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 13 / 04 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करते भी अपने को बंधन से मुक्त कर ईश्वरीय सर्विस की ?*

 

➢➢ *दूसरी बातों में अपना समय वेस्ट न कर बाप को याद कर माईट ली ?*

 

➢➢ *हद की इच्छाओं को छोड़ अच्छा बनने का अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *अपने श्रेष्ठ कर्म व श्रेष्ठ चलन द्वारा दुआएं जमा की ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *योग का प्रयोग करने के लिए दृष्टि-वृत्ति में भी पवित्रता को और अण्डरलाइन करो।* मूल फाउण्डेशन-अपने संकल्प को शुद्ध, ज्ञान स्वरूप, शक्ति स्वरूप बनाओ। *कोई कितना भी भटकता हुआ, परेशान, दु:ख की लहर में आये, खुशी में रहना असम्भव समझता हो लेकिन आपके सामने आते ही आपकी मूर्त, आपकी वृत्ति, आपकी दृष्टि आत्मा को परिवर्तन कर दे। यही है योग का प्रयोग।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं परमात्मा का सिकीलधा हूँ"*

 

✧  सदा अपने को सिकीलधे समझते हो ना। सदा बाप के सिक व प्रेम का विशेष अनुभव होता है ना! जिस सिक व प्रेम से बाप ने अपना बनाया ऐसे सिक व प्रेम से आपने भी बाप को अपना बनाया है ना! दोनों का स्नेह का अविनाशी पक्का सौदा हो गया। ऐसे सौदा करने वाले सौदागर वा व्यापारी हो ना! ऐसा सौदा सारी दुनिया में कोई कर नहीं सकता। कितना सहज सौदा है। *दो शब्दों का सौदा है लेकिन है अमर। दो शब्द कौन से हैं? आपने कहा 'तेरा' और बाप ने कहा 'मेरा'। बस सौदा हो गया। तेरा और मेरा इन दो शब्दों में अविनाशी सौदा हो गया। और कुछ देना नहीं पड़ता।*

 

  देना भी न पड़े और सौदा भी बढ़ीया हो जाएँ तो और क्या चाहिए! सब कुछ मिल गया है ना। ऐसे समझा था कि घर बैठे इतना सहज सौदा भगवान से करेंगे। सोचा था! तो जो संकल्प में भी नहीं था वह प्रैक्टिकल कर्म में हो गया। यह खुशी है ना? सबसे ज्यादा खुशी किसको है? विशेषता यही है जो हरेक कहता - हमें ज्यादा खुशी है। पहले मैं। ऐसे नहीं इन्हें है हमें नहीं। यह भी रेस है, ईर्ष्या नहीं। इसमें हरेक एक दो से आगे बढ़ो। *चांस है आगे बढ़ने का। जितना आगे बढ़ने चाहो उतना बढ़ सकते हो। तो सब पक्के सौदागर बनो। कच्चा सौदा करेंगे तो नुकसान अपने को ही करेंगे।*

 

  सदा स्वयं को समाया हुआ अनुभव करते हो? *बाप के नयनों में, दिल में समाया हुआ। जो समाये रहते हैं वह दुनिया से पार रहते हैं। उन्हें अनुभव होता कि बाप ही सारी दुनिया है। स्वप्न में भी पुरानी दुनिया की आकर्षण आकर्षित नहीं कर सकती है। ऐसे समाये हुए को किसी भी बात में मुश्किल का अनुभव नहीं हो सकता। वह दुनिया से खोया हुआ है। अविनाशी सर्व प्राप्ति प्राप्त किया हुआ है।* सदा दिल में एक ही दिलाराम रहता, ऐसी समाई हुई आत्मा सदा सफल है ही।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧   *अच्छा सारे दिन अव्यक्त स्थिती कितना समय रहती है?* बिन्दि रूप के लिए नहीं पूछते हैं। अव्यक्त स्थिति कितना समय रहती है? बापदादा सम्पूर्ण स्टेज को  सामने रख पूछते हो और आप अपने पास्ट के पुरुषार्थ को सामने रख सोचते हो कितना फर्क हो गया। वर्तमान समय पढाई कि मुख्य सब्जेक्टस् कौन - सी चल रही है? *मुख्य सबजेक्ट यह पढ रहे हो कि ज्यादा से ज्सादा अव्यक्त स्थिति बनें*।

 

✧  तो मुख्य सबजेक्ट में रिजल्ट कम है। निरंतर याद में रहने कि सम्पूर्ण स्टेज के आगे एक - दो घण्टा क्या है। इनसे ज्यादा अपनी अव्यक्त स्थिति बनाने की विधी बुद्धी में हैं? अगर विधी है तो वृद्धि क्यों नहीं होती है, कारण? विधी का ज्ञान सारा स्पष्ट बुद्धी में आता है, लेकिन एक बात नहीं आती, जिस कारण विधि का मालूम होते भी वृद्धि नहीं होती है। वह कौन - सी बात है?

 

✧  अच्छा आज वृद्धि कैसे हो उस पर सुनाते है। *एक बात जो नहीं आती है वह है कि विस्तार करना और विस्तार में जाना आता है लेकिन विस्तार को जब चाहे समेटना और समा लेना यह प्रैक्टीस कम है*। ज्ञान के विस्तार में आना भी जानते हो लेकिन विस्तार को समाकर ज्ञान स्वरूप बन जाना, बीज रुप बन जाना इसकी प्रैक्टीस कम है। विस्तार से जाने से टाइम बहुत व्यर्थ जाता है और संकल्प भी व्यर्थ जाते है। इसलिए जो शक्ति जमा होनी चाहिए, वह नहीं होती।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  जैसे बाप को सर्व स्वरूपों से व सर्व सम्बन्धों से जानना आवश्यक है, ऐसे ही बाप द्वारा स्वयं को भी ऐसा जानना आवश्यक है। *जानना अर्थात् मानना। मैं जो हूँ, जैसा हो ऐसे मानकर चलेंगे तो क्या स्थिति होगी? देह में विदेही, व्यक्त में होते अव्यक्त, चलते-फिरते फरिश्ता वा कर्म करते हुए कर्मातीत।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- घर को याद करना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा नक्की झील में नाव में बैठ सैर करती हुई चारों ओर के नजारों को देख मन्त्रमुग्ध हो रही हूँ... झील में उगे कमल के फूलों को देख मैं आत्मा विचार करती हूँ की प्यारे बाबा ने मेरे जीवन को कमल फूल समान खुशनुमा बना दिया है... खुशहाल बना दिया है...* मैं आत्मा इस पुरानी दुनिया, इस पुराने देह और देह के सम्बन्धी, देह के वैभवों से ममत्व मिटा रही हूँ... प्यारे बाबा के साथ वापिस घर चलने के लिए ज्ञान रत्नों से सज संवर रही हूँ... मैं आत्मा अपना श्रृंगार कराने उड़ चलती हूँ वतन में अव्यक्त बापदादा के पास...

 

  *वान प्रस्थ अवस्था की स्मृति दिलाकर निर्वाणधाम में चलने की तैयारी कराते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... बहुत पराये दुःख देख लिए... मेरे खुशनुमा फूल देह के भान में कांटे से हो गए... *अब बागबाँ बाबा को यादकर उसी खुशबु से फिर से भर जाओ... अपने मीठे घर शान्तिधाम में... पिता का हाथ थामे मुस्कराते हुए चलने की तैयारी में जुट जाओ...*

 

_ ➳  *प्यारे बाबा की छवि को अपने दिल दर्पण में बसाकर सत्य स्वरुप में दमकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा देह के झूठ आवरण के दायरे से निकल सत्य के प्रकाश में अपनी प्रकाशित अवस्था को पाकर गुणो और शक्तियो से भरपूर होती जा रही हूँ.... *यादो में अपनी खोयी रंगत को पाकर मीठे बाबा संग घर चलने को तैयार हो रही हूँ...*

 

  *दुःख के अंधकार को निकाल मेरे जीवन में खुशियों की रौनक बिखेरते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *अब दुःख का खेल पूरा हो गया और सुखो के गीत गुनगुनाने का मौसम दिल के करीब है... इसलिए आत्मस्वरूप में गहरे डूब जाओ...* वानप्रस्थ अवस्था है तो मीठे बाबा के साथ अपने शांत घर में शान से चलने की तैयारी करो...

 

_ ➳  *बेहद बाबा के बेहद प्यार में डूबकर बाबा का हाथ थामकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा आपकी मीठी प्यारी यादो में कितनी खुबसूरत और प्यारी होकर घर चलने को आमादा हूँ... यादो में गहरे खोकर एवररेड्डी बन गई हूँ...* संसार की हर बात से परे ईश्वरीय प्यार के झूले में झूल रही हूँ...

 

  *इस सृष्टि नाटक से पर्दा उठाकर घर की स्मृति दिलाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... अब स्वयं को सब जगह से समेट कर ईश्वर पिता की मीठी यादो में गहरे उतर जाओ... यह यादे ही सच्चा सहारा है... *अब अपने घर चलना है और फिर सजधज कर मीठे सुखो में चहकना है... तो हर बात से न्यारे होकर प्यारे पिता के प्यार में खो जाओ...*

 

_ ➳  *ईश्वरीय राह पर तन, मन, धन से सम्पूर्ण रूप से समर्पित होकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा सत्य पिता की सच्ची यादो में प्रतिपल निखरती जा रही हूँ... *इन यादो में घर चलने से पूर्व अपनी सतोप्रधान अवस्था को पुनः पाती जा रही हूँ... मीठे बाबा ने मेरे स्वागत को मीठे सुख सजाये है...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मनसा - वाचा - कर्मणा सबको सुख देने का ही पुरुषार्थ करना है*"

 

_ ➳  स्वयं भगवान द्वारा पढ़ाई जाने वाली इस ईश्वरीय पढ़ाई में पास विद ऑनर होने के लक्ष्य को पाने के लिये मुझे इस बात का पूरा ख्याल रखना है कि कभी भी मनसा - वाचा - कर्मणा मुझ से कोई भी भूल ना हो। *मन ही मन स्वयं से यह दृढ़ प्रतिज्ञा कर मैं एकांत में बैठ अपनी चेकिंग करती हूँ कि क्या मेरे हर संकल्प, बोल और कर्म में सर्व के प्रति कल्याण की भावना समाई रहती है*! मेरे संकल्प व्यर्थ और अकल्याणकारी तो नही होते! मेरे बोल दूसरों को दुख देने का कारण तो नही बनते और मुझसे ऐसा कोई कर्म तो नही होता जिससे किसी को कष्ट हो!

 

_ ➳  यह सोचते और अपनी चेकिंग करते हुए मैं विचार करती हूँ कि दुख हर्ता सुख कर्ता बाप की सन्तान मैं आत्मा भी तो उनके समान मास्टर दुख हर्ता सुख कर्ता हूँ तो *बाप समान सर्व आत्माओं को दुःखो से छुड़ा कर उन्हें सुख देना मेरा परम कर्तव्य है और इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए अपने हर संकल्प, बोल और कर्म पर मुझे विशेष अटेंशन अवश्य देना है*। इसी दृढ़ संकल्प के साथ मनसा वाचा कर्मणा तीनो रूपों से स्वयं को शक्तिशाली बनाने के लिए अब मैं अपने शिव पिता के पास जाने का संकल्प कर, अशरीरी स्थिति के अभ्यास द्वारा अपने दिव्य ज्योतिर्मय स्वरूप में स्थित होती हूँ और मन बुद्धि को हर चीज के प्रभाव से मुक्त कर, अपने सम्पूर्ण ध्यान को केवल भृकुटि पर एकाग्र कर लेती हूँ।

 

_ ➳  एकाग्रता की शक्ति सेकण्ड में मुझे देह और देह की दुनिया के हर प्रकार के आकर्षण से मुक्त कर अति न्यारी और प्यारी स्थिति में स्थित कर देती है। *ज्ञान के दिव्य चक्षु से मुझे मेरा पूर्ण प्रकाशित स्वरूप स्पष्ट दिखाई देने लगता है*। मेरा यह अति सुन्दर न्यारा और प्यारा स्वरूप मुझे डीप साइलेन्स का गहराई तक अनुभव करवा रहा है। देह, देह से जुड़ी हर वस्तु से मैं स्वयं को पूर्णतया मुक्त अनुभव करने लगी हूँ।

 

_ ➳  इस न्यारी अवस्था में स्थित होते ही मैं स्वयं को विदेही, निराकार और मास्टर बीज रुप स्थिति में अपने बीच रुप परम पिता परमात्मा, संपूर्णता के सागर, पवित्रता के सागर, सर्वगुण और सर्व शक्तियों के अखुट भंडार, ज्ञान सागर, पारसनाथ बाप के सामने परम धाम में देख रही हूँ। *कोई संकल्प कोई विचार अब मेरे मन में नही है। एकदम निर्संकल्प अवस्था। बस बाबा और मैं। बीज रुप बाप के सामने मैं मास्टर बीज रुप आत्मा डेड साइलेंस की स्थिति में स्थित हो कर अतीन्द्रिय सुख का सहज अनुभव कर रही हूँ*।

 

_ ➳  स्वयं को निराकार महाज्योति अपने प्यारे परम पिता परमात्मा शिव बाबा के सम्मुख देखते हुए उनसे निकल रही अनन्त शक्तियों को स्वयं में समा कर मैं स्वयं को शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ। उनकी किरणों की शीतल छाया मुझे गहन शांति का अनुभव करवा रही हैं। *सर्वशक्तियों से भरपूर हो कर मैं आ जाती हूँ परमधाम से नीचे फरिश्तों की जगमग करती हुई दुनिया में*। सफेद चमकीली फरिश्ता ड्रेस धारण कर मैं फरिश्ता पहुँच जाता हूँ अव्यक्त वतन वासी अपने प्यारे ब्रह्मा बाबा के सामने जिनकी भृकुटि में शिवबाबा चमक रहें हैं। *बापदादा बड़े प्यार से निहारते हुए अपनी मीठी दृष्टि मुझ पर डाल रहे हैं। उनकी शक्तिशाली दृष्टि से मुझ फरिश्ते के अंदर परमात्म बल भरता जा रहा है जो मुझे शक्तिशाली बना रहा है*।

 

_ ➳  परमात्म बल, परमात्म शक्तियों से भरपूर हो कर मैं आत्मा अब वापिस अपनी कर्मभूमि पर लौट आती हूँ और अपना देह रूपी वस्त्र धारण कर पास विद ऑनर होने के पुरुषार्थ में लग जाती हूँ। *अपनी अवस्था जमाने के लिए मैं हर कर्म अब अपने प्राण प्रिय शिव बाबा की याद मे रहकर करती हूँ*। चलते फिरते बुद्धि का योग केवल अपने शिवपिता के साथ जोड़ कर, अपनी मनसा, वाचा, कर्मणा पर मैं सम्पूर्ण अटेंशन देती हूँ। मनसा वाचा कर्मणा तीनो रूपों में किसी को भी मेरे कारण दुख न पहुंचे, इस बात पर सम्पूर्ण ध्यान देते हुए, अपने सम्पूर्णता के लक्ष्य को पाकर पास विद होने का पुरुषार्थ अब मैं निरन्तर कर रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं हद की इच्छाओं को छोड़ अच्छा बनने वाली इच्छा मात्रम अविद्या आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं अपने श्रेष्ठ कर्म व श्रेष्ठ चलन द्वारा दुआएं जमा करके पहाड़ जैसी बात भी रुई के समान अनुभव करने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  ब्रह्मा बाप के हर कार्य के उत्साह को तो देखा ही है। जैसे शुरू में उमंग था - चाबी चाहिए! अभी भी ब्रह्मा बाप यही शिव बाप से कहते - अभी घर के दरवाजे की चाबी दो। लेकिन साथ जाने वाले भी तो तैयार हों। अकेला क्या करेगा! *तो अभी साथ जाना है ना या पीछे-पीछे जाना है? साथ जाना है ना? तो ब्रह्मा बाप कहते हैं कि बच्चों से पूछो अगर बाप चाबी दे दे तो आप एवररेडी हो? एवररेडी हो या रेडी हो, सिर्फ रेडी नहीं - एवररेडी त्याग, तपस्या, सेवा तीनों ही पेपर तैयार हो गये हैं?* ब्रह्मा बाप मुस्कराते हैं कि प्यार के आँसू बहुत बहाते हैं और ब्रह्मा बाप वह आँसू मोती समान दिल में समाते भी हैं लेकिन एक संकल्प ज़रूर चलता कि सब एवररेडी कब बनेंगे! *डेट दे देवें। आप कहेंगे कि हम तो एवररेडी हैं, लेकिन आपके जो साथी हैं उन्हें भी तो बनाओ या उनको छोड़कर चल पड़ेंगे?*

 

✺  *"ड्रिल :- एवररेडी स्थिति का अनुभव"*

 

_ ➳  *अब घर जाना है कि स्मृति से मैं आत्मा उड़ चली अपने घर परमधाम* मैं आत्मा ज्ञान सूर्य की किरणों के नीचे बैठ जाती हूँ... ज्ञान सूर्य से निकलती किरणों को मैं आत्मा स्वयं में भर रही हूँ... सर्व गुणों और शक्तियों का फाउंटेन मुझ आत्मा पर पड़ रहा है... *रंग-बिरंगी किरणों के फाउंटेन से मुझ आत्मा में ज्ञान, प्रेम, सुख, आनंद, पवित्रता, शांति, और सर्व शक्तियां समा रही हैं...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा देहभान के विस्तार को सार में समेट रही हूँ...* मैं आत्मा मेरा फलाना नाम है, फलाना आक्यूपेशन है, मैं नर हूँ, नारी हूँ... इन सब विस्तारों को समाप्त कर रही हूँ... *मैं सिर्फ और सिर्फ एक ज्योतिबिंदु आत्मा हूँ... अविनाशी हूँ... इस देह की मालिक हूँ... मैं आत्मा बिंदु रूप में स्थित हो रही हूँ...*

 

_ ➳  *अब मैं आत्मा देह के सभी संबंधो के विस्तार को सार में समेटती हूँ...* ये मेरी माँ है, ये बाप है, ये बेटा है या बेटी है... ये सब सिर्फ इस जन्म में पार्ट बजाने के साथी हैं... *मुझ आत्मा का सिर्फ एक शिव बाबा से ही सर्व सम्बन्ध हैं...* मैं आत्मा एक शिव बाबा में ही सर्व सम्बन्धों का सुख अनुभव कर रही हूँ...

 

_ ➳  *अब मैं आत्मा देह के पदार्थों, साधनों, वैभवों के विस्तार को सार में समेट रही हूँ...* ये सब साधन विनाशी हैं... मुझ आत्मा का स्थूल विनाशी साधनों के अल्पकाल के सुख का मोह मिट रहा है... *ये पुरानी दुनिया, पुराने सम्बन्ध, वस्तुएं सब नश्वर हैं...* मैं आत्मा मन-बुद्धि के सभी विस्तारों को समेटकर सार रूप में स्थित हो रही हूँ... *एक सेकंड में बुद्धि को व्यर्थ से समर्थ की ओर स्थित करती हूँ...*

 

_ ➳  *अब मैं आत्मा सर्व संबंधो, सर्व सम्पतियों की प्राप्तियों का सुख एक बाबा में ही अनुभव कर रही हूँ...* अब मैं आत्मा सार रूप में स्थित होकर सदा सुख, शांति, ख़ुशी, ज्ञान के, आनंद के झूले में झूल रही हूँ... *सदा सर्व प्राप्तियों के सम्पन्न स्वरूप के अविनाशी नशे में स्थित रहती हूँ...*

 

_ ➳  *अब मैं आत्मा अंत मति सो गति की स्मृति से मन-बुद्धि को एक बाबा में ही एकाग्र कर रही हूँ...* मैं आत्मा ब्रह्मा बाप समान त्यागी, तपस्वीमूर्त, विश्व सेवाधारी बन रही हूँ... मैं आत्मा सर्व शक्तियों को समय प्रमाण स्व के और सर्व के प्रयोग में लाती हूँ... *अब मैं आत्मा त्याग, तपस्या और सेवा तीनों ही पेपर्स में एवररेडी स्थिति का अनुभव कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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