जो मुझ आत्मा का वास्तविक घर है, मेरे पिता परमात्मा का घर है*। जहां से मैं आत्मा अपने सत्य स्वरूप के साथ सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने के लिए आई थी और पार्ट बजाते - बजाते अपने सत्य स्वरूप को ही भूल गई थी। किन्तु मेरे शिव पिता परमात्मा ने आ कर मुझे मेरा वास्तविक परिचय दे कर मुझे मेरे उस सत्य स्वरूप का अनुभव करवा दिया।

 

_ ➳  अपने उस सत्य स्वरूप का अनुभव अपने घर में, अपने शिव पिता परमात्मा के सम्मुख करने के लिए मैं आत्मा अब अपने घर परमधाम की ओर चल पड़ती हूँ। मन बुद्धि के विमान पर सवार हो कर सेकण्ड में मैं आकाश को पार कर जाती हूँ और उससे भी परें अपने परमधाम घर में पहुँच जाती हूँ अपने शिव परम पिता परमात्मा के पास। *बीजरूप शिव पिता की मास्टर बीजरूप सन्तान मैं आत्मा स्वयं को देख रही हूँ आत्माओं की अति सुंदर निराकारी दुनिया में*। मेरे सामने बिंदु रूप में मेरे शिव पिता परमात्मा और उनके सामने मैं बिंदु आत्मा। कितना सुखद दृश्य हैं। बिंदु बाप और बिंदु बच्चे का यह मंगल मिलन चित को चैन और मन को आराम दे रहा है ।

 

_ ➳  5 तत्वों के पार लाल सुनहरी प्रकाश से प्रकाशित यह दुनिया कितनी निराली और असीम शांति से भरपूर करने वाली है। चारों और गहन शांति ही शांति का अनुभव हो रहा है। संकल्पो की हलचल मात्र भी यहां नही है। *इस बीजरूप अवस्था में अपने ओरिजनल स्वरूप में स्थित हो कर अपने बीज रूप परमात्मा बाप के सानिध्य में मैं अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ* । बीजरूप बाबा से आती सर्वशक्तियों रूपी किरणों की बौछारें मुझे असीम बल प्रदान कर रही हैं। बाबा से आती सर्वशक्तियों को स्वयं में समाकर मैं शक्तियों का पुंज बन गई हूँ और बहुत ही शक्तिशाली स्थिति का अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  शक्ति स्वरूप स्थिति में स्थित हो कर अब मैं पुनः लौट रही हूँ जीवात्माओं की साकारी दुनिया में। फिर से अपने साकार तन में, साकार दुनिया मे, साकार सम्बन्धो के बीच अपने ब्राह्मण स्वरुप में मैं स्थित हूँ। *देह और देह की दुनिया मे रह कर मैं अपना पार्ट बजा रही हूँ*। किन्तु देह और देहधारियों के बीच में रहते हुए भी अपने सत्य स्वरूप में टिक कर अपनी दिव्यता और रूहानियत का अनुभव मुझे इस नश्वर दुनिया से वैराग्य दिला रहा है। स्वयं को मैं इस दुनिया से उपराम अनुभव कर रही हूँ। *बुद्धि को देहधारियों से निकाल, अपने सत्य स्वरूप में अपने सत्य बाप के साथ सर्व सम्बन्धों का सुख लेते हुए मैं हर पल अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं अपने अव्यक्त शान्त स्वरूप द्वारा वातावरण को अव्यक्त बनाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं साक्षात मूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव संपूर्ण सत्यता को धारण करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा पवित्रता का आधार लेती हूँ  ।*

   *मैं पवित्र आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳   बापदादा को राजी करना बहुत सहज है। बापदादा को राजी करने का सहज साधन है 'सच्ची दिल'। *सच्ची दिल पर साहेब राजी है। हर कर्म में सत्यवादी।* सत्यता महानता है। *जो सच्ची दिल वाला हैवह सदा संकल्प, वाणी और कर्म में, सम्बन्ध-सम्पर्क में राजयुक्त होगा* अर्थात् राज को समझ करने वालेचलने वालेऔर हम कहाँ तक राजयुक्त हैं - उसको परखने की निशानी है - *अगर राज जानता है तो वह कभी भी अपने स्व-स्थिति से नाराज नहीं होगा* अर्थात् दिलशिकस्त नहीं होगा और *संकल्प में भी, वृत्ति से भीस्मृति से भी, दृष्टि से भी किसी को नाराज नहीं करेगा,* क्योंकि वो सबके वा अपने संस्कार-स्वभाव को जानने वाला राजयुक्त है। तो *बाप को राजी करने की विधि है - राजयुक्त चलना और राजयुक्त अर्थात् न अपने अन्दर नाराजगी आयेन औरों को नाराज करे।*   

 

✺   *ड्रिल :-  "राजयुक्त होकर बापदादा को सहज राजी करना"*

 

 _ ➳  इस साकार लोक में... अपने कर्म क्षेत्र के... सभी कार्यों को समाप्त कर... मैं आत्मा इस संगमयुग की... सुहानी बेला के शुभचिंतन में खो गई हूँ... स्नेह सागर और नदियों के संगम में... खुशियों भरे... मौज मनाने वाले... मेले का आनंद ले रही हूँ... बापदादा के संग मिलन मेले का श्रेष्ठ भाग्य... अनुभव कर हर्षित हो रही हूँ... स्नेह सुधा बरसाते हुए मेरे बाबा... मुझे भी अपने समान स्नेही बना कर... धन्य धन्य कर रहे हैं... बापदादा से... *कभी सूर्य समान उज्जवल... शक्तिशाली किरणें लेती हुई... कभी चंद्रमा जैसी शीतल चांदनी लेती हुई...* मैं आत्मा अपने श्रेष्ठ भाग्य के गीत गाती ही जा रही हूँ...

 

 _ ➳  मुझ सच्ची दिल वाली... स्नेही आत्मा ने... दिलाराम बाप को राजी कर लिया है... *दिलाराम बाप... इस सच्ची दिल में... याद के रूप में... सदा के लिए ठहर गए हैं...* सदा ही बाप के साथ का अनुभव करती हुई... स्वयं को बाप के समीप अनुभव कर रही हूँ... मैं आत्मा फरिश्ता स्वरुप में... स्नेह के सागर से... मिलन मनाने के... उमंग-उत्साह में उड़ती और उड़ाती ही रहती हूँ...

 

 _ ➳  हर कर्म सत्यता से करती हुई... मैं सत्यवादी आत्मा... अपने बाबा की दिलतख्तनशीन बन गई हूँ... सत्यता महानता है... सदा संकल्प... वाणी और कर्म में... सत्यता की शक्ति धारण करके... *सर्व के साथ सत्यता से... सभ्यतापूर्वक... स्नेह व सम्मान से व्यवहार कर रही हूँ... स्वस्थिति को श्रेष्ठ बना कर...* सर्व का सम्मान... सहज ही प्राप्त करती जा रही हूँ...

 

 _ ➳  *ड्रामा के... सृष्टि चक्र के... राज़ को जान कर... समझकर... निश्चिंत हो गई हूँ...* साक्षीपन की स्थिति में रहकर... हर परिस्थिति के खेल को देख रही हूँ... देख कर आनंदित हो रही हूँ... समय के राज़ को जान कर... हर धोखे से स्वयं को बचा लिया है... अचल अडोल अवस्था से... नम्रतापूर्वक... संबंध संपर्क में आने वाली... हर आत्मा की पालना... बहुत ही स्नेह से... शांति से कर रही हूँ...

 

 _ ➳  स्मृति स्वरूप बन कर... सृष्टि चक्र समझ कर... अपने पार्ट को देखते हुए.. आनंदविभोर हो रही हूँ... हर्षित हो रही हूँ... दूसरी आत्माओं के संस्कार स्वभाव को भी जान कर... अपना पार्ट कुशलता से बजा रही हूँ... मुझ एकरस स्थिति वाली आत्मा के... वाणी व्यवहार से... हर दूसरी आत्मा... संतुष्ट व हर्षित दिखाई दे रही है... श्रेष्ठ स्वस्थिति द्वारा... विश्व में स्नेह व शांति का... प्रकंपन देते हुए... विश्व सेवा करती जा रही हूँ... *मेरे प्यारे बापदादा भी... मुझ सच्ची दिल वाली... राजयुक्त आत्मा पर... सहज ही राज़ी हैं...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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