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 12 / 03 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *"आत्मा भाई - भाई है" - यह अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *मुख से कोई उल्टा सुलटा बोल तो नहीं निकला ?*

 

➢➢ *ईश्वरीय संग में रह उल्टे संग के वार से बचकर रहे ?*

 

➢➢ *बुराई को भी अच्छाई में परिवर्तित कर सदा प्रसन्नचित रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *आदिकाल, अमृतवेले अपने दिल में परमात्म प्यार को सम्पूर्ण रूप से धारण कर लो ।* अगर दिल में परमात्म प्यार, परमात्म शक्तियां, परमात्म ज्ञान फुल होगा *तो कभी और किसी भी तरफ लगाव या स्नेह जा नहीं सकता ।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बाप द्वारा सर्व खजानों से भरपूर आत्मा हूँ"*

 

  बाप द्वारा सर्व खजाने प्राप्त हो रहे हैं? भरपूर आत्मायें हैं, ऐसा अनुभव करते हो? *एक जन्म नहीं लेकिन 21 जन्म यह खजाने चलते रहेंगे। कितना भी आज की दुनिया में कोई धनवान हो लेकिन जो खजाना आपके पास है वह किसी के पास भी नहीं है। तो वास्तविक सच्चे वी.आई.पी कौन हैं? आप हो ना!* वह पोजीशन तो आज है कल नहीं लेकिन आपका यह ईश्वरीय पोजीशन कोई छीन नहीं सकता।

 

  *बाप के घर में श्रृंगार बच्चे हो। जैसे फूलों से घर को सजाया जाता है ऐसे बाप के घर के श्रृंगार हो। तो सदा स्वयं को - मैं बाप का श्रृंगार हूँ ऐसा समझ श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रहो।* कभी भी कमजोरी की बातें याद नहीं करना। बीती बातों को याद करने से और ही कमजोरी आ जायेगी। पास्ट सोचेंगे तो रोना आयेगा इसलिए पास्ट अर्थात् फिनिश।

 

* बाप की याद शक्तिशाली आत्मा बना देती है। शक्तिशाली आत्मा के लिए मेहनत भी मुहब्बत में बदल जाती है। जितना ज्ञान का खजाना दूसरों को दते हैं उतना वृद्धि होती है। हिम्मत और उल्लास द्वारा सदा उन्नति को पाते आगे बढ़ते चलो।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *अभी एक मिनट के लिए सभी लाइट हाऊस, माइट हाऊस स्थिति द्वारा विश्व में अपनी लाइट-माइट फैलाओ।* (बापदादा ने ड़िल कराई) अच्छा - ऐसा अभ्यास समय प्रति समय कार्य में होते हुए भी करते रहो। *अभी सेकण्ड में जिस स्थिति में बापदाद डायरेक्शन दे उसी स्थिति में सेकण्ड में पहुँच सकते हो?* कि पुरुषार्थ में समय चला जायेगा?

 

✧  *अभी प्रेक्टिस चाहिए सेकण्ड की क्योंकि आगे जो फाइनल समय आने वाला है, जिसमें पास विद ऑनर का सर्टीफिकेट मिलना है, उसका अभ्यास अभी से करना है।* सेकण्ड में जहाँ चाहे, जो स्थिति चाहिए उस स्थिति में स्थित हो जाएँ तो एवररेडी। रेडी हो गये। अभी पहले एक सेकण्ड में पुरुषोत्तम संगमयुगी ब्राह्मण हूँ इस स्थिति में स्थित हो जाओ।

 

✧  अभी मैं फरिश्ता रूप हूँ, डबल लाइट हूँ।  *अभी विश्व कल्याणकारी बन मन्सा द्वारा चारों ओर शक्ति की किरणें देने का अनुभव करो।* ऐसे सारे दिन में सेकण्ड में स्थित हो सकते हैं। इसका अनुभव करते रहो क्योंकि अचानक कुछ भी होना है। ज्यादा समय नहीं मिलेगा। *हलचल में सेकण्ड में अचल बन सकें इसका अभ्यास स्वयं ही अपना समय निकाल बीच-बीच में करते रहो। इससे मन का कन्ट्रोल सहज हो जायेगा। कन्ट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर बढती जायेगी।* अन्छ|-

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  व्यक्त में रहते अव्यक्त स्थिति में रहने का अभ्यास अभी सहज हो गया है ? जब जहाँ अपनी बुद्धि को लगाना चाहे वहाँ लगा सकें - इसी अभ्यास को बढ़ाने के लिए भट्ठी में आते हैं। *जैसे लौकिक जीवन में न चाहते हुए भी आदत अपनी तरफ खींच लेती है, वैसे ही अव्यक्त स्थिति में स्थित होने की आदत बन जाने के बाद यह आदत स्वत: ही अपनी तरफ खींचेगी । यह आदत आपको अदालत में जाने से बचायेगी। समझा?* जब बुरी -बुरी आदतें अपना सकते हो  तो क्या यह आदत नहीं डाल सकते हो? दो चार बार भी कोई बात प्रेक्टिकल में लाई जाती है तो प्रेक्टिकल में लाने से प्रेक्टिस हो जाता है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- आत्म-अभिमानी और परमात्म-अभिमानी बनना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा स्वयं को बाबा की कुटिया में बैठा हुआ अनुभव कर रही हूं...    बाबा की मीठी मीठी यादों में खोई में आत्मा पहुंच जाती हूं परमधाम और बाबा को स्पर्श करती हूं... स्पर्श करते ही एक दिव्य अलौकिक प्रकाश मुझ आत्मा में भर जाता है और मैं आत्मा बहुत शक्तिशाली अनुभव करने लगती हूँ... शक्तिओं से भरपूर होकर मैं आत्मा स्वयं को नीचे उतरता हुआ देख रही हूं... वतन में पहुंच कर बापदादा को अपने सामने देख रही हूं... बाबा बाहें फैलाये सम्मुख खड़े हैं और मैं आत्मा नन्हा फ़रिश्ता बन बाबा की बाहों में समा जाती हूँ...*

 

  *बाबा मुझ आत्मा को अपनी बाहों में लेकर बहुत प्यार से बोले:-* "मेरे सिकीलधे बच्चे.... अब देही अभिमानी बनों बाप आये हैं तुम्हें राजयोग सिखाने, राजयोगी बन बाप से पूरा पूरा वर्सा लेने का पुरुषार्थ करो... *तुम्हें अपने पुरुषार्थ के बल से ही सूर्यवंशी घराने में आना है और बाप से विश्व की बादशाही लेनी है... मेरी आँखों के नूर मैं आया हूँ तुम्हें इस नरक से निकाल अपने साथ ले जाने इसलिए बाप की श्रीमत पर चल अब सम्पूर्ण पवित्र बनो...*"

 

_ ➳  *बाबा के वाक्यों को अपने हृदय में समाते हुए मैं आत्मा बाबा से कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मुझे पवित्रता का वरदान देकर मेरे इस खाली जीवन को आपने खुशिओं से भर दिया है... मैं आत्मा देही अभिमानी बन संपूर्ण सुखों से भरपूर हो गयी हूँ... आप मेरे गाईड बनें और मेरे जीवन को नया रास्ता मिल गया है... *मैं आत्मा आपके बताए रास्ते पर चलकर कितनी महान बनती जा रही हूं , सुख के सागर को पाकर मैं आत्मा धन्य हो गयी हूँ... पत्थर बुद्धि से पारस बुद्धि बन गयी हूँ...*"

 

  *बाबा मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर कहते हैं:-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... बाप आये हैं तुम्हें बहुत बहुत मीठा बनाने, माया ने तुम्हें खाली कर दिया है बाप आये हैं फिर से तुम्हें ज्ञान के खजाने से मालामाल करने... *अपने को देही समझ एक बाप से योग लगाओ योग से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे और तुम नई दुनिया के मालिक बन जायेंगे... मेरा तो एक बाबा दूसरा न कोई इस पाठ को पक्का करो, बाप की श्रीमत पर चलकर ही तुम राज्य के अधिकारी बनते हो... बाप से पूरा वर्सा लेने के लिए निरंतर बाप की याद में रहो...*"

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा की प्रेमभरी वाणी को स्वयं में धारण करते हुए बाबा से कहती हूँ:-* "हां मेरे दिलाराम बाबा... आपकी श्रीमत पाकर मुझ आत्मा के जीवन में नई उमंग और नया उत्साह भर गया है... मैं आत्मा कितनी सौभाग्यशाली हूँ जिसको परमात्मा की पालना मिली है ये सोचते ही मेरे रोम रोम में खुशी और उल्लास की लहर सी दौड़ जाती है... *नाजाने कब से अंजान रास्तों पर चली जा रही थी अपने जीवन की मंजिल का कुछ पता न था आपने आकर मुझ आत्मा को मेरी मंजिल बताकर मुझे भटकने से बचा लिया... आपको पाकर अब और कुछ भी पाना बाकी नही रह गया...*"

 

  *बाबा मुझ आत्मा का ज्ञान श्रृंगार करते हुए मधुर वाणी में बोले:-* "मीठे बच्चे... ज्ञान से ही योग की धारणा होगी इसलिए पढ़ाई कभी मिस नही करनी... बाप से रोज़ पढ़ना है और स्वयं में ज्ञान धारण कर औरों को भी कराने की सेवा करनी है... *बाप रोज़ परमधाम से तुम्हें पढ़ाने आते हैं इस स्मृति में रहना है, निश्चय बुद्धि बनना है , कभी भी संशय में नही आना है... संगदोष में आकर पढ़ाई को कभी नही छोड़ना, ऐसा कोई काम नही करना जिससे बाप की अवज्ञा हो...*"

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा के महावाक्यों का रसपान करते हुए बाबा से बोली:-* "मेरे प्राणों से प्यारे बाबा... आपने मेरे जीवन को दिव्यता और सुख की अलौकिक चांदनी से चमचमा दिया है... जीवन की प्यास को अपने ज्ञानामृत से बुझा दिया और *मुझ आत्मा की बुद्धि का ताला खोलकर मुझे ज्ञानवान बना दिया...* मैं आत्मा स्वयं को बहुत हल्का अनुभव कर रही हूं... मेरे जन्मों जन्मों की जो खाद आत्मा में पड़ी हुई है उसे योग अग्नि से भस्म करती जा रही हूं... *बाबा आपने वरदानों से मेरा श्रृंगार करके मुझे और भी अलौकिक बना दिया है... आपने मेरे जीवन को ज्ञान और परमात्म प्रेम से भर दिया है आपका कितना भी शुक्रिया करूँ कम ही लगता है... मैं आत्मा बाबा को दिल की गहराइयों से शक्रिया कर अपने साकारी तन में लौट आती हूं...*"

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- शरीर विनाशी है, उससे प्यार निकाल अविनाशी आत्मा से प्यार रखना है*"

 

_ ➳  अपने विचित्र निराकार भगवान बाप को जिसका कोई चित्र अर्थात शरीर नही उसके समान स्वयं को विचित्र बना कर, देह के भान से स्वयं को मुक्त कर, *अपने आत्मिक स्वरूप में स्थित होकर मैं जैसे ही बैठती हूँ अपने इस देह रूपी चित्र से स्वयं को बिल्कुल न्यारा अनुभव करते हुए, अपने निराकारी स्वरूप पर अपने ध्यान को फोकस करते ही एक अति सुखमय विचित्र अनुभूति से मैं आत्मा भर उठती हूँ*।

 

_ ➳  चमकते हुए सितारे के समान अपने इस अति सुन्दर स्वरूप को निहारते - निहारते अब मैं इस चैतन्य शक्ति में समाये सातों गुणों का गहराई तक अनुभव कर रही हूँ और विचार करती हूँ कि आज दिन तक मैं आत्मा अपने अंदर छुपे अथाह ख़ज़ानों से ही अनभिज्ञ थी। *क्षण भर का सुख और शांति पाने के लिए मैं कहाँ - कहाँ नही भटक रही थी। किन्तु मेरे विचित्र बाप ने आकर, देह रूपी चित्र के अंदर छुपे मेरे विचित्र स्वरूप का मुझे सत्य परिचय देकर, मेरे अंदर छुपे गुणों और शक्तियों का अनुभव करवाकर गहन सुख और शांति से मुझे भरपूर कर दिया*।

 

_ ➳  अपने विचित्र बाप का शुक्रिया अदा करने के लिए मैं आत्मा विदेही बन अब देह रूपी चित्र से बाहर आ जाती हूँ। देह की कारा में बंद मैं आत्म पँछी देह से बाहर आते ही अब उड़ चलती हूँ ऊपर नीलगगन की ओर। *इस नीले अंतहीन पोलार में विचरण करते, उन्मुक्त होकर उड़ने का भरपूर आनन्द लेते हुए मैं आत्मा इस नीलगगन को पार करके, अब सूक्ष्म देहधारी फरिश्तो की दुनिया में प्रवेश कर इस दुनिया को भी पार कर पहुँच जाती हूँ आत्माओं की ऐसी विचित्र निराकारी दुनिया में* जहाँ ना स्थूल और ना ही सूक्ष्म देह रूपी चित्र का कोई भान है।

 

_ ➳  लौकिक और अलौकिक हर प्रकार के भान से मुक्त इस पारलौकिक घर में अपने विचित्र पारलौकिक परम पिता परमात्मा के पास बैठ उनके सुंदर सजीले स्वरूप को निहारते हुए मैं असीम आनन्द का अनुभव कर रही हूँ। *उनकी सर्वशक्तियों रूपी किरणों की मीठी - मीठी फुहारें मुझ आत्मा पर औंस की बूंदों की तरह पड़ कर, गहन शीतलता की अनुभूति करवा रही हैं*। अपने प्रेम की किरणों रूपी बाहों में मुझे भरकर मेरे विचित्र दिलाराम बाबा मुझ विचित्र आत्मा पर अपना असीम प्रेम बरसा रहें हैं। अपनी सर्वशक्तियों और गुणों से मुझे भरपूर करके बाबा मुझे आप समान बना रहे हैं। *बाबा की सर्वशक्तियाँ मेरे अंदर गहराई तक समाकर मुझे शक्तिशाली बना रही हैं*।

 

_ ➳  अपने विचित्र निराकार भगवान से उनके समान विचित्र बन मिलन मनाने का सुख ले कर, स्वयं को तृप्त करके, अब मैं विचित्र आत्मा सृष्टि रंग मंच पर अपना पार्ट बजाने के लिए वापिस साकार दुनिया की ओर चल पड़ती हूँ। *अपने जिस देह रूपी चित्र को छोड़ मैं आत्मा अपने विचित्र बाप से मिलन मनाने गई थी, उसी देह रूपी चित्र में कर्म करने के लिए फिर से प्रवेश करती हूँ*। किन्तु विचित्र बनने का सुखद एहसास अब मुझे देह की दुनिया मे रहते हुए भी, देह से न्यारेपन की अनुभूति में सदा स्थित रखता है।

 

_ ➳  इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर अब मैं हर कर्म अपने विचित्र स्वरूप की स्मृति में रह कर करती हूँ। इस देह से जुड़े हर सम्बन्धी के चित्र को देखने के बजाए उसकी देह रूपी चित्र में विराजमान विचित्र आत्मा को ही अब मैं देखती हूँ। सभी को शिव पिता की अजर, अमर, अविनाशी सन्तान के रूप में देखते हुए निस्वार्थ भाव से सभी को सच्चा रूहानी स्नेह मैं सदा देती रहती हूँ। *कोई भी चित्र का सिमरण ना करते हुए चित्र में विराजमान चरित्र अर्थात आत्मा को देखने का अभ्यास मुझे स्वत: ही सर्व से न्यारा और अपने विचित्र बाप का प्यारा बना रहा है*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं ईश्वरीय संग में रह उल्टे संग के वार से बचने वाली सदा की सत्संगी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं बुराई को अच्छाई में परिवर्तन करके प्रसन्नचित्त रहने वाली शक्तिशाली आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बापदादा यही इशारा देते हैं - *कोई भी समस्या को सामना करने के लिए सहज विधि है पहले एकाग्रता की शक्ति*। मन एकाग्र हो जाए, तो *एकाग्रता की शक्ति निर्णय बहुत अच्छा करती है*। इसीलिए देखो कोर्ट में तराजू दिखाते हैं। निर्णय की निशानी तराजू इसलिए दिखाते हैं - एकाग्र कांटा हो जाता है। तो *कोई भी समस्या को जिस समय चारों ओर हलचल हो उस समय अगर मन की एकाग्रता की शक्ति हो, जहाँ मन को चाहो वहाँ एकाग्र हो जाए, निर्णय हो जाए किस परिस्थिति में कौन सी शक्ति कार्य में लायें, तो एकाग्रता की शक्ति दृढ़ता स्वतः ही दिलाती है और दृढ़ता सफलता की चाबी है*। तो ऐसे अपने को एक एक्जैम्पुल बनाके औरों को प्रेरणा देते रहो। ठीक है ना! अच्छा है।

 

✺   *ड्रिल :-  "एकाग्रता की शक्ति से कोई भी समस्या को सामना करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  *मन बुद्धि को एक बिन्दु पर एकाग्र कर मैं आत्मा, साक्षी होकर देख रही हूँ... मन में उत्पन्न होने वालें संकल्पों और विकल्पों को... संकल्पों का ये बहाव सागर में उठती लहरों के समान*...  हर लहर में डूबाने और पार लगाने की शक्ति, ठीक ऐसे ही मेरे हर संकल्प में चढती कला और उतरती कला का अन्तहीन सफर... *देही से देह तक के सफ़र में समस्याओं का समर और साथ छोडती मेरी एकाग्रता*... शनै: शनै: क्षीण होती निर्णय शक्ति...

 

 _ ➳  *मैं आत्मा संगम पर प्रभु प्रेम की डोर पकड पहचान रही हूँ निज स्वरूप को*... स्वराज्य अधिकारी की स्टेज पर  स्थित मैं आत्मा... *मन और बुद्धि की कचहरी लगा अपना अपना कार्य सौंप रही हूँ दोनों को*... मन विचार शक्ति और बुद्धि विवेक शक्ति... दोनो ही महामन्त्री अपने अपने अधिकार क्षेत्र पर पूरी सतर्कता के साथ... *दोनो का आपस में घनिष्ठ सहयोग...* और सफलता में दृढ होता मेरा निश्चय...

 

 _ ➳  संकल्पों की सफलता से बढता मेरा आत्मविश्वास... और पग पग पर जीत की अनुभूतियाँ संजोये, मैं आत्मा आनन्द के गहरें सागर में डुबकिया लगा रही हूँ... *नाम, मान, शान की लहरें हर पल मेरे चारों ओर अठखेलियाँ करती हुई... असंख्य रूपों से भ्रमित करने की भरसक कोशिश कर रहीं है ये लहरें*... मन मुग्ध हो रहा है उनकी अदाओं से... घिर रहा है उनके जादुई आकर्षण में... संकल्पों और  विकल्पों का बुनता जाल... और आहिस्ता आहिस्ता उलझनों का विशाल भँवर...

 

 _ ➳  *बुद्धि के पलडें पर आती संकल्प- विकल्प रूपी लहरें*... साक्षी भाव से हर एक संकल्प को परखती हुई बुद्धि सहजता से नीचे गिरा रही है नाम, मान, शान की उन लहरों को... और इन सब के लिए मौन स्वीकृति देता मन... बुद्धि के सहयोगी होने का परिचय दे रहा है... *मन मुक्त हो रहा है विकल्पों के भार से*...और फिर से आनन्दोत्सव की फुहारें मन की गलियों में महसूस कर रही हूँ मैं आत्मा...

 

 _ ➳  *मन स्थिर होता जा रहा है केवल निज स्वरूप पर*... अपनी शक्तियों का भरपूर एहसास संजोए... *बुद्धि की अनन्त शक्तियों को प्रयोग में लाता हुआ*... हर परिस्थिति के अनुसार *मन और बुद्धि की उचित शक्ति का प्रयोग कर समस्या मुक्त होती मैं समाधान मूर्त आत्मा*... एकाग्रता की शक्ति का गहरा अनुभव कर रही हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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