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 12 / 09 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कभी भी आपस में व बाप से रूठे तो नहीं ?*

 

➢➢ *सत बाप, सत टीचर और सत गुरु के साथ सच्चा होकर रहे ?*

 

➢➢ *आदि रतन की स्मृति से अपने जीवन का मूल्य जाना ?*

 

➢➢ *धोखा खाने से पहले परखकर स्वयं को बचा ज्ञानी तू आत्मा बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अभी संगठित रूप में लाइट-हाउस, माइट-हाउस बन शक्तिशाली वायब्रेशन्स फैलाने की सेवा करो।* अभी अपनी वृत्ति को, वायब्रेशन, वायुमण्डल पावरफुल बनाओ। *चारों ओर का वायुमण्डल सम्पूर्ण निर्विघ्न रहमदिल, शुभ भावना, शुभ कामना वाला बने तब यह लाइट-माइट प्रत्यक्षता के निमित्त बनेंगी।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं एक बल एक भरोसे वाली नष्टोमोहा आत्मा हूँ"*

 

〰✧  सभी एक बल एक भरोसे का अनुभव करते हो? एक बल, एक भरोसे वाले की निशानी क्या होगी? एक बल, एक भरोसे में रहने वाली आत्मा सदा एक रस स्थिति में स्थित होगी। एकरस स्थिति अर्थात् सदा अचल, हलचल नहीं। तो ऐसे रहते हो कि कभी हलचल, कभी अचल? हलचल के समय एक बल, एक भरोसा कहेंगे या अनेक बल, अनेक भरोसा कहेंगे? *जब एक बाप द्वारा सर्वशक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं तो एक बल, एक भरोसा चाहिये ना। एक को भूलते हो तभी हलचल होती है। तो अचल रहने वाले हो ना? यहाँ आपका यादगार कौन-सा है? अचल घर है या हलचल घर है? या अचल घर कभी हलचल घर हो जाता है! यादगार आपका ही है ना। फिर हलचल में क्यों आते हो?*

 

  प्रैक्टिकल का ही यादगार बना है ना। तो सदा ये याद करो कि एक बल एक भरोसे में रहने वाले हैं। क्योंकि भक्ति में अनेक के ऊपर भरोसा रखकरके अनुभव कर लिया ना तो क्या मिला? सब कुछ गंवा लिया ना। सतयुग का इतना सारा धन कहाँ गंवाया? भक्ति में गँवाया ना। अच्छी तरह से अनुभव कर लिया ना। *तो जब भी कोई ऐसे हलचल की परिस्थिति आती है तो अपने यादगार अचल घर को याद करो। जब यादगार ही अचल घर है तो मैं कैसे हलचल में आ सकती हूँ! ये तो सहज याद आयेगा ना। एकरस स्थिति का अर्थ ही है कि एक द्वारा सर्व सम्बन्ध, सर्व प्राप्तियों के रस का अनुभव करना।* तो अनुभव होता है कि बीच-बीच में और कोई सम्बन्ध भी खींचता है?

 

  जब सर्व सम्बन्ध एक द्वारा अनुभव होता है तो दूसरे सम्बन्ध में आकर्षण होने की तो बात ही नहीं है। सर्व सम्बन्ध का अनुभव है कि कोई-कोई सम्बन्ध का अनुभव है? सर्व सम्बन्ध से बाप को अपना बनाया है कि कोई सम्बन्ध किनारे रख दिया है? सर्व हैं कि एक-दो में अटेन्शन जाता है? कोई का भाई में, कोई का बच्चे में, कोई का पोत्रे में! नहीं? *निभाना अलग चीज है, आकर्षित होना अलग चीज है। तो नष्टोमोहा हो? पाण्डवों को पैसे कमाने में मोह नहीं है? ट्रस्टी होकर कमाना अलग चीज है। लगाव से कमाना, मोह से कमाना अलग चीज है।* कभी धन में मोह जाता है? थोड़ा-थोड़ा जाता है? क्या होगा, कैसे होगा, जमा कर लें, कुछ कर लें, पता नहीं कितने वर्ष के बाद विनाश होता है, दस वर्ष लगते हैं या 50 वर्ष लगते हैं.. ये नहीं आता? नष्टोमोहा बनकर, ट्रस्टी बनकरके चलना और मोह से चलना कितना अन्तर है!

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  स्थूल कर्मेन्द्रियाँ - यह तो बहुत मोटी बात है। कर्मेन्द्रिय-जीत बनना, यह फिर भी सहज है। लेकिन *मन-बुद्धि-संस्कार, इन सूक्ष्म शक्तियों पर विजयी बनना कहते हैं सूक्ष्म शक्तियों पर विजय अर्थात राजऋषि स्थिति।*

 

✧  जैसे स्थूल कर्मेन्द्रियों को ऑर्डर करते हो कि यह करो, यह न करो। हाथ नीचे करो, ऊपर हो, तो ऊपर हो जाता है ना *ऐसे संकल्प और संस्कार और निर्णय शक्ति बुद्धि' ऐसे ही ऑर्डर पर चले।*

 

✧  आत्मा अर्थात राजा, मन को अर्थात संकल्प शक्ति को ऑर्डर करें कि *अभी-अभी एकाग्रचित हो जाओ, एक संकल्प में स्थित हो जाओ।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ क्योंकि अन्त में अशरीरीपन का अभ्यास ही काम में आयेगा। सेकण्ड में अशरीरी हो जायें। *चाहे अपना पार्ट भी कोई चल रहा हो लेकिन अशरीरी बन आत्मा साक्षी हो अपने शरीर का भी पार्ट देखें। मैं आत्मा न्यारी हूँ शरीर से यह पार्ट करा रही हूँ। यही न्यारेपन की अवस्था अन्त में विजयी या पास विद ऑनर का सर्टिफिकेट देगी।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  सतयुगी राजधानी स्थापन करने की स्मृति में रहना"*

 

_ ➳  मधुबन प्रांगण में डायमण्ड हॉल में अपने खुबसूरत लक्ष्य को निहारती मै आत्मा मन्त्रमुग्ध हो जाती हूँ... और मीठे बाबा की याद में गहरे डूब जाती हूँ... और अगले ही पल दादी गुलजार के तन में विराजित मीठे बाबा को पाकर... अपने महान भाग्य पर मुस्कराती हूँ... मीठे बाबा मुझ आत्मा पर ज्ञान रत्नों की बरसात कर मुझे महा धनवान् बना रहे है... और मै आत्मा *भगवान को यूँ पिता, टीचर, सतगुरु रूप में पाकर भाव विभोर हो जाती हूँ.*.. ज्ञान धन से लबालब मै आत्मा, अपने देवताई लक्ष्य को सदा स्मर्ति में लिए... मीठे बाबा के हाथो में अपना हाथ देकर... सदा के लिए निश्चिन्त हो मुस्कराती हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने ज्ञान रत्नों की बौछार मुझ आत्मा पर कर सम्पन्न बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *अपने प्यारे बच्चों को फिर से शहंशाह बनाने के लिए, भगवान पिता बनकर. अथाह खजानो और सुखो को अपनी हथेली पर सजाकर लाया है.*.. इस ईश्वरीय दौलत से सम्पन्न हो, देवताई सुखो में मुस्कराओ... अपना सम्पन्न स्वरूप देवताई लक्ष्य, सदा याद रख निरन्तर आगे बढ़ो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा से यूँ ज्ञान धन से मालामाल होकर, कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा... आपने मुझ आत्मा को अपनी गोद में बिठाकर, ज्ञान धन से भरपूर किया है... *भगवान को टीचर रूप में पाने वाली, मै संसार की सबसे भाग्यशाली आत्मा हूँ... जिसे ईश्वर पिता अपने हाथो से देवताई स्वरूप में ढाल रहा है.*.. यह कितना प्यारा मेरा भाग्य है..."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को देवताई लक्ष्य का नशा दिलाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... *संगम के वरदानी समय पर, ईश्वर पिता से देवताई अमीरी से, भरपूर हो रहे हो.*.. इस मीठे भाग्य के नशे में हर पल झूमते रहो... मीठे बाबा से फिर से राजयोग सीख, देवताई सौंदर्य और विश्व की राजाई पा रहे हो... अपने लक्ष्य को सदा स्मर्ति में रख ईश्वरीय यादो में खोये रहो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा से बेपनाह सुख और दौलत पाकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... मै आत्मा *आपकी यादो की बाँहों में, खुबसूरत देवताई लक्ष्य पाकर, मनुष्य से देवतुल्य बन रही हूँ..*. इस समूर्ण विश्व धरा पर राज्य भाग्य पा रही हूँ... प्यारे बाबा आपसे पुनः राजयोग सीख, अपनी खोयी शक्तियाँ और गुणो के खजाने से पुनः भर रही हूँ..."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को अपने प्यार और वरदानों से भरपूर करते हुए कहते है :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वर पिता की प्यार भरी छत्रछाया में बैठकर,पढ़ाई पढ़कर, सहज ही देवताई लक्ष्य को बाँहों में पा लो... *घनेरे सुखो की बहारो में प्रेम, शांति और आनन्द के झूलो में खिलखिलाओ.*..मीठे बाबा के सारे खजानो के अधिकारी बन, विश्व की बादशाही को पाने वाले महान भाग्यवान बनकर मुस्कराओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा को असीम प्यार से निहारते और गले लगाते हुए कहती हूँ :-* "सच्चे साथी बाबा मेरे... मै आत्मा आपको पाकर धन्य धन्य हो गयी हूँ... आपकी यादो में गुणवान, शक्तिवान बन, अपने खोये अस्तित्व को पुनः पा रही हूँ... *सच्चे सुख, शांति और प्रेम की दुनिया की ओर रुख कर रही हूँ... और सदा की मालामाल हो रही हूँ.*.."मीठे बाबा की बाँहों में अथाह ज्ञान रत्नों को पाकर मै आत्मा... अपने स्थूल वतन में लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  पुरानी दुनिया से, पुरानी देह से दिल नही लगानी है*

 

_ ➳  अंतिम समय के एक सेकेण्ड के पेपर के बारे में एकान्त में बैठी मैं विचार कर रही हूँ कि कैसा होगा अंत समय का वो एक सेकण्ड का पेपर! *साधारण पढ़ाई में भी जब स्टूडेंट्स का सरप्राइज टेस्ट होता है तो उस टेस्ट को देख कई स्टूडेंट्स के माथे पर तो पसीना आ जाता है*। यहाँ तो कल्प - कल्प की बाजी है। एक बार असफल होना माना कल्प - कल्प के लिए असफल हो जाना। 

 

_ ➳  यही सब चिंतन करते हुए अब अपने आप से मैं सवाल करती हूँ कि क्या मैं ऐसी तैयारी कर रही हूँ! *क्या मेरी ऐसी ऊँची स्थिति बन रही है जो अंत समय के एक सेकण्ड के पेपर को देख मुझे पसीने ना आयें बल्कि खुशी और सफलता के दृढ़ विश्वास के साथ मैं वो पेपर दे सकूँ और पास विद ऑनर हो सकूँ*! ऐसा तभी हो सकता है जब अंत मति सो गति का मेरा बहुत अच्छा पुरुषार्थ होगा।

 

_ ➳  अंत मति सो गति ही, अंतिम समय के एक सेकण्ड के पेपर में पास विद ऑनर का खिताब दिलाये मेरे सतयुगी ऊँच पद की प्राप्ति का आधार बनेंगी। *इसलिए अब मुझे अंत मति सो गति के पुरुषार्थ में तीव्र गति से लग जाना है। इस पुरानी दुनिया से दिल हटाकर, अपना मुख मोड़ लेना है और हर बात से उपराम होकर बुद्धि को अपने परमधाम घर मे स्थित कर देना है*। केवल अल्फ और बे इन दो शब्दों को स्मृति में रख, अपने प्यारे प्रभु की याद से विकर्मो को दग्ध करना है और विश्व की बादशाही प्राप्त करने का तीव्र पुरुषार्थ करना है। 

 

_ ➳  मन ही मन स्वयं से दृढ़ प्रतिज्ञा कर, इस प्रतिज्ञा को पूरा करने और इसमें सफल होने का वरदान अपने प्यारे प्रभु से प्राप्त करने करने के लिए और उनकी याद से विकर्मो को दग्ध करने के लिए अब मैं अशरीरी स्थिति में स्वयं को स्थित करती हूँ। *हर संकल्प विकल्प से अपने मन और बुद्धि को खाली करने के लिए अपने सम्पूर्ण ध्यान को अपने स्वरूप पर मैं एकाग्र कर लेती हूँ और अपने वास्तविक शान्त स्वरूप में स्थित होकर, शान्ति के एक अति सुखद अनुभव में कुछ पल के लिए खो जाती हूँ*। 

 

_ ➳  अपने स्वधर्म में स्थित हो कर शांति की गहन अनुभूति करते हुए मेरी बुद्धि का कनेक्शन स्वत: ही शांति के सागर मेरे शिव पिता के साथ जुड़ जाता है और मेरे प्यारे पिता की सर्वशक्तियों की किरणें मुझे सेकेण्ड में अपनी ओर खींच लेती हैं। *उनकी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों को थामे मैं देह के अकालतख्त को छोड़ देह से बाहर आ जाती हूँ और ऊपर अपने शिव पिता के पास उनकी निराकारी दुनिया की ओर प्रस्थान कर जाती हूँ*।

 

_ ➳  साकार और सूक्ष्म लोक को पार कर मैं मूल वतन में प्रवेश करती हूँ और अपने पिता की किरणों रूपी बाहों के झूले से नीचे उतर कर अपने इस ब्रह्मलोक, परमधाम घर की सैर करते हुए, इस अंतहीन ब्रह्मांड में फैले शांति के वायब्रेशन्स को अपने अंदर समाकर गहन शांति की अनुभूति करते हुए अब बाबा के पास जा कर बैठ जाती हूँ। *उनकी सर्वशक्तियों की अथाह किरणे एक मीठे झरने के रूप में मुझ पर बरसने लगती हैं और मुझे सर्वशक्तियों से भरपूर करके आप समान शक्तिशाली बना देती है*। बाबा की सर्वशक्तियों को स्वयं में समाकर मैं वापिस साकार लोक में लौट आती हूँ और फिर से अपने साकार शरीर रूपी रथ पर आकर विराजमान हो जाती हूँ।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण जीवन में शक्तिसम्पन्न स्वरूप के साथ, अब मैं अंत मति सो गति के लिए निरन्तर सर्वशक्तिवान बाप की याद में रहने का सहज पुरुषार्थ कर रही हूँ। सर्वसम्बन्धो से बाबा को अपना बनाकर, हर सम्बन्ध का सुख बाबा से लेते हुए, देह और देह की दुनिया से मैं नष्टोमोहा बनती जा रही हूँ। *इस पुरानी दुनिया से मेरी दिल हटती जा रही है। अपना मुख इस विनाशी दुनिया से मोड़, नई आने वाली सतयुगी दुनिया की ओर करके,अंत मति सो गति द्वारा, अंतिम समय के पेपर में पास विद ऑनर होने का पुरुषार्थ मैं पूरी लग्न के साथ कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं आदि रत्न की स्मृति स्वरूप आत्मा हूँ।*

   *मैं अपने जीवन का मूल्य जानने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सदा समर्थ आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं ज्ञानी तू आत्मा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा धोखा खाने से पहले परख लेती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा परखने की शक्ति यूज़ करके स्वयं को बचा लेती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *ब्रह्मा बाप को देखाकैसा भी बच्चा होशिक्षादाता बन शिक्षा भी देते लेकिन शिक्षा के साथ प्यार भी दिल में रखते।* और प्यार कोई बाहों का नहीं, लेकिन प्यार की निशानी है - अपनी शुभ भावना सेशुभ कामना से कैसी भी माया के वश आत्मा को परिवर्तन करना। कोई भी हैकैसी भी हैघृणा भाव नहीं आवेयह तो बदलने वाले ही नहीं हैंयह तो हैं ही ऐसे। नहीं। *अभी आवश्यकता है रहमदिल बनने की क्योंकि कई बच्चे कमजोर होने के कारण अपनी शक्ति से कोई बड़ी समस्या से पार नहीं हो सकतेतो आप सहयोगी बनो।* किससे? सिर्फ शिक्षा से नहींआजकल शिक्षा, सिवाए प्यार या शुभ भावना के कोई नहीं सुन सकता। यह तो फाइनल रिजल्ट है, शिक्षा काम नहीं करती लेकिन शिक्षा के साथ शुभ भावना, रहमदिल यह सहज काम करता है। *जैसे ब्रह्मा बाप को देखामालूम भी होता कि आज इस बच्चे ने भूल की हैतो भी उस बच्चे को शिक्षा भी तरीके सेयुक्ति से देता और फिर उसको बहुत प्यार भी करता, जिससे वह समझ जाते कि बाबा का प्यार है और प्यार में गलती के महसूसता की शक्ति उसमें आ जाती।*

 

✺   *ड्रिल :-  "ब्रह्माबाप समान प्यार से शिक्षा देना"*

 

 _ ➳  रिमझिम रिमझिम बारिश की हल्की हल्की फुहारों के साथ... मैं सागर के किनारे बैठ कर लहरों को आता जाता देख... मन के ताने बाने से... सागर की गहराई को नापने की कोशिश कर रही हूँ... तभी *बाबा की याद में खोया हुआ मन पहुँच जाता है सूक्ष्म वतन में... जहाँ बापदादा लाल रंग के कमल के फूल पर बैठे हुए मन्द मन्द मुस्कुरा रहें हैं...*  

 

 _ ➳  मैं दौड़ कर उनकी गोद में जाकर बैठ जाती हूँ... बाबा कहते... आ जाओ बच्ची... मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था... फिर बाबा अपने कोमल हाथों द्वारा मेरे सिर पर प्यार भरा हाथ फिराते हैं... *बाबा के वरद हाथों से अनन्त शक्तिशाली किरणें मेरे शरीर के रोम रोम में फैल रही हैं... मैं बाबा से आती इन शक्तिशाली किरणों को स्वयं में समाती हुई अनुभव कर रही हूँ...* लहरों के समान दौड़ता हुआ मेरा मन शांत शीतल होता जा रहा है... और स्नेह के सागर... प्रेम के सागर... के प्रेम में... मैं आत्मा लवलीन हो गयी हूँ... मास्टर प्रेम का सागर बन गयी हूँ...  

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा बाबा की मीठी बच्ची सदा ब्रह्मा बाप समान... हर आत्मा के प्रति कल्याण की भावना... शुभ भावना शुभ कामना... रहम की भावना रखती हूँ... किसी भी आत्मा के प्रति नकरात्मक संकल्प नहीं रखती हूँ... सबके प्रति प्रेम की भावना... पॉजिटिव सोच रखती हूँ... क्योंकि संकल्पों से ही वायुमण्डल बनता है... *धारणा स्वरूप... याद स्वरूप बन... मैं आत्मा ब्रह्मा बाप समान रहमदिल बन सभी आत्माओं के प्रति शुभ भावना रख उन्हें ज्ञान की बातें सुना रही हूँ...* 

 

 _ ➳  *मैं आत्मा बाप समान... रूहानी दृष्टि... वृत्ति रख... अन्य आत्माओं की कमी कमजोरी... अवगुणों को नज़र अंदाज़ करते हुए उन्हें बाबा का परिचय... सृष्टि के आदि-मध्य-अंत... के बारे में योगयुक्त... युक्तियुक्त... बहुत प्यार से समझा रही हूँ...* ज्ञान की बातें सुनकर उन आत्माओं के मन शांत हो रहें हैं... उनके मन में क्या... क्यों के प्रश्नों की झड़ियां समाप्त हो रही हैं... *ज्ञान की बातें उन्हें तीर की तरह लग रही हैं...*      

 

 _ ➳  हर आत्मा के प्रति यह एक ही शुभ संकल्प रहता कि हर आत्मा रूपी बच्चा सर्व खजानों से सम्पन्न हो जाये और अनेक जन्मों के लिये वर्से का अधिकारी बन जाये... *मैं आत्मा ब्रह्मा बाप समान सभी माया के वश आत्माओं को शुभ भावना... शुभ कामना से परिवर्तन कर उन्हें उमंग उत्साह से... प्यार से शिक्षा देते हुए खुशी का अनुभव कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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