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 12 / 02 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अपनी कमियों को छिपा स्वयं को ठगा तो नहीं ?*

 

➢➢ *कोई भी काम कायदे के विरुद्ध तो नहीं किया ?*

 

➢➢ *हर कदम फरमान पर चलकर माया को कुर्बान कराया ?*

 

➢➢ *स्वयं के परिवर्तन से अन्य आत्माओं क अपरिवर्तन किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे बापदादा को रहम आता है, ऐसे आप बच्चे भी मास्टर रहमदिल बन मन्सा अपनी वृत्ति से वायुमण्डल द्वारा आत्माओ को बाप द्वारा मिली हुई शक्तियां दो। *जब थोड़े समय में सारे विश्व की सेवा सम्पन्न करनी है, तत्वों सहित सबको पावन बनाना है तो तीव्र गति से सेवा करो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं संगमयुग की विशेषताओंकी स्मृति द्वारा समर्थ रहने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

✧  सदा अपने को संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें समझते हो? *संगमयुग श्रेष्ठ युग है, परिवर्तन युग है, आत्मा और परमात्मा के मिलन मेले का युग है। ऐसे संगमयुग के विशेषताओंको सोचो तो कितनी हैं। इन्हीं विशेषताओंके स्मृति में रह समर्थ बनो। जैसी स्मृति वैसा स्वरूप स्वत: बन जाता है।*

 

  तो सदा ज्ञान का मनन करते रहो। मनन करने से शक्ति भरती है। अगर मनन नहीं करते, सिर्फ सुनते सुनाते तो शक्ति स्वरूप नहीं। लेकिन सुनाने वाले स्पीकर बनेंगे। आप बच्चों के मनन का चित्र भक्ति में भी दिखाया है। कैसे मनन करो वह चित्र याद है! विष्णु का चित्र नहीं देखा है? आराम से लेटे हुए हैं और मनन कर रहे हैं, सिमरण कर रहे हैं। सिमरण कर, मनन कर हर्षित हो रहे हैं। तो यह किसका चित्र है? शैया देखो कैसी है! सांप को शैया बना दिया अर्थात् विकार अधीन हो गये। उसके ऊपर सोया है। *नीचे वाली चीज अधीन होती है, ऊपर मालिक होते हैं। मायाजीत बन गये तो निश्चिंत। माया से हार खाने की, युद्ध करने की कोई चिन्ता नहीं। तो निश्चिन्त और मनन करके हर्षित हो रहे हैं।*

 

  ऐसे अपने को देखो, मायाजीत बने हैं। कोई भी विकार वार न करे। रोज नई नई पाइंट स्मृति में रख मनन करो तो बड़ा मजा आयेगा, मौज में रहेंगे। क्योंकि बाप का दिया हुआ खजाना मनन करने से अपना अनुभव होता है। जैसे भोजन पहले अलग होता है, खाने वाला अलग होता है। लेकिन जब हजम कर लेते तो वही भोजन खून बन शक्ति के रूप में अपना बन जाता है। *ऐसे ज्ञान भी मनन करने से अपना बन जाता, अपना खजाना है यह महसूसता आयेगी।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आप सबको, पुराने बच्चों को मालूम है कि ब्रह्मा बाप ने शुरू-शुरू में क्या अभ्यास किया? एक डायरी देखी थी ना। *सारी डायरी में एक ही शब्द - मैं भी आत्मा, जसोदा भी आत्मा, यह बच्चे भी आत्मा हैं, आत्मा हैं, आत्मा हैं। यह फाउण्डेशन सदा का अभ्यास किया।* तो यह पहला पाठ मैं कौन? इसका बार-बार अभ्यास चाहिए। चेकिंग चाहिए, ऐसे नहीं मैं तो हूँ ही आत्मा।

 

✧  *अनुभव करे कि मैं आत्मा करावनहार बन कर्म करा रही हूँ करनहार अलग है, करावनहार अलग है।* ब्रह्मा बाप का दूसरा अनुभव भी सुना है कि यह कर्मेद्रियाँ, कर्मचारी हैं। तो रोज रात की कचहरी सुनी है ना! तो मालिक बन इन कर्मेन्द्रियों रूपी कर्मचारियों से हालचाल पूछा है ना!

 

✧  तो जैसे ब्रह्माबाप ने यह अभ्यास फाउण्डेशन बहुत पक्का किया, इसलिए जो बच्चे लास्ट में भी साथ रहे उन्होंने क्या अनुभव किया? कि बाप कार्य करते भी शरीर में होते हुए भी अशरीरी स्थिति में चलते-फिरते अनुभव होता रहा। *चाहे कर्म का हिसाब भी चुक्तू करना पडा लेकिन साक्षी हो, न स्वयं कर्म के हिसाब के वश रहे, न औरों को कर्म के हिसाब-किताब चुक्तू होने का अनुभव कराया।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  लौकिक में रहते हुए भी हम, लोगों से न्यारे हैं। अपने को आत्मिक-रूप में न्यारा समझना है। *कर्तव्य से न्यारा होना तो सहज है, उससे दुनिया को प्यारे नहीं लगेंगे, दुनिया को प्यारे तब लगेंगे जब शरीर से न्यारी आत्मा-रूप में कार्य करेंगे।* तो सिर्फ दुनिया की बातों से ही न्यारा नहीं बनना है, *अपने मन के प्रिय, प्रभु-प्रिय और लोक-प्रिय भी बनेंगे। अभी लोगों को क्यों नहीं प्रिय लगते हैं? क्योंकि अपने शरीर से न्यारे नहीं हुए हो। सिर्फ देह के सम्बन्धियों से न्यारे होनी की कोशिश करते हो तो वह उलहने देते - खुद को क्या चेन्ज किया है।* पहले देह के भान से न्यारे नहीं हुए हो, तब तक उलहना मिलता है। *पहले देह से न्यारे होंगे तो उलहने नहीं मिलेंगे, और ही लोकप्रिय बन जायेंगे।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  कमाई का शौक होना"*

 

_ ➳  मधुबन घर में डायमण्ड हॉल में अपने प्यारे बाबा को निहारती हुई मै आत्मा... कभी अपने महान भाग्य को, कभी इस ईश्वरीय मिलन के खुबसूरत समय को... देख रही हूँ... कि जीवन में अनगिनत दुखो की भोगना यूँ पीछे गुजर गयी... और मै आत्मा इस खुबसूरत समय पर भगवान के सम्मुख आ गयी... *इस सुनहरे वक्त ने मुझे ईश्वर से मिलाकर... मेरा भविष्य सुनहरे अक्षरो में लिख दिया है... आज सतयुग मेरे कदमो की आहट लेने को आतुर है... सुख मेरी बाट जोह रहे है.. खुशियां मेरा रास्ता निहार रही है.*.. अमीरी मुझे बाँहों में भर लेने को दीवानी है... सारे दुःख गायब हो गए है और अथाह सुख मेरी नजरो में प्रत्यक्ष हो रहे है... और कह रहे है... मीठे बाबा की यादो में गहरे डूब जाओ... ती हम सजीव बन आपकी सेवाओ में हाजिर है... *वाह... कितना प्यारा यह, मीठे बाबा के साथ भरा समय है.*..

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अमूल्य ज्ञान मणियो से सजाकर कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *ईश्वरीय ज्ञान रत्नों को पाकर, यादो में सच्ची कमाई करने वाले महान भाग्यशाली बनो.*.. संगम के वरदानी समय के हर पल को यादो में सफलकर सच्ची कमाई से भरपूर बनो... ईश्वर के साथ भरा यह मीठा समय... अब व्यर्थ बातो में नही गंवाओ... मीठे बाबा से सारी दौलत खजाने लेकर... सदा की अमीरी से सज जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के प्यार में सारी जागीर की मालिक बनकर कहती हूँ ;-* "मीठे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपकी छत्रछाया में सुखी और अमीर जीवन को पाती जा रही हूँ... *आपको पाकर अब मै आत्मा किसी भी व्यर्थ में स्वयं को उलझाती नही हूँ... बल्कि हर क्षण यादो में खोकर, अपने सारे विकर्मो से मुक्त होती जा रही हूँ.*.. यादो की कमाई करके विश्व की अमीरी को पाती जा रही हूँ ..."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को समय का महत्व समझाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *यही वह कीमती पल है, जिसमे मीठे बाबा को याद करके... अथाह सम्पत्ति और सुख भरा भविष्य अपनी तकदीर में सजा सकते हो.*.. इस सुनहरे समय को साधारण रीति या व्यर्थ में न बिताओ... हर पल याद का निरन्तर अभ्यास कर... स्वयं का महान भाग्य स्वयं लिखो... सच्ची कमाई के पीछे दीवाने होकर जुट जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की श्रीमत को दिल में गहरे उतार कर कहती हूँ ;-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... मै आत्मा देह की और दुखो की दुनिया में जो घिरी तो... अपनी सारी खुशियां गुण और दौलत ही गंवा बेठी... अब आपने आकर मुझे पुनः दौलतमंद और खुशहाल बनने का सारा राज बता दिया है... *मै आत्मा हर साँस आपकी यादो में डूबकर, सच्ची दौलत को अपनी बाँहों में बटोरती जा रही हूँ..*."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को सर्वगुणों और शक्तियो से भरपूर करते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... इस पुरानी दुनिया की विनाशी दौलत के पीछे बहुत खपे हो... अब मीठे बाबा से 21 जनमो की अमीरी लेकर विश्व के बादशाह बनो... *एक एक पल कमाई से भरपूर हो, मन बुद्धि को मीठे बाबा की याद में पूरा झोंक दो.*.. यादो में ही पुराने सारे विकर्म भस्म होंगे और सुखो भरा खुबसूरत जीवन आपके हाथो में होगा... इसलिए निरन्तर याद में खोये रहो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा को मुझ आत्मा के सुख के लिए इस कदर आतुर देख कहती हूँ :-* "मीठे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा कितनी महान हूँ, और कितनी भाग्यशाली हूँ... कि भगवान बेठ मुझे यूँ अमीर बना रहा है... और मुझे विश्व का मालिकाना हक दिलवा रहा है... मै आत्मा इतनी अमीर बनूंगी, यह तो कभी ख्यालो में भी न था... *आज आपकी सच्ची यादो में यह जीवन की खुबसूरत हकीकत बन रही है... और मै आत्मा हर साँस से यादो की कमाई कर, अमीर और अमीर होती जा रही हूँ.*.."प्यारे बाबा से यूँ मीठी रुहरिहानं कर मै आत्मा... अपने कर्मक्षेत्र पर लौट आयी....

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- आप समान बनाने की सेवा करनी है*"

 

 _ ➳  लाइट की सूक्ष्म आकारी देह को धारण कर मैं फ़रिशता अपनी साकारी देह से बाहर निकलता हूँ और दुनिया के नज़ारो को देखने चल पड़ता हूँ। सड़क पर लोगों की भीड़ के बीच मैं चल रहा हूँ। कोई मुझे नही देख पा रहा लेकिन मैं सबको देख रहा हूँ। *हर व्यक्ति का चेहरा मैं देख भी रहा हूँ और उनके चेहरे के हाव - भाव भी पड़ रहा हूँ। हर व्यक्ति एक अजीब सी कशमकश में उलझा हुआ दिखाई दे रहा है*। दुनिया की अन्धी दौड़ में सब भाग रहें है लेकिन जाना कहाँ है, मंजिल कहाँ हैं, किसी को नही पता। चेहरे पर उदासी और दुख की रेखाये लिए सब अपना जीवन जी रहें हैं।

 

 _ ➳  किसी के चेहरे पर खुशी की कोई झलक दिखाई नही दे रही। कोई हंसता हुआ अगर दिखाई भी दे रहा है तो ऐसा लग रहा है जैसे झूठी हंसी हंस रहा है। *लोगों के ऐसे उदास चेहरे देख मन मे विचार आता है कि ये सब मेरे आत्मा भाई ही तो है*। जैसे मेरे मीठे बाबा ने आ कर मेरे जीवन को खुशियों से भरपूर कर दिया है ऐसे ही मेरा भी ये फर्ज बनता है कि अपने इन आत्मा भाईयों को आप समान बना कर मैं इन्हें भी सच्ची खुशी पाने का सहज मार्ग दिखा कर इनके जीवन मे भी खुशियां ले आऊँ। *इसी दृढ़ संकल्प के साथ अब मैं तीव्र उड़ान भरते हुए आकाश को पार कर पहुँच जाता हूँ अपने अति परम प्रिय, खुशियों के वरदाता बापदादा के पास उनके अव्यक्त वतन में*।

 

 _ ➳  बापदादा मेरे आने का आश्रय समझ प्रसन्नचित मुद्रा में, अपनी बाहें फैला कर मेरा स्वागत करते हुए मुझे अपनी बाहों में भर लेते हैं। *अपना असीम स्नेह और प्यार मुझ पर लुटा कर, बाबा खुशी के अथाह खजाने से मेरी झोली भरते हुए मुझे "सदा खुशी में रह, सबको आप समान बनाने" का वरदान देते हुए, अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रख देते हैं*। खुशी के खजाने और वरदान ले कर अब मैं फ़रिशता वापिस साकारी दुनिया मे लौट आता हूँ। बापदादा का आह्वान कर, कम्बाइन्ड स्वरूप में अब मैं फ़रिशता सारे विश्व का चक्कर लगा रहा हूँ। *बाबा की सर्वशक्तियाँ मुझ फ़रिश्ते में समा रही हैं और श्वेत रश्मियो के रूप में मुझ फ़रिश्ते से निकल कर सारे विश्व में चारों और फैल रही हैं*।

 

_ ➳  मेरे चारों ओर प्रकाश का एक शक्तिशाली औरा बनता जा रहा है। इस औरे से निकल रहे शक्तिशाली वायब्रेशन सबको सुख, शांति की अनुभूति करवा रहें हैं। *डबल लाइट फरिश्ता स्वरूप धारण किये, परमपिता परमात्मा का संदेशवाहक बन, सूक्ष्म रीति मैं सारे विश्व की आत्माओं को परमात्मा के इस धरा पर अवतरित होने का संदेश दे रहा हूँ*। परमात्म सन्देश पा कर सभी आत्माओं के चेहरे एक दिव्य अलौकिक मुस्कान से खिल उठे हैं। सबके चेहरे पर खुशी की झलक मैं स्पष्ट देख रहा हूँ। विश्व की सर्व आत्माओं को सच्ची खुशी की अनुभूति करवा कर अब मैं फ़रिशता अपने साकारी तन में प्रवेश करता हूँ।

 

 _ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर अब मैं अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली आत्माओं को आप समान बना कर, असीम खुशी का अनुभव करते हुए, उन्हें भी सच्ची खुशी का अनुभव करवा रही हूँ। मेरे मुख से निकले वरदानी बोल उनके दुखी जीवन को सुखमय बना रहे हैं। *खुशी के खजाने से मुझे सम्पन्न करके, खुशियों के सागर मेरे शिव पिता परमात्मा ने सबकी झोली खुशियों से भरने के मुझे निमित बना कर मुझे सर्व की दुआयों की पात्र आत्मा बना दिया है*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं हर कदम फरमान पर चलकर माया को कुर्बान कराने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सहजयोगी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा स्वयं का परिवर्तन करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा अन्य आत्माओं का परिवर्तन करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा अन्य आत्माओं को जीयदान देती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बापदादा यही चाहते हैं कि *वर्तमान समय प्रमाण लव और ला का बैलेन्स रखना पड़ता है, लेकिन ला और लव का बैलेन्स मिलकरके ला नहीं लगे। ला में भी लव महसूस हो।* जैसे साकार स्वरूप में बाप को देखा। ला के साथ लव इतना दिया जो हरेक के मुख से यही निकलता कि बाबा का मेरे से प्यार है। मेरा बाबा है। ला जरूर उठाओ लेकिन ला के साथ लव भी दो। सिर्फ ला नहीं। सिर्फ ला से कहाँ-कहाँ आत्मायें कमजोर होने के कारण दिलशिकस्त हो जाती हैं। *जब स्वयं आत्मिक प्यार की मूर्ति बनेंगे तब दूसरों के प्यार की, (आत्मिक प्यार, दूसरा प्यार नहीं) आत्मिक प्यार अर्थात् हर समस्या को हल करने में सहयोगी बनना।* सिर्फ शिक्षा देना नहीं, शिक्षा और सहयोग साथसाथ देना - ये है आत्मिक प्यार की मूर्ति बनना। तो आज विशेष बापदादा हर ब्राह्मण आत्मा को, चाहे देश, चाहे विदेश चारों ओर के सर्व बच्चों को यही विशेष अण्डरलाइन करते हैं कि *आत्मिक प्यार की मूर्ति बनो। और आत्माओं के आत्मिक प्यार की प्यास बुझाने वाले दाता-देवता बनो।* ठीक है ना। अच्छा।

 

✺   *ड्रिल :-  "ला में भी लव महसूस करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा लाइट के कार्ब में लाइट के तन में हूँ... मैं बिल्कुल हल्का फरिश्ता हूँ... *मैं स्वयं को सतरंगी प्रकाश की किरणों के बीच देख रही हूँ... मैं जगमगाता दिव्य फरिश्ता सतरंगी किरणों की आभा फैलाते हुए जाती हूँ... सफेद प्रकाश की दुनिया में...*  दिव्य फरिश्तों की यह कितनी प्यारी दुनिया है... चारों ओर अलौकिकता, दिव्यता ही दिव्यता है... आवाज से परे गहन शांति की दुनिया है... यहाँ हर कर्म संकल्पों से हो रहा है... यहाँ मैं फ़रिश्ता सर्व हदों से मुक्त रूहानियत की स्थिति में स्थित हूँ... मेरा सर्व के साथ आत्मिक भाव और आत्मिक चाल चलन है...

 

 _ ➳  मैं फरिश्ता सामने मीठे बापदादा को देख रही हूँ... बाबा की दृष्टि मुझे भरपूर कर रही है... बापदादा मेरे सिर पर बहुत प्यार से हाथ फ़िराते हैं... मुझे वरदानों से भरपूर कर रहे हैं... *बापदादा मुझे 'जगतमाता भव' का वरदान देते हैं... बापदादा से प्राप्त इस श्रेष्ठ स्वमान के अर्थ स्वरुप में मैं स्वयं को स्थित कर रही हूँ...* जगतमाता के स्वमान में टिकते ही मेरे मन में विश्व की सर्व आत्माओं के लिए अपनेपन, रूहानी स्नेह की, निस्वार्थ प्यार की भावना जागृत हो रही है...

 

 _ ➳  जैसे एक माँ बच्चे की हर गलती को क्षमा करती है क्योंकि उसके मन में बच्चे के प्रति निस्वार्थ प्रेम है... इसलिए वह बच्चों की गलतियों के बाद भी उसे निर्मल अगाध स्नेह देती रहती है... ठीक इसी प्रकार *मैं आत्मा निःस्वार्थ भाव से... सभी आत्माओं पर ईश्वरीय स्नेह की... निर्मल स्नेह की वर्षा कर रही हूँ... ईश्वरीय स्नेह में मैं आत्मा डूबती जा रही हूँ... यह ईश्वरीय स्नेह शक्ति का रूप बनता जा रहा है... और मैं आत्मा लव और ला का बैलेंस कर रही हूँ...* नियम मर्यादा के साथ चलते हुए भी... मैं निर्मल स्नेह का झरना बन रही हूँ... जिससे अगाध स्नेह अनवरत रूप से बहता जा रहा है...

 

 _ ➳  ब्रह्मा बाप ने लव और ला का बैलेंस करके दिखाया... जिससे हर एक को बाबा से रूहानी स्नेह की भासना आती थी...हर एक के मुख से, दिल से 'मेरा बाबा' यही बोल निकलते थे... *मैं आत्मा ब्रह्मा बाबा के नक्शे कदम पर चल रही हूँ... मैं सर्व को नि:स्वार्थ प्यार से भरपूर कर रही हूँ... स्नेह की शक्ति पत्थर को भी पिघला सकती है... मैं आत्मिक प्यार की मूरत बनती जा रही हूँ... यह रूहानी स्नेह हर समस्या को सहज ही हल कर रहा है...* इस स्नेह से सर्व आत्माये सहयोगी बनती जा रही हैं...

 

 _ ➳  मैं दिव्य फ़रिश्ता सर्व दैहिक आकर्षणों से मुक्त हूँ... रुहानियत से भरपूर हूँ... *मैं आत्मिक स्नेह का साक्षात स्वरुप हूँ...* स्नेह की इस शक्ति से संपन्न मैं सर्व को समझानी और सहयोग दे रही हूँ... कोरी शिक्षा ही नहीं स्नेह और सहयोग भी दे रही हूँ... आज आत्माएं सच्चे प्यार की तलाश में भटक रही हैं, तड़प रही हैं... उन *भटकती, प्यासी आत्माओं की प्यास बुझाने वाली मैं आत्मिक प्यार की देवी हूँ... मैं दाता का बच्चा सर्व आत्माओं को सच्चे रूहानी, नि:स्वार्थ स्नेह की अनुभूति करा रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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