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 12 / 02 / 18  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *स्वदर्शन चक्र धारण कर अपने पापों को भस्म किया ?*

 

➢➢ *साक्षातकार की आश तो नहीं रखी ?*

 

➢➢ *स्वयं को निमित समझ व्यर्थ संकल्प व व्यर्थ वृत्ति से मुक्त रहे ?*

 

➢➢ *ज्ञान की शक्ति से शांति का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे बापदादा को रहम आता है, ऐसे आप बच्चे भी मास्टर रहमदिल बन मन्सा अपनी वृत्ति से वायुमण्डल द्वारा आत्माओ को बाप द्वारा मिली हुई शक्तियां दो। *जब थोड़े समय में सारे विश्व की सेवा सम्पन्न करनी है, तत्वों सहित सबको पावन बनाना है तो तीव्र गति से सेवा करो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं संगमयुग की विशेषताओंकी स्मृति द्वारा समर्थ रहने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

✧  सदा अपने को संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें समझते हो? *संगमयुग श्रेष्ठ युग है, परिवर्तन युग है, आत्मा और परमात्मा के मिलन मेले का युग है। ऐसे संगमयुग के विशेषताओंको सोचो तो कितनी हैं। इन्हीं विशेषताओंके स्मृति में रह समर्थ बनो। जैसी स्मृति वैसा स्वरूप स्वत: बन जाता है।*

 

  तो सदा ज्ञान का मनन करते रहो। मनन करने से शक्ति भरती है। अगर मनन नहीं करते, सिर्फ सुनते सुनाते तो शक्ति स्वरूप नहीं। लेकिन सुनाने वाले स्पीकर बनेंगे। आप बच्चों के मनन का चित्र भक्ति में भी दिखाया है। कैसे मनन करो वह चित्र याद है! विष्णु का चित्र नहीं देखा है? आराम से लेटे हुए हैं और मनन कर रहे हैं, सिमरण कर रहे हैं। सिमरण कर, मनन कर हर्षित हो रहे हैं। तो यह किसका चित्र है? शैया देखो कैसी है! सांप को शैया बना दिया अर्थात् विकार अधीन हो गये। उसके ऊपर सोया है। *नीचे वाली चीज अधीन होती है, ऊपर मालिक होते हैं। मायाजीत बन गये तो निश्चिंत। माया से हार खाने की, युद्ध करने की कोई चिन्ता नहीं। तो निश्चिन्त और मनन करके हर्षित हो रहे हैं।*

 

  ऐसे अपने को देखो, मायाजीत बने हैं। कोई भी विकार वार न करे। रोज नई नई पाइंट स्मृति में रख मनन करो तो बड़ा मजा आयेगा, मौज में रहेंगे। क्योंकि बाप का दिया हुआ खजाना मनन करने से अपना अनुभव होता है। जैसे भोजन पहले अलग होता है, खाने वाला अलग होता है। लेकिन जब हजम कर लेते तो वही भोजन खून बन शक्ति के रूप में अपना बन जाता है। *ऐसे ज्ञान भी मनन करने से अपना बन जाता, अपना खजाना है यह महसूसता आयेगी।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आप सबको, पुराने बच्चों को मालूम है कि ब्रह्मा बाप ने शुरू-शुरू में क्या अभ्यास किया? एक डायरी देखी थी ना। *सारी डायरी में एक ही शब्द - मैं भी आत्मा, जसोदा भी आत्मा, यह बच्चे भी आत्मा हैं, आत्मा हैं, आत्मा हैं। यह फाउण्डेशन सदा का अभ्यास किया।* तो यह पहला पाठ मैं कौन? इसका बार-बार अभ्यास चाहिए। चेकिंग चाहिए, ऐसे नहीं मैं तो हूँ ही आत्मा।

 

✧  *अनुभव करे कि मैं आत्मा करावनहार बन कर्म करा रही हूँ करनहार अलग है, करावनहार अलग है।* ब्रह्मा बाप का दूसरा अनुभव भी सुना है कि यह कर्मेद्रियाँ, कर्मचारी हैं। तो रोज रात की कचहरी सुनी है ना! तो मालिक बन इन कर्मेन्द्रियों रूपी कर्मचारियों से हालचाल पूछा है ना!

 

✧  तो जैसे ब्रह्माबाप ने यह अभ्यास फाउण्डेशन बहुत पक्का किया, इसलिए जो बच्चे लास्ट में भी साथ रहे उन्होंने क्या अनुभव किया? कि बाप कार्य करते भी शरीर में होते हुए भी अशरीरी स्थिति में चलते-फिरते अनुभव होता रहा। *चाहे कर्म का हिसाब भी चुक्तू करना पडा लेकिन साक्षी हो, न स्वयं कर्म के हिसाब के वश रहे, न औरों को कर्म के हिसाब-किताब चुक्तू होने का अनुभव कराया।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  लौकिक में रहते हुए भी हम, लोगों से न्यारे हैं। अपने को आत्मिक-रूप में न्यारा समझना है। *कर्तव्य से न्यारा होना तो सहज है, उससे दुनिया को प्यारे नहीं लगेंगे, दुनिया को प्यारे तब लगेंगे जब शरीर से न्यारी आत्मा-रूप में कार्य करेंगे।* तो सिर्फ दुनिया की बातों से ही न्यारा नहीं बनना है, *अपने मन के प्रिय, प्रभु-प्रिय और लोक-प्रिय भी बनेंगे। अभी लोगों को क्यों नहीं प्रिय लगते हैं? क्योंकि अपने शरीर से न्यारे नहीं हुए हो। सिर्फ देह के सम्बन्धियों से न्यारे होनी की कोशिश करते हो तो वह उलहने देते - खुद को क्या चेन्ज किया है।* पहले देह के भान से न्यारे नहीं हुए हो, तब तक उलहना मिलता है। *पहले देह से न्यारे होंगे तो उलहने नहीं मिलेंगे, और ही लोकप्रिय बन जायेंगे।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- टीचर विदेही है इसलिए याद की मेहनत करनी है"*

 

_ ➳  *इस रूहानी संगम के तट पर मैं आत्मा नदी सागर बाबा से मिलने यादों में लहराते हुए पहुँच जाती हूँ दिव्य लोक परमधाम में... ज्ञान, गुण, शक्तियों के सागर बाबा से एक होकर उनमे समा जाती हूँ... ये देह, देह की दुनिया, वस्तु, वैभव सबकुछ भूल एक विदेही बाबा में खो जाती हूँ...* मीठे बाबा मुझे अपनी गोद में लेकर पूरे ब्रह्माण्ड की सैर कराते हुए अव्यक्त वतन में श्वेत चमकीले बादलों के सिहांसन पर बिठाकर मीठी मीठी शिक्षाओं की बौछारें करते हैं...

 

   *सुहानी यादों के झूले में झुलाते प्यार का समंदर बहाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... खुबसूरत चमकती मणि आत्मा हो,देह नही हो... इसलिए इस देहभान से मुक्त हो, अपने अविनाशीपन के नशे में खो जाओ... *अब इस देह के आवरण से बाहर निकल, अशरीरी आत्मा के स्वमान में आओ... और पिता तुल्य देही अभिमानी हो, साथी बन घर साथ चलो..."*

 

_ ➳  *देहभान को छोडकर यादों के पंख लगाकर एक बाबा से ही दिल लगाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... *मैं आत्मा अपने सत्य स्वरूप की चमक में डूबती जा रही हूँ... मीठे बाबा आपके प्यार की गहराइयो में खोकर आप समान होती जा रही हूँ... स्वयं के निराकारी और आपके परम् स्वरूप को यादो में बसाकर मन्त्रमुग्ध हो रही हूँ...*

 

   *अपने आँचल में मुझ सितारे को समेटकर देह की दुनिया से न्यारी बनाकर मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... अब यह खेल पूरा होने को है... इसलिये इस देह के मटमैलेपन को आत्मिक स्मृति से मिटाओ... *अपने दमकते सौंदर्य आत्मा मणि को यादो में प्रतिपल तरोताजा कर... बाप समान निराकारी बन जाओ... निराकारी बन मीठे बाबा संग अब घर को चलना है यह मीठी बात हर पल यादो में समालो..."*

 

_ ➳  *देह रूपी सीपी से मुक्त होकर मैं आत्मा मोती बन चमकते हुए कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी यादो में जनमो से खोयी अपनी आत्मिक सुंदरता को पुनः पाकर रोमांचित हो गई हूँ... *आपकी यादो की छत्रछाया में आप समान होती जा रही हूँ... देह के नश्वर आवरण से मुक्त हो, बन्धन मुक्त अवस्था को पाती जा रही हूँ..."*

 

   *प्यारे बाबा मेरे कानों में स्नेह की शहनाई बजाकर मेरी जिंदगी को खुशनुमा बनाते हुए कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... *ईश्वरीय यादो में आत्मिक सौंदर्य से दमक कर, चमकीले बन घर चलने की तैयारी में, हर साँस संकल्प से जुट जाओ... इस पुरानी परायी दुनिया को भूल असली घर के आनन्द में डूब जाओ...* परमधाम से प्यारा पिता जो लेने आया है, तो देह के सारे बन्धन तोड़कर, ख़ुशी ख़ुशी घर की ओर रुख करो..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा कली बाबा की यादों की बाँहों में फूल बन मुस्कुराते हुए कहती हूँ :-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपके प्यार भरी गोद में फूलो सी खिल रही हूँ... अपनी सत्यता को पाकर सच्ची खुशियो को पा रही हूँ... *मीठे बाबा आपके प्यार भरी हथेलियो में पल रही हूँ... और अशरीरी बन बेहद के नशे में खो गयी हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- साक्षात्कार की आश नही रखनी है*"

 

_ ➳  मेरा यह ब्राह्मण जीवन पुरुषार्थी जीवन है जिसमे मुझे तीव्र पुरुषार्थ कर सम्पूर्ण बनने के अपने उस ऊंच लक्ष्य को पाना है जो लक्ष्य मेरे लिए मेरे परम पिता परमात्मा शिव बाबा ने निर्धारित किया है। *अपने उसी ऊंच लक्ष्य को स्मृति में ला कर, ऐसा ऊंच लक्ष्य देने वाले अपने शिव पिता परमात्मा को मैं याद करती हूँ और उनकी मीठी याद का आधार ले कर, ज्ञान और योग के पंख लगा कर मैं आत्मा उड़ने लगती हूँ*। सभी हद के किनारों का सहारा छोड़, सम्पूर्ण निश्चय बुद्धि बन केवल अपने शिव की पिता की याद का सहारा ले कर अब मैं आत्मा जा रही हूँ उनके पास उस निराकारी धाम में जहां देह और देह की दुनिया का कोई बोध नही।

 

_ ➳  आत्माओं की इस निराकारी दुनिया मे मैं देख रही हूँ चारों और चमकती मणियों को जो सितारों की भांति चमक रही हैं। *सामने हैं महाज्योति शिव बाबा जो एक ज्योति पुंज के रूप में सुशोभित हो रहें हैं*। आत्माओं और परमात्मा के मंगल मिलन को मैं मन बुद्धि के नेत्रों से स्पष्ट देख रही हूँ। महाज्योति शिव परम पिता परमात्मा की अनन्त ज्योति के प्रकाश से हर चैतन्य दीपक की चमक तेजी से बढ़ रही है। *ऐसा लग रहा है जैसे कोई बहुत बड़ी दीपमाला है। सामने दीपराज और उनके सामने जगमग करते असंख्य चैतन्य दीपक*। इस खूबसूरत दृश्य को देख मैं मन ही मन आनन्दित हो रही हूँ।

 

_ ➳  गहन आनन्द की अनुभूति करके मैं चैतन्य दीपक अब परमधाम से नीचे फरिश्तो की आकारी दुनिया में प्रवेश करती हूँ। चमकीली फ़रिशता ड्रेस धारण कर मैं बापदादा के सम्मुख पहुंचती हूँ। *बापदादा के अति शोभनीय लाइट माइट स्वरूप को मैं मन बुद्धि के नेत्रों से निहार रही हूँ और साथ ही साथ बापदादा की लाइट माइट को स्वयं में समा कर बापदादा के समान लाइट माइट बन रही हूँ*। बापदादा की लाइट माइट पा कर मेरी चमकीली फ़रिशता ड्रेस और भी चमकीली हो गई है। ऐसा लग रहा है जैसे मेरे अंग - अंग से श्वेत रश्मियां फव्वारा बन कर फूट रही है और चारों और फैलती जा रही हैं।

 

_ ➳  अपने इस अति सुंदर, अति प्रकाशित स्वरूप को देख मैं आनन्द में गदगद हो रही हूँ। अपने इस अति चमकीले, अति प्रकाशवान स्वरूप में मैं अब सूक्ष्म लोक से नीचे साकार लोक की और आ रही हूँ। *मंदिरों, गुरुद्वारों, और अनेक धार्मिक स्थानों के ऊपर से गुजरते हुए मैं भगवान की भक्ति में डूबे भक्तों को देख रही हूँ*। अपने ईष्ट देव और ईष्ट देवी के  साक्षात्कार की आश में कठिन से कठिन उपाय कर रहें हैं। उनके एक दर्शन मात्र के लिए कितने कर्मकांड कर रहें हैं। उनकी इस मनोकामना को पूर्ण करता, उनके इष्ट देव के रूप में उनकी साक्षात्कार की आश को पूरा करता हुआ मैं फ़रिशता अब पहुंच गया साकारी लोक में और अपने अति उज्ज्वल सूक्ष्म फ़रिशता स्वरूप के साथ अपने साकारी शरीर मे प्रवेश कर रहा हूँ।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर अब मैं उन बेचारे भक्तो के बारे में सोच रही हूँ जो इस बात से सर्वथा अनजान है कि भगवान के या इष्ट देव/देवी के साक्षात्कार हो जाना कोई प्राप्ति नही है। *प्राप्ति तो परमात्म पालना में है और वही परमात्म पालना देने के लिए भगवान स्वयं इस धरती पर आए हैं*। अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य पर मुझे शुद्ध अभिमान हो रहा है कि कोटो में कोई, कोई में भी कोई वो सौभाग्यशाली आत्मा हूँ मैं, जिसका हर पल प्रभु प्रेम के पालने में कट रहा है।

 

_ ➳  *साक्षात्कार की मेरे मन मे कोई आश ही नही क्योकि भगवान स्वयं सम्मुख आ कर अपने प्रेम की शीतल छांव में हर पल मुझे झुला रहा है और उसके प्रेम की यही शीतल छांव और परमात्म पालना की अनुभूति मुझे निश्चय बुद्धि बना रही है*। निश्चय बुद्धि बन, अपने पुरुषार्थ को तीव्र कर अब मैं निरन्तर आगे बढ़ती जा रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं स्वयं को निमित्त समझ व्यर्थ संकल्प वा व्यर्थ वृत्ति से मुक्त रहने वाली विश्व कल्याणकारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺  *मैं ज्ञान की शक्ति शांति को धारण करके अज्ञान की शक्ति क्रोध से मुक्त होने वाली शांत आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बापदादा यही चाहते हैं कि *वर्तमान समय प्रमाण लव और ला का बैलेन्स रखना पड़ता है, लेकिन ला और लव का बैलेन्स मिलकरके ला नहीं लगे। ला में भी लव महसूस हो।* जैसे साकार स्वरूप में बाप को देखा। ला के साथ लव इतना दिया जो हरेक के मुख से यही निकलता कि बाबा का मेरे से प्यार है। मेरा बाबा है। ला जरूर उठाओ लेकिन ला के साथ लव भी दो। सिर्फ ला नहीं। सिर्फ ला से कहाँ-कहाँ आत्मायें कमजोर होने के कारण दिलशिकस्त हो जाती हैं। *जब स्वयं आत्मिक प्यार की मूर्ति बनेंगे तब दूसरों के प्यार की, (आत्मिक प्यार, दूसरा प्यार नहीं) आत्मिक प्यार अर्थात् हर समस्या को हल करने में सहयोगी बनना।* सिर्फ शिक्षा देना नहीं, शिक्षा और सहयोग साथसाथ देना - ये है आत्मिक प्यार की मूर्ति बनना। तो आज विशेष बापदादा हर ब्राह्मण आत्मा को, चाहे देश, चाहे विदेश चारों ओर के सर्व बच्चों को यही विशेष अण्डरलाइन करते हैं कि *आत्मिक प्यार की मूर्ति बनो। और आत्माओं के आत्मिक प्यार की प्यास बुझाने वाले दाता-देवता बनो।* ठीक है ना। अच्छा।

 

✺   *ड्रिल :-  "ला में भी लव महसूस करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा लाइट के कार्ब में लाइट के तन में हूँ... मैं बिल्कुल हल्का फरिश्ता हूँ... *मैं स्वयं को सतरंगी प्रकाश की किरणों के बीच देख रही हूँ... मैं जगमगाता दिव्य फरिश्ता सतरंगी किरणों की आभा फैलाते हुए जाती हूँ... सफेद प्रकाश की दुनिया में...*  दिव्य फरिश्तों की यह कितनी प्यारी दुनिया है... चारों ओर अलौकिकता, दिव्यता ही दिव्यता है... आवाज से परे गहन शांति की दुनिया है... यहाँ हर कर्म संकल्पों से हो रहा है... यहाँ मैं फ़रिश्ता सर्व हदों से मुक्त रूहानियत की स्थिति में स्थित हूँ... मेरा सर्व के साथ आत्मिक भाव और आत्मिक चाल चलन है...

 

 _ ➳  मैं फरिश्ता सामने मीठे बापदादा को देख रही हूँ... बाबा की दृष्टि मुझे भरपूर कर रही है... बापदादा मेरे सिर पर बहुत प्यार से हाथ फ़िराते हैं... मुझे वरदानों से भरपूर कर रहे हैं... *बापदादा मुझे 'जगतमाता भव' का वरदान देते हैं... बापदादा से प्राप्त इस श्रेष्ठ स्वमान के अर्थ स्वरुप में मैं स्वयं को स्थित कर रही हूँ...* जगतमाता के स्वमान में टिकते ही मेरे मन में विश्व की सर्व आत्माओं के लिए अपनेपन, रूहानी स्नेह की, निस्वार्थ प्यार की भावना जागृत हो रही है...

 

 _ ➳  जैसे एक माँ बच्चे की हर गलती को क्षमा करती है क्योंकि उसके मन में बच्चे के प्रति निस्वार्थ प्रेम है... इसलिए वह बच्चों की गलतियों के बाद भी उसे निर्मल अगाध स्नेह देती रहती है... ठीक इसी प्रकार *मैं आत्मा निःस्वार्थ भाव से... सभी आत्माओं पर ईश्वरीय स्नेह की... निर्मल स्नेह की वर्षा कर रही हूँ... ईश्वरीय स्नेह में मैं आत्मा डूबती जा रही हूँ... यह ईश्वरीय स्नेह शक्ति का रूप बनता जा रहा है... और मैं आत्मा लव और ला का बैलेंस कर रही हूँ...* नियम मर्यादा के साथ चलते हुए भी... मैं निर्मल स्नेह का झरना बन रही हूँ... जिससे अगाध स्नेह अनवरत रूप से बहता जा रहा है...

 

 _ ➳  ब्रह्मा बाप ने लव और ला का बैलेंस करके दिखाया... जिससे हर एक को बाबा से रूहानी स्नेह की भासना आती थी...हर एक के मुख से, दिल से 'मेरा बाबा' यही बोल निकलते थे... *मैं आत्मा ब्रह्मा बाबा के नक्शे कदम पर चल रही हूँ... मैं सर्व को नि:स्वार्थ प्यार से भरपूर कर रही हूँ... स्नेह की शक्ति पत्थर को भी पिघला सकती है... मैं आत्मिक प्यार की मूरत बनती जा रही हूँ... यह रूहानी स्नेह हर समस्या को सहज ही हल कर रहा है...* इस स्नेह से सर्व आत्माये सहयोगी बनती जा रही हैं...

 

 _ ➳  मैं दिव्य फ़रिश्ता सर्व दैहिक आकर्षणों से मुक्त हूँ... रुहानियत से भरपूर हूँ... *मैं आत्मिक स्नेह का साक्षात स्वरुप हूँ...* स्नेह की इस शक्ति से संपन्न मैं सर्व को समझानी और सहयोग दे रही हूँ... कोरी शिक्षा ही नहीं स्नेह और सहयोग भी दे रही हूँ... आज आत्माएं सच्चे प्यार की तलाश में भटक रही हैं, तड़प रही हैं... उन *भटकती, प्यासी आत्माओं की प्यास बुझाने वाली मैं आत्मिक प्यार की देवी हूँ... मैं दाता का बच्चा सर्व आत्माओं को सच्चे रूहानी, नि:स्वार्थ स्नेह की अनुभूति करा रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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