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 12 / 09 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *स्वमान की श्रेष्ठ सीट पर सेट रहे ?*

 

➢➢ *पवित्रता की धारणा पर विशेष अटेंशन रहा ?*

 

➢➢ *बाबा को रमणीकता से भिन्न भिन्न विधियों से याद किया ?*

 

➢➢ *स्वयं को मधुबन निवासी अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अभी संगठित रूप में लाइट-हाउस, माइट-हाउस बन शक्तिशाली वायब्रेशन्स फैलाने की सेवा करो।* अभी अपनी वृत्ति को, वायब्रेशन, वायुमण्डल पावरफुल बनाओ। *चारों ओर का वायुमण्डल सम्पूर्ण निर्विघ्न रहमदिल, शुभ भावना, शुभ कामना वाला बने तब यह लाइट-माइट प्रत्यक्षता के निमित्त बनेंगी।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं एक बल एक भरोसे वाली नष्टोमोहा आत्मा हूँ"*

 

〰✧  सभी एक बल एक भरोसे का अनुभव करते हो? एक बल, एक भरोसे वाले की निशानी क्या होगी? एक बल, एक भरोसे में रहने वाली आत्मा सदा एक रस स्थिति में स्थित होगी। एकरस स्थिति अर्थात् सदा अचल, हलचल नहीं। तो ऐसे रहते हो कि कभी हलचल, कभी अचल? हलचल के समय एक बल, एक भरोसा कहेंगे या अनेक बल, अनेक भरोसा कहेंगे? *जब एक बाप द्वारा सर्वशक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं तो एक बल, एक भरोसा चाहिये ना। एक को भूलते हो तभी हलचल होती है। तो अचल रहने वाले हो ना? यहाँ आपका यादगार कौन-सा है? अचल घर है या हलचल घर है? या अचल घर कभी हलचल घर हो जाता है! यादगार आपका ही है ना। फिर हलचल में क्यों आते हो?*

 

  प्रैक्टिकल का ही यादगार बना है ना। तो सदा ये याद करो कि एक बल एक भरोसे में रहने वाले हैं। क्योंकि भक्ति में अनेक के ऊपर भरोसा रखकरके अनुभव कर लिया ना तो क्या मिला? सब कुछ गंवा लिया ना। सतयुग का इतना सारा धन कहाँ गंवाया? भक्ति में गँवाया ना। अच्छी तरह से अनुभव कर लिया ना। *तो जब भी कोई ऐसे हलचल की परिस्थिति आती है तो अपने यादगार अचल घर को याद करो। जब यादगार ही अचल घर है तो मैं कैसे हलचल में आ सकती हूँ! ये तो सहज याद आयेगा ना। एकरस स्थिति का अर्थ ही है कि एक द्वारा सर्व सम्बन्ध, सर्व प्राप्तियों के रस का अनुभव करना।* तो अनुभव होता है कि बीच-बीच में और कोई सम्बन्ध भी खींचता है?

 

  जब सर्व सम्बन्ध एक द्वारा अनुभव होता है तो दूसरे सम्बन्ध में आकर्षण होने की तो बात ही नहीं है। सर्व सम्बन्ध का अनुभव है कि कोई-कोई सम्बन्ध का अनुभव है? सर्व सम्बन्ध से बाप को अपना बनाया है कि कोई सम्बन्ध किनारे रख दिया है? सर्व हैं कि एक-दो में अटेन्शन जाता है? कोई का भाई में, कोई का बच्चे में, कोई का पोत्रे में! नहीं? *निभाना अलग चीज है, आकर्षित होना अलग चीज है। तो नष्टोमोहा हो? पाण्डवों को पैसे कमाने में मोह नहीं है? ट्रस्टी होकर कमाना अलग चीज है। लगाव से कमाना, मोह से कमाना अलग चीज है।* कभी धन में मोह जाता है? थोड़ा-थोड़ा जाता है? क्या होगा, कैसे होगा, जमा कर लें, कुछ कर लें, पता नहीं कितने वर्ष के बाद विनाश होता है, दस वर्ष लगते हैं या 50 वर्ष लगते हैं.. ये नहीं आता? नष्टोमोहा बनकर, ट्रस्टी बनकरके चलना और मोह से चलना कितना अन्तर है!

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  स्थूल कर्मेन्द्रियाँ - यह तो बहुत मोटी बात है। कर्मेन्द्रिय-जीत बनना, यह फिर भी सहज है। लेकिन *मन-बुद्धि-संस्कार, इन सूक्ष्म शक्तियों पर विजयी बनना कहते हैं सूक्ष्म शक्तियों पर विजय अर्थात राजऋषि स्थिति।*

 

✧  जैसे स्थूल कर्मेन्द्रियों को ऑर्डर करते हो कि यह करो, यह न करो। हाथ नीचे करो, ऊपर हो, तो ऊपर हो जाता है ना *ऐसे संकल्प और संस्कार और निर्णय शक्ति बुद्धि' ऐसे ही ऑर्डर पर चले।*

 

✧  आत्मा अर्थात राजा, मन को अर्थात संकल्प शक्ति को ऑर्डर करें कि *अभी-अभी एकाग्रचित हो जाओ, एक संकल्प में स्थित हो जाओ।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ क्योंकि अन्त में अशरीरीपन का अभ्यास ही काम में आयेगा। सेकण्ड में अशरीरी हो जायें। *चाहे अपना पार्ट भी कोई चल रहा हो लेकिन अशरीरी बन आत्मा साक्षी हो अपने शरीर का भी पार्ट देखें। मैं आत्मा न्यारी हूँ शरीर से यह पार्ट करा रही हूँ। यही न्यारेपन की अवस्था अन्त में विजयी या पास विद ऑनर का सर्टिफिकेट देगी।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  याद में रमणीकता लाना"*

 

_ ➳  प्यारे बाबा को अपने दिल आँगन में बुलाकर... अपनी सारी मीठी भावनाये उंडेलती हुई... मीठे चिंतन में खो जाती हूँ... *कि इस जीवन में मीठे बाबा ने आकर कितनी रौनक बिखेरी है.*.. दुखो में कलुषित जीवन जीने वाली मै आत्मा.... आज मीठे बाबा के हाथ को पकड़े...उमंगो से भरी हुई... हर आत्मा को भी उजालो में ला रही हूँ... मीठे बाबा की शक्तियो को स्वयं में समाकर... माया के हर दांव को निष्फल कर रही हूँ... और देखती हूँ, अपने प्यारे बाबा को जो... कब से खड़े, मेरी भावनाओ को निहार रहे है...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को ज्ञान धन की मल्लिका बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... सदा विधि को अपनाने वाले सिद्धि स्वरूप बनकर मुस्कराओ... विधान से विश्व निर्माता बनो और वरदानों से वरदानी मूर्त बनकर, मीठे बाबा को जहान में प्रत्यक्ष करो... *मा विधाता बनकर सबको खुशियो भरे भाग्य से भरकर आप समान सुखी बनाओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से पायी असीम खुशियो पर मुस्कराते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... आपकी प्यारी गोद में खिलकर तो मै आत्मा मा विधाता बन गयी हूँ... स्वयं को भी नही जानती थी, और *आज सारे विश्व का कल्याण करने वाला प्यारा दिल लिए घूम रही हूँ... मीठे बाबा कितनी प्यारी जादूगरी आपने सिखायी है.*.."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को सच्चे स्नेह से सींचते हुए कहते है :-* " सदा मीठे बाबा का हाथ पकड़े कम्बाइंड रहो... और निमित्त भाव लिए खुशियो में झूमते रहो... मीठे बाबा के नयनों का नूर बनकर सदा आगे बढ़ते रहो... और *हजार हाथो की मदद बाबा से पाकर, हर कदम सफलता...पाने वाले महा भाग्यवान बनकर विश्व धरा पर इठलाओ.*.. लाइट हाऊस बनकर सबको सत्य रौशनी की राहे दिखाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा से शक्तियो को लेकर स्वयं में भरते हुए कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... आपके सत्य ज्ञान से ओजस्वी होकर मै आत्मा... हर दिल को अँधेरे से निकाल, सत्य के प्रकाश से भर रही हूँ... *आपके हजार हाथो में अपने हाथो को सौंपकर... कितनी निश्चिन्त सी और बेफिक्र बन झूम रही हूँ.*.."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपने दिलतख्त पर बिठाते हुए कहा :-* "मीठे सिकीलधे प्यारे बच्चे... मीठे बाबा का हाथ पकड़ कर महावीर बनकर... माया पर सहज ही जीत पाओ... बड़े बाप के संग रह, सदा विजय पताका फहराओ... *पहले आप के गुण से परमार्थ और व्यवहार में सर्व के प्रिय बनकर मुस्कराओ..*.

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा को दिल से असीम दुआए देते हुए कहती हूँ :-* "मीठे दुलारे बाबा मेरे... *आपके फूलो से हाथो को थाम कर.. जीवन कितनी अपार ख़ुशी की जागीर बन गया है.*.. जिस माया के गर्त में गहरे फंसी थी... आज आपकी यादो के सहारे, उस दलदल से निकलना कितना आसान हो गया है..."प्यारे बाबा से मीठी सी रुहरिहानं कर मै आत्मा... अपने साकार वतन में लॉट आयी...

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- स्वमान की श्रेष्ठ सीट पर सेट होने का अनुभव*"

 

 _ ➳  "मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ, सर्वशक्तिवान की संतान हूँ" इस श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर सेट होते ही मैं अनुभव करती हूँ जैसे परमधाम से सर्वशक्तिवान शिव बाबा अपनी सर्वशक्तियाँ बिखेरते हुए, मेरे सिर के बिल्कुल ऊपर आ कर स्थित हो गए हैं और उनकी सर्वशक्तियों से मेरे चारों और एक बहुत ही सुंदर औरा निर्मित हो गया है। *इस औरे का विस्तार जैसे - जैसे बढ़ रहा है वैेसे - वैसे मेरे चारों और का वायुमण्डल बहुत ही शक्तिशाली बनता जा रहा है*। एक - एक करके मेरी सभी शक्तियां इमर्ज रूप में मेरे सामने उपस्थित हो गई है और मैं स्वयं को बहुत ही शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ। *अपनी इस शक्तिशाली स्थिति में स्थित हो कर अब मैं अपने लाइट के फ़रिशता स्वरूप को धारण कर लेती हूँ*।

 

 _ ➳  सर्वशक्तियों से सम्पन्न अपने फ़रिशता स्वरूप में स्थित हो कर, अपने सर्वशक्तिवान परम पिता परमात्मा की छत्रछाया के नीचे स्वयं को अनुभव करते, अब मैं फ़रिशता सारी दुनिया का चक्कर लगा रहा हूँ। *सर्वशक्तिवान मेरे शिव पिता परमात्मा से निरन्तर सर्वशक्तियाँ निकल कर मुझ फ़रिश्ते में और मुझ फ़रिश्ते से सारे विश्व में फैलती जा रही हूँ*। मैं देख रहा हूँ उन सभी तड़पती हुई, अशांत आत्माओं को जो पल भर की शांति की तलाश में भटक - भटक कर बिल्कुल निर्बल, शक्तिहीन हो चुकी हैं और मुझ फ़रिश्ते से निकल रही सर्वशक्तियों को पा कर स्वयं को शक्तिशाली अनुभव करने लगी है। *मुझ फ़रिश्ते से निकल रही सर्वशक्तियाँ उनमें शक्ति का संचार कर रही हैं*।

 

 _ ➳  सर्वशक्तिवान बाबा की सर्वशक्तियों की छत्रछाया के नीचे, विश्व की सर्व आत्माओं को शक्तियां प्रदान करता मैं फ़रिशता अब अपने सर्वशक्तिवान बाबा के साथ सूक्ष्म लोक की ओर जा रहा हूँ। *सूक्ष्म लोक में पहुंच कर बाबा अपने निर्धारित रथ, ब्रह्मा बाबा की भृकुटि में विराजमान हो जाते हैं और मुझे अपने पास बिठा कर, शक्तिशाली दृष्टि दे कर अपनी सर्वशक्तियों से मुझे भरपूर करने लगते हैं*। अपने हाथ मेरे हाथों पर रख कर बाबा अपनी सर्वशक्तियाँ मुझे विल करने के बाद अपने निराकार स्वरूप में परमधाम की ओर प्रस्थान करते हैं। मैं भी अपनी फ़रिशता ड्रेस को वही उतार कर, अपने निराकार ज्योति बिंदु स्वरूप में स्थित हो कर उनके पीछे परमधाम की ओर चल पड़ती हूँ।

 

 _ ➳  परमधाम में पहुंच कर, सर्वशक्तिवान बीज रूप अपने शिव पिता परमात्मा के सानिध्य में मैं मास्टर बीज रूप आत्मा जा कर बैठ जाती हूँ। बाबा से आती सर्वशक्तियों रूपी किरणों की मीठी - मीठी फुहारे मुझे असीम बल प्रदान कर रही हैं। सर्वशक्तियों से मैं सम्पन्न होती जा रही हूँ।  *ऐसा लग रहा है जैसे अपनी समस्त ऊर्जा का भंडार बाबा मेरे अंदर समाहित कर रहे हैं ताकि संपूर्ण ऊर्जावान बन मैं विश्व की समस्त आत्माओं का कल्याण करने के निमित बन बाबा के कार्य में मददगार बन सकूँ*। परमात्म शक्तियों से स्वयं को भरपूर कर, शक्तियों का पुंज बन अब मैं परमधाम से नीचे आ जाती हूँ और साकारी दुनिया मे आ कर अपने पांच तत्वों के बने शरीर में मैं प्रवेश करती हूँ, इस स्मृति के साथ कि अब मुझे मास्टर सर्व शक्तिवान आत्मा बन निर्बल आत्माओं को शक्ति स्वरुप स्थिति का अनुभव करवाना है।

 

 _ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर अब मैं स्वयं को सदा इस श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर सेट रखती हूँ कि "मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ, सर्वशक्तिवान की संतान हूँ"। *इस श्रेष्ठ स्वमान की स्मृति में रहने से मैं स्वयं को सदैव अपने सर्वशक्तिवान शिव बाबा के साथ कम्बाइन्ड अनुभव करती हूँ*। जिससे मुझ आत्मा की शक्तियाँ सदैव इमर्ज रहती है और मेरा शक्तिसम्पन्न स्वरूप मेरे सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली निर्बल और कमजोर आत्माओं को भी, उनके शक्तियों से सम्पन्न ओरिजनल स्वरूप का रीयलाईजेशन करवा कर उन्हें भी शक्ति स्वरूप स्थिति का अनुभव करवाता रहता है।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सेकण्ड में देह रूपी चोले से न्यारी बनने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं कर्मभोग पर विजय प्राप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सर्व शक्ति सम्पन्न आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं निर्मानचित्त आत्मा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव सर्व का मान प्राप्त करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा महानता की निशानी निर्मानता को धारण करती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *ब्रह्मा बाप को देखाकैसा भी बच्चा होशिक्षादाता बन शिक्षा भी देते लेकिन शिक्षा के साथ प्यार भी दिल में रखते।* और प्यार कोई बाहों का नहीं, लेकिन प्यार की निशानी है - अपनी शुभ भावना सेशुभ कामना से कैसी भी माया के वश आत्मा को परिवर्तन करना। कोई भी हैकैसी भी हैघृणा भाव नहीं आवेयह तो बदलने वाले ही नहीं हैंयह तो हैं ही ऐसे। नहीं। *अभी आवश्यकता है रहमदिल बनने की क्योंकि कई बच्चे कमजोर होने के कारण अपनी शक्ति से कोई बड़ी समस्या से पार नहीं हो सकतेतो आप सहयोगी बनो।* किससे? सिर्फ शिक्षा से नहींआजकल शिक्षा, सिवाए प्यार या शुभ भावना के कोई नहीं सुन सकता। यह तो फाइनल रिजल्ट है, शिक्षा काम नहीं करती लेकिन शिक्षा के साथ शुभ भावना, रहमदिल यह सहज काम करता है। *जैसे ब्रह्मा बाप को देखामालूम भी होता कि आज इस बच्चे ने भूल की हैतो भी उस बच्चे को शिक्षा भी तरीके सेयुक्ति से देता और फिर उसको बहुत प्यार भी करता, जिससे वह समझ जाते कि बाबा का प्यार है और प्यार में गलती के महसूसता की शक्ति उसमें आ जाती।*

 

✺   *ड्रिल :-  "ब्रह्माबाप समान प्यार से शिक्षा देना"*

 

 _ ➳  रिमझिम रिमझिम बारिश की हल्की हल्की फुहारों के साथ... मैं सागर के किनारे बैठ कर लहरों को आता जाता देख... मन के ताने बाने से... सागर की गहराई को नापने की कोशिश कर रही हूँ... तभी *बाबा की याद में खोया हुआ मन पहुँच जाता है सूक्ष्म वतन में... जहाँ बापदादा लाल रंग के कमल के फूल पर बैठे हुए मन्द मन्द मुस्कुरा रहें हैं...*  

 

 _ ➳  मैं दौड़ कर उनकी गोद में जाकर बैठ जाती हूँ... बाबा कहते... आ जाओ बच्ची... मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था... फिर बाबा अपने कोमल हाथों द्वारा मेरे सिर पर प्यार भरा हाथ फिराते हैं... *बाबा के वरद हाथों से अनन्त शक्तिशाली किरणें मेरे शरीर के रोम रोम में फैल रही हैं... मैं बाबा से आती इन शक्तिशाली किरणों को स्वयं में समाती हुई अनुभव कर रही हूँ...* लहरों के समान दौड़ता हुआ मेरा मन शांत शीतल होता जा रहा है... और स्नेह के सागर... प्रेम के सागर... के प्रेम में... मैं आत्मा लवलीन हो गयी हूँ... मास्टर प्रेम का सागर बन गयी हूँ...  

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा बाबा की मीठी बच्ची सदा ब्रह्मा बाप समान... हर आत्मा के प्रति कल्याण की भावना... शुभ भावना शुभ कामना... रहम की भावना रखती हूँ... किसी भी आत्मा के प्रति नकरात्मक संकल्प नहीं रखती हूँ... सबके प्रति प्रेम की भावना... पॉजिटिव सोच रखती हूँ... क्योंकि संकल्पों से ही वायुमण्डल बनता है... *धारणा स्वरूप... याद स्वरूप बन... मैं आत्मा ब्रह्मा बाप समान रहमदिल बन सभी आत्माओं के प्रति शुभ भावना रख उन्हें ज्ञान की बातें सुना रही हूँ...* 

 

 _ ➳  *मैं आत्मा बाप समान... रूहानी दृष्टि... वृत्ति रख... अन्य आत्माओं की कमी कमजोरी... अवगुणों को नज़र अंदाज़ करते हुए उन्हें बाबा का परिचय... सृष्टि के आदि-मध्य-अंत... के बारे में योगयुक्त... युक्तियुक्त... बहुत प्यार से समझा रही हूँ...* ज्ञान की बातें सुनकर उन आत्माओं के मन शांत हो रहें हैं... उनके मन में क्या... क्यों के प्रश्नों की झड़ियां समाप्त हो रही हैं... *ज्ञान की बातें उन्हें तीर की तरह लग रही हैं...*      

 

 _ ➳  हर आत्मा के प्रति यह एक ही शुभ संकल्प रहता कि हर आत्मा रूपी बच्चा सर्व खजानों से सम्पन्न हो जाये और अनेक जन्मों के लिये वर्से का अधिकारी बन जाये... *मैं आत्मा ब्रह्मा बाप समान सभी माया के वश आत्माओं को शुभ भावना... शुभ कामना से परिवर्तन कर उन्हें उमंग उत्साह से... प्यार से शिक्षा देते हुए खुशी का अनुभव कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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