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 13 / 03 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *पढाई से कभी रूठे तो नहीं ?*

 

➢➢ *बहार से बुधी निकाल अंतर्मुखी रहने का अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *सुख स्वरुप बन हर आत्मा को सुख दिया ?*

 

➢➢ *मास्टर दाता बन सहयोग, स्नेह और सहानुभूति दी ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *बाप से सच्चा प्यार है तो प्यार की निशानी है-समान, कर्मातीत बनो । ' करावनहार' होकर कर्म करो, कराओ ।* कर्मेन्द्रियां आपसे नहीं करावें लेकिन आप कर्मेन्द्रियों से कराओ । कभी भी मन-बुद्धि वा संस्कारों के वश होकर कोई भी कर्म नहीं करो ।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सृष्टि ड्रामा के अन्दर विशेष पार्टधारी हूँ"*

 

  सभी अपने को इस सृष्टि ड्रामा के अन्दर विशेष पार्टधारी समझते हो? कल्प पहले वाले अपने चित्र अभी देख रहे हो! यही ब्राह्मण जीवन का वन्डर है। *सदा इसी विशेषता को याद करो कि क्या थे और क्या बन गये! कौड़ी से हीरे तुल्य बन गये। दु:खी संसार से सुखी संसार में आ गये।*

 

  *आप सब इस ड्रामा के हीरो हीरोइन एक्टर हो। एक-एक ब्रह्माकुमार-कुमारी बाप का सन्देश सुनाने वाले सन्देशी हो। भगवान का सन्देश सुनाने वाले सन्देशी कितने श्रेष्ठ हुए!*

 

 *तो सदा इसी कार्य के निमित्त अवतरित हुए हैं। ऊपर से नीचे आये हैं यह सन्देश देने - यही स्मृति खुशी दिलाने वाली हैं। बस, आपना यही आक्यूपेशन सदा याद रखो कि खुशियों की खान के मालिक हैं। यही आपका टाइटिल है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  मीठे - मीठे बच्चे किसके सामने बैठे हो और क्या होकर बैठे हो? बाप तो तुम बच्चों को बिन्दि रुप बनाने आये हैँ। मै आत्मा बिन्दु रुप हूँ। बिन्दि कितनी छोटी होती है और बाप भी कितना छोटा है। इतनी छोटी - सी बात भी तुम बच्चों को बुद्धि में नहीं आती है ? बाप तो  बच्चों के सामने ही है, दूर नहीं। दूर हुई चीज को भूल जाते हो। *जो चीज सामने ही रहती है उस चीज को भूलना - यह तुम बच्चों को शोभा नहीं देता है*।

 

✧  बच्चे! अगर बिन्दि को ही भूल जायेंगे, तो बोलो, किस आधार पर चलेंगे? आत्मा के ही तो आधार से शरीर भी चलती है। मैं आत्मा हूँ। *यह नशा होना चाहिए कि मै बिन्दु , बिन्दु की ही सन्तान हूँ*। सन्तान कहने से ही स्नेह में आ जाते हैँ। तो आज तुम बच्चों को बिन्दु रूप में स्थित होने कि प्रैक्टिस करायें?

 

✧    *मैं आत्मा हूँ - इसमें तो भूलने की ही आवश्यकता नहीं रहती है*। जैसे मुझ बाप को भूलने की जरूरत पडती है? हाँ, परिचय देने के लिए तो जरूर बोलना पडता है कि मेरा नाम, रूप, गुण, कर्तव्य क्या है और मै फिर कब आता हूँ, किस तन में आता हूँ। तुम बच्चों को ही अपना परिचय देता हूँ। तो क्या बाप अपने परिचय को भूल जाते है? बच्चे उस स्थिति में एक सेकण्ड भी नहीं रह सकते है? तो क्या अपने नाम, रुप, देश, को भी भूल जाते हैँ?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  बिल्कुल इस दुनिया की बातों से, सम्बन्धों से न्यारे बनेंगे तब दैवी परिवार के बापदादा के और सारी दुनिया के प्यारे बनेंगे। *लेकिन यहाँ न्यारा बनना है ज्ञान सहित । सिर्फ बाहर से न्यारा नहीं बनना है। मन का लगाव न हो।* जब अपनी देह से भी न्यारा हो जाते हो तो न्यारेपन की अवस्था अपने आपको भी प्यारी लगती है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अंतर्मुखी रहने का पुरुषार्थ करना"*

 

_ ➳  मैं आत्मा परमधाम निवासी... परमधाम से आयी इस स्थूल धरा पर... अपना पार्ट बजाने... सतयुग... त्रेतायुग... द्वापरयुग... कलियुग... पार्ट बजाते बजाते काली हो गई... *अपनी शक्तियों को भूल... अपने आप से अनजान... उस भगवान से भी अनजान... जो मेरा पिता है... और मै उनकी संतान हूँ... मैं आत्मा हूँ... और ना ही यह शरीर...* इस सत्य से अनजान मैं आत्मा बैठी हूँ... शांत शीतल समुद्र के तट पर... खोई हुई... उलझी हुई... मायूस सी मैं आत्मा बैठी हूँ... *पुकार रहीं हूँ उस भगवान को जो दुःखहर्ता...  सुखकर्ता हैं...* मेरी पुकार सुन.. मेरे पिता स्वयं धरती पर आगये...  *ब्रह्माकुमारी संस्था में मुझ आत्मा को सच्चा गीता ज्ञान... परमपिता परमात्मा का ज्ञान... आत्मा - परमात्मा का ज्ञान देने...* और मैं आत्मा... अपने पिता की पहचान को जान... द्रवित हो जाती हूँ... और पहुँच जाती हूँ उनके पास...

 

  *अपने पिता का हाथ पकड़ कर मैं आत्मा सैर कर रही हूँ और बाबा ने कहा :-* "मेरी फूल बच्ची... क्यों मायूस हो जाती हो... *मुझे जाना... पहचाना... अपना बनाकर क्यों... उलझी हुई हो ? इस धरा पर तुझसे प्यारा अतिरिक्त मुझे और कोई नहीं है...* मासुमसी यह आँखों मे दुःख की लहर क्यों है...?"

 

_ ➳  *बाबा के प्यार और दुलार को देख मैं आत्मा बाबा से कहती हूँ :-* "मेरे बाबा... *आप तो मेरे पिता हो... कल्प के बाद मिले हो... अब तक तो आप से अनजान थी...* अब मिले हो तो... खुशी में मन क्यों नहीं झूम रहा हैं... मन मे यह अदृश्य... असहनीय वेदना क्यों हैं... क्यों मन बारबार उदास हो जाता है ? *क्या वह बात हैं जिससे मैं अनजान हूँ... क्या वह दुःख हैं जो मैं महसूस कर रही हूँ..."*

 

  *शीतल पवन की लहरों समान मेरे बाबा बोले :-* "मेरी राज दुलारी... मेरी लाडली बच्ची... *कल्प के संगमयुग में मुझे आना हैं... इतने युगों पश्चात यह बाप और बच्चें का पवित्र मिलन हुआ हैं...* यह जन्म अंतिम जन्म हैं... *जिस घड़ी से मुझे जाना... उस घड़ी से जो बीता उसको बिंदी लगाना सीख गई हो... लेकिन अपने 63 जन्मो के विकर्मों को भस्म करना नहीं सीखी हो..."*

 

_ ➳  *गुल गुल फूलों से महकते मेरे बाबा को मैं आत्मा कहती हूँ :-* "मेरे गुलाब बाबा... आपने अपना बनाया... 21 जन्मों के स्वराज्य भाग्य के अधिकारी बनाया... *दुःख की लहरों से दूर हमें आप सुख की ऊंची मंजिल पर ले आये हो... सर्व दोषो से मुक्त्त कर सर्वगुण सम्पन्न बना दिया हैं... श्रीमत आपकी इस अंतिम जन्म में गले का हार बन गई है... अंतर्मुखता की इस यात्रा में... मैं आत्मा... आप के नक़्शे कदम पे चल रहीं हूँ..."*

 

  *सुख के सागर मेरे प्यारे बाबा बोले :-* "रूहानी गुलाब सी मेरी प्यारी बच्ची... अब समय हैं जन्मों के विकारों के खाते को खत्म करना... *योगबल की शक्त्ति... पवित्रता की शक्त्ति से अपने पुण्य के खाते को बढ़ाना हैं... अपने सूक्ष्म ते सूक्ष्म विकर्मों के बोझ से मुक्त्त हो... सब को मुक्त्त करना हैं... सर्व शक्तिसम्पन्न बन सर्व को शक्ति का दान करना हैं...* शांति देवा बन शांति का दान करना हैं... 63 जन्मों के विकर्मों को योग अग्नि की भट्टी में स्वाहा करना है और कंचन वर्ण बनना हैं..."

 

_ ➳  *प्यार भरी आँखो से बाबा के हाथ चूमती मैं आत्मा बाबा से कहती हूँ :-* "मीठे बाबा... *कल्प के संगमयुग में... इस महा मिलन के कुम्भ मेले में... मैं आत्मा... इस सुवर्ण जन्म में... अपने जन्मों के विकारो को भस्म कर... आप समान बन रही हूँ...* योग अग्नि में तप कर खरा सोना बन रही हूँ... *योग की ऊंची मंजिल पर बैठ आप की प्रत्यक्षता का नगाड़ा बजा रही हूँ... हर गली... हर घर मे आप का ही झंडा लहरा रहा है..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाहर से बुद्धि निकाल अंतर्मुखी रहने का अभ्यास करना है*

 

_ ➳  स्व स्थिति के आसन पर विराजमान होते ही मैं अनुभव करती हूँ जैसे *कोई राजा अपने सिहांसन पर विराजमान होकर, अपने अधिकारों का प्रयोग करता है और अपने राज्य की कारोबार को चलाने के लिए अपने मंत्रियों को आदेश देकर अपने शासन की बागडोर को अच्छी रीति सम्भलाता है ठीक उसी तरह मैं आत्मा भी अब स्वराज्य अधिकारी की सीट पर सेट हूँ और महसूस कर रही हूँ कि मैं आत्मा राजा हूँ और हर कर्मेंद्रिय मेरे ऑर्डर प्रमाण कार्य कर रही है*।

 

_ ➳  अपने ऊँचे ते ऊँचे अधिकारीपन के आसन पर सेट होकर अब मैं अपनी सभी कर्मेन्द्रियों को समेट, मास्टर बीज रूप स्थिति में स्थित होकर शांति में बैठने का अभ्यास करती हूँ और धीरे - धीरे महसूस करती हूँ जैसे मैं आत्मा अंतर्मुखता की एक ऐसी गुफा में जा रही हूँ जहाँ कोई आवाज, कोई शोर नही यहां तक कि संकल्पो की भी हलचल नही। *अंतर्मुखता का यह अवस्था मुझे गहन शांति का अनुभव करवा रही है। अपने मस्तक से निकल रहे शांति के वायब्रेशन्स को मैं अपने चारों और फैलता हुआ देख रही हूँ। शांति के शक्तिशाली वायब्रेशन्स धीरे - धीरे चारों ओर फैलते जा रहें हैं और मेरे आस पास के वायुमंडल को शांत बना रहे हैं*। मैं महसूस कर रही हूँ कि मुझ आत्मा से निकल रहे शांति के वायब्रेशन्स से एक शक्तिशाली आभामण्डल मेरे चारों तरफ बन गया है जो बाहरी वातावरण के हर प्रभाव से मुझे मुक्त कर रहा है।

 

_ ➳  अंतर्मुखी बन, शांति की गहन अनुभूति करते हुए, शांति के सागर अपने प्यारे पिता को अब मैं याद करती हूँ और महसूस करती हूँ कि उन्हें याद करते ही मेरे मन बुद्धि का कनेक्शन शांति धाम में रहने वाले शांति के सागर अपने शिव पिता के साथ जुड़ गया है और यह कनेक्शन मुझे अपनी और खींच रहा है। *मन बुद्धि के विमान पर बैठ सेकण्ड में मैं साकार और सूक्ष्म लोक को पार करके अपने शांतिधाम घर मे पहुँच जाती हूँ। शांति के बहुत ही शक्तिशाली वायब्रेशन इस शांति धाम घर में फैले हुए हैं। जो मुझे गहन शांति से भरपूर कर रहे हैं*। गहन शांति की गहन अनुभूति करते हुए मैं आत्मा धीरे - धीरे शांति के सागर अपने प्यारे पिता के पास पहुँच जाती हूँ।

 

_ ➳  सर्वगुणों और सर्वशक्तियों के सागर अपने शांति दाता शिव बाबा के समीप बैठ अब मैं उनके सर्व गुणों, सर्व शक्तियों की एक - एक किरण को गहराई तक स्वयं में समाती जा रही हूँ। जैसे - जैसे बाबा की सर्वशक्तियों की किरणे मुझ आत्मा पर पड़ रही हैं मैं स्वयं में असीम बल भरता हुआ अनुभव कर रही हूँ। *अपने बिंदु बाप की शीतल किरणों की छत्रछाया में गहन शीतलता की अनुभूति करते हुए अपने प्यारे बाबा के साथ इतना सुन्दर मधुर मंगल मिलन मनाने का सुख मैं प्राप्त कर रही हूँ*। मास्टर बीज रूप बन अपने बीज रूप बाप के साथ मंगल मिलन मनाने का यह सुख मुझे परम आनन्द प्रदान कर रहा है। परमात्म शक्तियों से मैं आत्मा भरपूर होती जा रही हूँ और बहुत ही शक्तिशाली स्थिति का अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  अपने बीज रूप शिव पिता के सानिध्य में बैठ, उनकी सर्वशक्तियों को स्वयं में समाकर मैं मास्टर बीज रूप आत्मा उनके समान अति तेजस्वी, सर्वशक्तिसम्पन्न स्वरूप बन कर, अब वापिस अपने कर्म क्षेत्र पर लौट रही हूँ। *अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करके फिर अपने को देह से न्यारी मास्टर बीज रूप आत्मा समझ, कर्मेन्द्रियों को समेट शान्त में बैठने का अभ्यास निरन्तर करते हुए, गहन शांति की अनुभूति मैं हर पल स्वयं भी कर रही हूँ और दूसरों को करा रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सुख स्वरूप बन हर आत्मा को सुख देने वाली मास्टर सुखदाता आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं मास्टरदाता बन सहयोग, स्नेह और सहानुभूति देने वाली रहमदिल आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  अभी इस वर्ष बापदादा बच्चों के स्नेह में कोई भी बच्चे की किसी भी समस्या में मेहनत नहीं देखने चाहते। *समस्या समाप्त और समाधान समर्थ स्वरूप। क्या यह हो सकता है?* बोलो दादियाँ हो सकता है? टीचर्स बोलो, हो सकता है? पाण्डव हो सकता है? फिर बहाना नहीं बताना, यह था ना, यह हुआ ना! यह नहीं होता तो नहीं होता! बापदादा बहुत मीठे-मीठे खेल देख चुके हैं। *कुछ भी हो, हिमालय से भी बड़ा, सौ गुणा समस्या का स्वरूप हो, चाहे तन द्वारा, चाहे मन द्वारा, चाहे व्यक्ति द्वारा, चाहे प्रकृति द्वारा समस्या, पर-स्थिति आपकी स्व-स्थिति के आगे कुछ भी नहीं है और स्व-स्थिति का साधन है - स्वमान।*

 

 _ ➳  नेचरल रूप में स्वमान हो। याद नहीं करना पड़े, बार-बार मेहनत नहीं करनी पड़े, नहीं-नहीं मैं स्वदर्शन चक्रधारी हूँ, मैं नूरे रत्न हूँ, मैं दिलतख्तनशीन हूँ... हूँ ही। और कोई होने है क्या! कल्प पहले कौन बने थे? और बने थे या आप ही बने थे? आप ही थे, आप ही हैं, हर कल्प आप ही बनेंगे। यह निश्चिंत है। *बापदादा सब चेहरे देख रहे हैं यह वही कल्प पहले वाले हैं। इस कल्प के हो या अनेक कल्प के हो? अनेक कल्प के हो ना! हो?* हाथ उठाओ जो हर कल्प वाले हैं? फिर तो निश्चित है ना, *आपको तो पास सर्टीफिकेट मिल गया है ना कि लेना है? मिल गया है ना? मिल गया है या लेना है?* कल्प पहले मिल गया है, अभी क्यों नहीं मिलेगा। तो यही स्मृति स्वरूप बनो कि सर्टीफिकेट मिला हुआ है। *चाहे पास विद आनर का, चाहे पास का, यह फर्क तो होगा, लेकिन हम ही हैं। पक्का है ना।*

 

✺   *ड्रिल :-  "समाधान, समर्थ स्वरूप में स्थित होने का अनुभव"*

 

 _ ➳  भृकुटि सिंहासन पर विराजमान...  मैं चमकता हुआ सितारा... अपने स्वमान में स्थित ज्ञान स्वरूप हूं... मुझ आत्मा से नीले रंग की चमत्कारी किरणें चारों ओर फैल रही है... अपने लाइट माइट स्वरूप में चारों ओर का किचड़ा मैं आत्मा भस्म करती जा रही हूं... मैं देखती हूं चारों ओर का वातावरण साफ व शुद्ध होता जा रहा है... *अपने अनादि संबंध की स्मृति में... अपने चारों ओर की आत्माओं को भाई-भाई की दृष्टि से निहारती मैं आत्मा स्मृति स्वरूप हूं... यह स्मृति मुझ आत्मा को समर्थ बनाए हुए हैं... आत्माओं द्वारा समस्या रूपी विघ्न मैं आत्मा  सहज ही पार करती जा रही हूं...*

 

 _ ➳  आत्मा-आत्मा भाई-भाई की रूहानी दृष्टि में स्थित... मै ज्ञानी तू आत्मा सहज ही सामने वाली आत्मा के साथ अपने संस्कारों का मिलान कर रही हूं... *मैं आत्मा शांति के सागर परमपिता शिव की संतान हूं... यह स्मृति मुझे शांति से भरपूर किए हुए हैं.... मुझसे शांति की अनंत किरणें निकल चारों ओर फैल रही हैं... मैं देखती हूँ मेरे चारों ओर की आत्माएं व प्रकृति एकदम शांत हैं... पांचों तत्व सतोप्रधानता को प्राप्त  हैं...* मैं स्वयं को प्रकृतिजीत स्थिति में देख रही हूं...  मुक्ति द्वार पर स्थित मैं आत्मा मास्टर त्रिकालदर्शी हूं... ड्रामा के राज से परिचित मैं आत्मा साक्षी दृष्टा की सीट पर विराजमान हूं...

 

 _ ➳  साक्षीपन की ये स्मृति मुझ आत्मन को समस्या से समाधान स्वरूप बनाए हुए हैं... कोई भी विघ्न चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो मुझे चींटी समान प्रतीत हो रहा है... *मैं आत्मा उड़ती कला में स्थित तीव्र गति से हिमालय रूपी समस्याओं को पार करती हुई मंजिल की ओर बढ़ रही हूं...* मैं आत्मा मन की डांस में मगन हूं...  तन द्वारा आया कोई भी विघ्न मुझ आत्मा को कागज के शेर जैसा प्रतीत हो रहा है...  अंतिम जन्म की स्मृति... मुझ आत्मा को देह से न्यारे किए हुए है... मैं आत्मा अशरीरी पन का अनुभव करती जा रही हूं... मैं आत्मा सुख के सागर की संतान सुख स्वरूप... सागर के कंठे पर विराजमान अतींद्रिय सुख का अनुभव करती हूं...

 

 _ ➳  मेरे जीवन में दुःख का नाम निशान नहीं... दुःख की कोई भी लहर मुझ आत्मा से कोसों दूर है... मैं आत्मा सुख के सागर में समाई हुई सुखदाता की बच्ची मास्टर सुखदाता हूं... *मैं वही कल्प पहले वाली बाबा की बच्ची ब्राह्मण वंशावली हूं... सृष्टि मंच पर मैं आत्मा अपने 84 जन्मों का चक्कर लगाए स्वदर्शन चक्रधारी हूं...* अभी मैं आत्मा अपने अंतिम जन्म में स्थित पवित्र बन पवित्र दुनिया का मालिक बनने जा रही हूं...  कल्प कल्प की मैं आत्मा स्वराज्य सो विश्व राज्य अधिकारी हूं...

 

 _ ➳  अब फिर से मैं आत्मा वही इतिहास दोहरा रही हूं... *मैं आत्मा स्नेह के सागर की संतान सर्व की स्नेही हूं... मुझ आत्मा का यही गुण मुझे सर्व का सहयोगी बना रहा है... सब मेरे सहयोगी बनते जा रहे हैं...* सर्वशक्तिमान शिव बाबा की संतान मैं आत्मा शक्ति स्वरुप हूं... यह स्वमान मुझ आत्मा को समर्थ बनाये हुए हैं... *स्नेह और शक्ति के इस बैलेंस द्वारा मैं आत्मा सहज ही आगे बढ़ती जा रही हूं...* मैं आत्मा सर्व की प्यारी बाप की प्यारी हूं... चारों ओर बापदादा की प्रत्यक्षता का नगाड़ा मैं आत्मा बजा रही हूं... वही हैं यह वही हैं जिनकी हमें तलाश थी की आवाज चारों ओर गूंज रही हैं...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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