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 12 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *रचना की संभाल करते हुए कमल फूल समान पवित्र बनकर रहे ?*

 

➢➢ *ज्ञान चिता पर बठे रहे ?*

 

➢➢ *मास्टर स्नेह के सागर बन घृणा भाव को समाप्त किया ?*

 

➢➢ *हदों को समाप्त कर बेहद की दृष्टि और वृत्ति को अपनाया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  अब अपने दिल की शुभ भावनाएं अन्य आत्माओं तक पहुंचाओ। साइलेन्स की शक्ति को प्रत्यक्ष करो। *हर एक ब्राह्मण बच्चे में यह साइलेन्स की शक्ति है। सिर्फ इस शक्ति को मन से, तन से इमर्ज करो। एक सेकण्ड में मन के संकल्पों को एकाग्र कर लो तब फरिश्ते रूप द्वारा वायुमण्डल में साइलेन्स की शक्ति के प्रकम्पन्न फैला सकेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बेफिक्र बादशाह हूँ"*

 

  सदा अपने को बेफिक्र बादशाह अनुभव करते हो? या थोड़ा-थोड़ा फिक्र है? *क्योंकि जब बाप ने आपकी जिम्मेवारी ले ली, तो जिम्मेवारी का फिक्र क्यों? अभी सिर्फ रेस्पान्सिबिल्टी है बाप के साथ-साथ चलते रहने की। वह भी बाप के साथसाथ है, अकेले नहीं।*

 

  तो क्या फिक्र है? कल क्या होगा-ये फिक्र है? जोब का फिक्र है? दुनिया में क्या होगा- ये फिक्र है? क्योंकि जानते हो कि-हमारे लिए जो भी होगा अच्छा होगा। निश्चय है ना। पक्का निश्चय है या हिलता है कभी ? *जहाँ निश्चय पक्का है, वहाँ निश्चय के साथ विजय भी निश्चित है। ये भी निश्चय है ना कि विजय हुई पड़ी है।*

 

  या कभी सोचते हो कि - पता नहीं होगी या नहीं? क्योंकि कल्प-कल्प के विजयी हैं और सदा रहेंगे-ये अपना यादगार कल्प पहले वाला अभी फिर से देख रहे हो। इतना निश्चय है ना कि कल्प-कल्प के विजयी हैं। इतना निश्चय है? कल्प पहले भी आप ही थे या दूसरे थे? *तो सदा यही याद रखना कि हम निश्चयबुद्धि विजयी रत्न हैं। ऐसे रत्न हो जिन रत्नों को बापदादा भी याद करते हैं। ये खुशी है ना? बहुत मौज में रहते हो ना।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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बापदादा बच्चों के मन की मेहनत नहीं देख सकते। 63 जन्म मेहनत की। अब एक जन्म मौजों का जन्म हैं, मुहब्बत का जन्म है, प्राप्तियों का जन्म है, वरदानों का जन्म हैं। मदद लेने का, मदद मिलने का जन्म हैं। फिर भी *इस जन्म में भी मेहनत क्यों? तो अब मेहनत को मुहब्बत में परिवर्तन करो।* महत्व से खत्म करो। आज बापदादा आपस में बहुत चिटचैट कर रहे थे, बच्चों की मेहनत परा क्या करते हैं, बापदादा मुस्करा रहे थे कि मन की मेहनत का कारण क्या बनता है, क्या करते हैं? टेढ़े बाँके, बच्चे पैदा करते, जिसका कभी मुँह नहीं होता, कभी टांग नहीं, कभी बांह नहीं होती। ऐसे व्यर्थ की वंशावली बहुत पैदा करते हैं और फिर जो रचना की तो क्या करेंगे? उसको पालने के कारण मेहनत करनी पडती। *ऐसी रचना रचने के कारण ज्यादा मेहनत कर थक जाते हैं और दिलशिकस्त भी हो जाते हैं।* बहुत मुश्किल लगता है। है अच्छा लेकिन है बडा मुश्किल।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *'बिन्दु' स्थिति में स्थित हो राज्य अधिकारी बन कार्य करना है। सर्व खजानों के 'बिन्दु' और 'सिंधु' यह दो बातें विशेष स्मृति में रख श्रेष्ठ सर्टिफिकेट लेना है। सदा ही श्रेष्ठ संकल्प की सफलता से आगे बढ़ते रहना। तो 'बिन्दु बनना, सिन्धु बनना' यही सर्व बच्चों प्रति वरदाता का वरदान है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पवित्र बनकर सबको पवित्र बनाना"*

 

_ ➳  *मीठे बाबा के कमरे में रूहरिहान करने के लिये... जब मैं आत्मा... पाण्डव भवन के प्रांगण में पहुंचती हूँ... वहाँ श्रीकृष्ण की मनमोहक छवि(चित्र) को सामने देख पुलकित हो उठती हूँ...* भक्ति में यह चित्र, आज ज्ञान में मन की आँखों से देखकर... मैं आत्मा अति आनंदित हो रही हूँ... मीठे बाबा ने ज्ञान के तीसरे नेत्र को देकर... चित्रों में चैतन्यता को सहज ही दिखलाया है... *आज प्यारे बाबा की गोद में बैठ कर... हर नज़ारा दिल के कितने करीब है... बाबा ने मुझ आत्मा को सतयुगी नजारे दिखाकर... भाव विभोर कर दिया है...* मन के यह भाव... मीठे बाबा को सुनाने मैं आत्मा... बाबा रूम की ओर बढ़ चलती हूँ...

 

  *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को... ब्राह्मण जीवन में पवित्रता का महत्व समझाते हुए कहा :-* "मेरे प्यारे सिकीलधे बच्चे... इस संगमयुग पर अपनी पवित्रता द्वारा चारों युगों के भाग्य को जान सकते हो... *ब्राह्मण जीवन का मुख्य आधार... पवित्रता है, जितनी श्रेष्ठ पवित्रता होगी... उतना ही श्रेष्ठ भाग्य बनेगा... और उतने ही ईश्वरीय खजानो के अधिकारी बनोगे...* पवित्र बन सबके जीवन में आप समान खुशियों की बहारों को सजाओ... *ईश्वर पिता को पाकर... जो सच्चे अहसासो को आपने जिया है... उनकी अनुभूति हर दिल को भी कराओ...* उनके भी सोये हुए भाग्य को जगाकर... उन्हें भी पतित से पावन बनाकर  देवताई राज्य भाग्य दिलाओ..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा मीठे बाबा के अमूल्य ज्ञान को बुद्धि में समेटकर कहती हूँ :-* "मेरे प्यारे प्यारे बाबा... *मैं आत्मा आप द्वारा दी गयी श्रीमत पर चल... पवित्रता धारण कर हर कर्म कर रही हूँ... मैं आत्मा ज्ञान धन से सम्पन्न होकर, आपकी मीठी यादों के झूले में खोयी हुई... हर क्षण सच्चे आनंद को जी रही हूँ...* आपकी यादों की छत्रछाया में पलकर, असीम खुशियों की धनी हो गयी हूँ..."

 

  *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपनी मीठी यादों के तारों में पिरोते हुए कहा :- "मीठे प्यारे लाडले बच्चे...* सेवा का मुख्य आधार... पवित्रता ही है... *पवित्रता के श्रेष्ठ आकर्षण से सहज ही आत्मायें... परमपिता की ओर खिंची चली आती हैं...  पवित्रता के बल से तुम्हारी हर सेवा आसान हो जाती है...* इसलिए रहमदिल बन... हर आत्मा के प्रति शुभ भावना... शुभ कामना रख सभी आत्माओ को पवित्र बनाने की प्रतिज्ञा करो..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा मीठे बाबा से महा धनवान बनकर पूरे विश्व में इस ज्ञान धन की दौलत लुटाकर कहती हूँ :- "मेरे शाहों के शाह... मीठे बाबा... मैं आत्मा आपके अथाह प्यार को पाकर... प्रेम, सुख, शांति की तरंगो से भर गयी हूँ...* और आपसे प्राप्त धन सम्पदा... को अपनी बाँहों में भरकर, हर दिल को... पवित्र बनाकर... आपकी ओर आकर्षित कर रही हूँ... *मुझे इस कदर प्यारा बनाने वाले, पिता की झलक, अपनी रूहानियत से सबको दिखा रही हूँ...* और आपकी बाँहो में पालना दिलवा कर, पुनः सभी आत्माओं को पावन बना रही हूँ..."

 

  *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपने महान भाग्य के नशे से भरते हुए कहा :-* "मेरे मीठे राजदुलारे बच्चों... *जैसे सूर्य अपनी किरणें फैलाकर समस्त विश्व को प्रकाशित कर देता है... वैसे ही पवित्र आत्मा, अपनी पवित्रता की किरणों द्वारा... संसार से माया रूपी अंधकार को मिटाने में समर्थ होती है...* अगर संसार में पवित्रता न हो तो पाप के भार से पृथ्वी डोलने लगती है... *अतः मीठे बच्चों... पवित्र बन सभी आत्माओ को पवित्र बनाने की दृढ प्रतिज्ञा कर... बाबा के सहयोगी बनो..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मीठे बाबा के स्नेह में डूबी, अपने मीठे भाग्य पर इतराती बाबा से कहती हूँ :- "मेरे मीठे दिलाराम बाबा...* आपने आकर मेरे कौड़ी तुल्य जीवन को हीरे तुल्य... अमूल्य बना दिया है... मुझे देवताओं से भी ऊंच बनाकर, अपने गले से लगाया है... *मेरी झोली वरदानों से भरकर... मुझे खुशनसीब बना दिया है...  मैं आत्मा आपको पाकर... धन्य-धन्य हो गयी हूँ...* प्यारे बाबा से मीठी रूहरिहान करके मैं आत्मा... अपने कर्मक्षेत्र पर लौट आती हूँ..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान पवित्र बनना है*"

 

 _ ➳  परमधाम में मैं आत्मा पतित पावन, पवित्रता के सागर अपने परमपिता परमात्मा शिव बाबा से पवित्रता की शक्तिशाली किरणे लेकर स्वयं को पावन बना रही हूं। *बाबा से आ रही पवित्रता की श्वेत किरणों का ज्वालामुखी स्वरूप मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी 63 जन्मो के विकारों की कट को जलाकर भस्म कर रहा है*। विकारों की कट उतरने से मैं आत्मा धीरे धीरे अपने उसी सम्पूर्ण निर्विकारी सतोप्रधान स्वरूप को पुनः प्राप्त कर रही हूं जिसे देहभान में आ कर, विकारों में लिप्त हो कर मैंने गंवा दिया था।

 

 _ ➳  परमधाम में बीज रूप स्थिति में स्थित हो कर अपने बीज रूप परमपिता परमात्मा के साथ योग लगाकर, योग की अग्नि में तपकर मेरा स्वरूप सच्चे सोने के समान बन गया है। *सोने के समान उज्ज्वल बन कर अब मैं आत्मा परमधाम से नीचे आ रही हूं और प्रवेश करती हूं सफेद प्रकाश की एक ऐसी दुनिया में जहां शिव बाबा अपने नन्दी अर्थात अव्यक्त ब्रह्मा बाबा में विराजमान हो कर हम बच्चों से अव्यक्त मिलन मनाते हैं*। इस स्थान पर पहुंच कर अपने लाइट के सम्पूर्ण फ़रिशता स्वरुप को धारण कर मैं पहुंच जाती हूँ बापदादा के सामने। मैं देख रही हूं ब्रह्माबाबा की भृकुटि में शिव बाबा को चमकते हुए। बाबा की भृकुटि से पवित्रता का अनन्त प्रकाश निकल रहा है जिसकी किरणे पूरे सूक्ष्म लोक में फैल रही हैं। बापदादा से आ रही पवित्रता की शक्तिशाली किरणें मुझ फ़रिश्ते में समा कर मुझे पावन बना रही हैं।

 

 _ ➳  अब बाबा मेरे समीप आ कर अपने वरदानी हाथ से मेरे मस्तक को छूते हैं। ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे बहुत तेज करंट मेरे अंदर प्रवाहित होने लगा है जिसने मेरे अंदर की कट को पूरी तरह जला कर भस्म करके मुझे डबल लाइट बना दिया है। मैं फ़रिशता जैसे पवित्रता का अवतार बन गया हूँ। अब *बाबा अपना हाथ ऊपर उठाते हैं औऱ देखते ही देखते एक कमल का पुष्प बाबा के हाथ मे आ जाता है जो धीरे धीरे बढ़ने लगता है*। बाबा उस कमल पुष्प को मेरे सामने रख देते हैं और मुझे उस कमल आसन पर बैठने का इशारा करते हैं। *कमल आसन पर विराजमान हो कर, बापदादा से विजय का तिलक ले कर अब मैं फ़रिशता ईश्वरीय सेवा अर्थ नीचे पतित दुनिया मे लौट आता हूँ*।

 

 _ ➳  ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर स्वयं को सदा कमल आसन पर विराजमान अनुभव करने से मुझे अपने मस्तक पर निरन्तर सफ़ेद मणि के समान चमकता हुआ पवित्रता का प्रकाश सदा अनुभव होता है जिससे निरन्तर पवित्रता के शक्तिशाली प्रकम्पन निकल कर चारों ओर फैलते रहते हैं। *मेरे चारों ओर पवित्रता का एक ऐसा शक्तिशाली औरा बन चुका है जो मुझे हर प्रकार की अपवित्रता से बचा कर रखता है* और गृहस्थ व्यवहार में रहते मुझे कमल पुष्प समान पवित्र जीवन जीने का बल देता है।

 

 _ ➳  घर गृहस्थ में कमल पुष्प समान रहकर अपनी रूहानियत की खुश्बू अब मैं चारों और फैला रही हूं। *लौकिक सम्बन्धों को अलौकिक बना कर, सबको आत्मा भाई भाई की दृष्टि से देखने का अभ्यास मुझे प्रवृति में रहते हुए भी पर - वृति का अनुभव करवा रहा है*। अपने लौकिक सम्बन्धियो को देख कर मैं यही अनुभव करती हूं कि ये सब भी शिव बाबा की अजर, अमर, अविनाशी सन्तान हैं। ये सब भी शिव बाबा के बच्चे और मेरे भाई हैं। संसार के सभी मनुष्य मात्र मेरे भाई बहन है। वे सब भी पवित्र आत्मायें हैं। *इन्ही शुभ और श्रेष्ठ संकल्पो के साथ, गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्रता का श्रृंगार किये अब मैं सबको पवित्रता की राह पर चलने का रास्ता बता रही हूं*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं मास्टर स्नेह के सागर आत्मा हूँ।*

   *मैं घृणा भाव को समाप्त करने वाली नॉलेजफुल आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा हदों को समाप्त कर देती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव बेहद की दृष्टि और वृत्ति को अपनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा यूनिटी का आधार बनाती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  स्व-चिंतन का मतलब क्या है? स्वचिन्तन इसको नहीं कहा जाता है कि सिर्फ ज्ञान की पाइन्ट्स रिपीट कर दी या ज्ञान की पाइन्ट्स सुन लीसुना दी-सिर्फ यही स्वचिन्तन नहीं है। लेकिन *स्वचिन्तन अर्थात् अपनी सूक्ष्म कमजोरियों कोअपनी छोटी-छोटी गलतियों को चिन्तन करके मिटाना, परिवर्तन करनाये स्वचिन्तन है।*

➳ _ ➳  बाकी ज्ञान सुनना और सुनाना उसमें तो सभी होशियार हो। वो ज्ञान का चिन्तन हैमनन है लेकिन *स्वचिन्तन का महीन अर्थ अपने प्रति है। क्योंकि जब रिजल्ट निकलेगी तो रिजल्ट में यह नहीं देखा जायेगा कि इसने ज्ञान का मनन अच्छा किया या सेवा में ज्ञान को अच्छा यूज किया।* इस रिजल्ट के पहले स्वचिन्तन और परिवर्तन, *स्वचिन्तन करने का अर्थ ही है परिवर्तन करना।*

➳ _ ➳  तो *जब फाइनल रिजल्ट होगी, उसमें पहली मार्क्स प्रैक्टिकल धारणा स्वरूप को मिलेगी।* जो धारणा स्वरूप होगा वो नैचरल योगी तो होगा ही। *अगर मार्क्स ज्यादा लेनी है तो पहले जो दूसरों को सुनाते हो, आजकल वैल्यूज पर जो भाषण करते हो, उसकी पहले स्वयं में चेकिंग करो।* क्योंकि सेवा की एक मार्क तो धारणा स्वरूप की १० मार्क्स होती हैं, अगर आप ज्ञान नहीं दे सकते हो लेकिन अपनी धारणा से प्रभाव डालते हो तो आपके सेवा की मार्क्स जमा हो गई ना।  

✺   *ड्रिल :-  "स्वचिन्तन से अपनी सूक्ष्म कमजोरियों को मिटाना, परिवर्तन करना"*

➳ _ ➳  मैं आत्मा पहुँच जाती हूँ... सर्वशक्तियों के सागर... अपने प्यारे पिता... शिवबाबा के पास... परमधाम में... जहाँ ज्ञान सूर्य अपनी सर्वशक्तियाँ चारों ओर बिखेर रहे हैं... *मैं आत्मा शिवबाबा के सम्मुख... ज्ञान सूर्य के तेज़ को स्वयं में अनुभव कर रही हूँ...* फिर बाबा को साथ लेकर सूक्ष्म वतन में जाती हूँ...

➳ _ ➳  मैं आत्मा बापदादा के सम्मुख... बाबा से कहती हूँ... बाबा मुझ आत्मा में अभी भी आलस्य, अलबेलेपन के सूक्ष्म संस्कार हैं... दूसरे की कमी कमजोरी दिखाई देती है... *बाबा... मैं आत्मा आपकी याद से... दृढ़ता की चाबी यूज़ करते हुए... इन सूक्ष्म संस्कारों पर विजय प्राप्त करुँगी...*

➳ _ ➳  बाबा... मुझ आत्मा को *"विजयी भव" का वरदान देते हुए कहने लगे... बच्ची... अब इन पुराने संस्कार... स्वभाव को  दृढ़ संकल्प की तीली द्वारा... चेक कर फिर चेंज करो...* यह समय उड़ती कला का है... इसलिये अब स्वचिंतन द्वारा स्वयं में परिवर्तन कर पुरुषार्थ को तीव्र करो...

➳ _ ➳  मैं आत्मा दृढ़ता की पेटी बाँध... स्व का चिंतन करती हूँ... *पुराने स्वभाव... संस्कार... बाबा की याद से परिवर्तित हो रहे हैं... मैं आत्मा बाप समान... मीठी बन रही हूँ...* दिव्य अलौकिक शक्तियां मुझ आत्मा में प्रवाहित हो रही हैं... अलबेलेपन और दूसरे की कमी कमजोरी देखने का संस्कार समाप्त हो गया है... *मैं आत्मा दिव्य गुणों को धारण कर... धारणा सम्पन्न अवस्था का अनुभव कर रही हूँ...*

➳ _ ➳  अब मैं आत्मा समय की तीव्र गति के प्रमाण... स्वचिंतन द्वारा स्वयं के परिवर्तन की गति को तीव्र कर रही हूँ... श्रेष्ठ संस्कारों को स्वयं में धारण कर रही हूँ... मैं आत्मा संकल्प करते ही... निश्चित समय पर हर कर्म को करते हुए सफलता प्राप्त कर रही हूँ... बाबा द्वारा दी गयी *हर श्रीमत को फॉलो कर हर परिस्थिति में अचल, अडोल बन विजय प्राप्त कर रही हूँ...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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