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 13 / 02 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बुधीयोग बाप और वरसे से लगा रहा ?*

 

➢➢ *बाप जो समझाते हैं, वह समझकर दूसरों को समझाया ?*

 

➢➢ *सम्पूरंता की रौशनी द्वारा अज्ञान का पर्दा हटाया ?*

 

➢➢ *माया और प्रकृति के आकर्षण से दूर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *कोई भी यह नहीं कह सकता कि हमको तो सेवा का चान्स नहीं है।* कोई बोल नहीं सकते तो मन्सा वायुमण्डल से सुख की वृत्ति, सुखमय स्थिति से सेवा करो। *तबियत ठीक नहीं है तो घर बैठे भी सहयोगी बनो, सिर्फ मन्सा में शुद्ध संकल्पों का स्टाक जमा करो, शुभ भावनाओं से सम्पन्न बनो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं आत्मिक स्मृति द्वारा कर्म करने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

✧  सभी अपने को सदा श्रेष्ठ आत्मा समझते हो? *श्रेष्ठ आत्मा अर्थात् हर संकल्प, बोल और कर्म सदा श्रेष्ठ हो। क्योंकि साधारण जीवन से निकल श्रेष्ठ जीवन में आ गये। कलियुग से निकल संगमयुग पर आ गये। जब युग बदल गया, जीवन बदल गई, तो जीवन बदला अर्थात् सब कुछ बदल गया।* ऐसा परिवर्तन अपने जीवन में देखते हो? कोई भी कर्म, चलन, साधारण लोगों के माफिक न हो। वे हैं लौकिक और आप - अलौकिक। तो अलौकिक जीवन वाले लौकिक आत्माओंसे न्यारे होंगे। संकल्प को भी चेक करो कि साधारण है वा अलौकिक है? साधारण है तो साधारण को चेक करके चेन्ज कर लो।

 

  जैसे कोई चीज सामने आती है तो चेक करते हो यह खाने योग्य है, लेने योग्य है, अगर नहीं होती तो नहीं लेते, छोड़ देते हो ना। ऐसे कर्म करने के पहले कर्म को चेक करो। साधारण कर्म करते-करते साधारण जीवन बन जायेगी फिर तो जैसे दुनिया वाले वैसे आप लोग भी उसमें मिक्स हो जायेंगे। न्यारे नहीं लगेंगे। अगर न्यारापन नहीं तो बाप का प्यारा भी नहीं। *अगर कभी कभी समझते हो कि हमको बाप का प्यार  अनुभव नहीं हो रहा है तो समझो कहाँ न्यारेपन में कमी है, कहाँ लगाव है। न्यारे नहीं बने हो तब बाप का प्यार अनुभव नहीं होता। चाहे अपनी देह से, चाहे सम्बन्ध से, चाहे किसी वस्तु से...स्थूल वस्तु भी योग को तोड़ने के निमित बन जाती है।* सम्बन्ध में लगाव नहीं होगा लेकिन खाने की वस्तु में, पहनने की वस्तु में लगाव होगा, कोई छोटी चीज भी नुकसान बहुत बड़ा कर देती है।

 

  तो सदा न्यारापन अर्थात् अलौकिक जीवन। जैसे वह बोलते, चलते, गृहस्थी में रहते ऐसे आप भी रहो तो अन्तर क्या हुआ! तो अपने आपको देखो कि परिवर्तन कितना किया है चाहे लौकिक सम्बन्ध में बहू हो, सासू हो, लेकिन आत्मा को देखो। बहू नहीं है लेकिन आत्मा है। आत्मा देखने से या तो खुशी होगी या रहम आयेगा। यह आत्मा बेचारी परवश है, अज्ञान में है, अंजान में है। मैं ज्ञानवान आत्मा हूँ तो उस अंजान आत्मा पर रहम कर अपनी शुभ भावना से बदलकर दिखाऊँगी। *अपनी वृत्ति, दृष्टि चेन्ज चाहिए। नहीं तो परिवार में प्रभाव नहीं पड़ता। तो वृत्ति और दृष्टि बदलना ही अलौकिक जीवन है। जो काम अज्ञानी करते वह आप नहीं कर सकते हो। संग का रंग आपका लगना चाहिए, न कि उन्हों के संग का रंग आपको लग जाए।* अपने को देखो मैं ज्ञानी आत्मा हूँ, मेरा प्रभाव अज्ञानी पर पड़ता है, अगर नहीं पड़ता तो शुभ भावना नहीं है। बोलने से प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन सूक्ष्म भावना जो होगी उसका फल मिलेगा।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आपको मालूम पडा कि ब्रह्मा बाप अव्यक्त हो रहा है, नहीं मालूम पडा ना! *तो इतना न्यारा, साक्षी, अशरीरी अर्थात कर्मातीत स्टेज बहुतकाल से अभ्यास की तब अन्त में भी वही स्वरूप अनुभव हुआ।* यह बहुतकाल का अभ्यास काम में आता है।

 

✧  *ऐसे नहीं सोचो कि अन्त मे देहभान छोड देंगे, नहीं। बहुतकाल का अशरीरीपन का, देह से न्यारा करावनहार स्थिति का अनुभव चाहिए।* अन्तकाल चाहे जवान है, चाहे बूढा है, चाहे तन्दरूस्त है, चाहे बीमार है, किसका भी कभी भी आ सकता है।

 

✧  इसलिए बहुतकाल साक्षीपन के अभ्यास पर अटेन्शन दो। *चाहे कितनी भी प्रकृतिक आपदायें आयेंगी लेकिन यह अशरीरीपन की स्टेज आपको सहज न्यारा और बाप का प्यारा बना देगी। इसलिए बहुतकाल शब्द को बापदादा अण्डरलाइन करा रहे हैं।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  इसलिए जैसे कोई भी बन्धन से मुक्त होते, वैसे ही सहज रीति शरीर के बन्धन से मुक्त हो सकें। नहीं तो शरीर के बन्धन से भी बड़ा मुश्किल मुक्त होंगे। *फाइनल पेपर है - अन्त मती सो गति। अन्त में सहज रीति शरीर के भान से मुक्त हो जायें - यह है 'पास विद ऑनर' की निशानी। लेकिन वह तब हो सकेगी जब अपना चोला टाइट नहीं होगा।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ *"ड्रिल :- शांति के लिए अशरीरी बनना"*

➳ _ ➳ मैं आत्मा घर की छत पर खड़े होकर सामने स्कूल के मैदान में बच्चों को देख रही हूँ... सभी बच्चे सफ़ेद पोशाक में खड़े होकर ड्रिल कर रहे हैं... जैसे-जैसे ड्रिल मास्टर आदेश कर रहे, वैसे-वैसे ही बच्चे ड्रिल कर रहे हैं... *मैं आत्मा मीठे बाबा का आह्वान करती हूँ... मीठे बाबा मुझे अपने गोद में उठाकर ले चलते हैं सूक्ष्म वतन में... प्यारे बाबा ड्रिल मास्टर बनकर मुझे रूहानी ड्रिल सिखाते हैं... मैं आत्मा इस शरीर से डिटैच होकर अशरीरी बन बाबा की यादों में खो जाती हूँ...*

❉ *मनमनाभव का मन्त्र देकर मुझे अशरीरी बनाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... अपने सत्य स्वरूप के नशे में गहरे डूब जाओ... *इस विकारी देह और देह के भान से स्वयं को मुक्त कर अशरीरी सच्चे वजूद की याद में खो जाओ... इस पराये शरीर के ममत्व से बाहर निकल अपने अविनाशी अस्तित्व की मस्ती में झूम जाओ...*

➳ _ ➳ *रावण की प्रॉपर्टी इस तन से न्यारी होकर अपने अविनाशी स्वरुप में टिकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में अपने असली स्वरूप को पाकर धन्य हो गयी हूँ... *दुःख को ही जीवन का अटल सत्य समझने वाली शरीरधारी से... इस कदर खुबसूरत मणि बन मुस्करा रही हूँ...*

❉ *देह की दुनिया के दलदल से निकाल रूहानियत का इत्र लगाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... जिस लाल घर के लाल हो वहाँ यह पराया तन तो जा ही न सके... तो इससे फिर दिल लगाना ही क्यों... *इन झूठे नातो और विकारी सम्बन्धो के भँवर से ईश्वरीय यादो के सहारे बाहर निकल जाओ... और अपने खुबसूरत स्वरूप और सच्चे सौंदर्य को प्रतिपल याद करो...*

➳ _ ➳ *सुख के सागर में सत्यता की नाव में बैठकर अपने घर की ओर रुख करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... आपने धरा पर आकर मुझ भूली भटकी आत्मा को आवाज देकर सुखो से संवार दिया है... *मै आत्मा तो दुखो के लिए हूँ ही नही और सदा सुख की अधिकारी हूँ... यह मीठा सत्य सुनकर मै आत्मा आपकी रोम रोम से ऋणी हो गयी हूँ...*

❉ *निराकारी बाबा मुझ आत्मा को आप समान निराकारी बनाते हुए कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... यह विकारी तन तो रावण का है यह कभी साथ जाना नही इसके मायाजाल से स्वयं को निकालो... *अपने अशरीरी के भान में खो जाओ और ईश्वर पिता की यादो में अपनी धुंधली सी हो गई रंगत को उसी ओज से भर लो...*

➳ _ ➳ *बाबा की यादों से अपने जीवन के हर एक पल को मीठा बनाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी प्यारी यादो में अपनी खोयी चमक को पाती जा रही हूँ... *शरीर के भान से मुक्त होकर सच्चे स्वरूप को प्रतिपल यादो में समाकर ईश्वरीय यादो में मालामाल होती जा रही हूँ... मै अजर अमर अविनाशी आत्मा हूँ इस सच्ची ख़ुशी से मुस्कराती जा रही हूँ...*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  विकर्माजीत बनने के लिए योगबल से विकर्मो पर जीत प्राप्त करनी है*"

➳ _ ➳  63
जन्मो के विकर्मो का बोझ जो आत्मा के ऊपर है उसे भस्म करने और स्वयं को विकर्माजीत बनाने के लिए मैं आत्मा बिंदु बन परमधाम में अपने बिंदु बाप के सानिध्य में जा कर बैठ जाती हूँ। *5 तत्वों से परे लाल सुनहरी प्रकाश से प्रकाशित यह दुनिया बहुत ही निराली और असीम शांति से भरपूर करने वाली है। यहाँ आकर मैं गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ*। संकल्पो की भी यहाँ कोई हलचल नही। अपनी ओरिजनल बीजरूप अवस्था में स्थित हो कर बीजरूप परमात्मा बाप के साथ का यह मंगल मिलन मुझे अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करवा रहा है। चित को चैन और मन को आराम दे रहा है।

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ज्ञानसूर्य शिव बाबा सर्वशक्तियों की ज्वलंत किरणों को निरन्तर मुझ बिंदु आत्मा पर प्रवाहित कर, मुझ आत्मा के ऊपर चढ़े हुए विकारों के किचड़े को जला कर भस्म कर रहे है। *बाबा से आ रही सर्वशक्तियों की अनन्त किरणे चक्र की भांति गोल - गोल घूमती हुई मेरे पास आ रही हैं। जैसे - जैसे इन किरणो का दायरा बढ़ता जा रहा है इनके आगोश में मैं गहराई तक समाती जा रही हूँ*। मेरे चारों और फैले सर्वशक्तियों के इस गोल चक्र ने जैसे ज्वाला स्वरूप धारण कर लिया है। ऐसा लग रहा है जैसे मेरे चारों तरफ योग अग्नि की बहुत ऊँची - ऊँची लपटे निकल रही हैं जिसकी तपिश से मेरे पुराने आसुरी स्वभाव, संस्कार जल कर भस्म हो रहें हैं और *मेरी खोई हुई सर्वशक्तियाँ पुनः जागृत हो रही हैं। मेरे सारे विकर्म भस्म हो रहें हैं*।

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आत्मा में पड़ी खाद जैसे - जैसे योग अग्नि में जल रही है, विकर्म विनाश हो रहें हैं वैसे - वैसे मैं आत्मा हल्की और चमकदार बनती जा रही हूँ। सोने के समान चमकता हुआ मेरा स्वरूप मुझे बहुत ही प्यारा और न्यारा लग रहा है। *कभी मैं अपने इस जगमग करते ज्योतिर्मय स्वरूप को देखती हूँ तो कभी अनन्त प्रकाशमय, सर्वशक्तियों के सागर अपने शिव पिता को*। इस अलौकिक मिलन की मस्ती में डूबी मैं एकटक अपने प्यारे बाबा को निहार रही हूँ और अपने प्यारे परमात्मा के सानिध्य में स्वयं को धन्य - धन्य अनुभव कर रही हूँ। *वाह मैं आत्मा, वाह मेरे बाबा, जो मुझे अपनी सर्वशक्तियों से भरपूर कर रहे है यही गीत गाती मैं इस अलौकिक मिलन का भरपूर आनन्द ले रही हूँ*। 

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अपने स्वीट बाबा से स्वीट साइलेन्स होम में मधुर मंगल मिलन मनाकर, योग अग्नि में विकर्मो को भस्म करके, डबल लाइट बन कर अब मैं वापिस साकारी दुनिया में लौट रही हूँ। *साकारी दुनिया में अपने साकार ब्राह्मण तन में अब मैं आत्मा विराजमान हूँ। बाबा की याद से विकर्मो पर जीत प्राप्त कर, विकर्माजीत बनने के लिए अब मैं अपने हर कर्म पर पूरा अटेंशन रखती हूँ*। स्वयं को स्वराज्य अधिकारी की सीट पर स्थित कर अब मैं हर रोज कर्मेन्द्रिय रूपी मंत्रियों की राजदरबार लगाती हूँ और उन्हें उचित निर्देश देकर अपनी इच्छानुसार उनसे हर कार्य करवाती हूँ।

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कर्मेन्द्रीयजीत बन कर्म करने से पिछले अनेक जन्मों के आसुरी स्वभाव संस्कार जो विकर्मो का कारण बन रहे थे वे सभी आसुरी स्वभाव संस्कार अब परिवर्तन हो रहे हैं। *तीन बिंदियों की स्मृति का तिलक अब मैं अपने मस्तक पर सदा लगा कर रखती हूँ जिससे मुझे निरन्तर यह स्मृति रहती है कि मुझे कर्मेन्द्रियों से ऐसा कोई पाप कर्म नही करना जिससे विकर्म बने*। अमृतवेले से रात तक बाबा की जो भी श्रीमत मिली हुई है उस पर एक्यूरेट चलने से और बाबा की याद में रह हर कर्म करने तथा स्वयं को सदा योग भट्टी में अनुभव करने से अब विकर्मों के खाते बन्द हो रहे हैं और मैं सहज ही विकर्माजीत बनती जा रही हूँ।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं सम्पूर्णता की रोशनी द्वारा अज्ञान का पर्दा हटाने वाली आत्मा हूँ।*
✺   *मैं आत्मा सर्च लाइट हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ *मैं आत्मा माया और प्रकृति की आकर्षण से दूर रहती हूँ ।*
✺ *मैं आत्मा सदा हर्षित रहती हूँ ।*
✺ *मैं प्रकृतिजीत आत्मा हूँ ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  सबसे विशेष बात है कि बाप को सारे विश्व में से कौन पसन्द आया? आप पसन्द आये ना! कितनी आत्मायें हैं लेकिन आप पसन्द आये। जिसको भगवान ने पसन्द कर लिया, उससे ज्यादा क्या होगा! तो *सदा बाप के साथ अपना भाग्य भी याद रखो। भगवान और भाग्य। सारे कल्प में ऐसी कोई आत्मा होगी जिसको रोज याद प्यार मिले, प्रभु प्यार मिले। रोज यादप्यार मिलता है ना।* सबसे ज्यादा लाडले कौन हैं? *आप ही लाडले हो ना। तो सदा अपने भाग्य को याद करने से व्यर्थ बातें भाग जायेंगी। भगाना नहीं पड़ेगा, सहज ही भाग जायेंगी।*

 

✺   *ड्रिल :-  "भगवान और भाग्य को सदा याद रखना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपने देह से न्यारी होकर मन-बुद्धि द्वारा एक सुंदर से बड़े दरबार में पहुँचती हूँ... वहाँ का नज़ारा मन को लुभाने वाला हैं... सामने  शिव बाबा एक गद्दी पर विराजमान हैं... वहाँ बाबा का स्वयंवर हो रहा हैं...* स्वयंवर के लिए करोड़ो मनुष्यात्माएं रूपी कुमारियाँ आयीं हुईं हैं... सभी बहुत सुंदर-सुंदर लाल रंग के जोड़े में दुल्हन बनी हुई हैं...

 

_  ➳  सभी बड़े ही उत्साह में हैं कि कब शिव बाबा हमें मिल जायें और हमारा साजन बन जायें... *मुझ आत्मा को बिल्कुल उम्मीद नहीं हैं कि शिव बाबा मुझे चुनेंगे क्योंकि वह गुणों के भण्डार हैं, आनंद के सागर हैं, ब्रह्मलोक के वासी हैं, सुख-दुःख से न्यारे हैं, सदगति दाता हैं, ज्ञानामृत के सागर हैं, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर के भी रचयिता त्रिमूर्ति हैं...*

 

_ ➳  उनमें से कुछ मनुष्यात्माएं रूपी कुमारियों का ध्यान देह की दुनिया रूपी दरबार की सजावटों में हैं, कुछ का ध्यान एक दूसरे के वस्त्रो में हैं, कुछ एक दूसरे को देखकर मन ही मन जल रही हैं... *स्वयंवर शुरू होते ही मेरी आँखों से खुशी के आँसू बह रहें हैं... बाबा धीरे-धीरे चलकर मेरी ओर आ रहें हैं और मुझे गुलाबों से बनी हुईं सुगंधित माला मेरे गले में डाल रहें हैं...* मुझे यकीन ही नहीं हो रहा हैं कि स्वयं शिव बाबा ने करोड़ो कुमारियों में से सिर्फ मुझ आत्मा को पसन्द किया...

 

 _ ➳  अब वह मेरे साजन हैं... कितना बड़ा भाग्य हैं मेरा जो शिव साजन ने मुझे अपनी सजनी बनाया... *अपने साजन के साथ मैं हवन कुण्ड की अग्नि में रावण के विकारों और व्यर्थ संकल्पों को स्वाहा कर रहीं हूँ... मेरे साजन अब मुझें बहुत सारी शिक्षाएं दे रहे हैं कि कैसे इस संगमयुग में रहना हैं, कैसे श्रीमत अनुसार चलना हैं... कैसे संकल्प चलाने हैं... अब शिव साजन मुझे हीरों का बना हुआ ताज तोहफ़े में भेंट कर रहें हैं...*

 

 _ ➳  *अब शिव साजन और मैं सूक्ष्मवतन पहुँचते हैं... वह मुझपर शांति और पवित्रता की किरणें डाल रहे हैं... मैं एकदम रिफ्रेश हो रही हूँ... अब मुझे बहन, भाई, माँ, बाप या अन्य किसी भी सम्बन्ध की कमी महसूस होती हैं तो शिव साजन तुरन्त उसी रूप में प्रकट हो जाते हैं...* कितनी सौभाग्यशाली आत्मा हूँ मैं... अब मैं किसी हद के बंधनों में नहीं फँसती हूँ... अब अपने भाग्य को याद करते ही व्यर्थ संकल्प अपने आप ही भाग जाते हैं...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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