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 13 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *ड्रामा की भावी पर अटल रहे ?*

 

➢➢ *देह को भूलने का अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *मन बुधी से किसी की बुराई को टच तो नहीं किया ?*

 

➢➢ *मन की उलझनों को समाप्त किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *आप बच्चों के पास पवित्रता की जो महान शक्ति है, यह श्रेष्ठ शक्ति ही अग्नि का काम करती है जो सेकण्ड में विश्व के किचड़े को भस्म कर सकती है।* जब आत्मा पवित्रता की सम्पूर्ण स्थिति में स्थित होती है तो उस स्थिति के श्रेष्ठ संकल्प से लगन की अग्नि प्रज्वलित होती है और किचड़ा भस्म हो जाता है, *वास्तव में यही योग ज्वाला है। अभी आप बच्चे अपनी इस श्रेष्ठ शक्ति को कार्य में लगाओ।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बैलेन्स द्वारा ब्लैसिंग प्राप्त करने वाली सफलता स्वरूप आत्मा हूँ"*

 

   सदा बाप की ब्लैसिंग स्वत: ही प्राप्त होती रहे - उसकी विधि क्या है? ब्लैसिंग प्राप्त करने के लिए हर समय, हर कर्म में बैलेन्स रखो। जिस समय कर्म और योग दोनों का बैलन्स होता है तो क्या अनुभव होता है? ब्लैसिंग मिलती है ना। *ऐसे ही याद और सेवा दोनों का बैलेन्स है तो सेवा में सफलता की ब्लैसिंग मिलती है। अगर याद साधारण है और सेवा बहुत करते हैं तो ब्लैसिंग कम होने से सफलता कम मिलती है। तो हर समय अपने कर्म-योग का बैलेन्स चेक करो।*

 

  दुनिया वाले तो यह समझते हैं कि कर्म ही सब कुछ है लेकिन बापदादा कहते हैं कि कर्म अलग नहीं, कर्म और योग दोनों साथ-साथ ह्रैं। ऐसे कर्मयोगी कैसा भी कर्म होगा उसमें सहज सफलता प्राप्त करेंगे। चाहे स्थूल कर्म करते हो, चाहे अलौकिक करते हो। *क्योंकि योग का अर्थ ही है मन-बुद्धि की एकाग्रता। तो जहाँ एकाग्रता होगी वहाँ कार्य की सफलता बंधी हुई है। अगर मन और बुद्धि एकाग्र नहीं हैं अर्थात् कर्म में योग नहीं है तो कर्म करने में मेहनत भी ज्यादा, समय भी ज्यादा और सफलता बहुत कम।*

 

  कर्मयोगी आत्मा को सर्व प्रकार की मदद स्वत: ही बाप द्वारा मिलती है। ऐसे कभी नहीं सोचो कि इस काम में बहुत बिजी थे इसलिए योग भूल गया। ऐसे टाइम पर ही योग आवश्यक है। अगर कोई बीमार कहे कि बीमारी बहुत बड़ी है इसीलिए दवाई नहीं ले सकता तो क्या कहेंगे? बीमारी के समय दवाई चाहिए ना। तो जब कर्म में ऐसे बिजी हो, मुश्किल काम हो उस समय योग, मुश्किल कर्म को सहज करेगा। तो ऐसे नहीं सोचना कि यह काम पूरा करेंगे फिर योग लगायेंगे। *कर्म के साथ-साथ योग को सदा साथ रखो। दिन-प्रतिदन समस्यायें, सरकमस्टांश और टाइट होने हैं, ऐसे समय पर कर्म और योग का बैलेन्स नहीं होगा तो बुद्धि जजमेन्ट ठीक नहीं कर सकती। इसलिए योग और कर्म के बैलेन्स द्वारा अपनी निर्णय शक्ति को बढ़ाओ।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧   वर्तमान समय का पुरुषार्थ क्या है? सुनना, सुनाना चलता रहता, *अभी अनुभवी बनना है।* अनुभवी का प्रभाव ज्यादा होता। वही बात अनुभवी सुनावे और वही बात सुनी हुई सुनावे तो अन्तर पड़ेगा ना? लोग भी अभी अनुभव करना चाहते। योग शिविर में विशेष अनुभव क्यों करते?

 

✧  क्योंकि *अनुभवी बनने का साधन है - सुनाने के साथ अनुभव कराया जाता है।* इससे रिज़ल्ट अच्छी निकलती है। जब आत्माएँ अनुभव चाहती है तो आप भी अनुभवी बनकर अनुभव कराओ। अनुभव कैसे हो? उसके लिए कौन - सा साधन अपनाना है? जैसे कोई इन्वेन्टर वह कोई भी इनवेन्शन निकालने के लिए बिल्कुल एकान्त में रहते है। 

 

✧  तो यहाँ की एकान्त अर्थात् एक के अन्त में खोना है, तो *बाहर के आकर्षण से एकान्त चाहिए।* ऐसे नहीं सिर्फ कमरे में बैठने की एकान्त चाहिए, लेकिन मन एकान्त हो। *मन की एकाग्रता अर्थात् एक की याद में रहना,*  एकाग्र होना यही एकान्त है।  एकान्त में जाकर इन्वेन्शन निकालते है न। चारों ओर के वायब्रेशन से परे चले जाते तो यहाँ भी स्वयं को आकर्षण से परे जाना पड़े।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ ऐसे ही साक्षी दृष्टा बन कर्म *करने से कोई भी कर्म के बन्धन में कर्मबन्धनी आत्मा नहीं बनेंगे। कर्म का फल श्रेष्ठ होने के कारण कर्म सम्बन्ध में आवेंगे, बन्धन में नहीं।* सदा कर्म करते हुए भी न्यारे और बाप के प्यारे अनुभव करेंगे ऐसी न्यारी और प्यारी आत्मायें अभी भी अनेक आत्माओं के सामने दृष्टान्त अर्थात् एक्जैम्पुल बनते हैं- *जिसको देखकर अनेक आत्मायें स्वयं भी कर्मयोगी बन जाती हैं और भविष्य में भी पूज्यनीय बन जाती हैं।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- नर से नारायण बनने की पाठशाला-इस निश्चय में रहना"*

 

_ ➳  मैं आत्मा गॉडली स्टूडेंट बन सेंटर में बाबा के सम्मुख बैठ बाबा की यादों में मग्न हो जाती हूँ... धीमे-धीमे प्यारे बाबा के मधुर गीत बज रहे हैं... लाल प्रकाश से भरा पूरा हाल परमधाम नज़र आ रहा है... सभी आत्माएं चमकते हुए लाल बिंदु लग रहे हैं... *मनुष्य से देवता, नर से नारायण बनने की यह यूनिवर्सिटी है जिसमें मुझे कोटों में से चुनकर स्वयं परमात्मा ने एडमिशन करवाया है... अपना बच्चा, अपना स्टूडेंट, अपना वारिस बनाया है...* प्यारे बाबा का आह्वान करते ही दीदी के मस्तक में विराजमान होकर मीठे बाबा मीठी मुरली सुनाते हैं...

 

   *नर से नारायण बनने की सच्ची सच्ची नालेज सुनाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे बच्चे... इस झूठ की दुनिया में झूठ को ही सत्य समझ जीते आये... *अब सत्य पिता सचखण्ड की स्थापना करने आये है... अपने सत्य दमकते स्वरूप को भूल साधारण मनुष्य होकर दुखो में लिप्त हो गए बच्चों को... मीठा बाबा नारायण बनाकर विश्व का मालिक बनाने आया है...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा पत्थर से पारस, मनुष्य से देवता बनने की पढाई को धारण करते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा भगवान से बैठ सारे सत्य को समझ रही हूँ... कैसे साधारण नर से नारायण बन सकती हूँ... यह गुह्य रहस्य बुद्धि में भर रही... ईश्वर पिता मुझे गोद में बिठा पढ़ा रहा...* और मेरा सदा का नारायणी भाग्य जगा रहा है...

 

   *लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सत्य की राह पर ऊँगली पकड़कर चलाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... जब सब मनुष्य मात्र झूठ को सत्य समझ जी रहे तो सत्य फिर कौन बताये... *सत्य परमात्मा के सिवाय तो भूलो को... फिर कौन राह दिखाये... तो वही सत्य कथा प्यारा बाबा सुना रहा और कांटे हो गए बच्चों को फूलो सा फिर खिला रहा...*

 

_ ➳  *अपने भाग्य पर नाज करती अविनाशी खुशियों में लहराते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा मीठे बाबा से महान भाग्य प्राप्त कर रही हूँ... सचखण्ड की मालिक बन रही हूँ... *मनुष्य से देवताई रूप में दमक रही हूँ... और सुखो की बगिया में खुशियो संग झूल रही हूँ... कितना प्यारा मेरा भाग्य है...*

 

   *दुःख की धरती बदलकर सुख की स्वर्णिम नगरी स्थापित करते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... सच्चा पिता तो सत्य सुखो से भरा सचखण्ड ही बनाये... यह दुःख धाम तो विकारो की माया ही बसाये... पिता तो अपने बच्चों को मीठे महकते सुखो की नगरी में ही बिठाये... *सारे विश्व का राज्य बच्चों के कदमो में ले आये और नारायण बनाकर विश्व धरा पर शान से चमकाए... तो वही मीठी सत्य नालेज बाबा बैठ सुना रहा है...*

 

_ ➳  *परमात्म ज्ञान पाकर गुण, शक्तियों और अनुभवों के खजानों से सजकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा सच्चे पिता से सत्य जानकारी लेकर सोने सी निखरती जा रही हूँ... *मीठा बाबा मुझे नारायण सा सजा रहा... यह नालेज मै मन बुद्धि में ग्रहण करती जा रही हूँ... और अपने सत्य स्वरूप को जीती जा रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- ड्रामा की भावी पर अटल रहना है*"

 

 _ ➳  इस बेहद के सृष्टि ड्रामा में पार्ट बजाने वाली मैं हीरो पार्टधारी आत्मा हूँ जिसने आदि से लेकर अंत तक इस बेहद ड्रामा में कल्प - कल्प हीरो पार्ट बजाया है। *इस बात को स्मृति में लाते ही पूरे 84 जन्मो का पार्ट मेरे सामने एक पिक्चर के रूप स्पष्ट होने लगता है*। सबसे पहले परमधाम में मेरा अनादि सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप जहां से मैं आत्मा सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप में ही अपने घर परमधाम से सृष्टि रूपी रंगमंच पर इस बेहद के ड्रामा में पार्ट बजाने के लिए नई सतोप्रधान सतयुगी दुनिया मे अवतरित हुई।

 

 _ ➳  एक ऐसी दुनिया जो अपरमअपार सुख, शान्ति और सम्पन्नता से भरपूर थी। जहाँ देवतायें निवास करते थे। *ऐसी दैवी दुनिया मे 20 जन्म इतना सुंदर पार्ट बजाने के बाद द्वापर युग मे भी पूज्य आत्मा बन मैने विशेष पार्ट बजाया*। ईष्टदेवी बन अपने भक्तों की हर मनोकामना को मैने पूर्ण किया। मन्दिरों में स्थापित मेरे जड़ चित्र आज भी भक्तों की हर मनोकामना को पूरा कर रहें हैं। *और अब मेरा यह ब्राह्मण जीवन भी कितना श्रेष्ठ है। स्वयं भगवान मेरी पालना कर रहें हैं। सर्व सम्बन्धो का सुख मुझे दे रहें हैं। "वाह ड्रामा वाह" और "वाह मेरा पार्ट वाह"*।

 

 _ ➳  इस बेहद के खूबसूरत ड्रामा में आदि से अंत तक के अपने विशेष हीरो पार्ट को मन बुद्धि से देखते - देखते अब मैं स्वयं से प्रतिज्ञा करती हूँ कि अब इस अंतिम जन्म में जबकि सभी हिसाब किताब चुकतू होने है इसलिए इस अंतिम जन्म में अनेक परिस्थितियों और दुखद घटनाओ के रूप में आने वाले कर्मभोग से मुझे घबराना नही है बल्कि *ड्रामा के पट्टे पर मजबूत रहना है और बाबा की याद से हर कर्मभोग को सहज रूप से हँसते - हँसते चुकतू करना है*। स्वयं से यह प्रतिज्ञा करते - करते मैं अनुभव करती हूँ जैसे बाबा मेरी इस प्रतिज्ञा को पूरा करने का बल मुझमे भरने के लिए मुझे अपनी ओर खींच रहें हैं।

 

 _ ➳  अशरीरी बन देह और देह की दुनिया से किनारा कर, ज्ञान और योग के पंख लगा कर मैं आत्मा अब अपने निराकार शिव पिता परमात्मा के पास उनके धाम की ओर चल पड़ती हूँ। *कुछ क्षणों की सुंदर, लुभावनी रूहानी यात्रा करके मैं पहुंच जाती हूँ उस अद्भुत दुनिया परमधाम में अपने प्यारे मीठे बाबा के पास*। संकल्पों विकल्पों की हलचल से दूर शांति के सागर बाप के सामने मैं आत्मा गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ। मन बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं अपलक शक्तियों के सागर अपने बाबा को निहार रही हूँ।

 

 _ ➳  धीरे - धीरे अब मैं आत्मा अपने मीठे प्यारे बाबा की ओर बढ़ रही हूँ। उनके समीप पहुंच कर मैं जैसे ही उन्हें टच करती हूँ शक्तियों का झरना फुल फोर्स के साथ बाबा से निकल कर अब मुझ आत्मा में समाने लगता है। *मेरा स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली व चमकदार बनता जा रहा है। मास्टर बीजरूप अवस्था में स्थित हो कर अपने बीज रूप परमात्मा बाप के साथ यह मंगलमयी मिलन मुझे अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करवा रहा है*। परमात्म लाइट मुझ आत्मा में समाकर मुझे पावन बना रही है। मैं स्वयं में परमात्म शक्तियों की गहन अनुभूति कर रही हूँ।

 

 _ ➳  शक्ति स्वरुप बनकर अब मैं परम धाम से नीचे आ रही हूँ। अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर इस बात को अब मैं सदा स्मृति में रखती हूँ कि "मैं विशेष हीरो पार्टधारी आत्मा हूँ"। मुझे केवल अपने पार्ट को देखना है। दूसरों के पार्ट को देख कर प्रश्नचित नही बनना। *बुद्धि में इस बात को अच्छी रीति धारण कर अब मैं ड्रामा के पट्टे पर मजबूत रहकर इस बेहद ड्रामा में अपना ऐक्यूरेट पार्ट बजा रही हूँ*। ड्रामा में हर आत्मा के पार्ट को साक्षी हो कर देखते हुए और जीवन मे आने वाली हर परिस्थिति को खेल समझते हुए क्या,क्यो, और कैसे की क्यू से मुक्त होकर सेकण्ड में फुल स्टाप लगा कर एकरस स्थिति में स्थित रहने का पुरुषार्थ अब मैं सहज रीति कर रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं मन - बुद्धि से किसी भी बुराई को टच न करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सम्पूर्ण वैष्णवआत्मा हूँ।*

   *मैं सफल तपस्वी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा मन की उलझनों को सदा समाप्त कर देती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव वर्तमान और भविष्य को उज्जवल बनाती हूँ  ।*

   *मैं सदा समर्थ आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ *दूसरा है विनाशी स्नेह और प्राप्ति के आधार पर वा अल्पकाल के लिए सहारा बनने के कारण लगाव वा झुकाव। यह भी लौकिक, अलौकिक दोनों सम्बन्ध में बुद्धि को अपनी तरफ खींचता है।* जैसे लौकिक में देह के सम्बन्धियों द्वारा स्नेह मिलता है, सहारा मिलता है,प्राप्ति होती है तो उस तरफ विशेष मोह जाता है ना। उस मोह को काटने के लिए पुरूषार्थ करते हो, लक्ष्य रखते हो कि किसी भी तरफ बुद्धि न जाए। लौकिक को छोड़ने के बाद अलौकिक सम्बन्ध में भी यही सब बातें बुद्धि को आकर्षित करती हैं। अर्थात् बुद्धि का झुकाव अपनी तरफ सहज कर लेती हैं। यह भी देहधारी के ही सम्बन्ध हैं। *जब कोई समस्या जीवन में आयेगी, दिल में कोई उलझन की बात होगी तो न चाहते भी अल्पकाल के सहारे देने वाले वा अल्पकाल की प्राप्ति कराने वाले,लगाव वाली आत्मा ही याद आयेगी। बाप याद नहीं आयेगा।*

➳ _ ➳ फिर से ऐसे लगाव लगाने वाली आत्मायें अपने आपको बचाने के लिए वा अपने को राइट सिद्ध करने के लिए क्या सोचती और बोलती हैं कि बाप तो निराकार और आकार है ना! साकार में कुछ चाहिए जरूर। *लेकिन यह भूल जाती हैं अगर एक बाप से सर्व प्राप्ति का सम्बन्ध, सर्व सम्बन्धों का अनुभव और सदा सहारे दाता का अटल विश्वास है, निश्चय है तो बापदादा निराकार या आकार होते भी स्नेह के बन्धन में बाँधे हुए हैं। साकार रूप की भासना देते हैं।* अनुभव न होने का कारण? नॉलेज द्वारा यह समझा है कि सर्व सम्बन्ध एक बाप से रखने हैं लेकिन जीवन में सर्व सम्बन्धों को नहीं लाया है। इसलिए साक्षात् सर्व सम्बन्ध की अनुभूति नहीं कर पाते हैं। जब भक्ति मार्ग में भक्त माला की शिरोमणी मीरा को भी साक्षात्कार नहीं लेकिन साक्षात् अनुभव हुआ तो क्या ज्ञान सागर के डायरेक्ट ज्ञान स्वरूप बच्चों को साकार रूप में सर्व प्राप्ति के आधार मूर्त, सदा सहारे दाता बाप का अनुभव नहीं हो सकता! तो फिर सर्वशक्तिवान को छोड़ यथा शक्ति आत्माओं को सहारा क्यों बनाते हो!

✺ *"ड्रिल :- सर्वशक्तिवान को छोड़ यथा शक्ति आत्माओं को अपना सहारा नहीं बनाना*

➳ _ ➳ *मेरे परमपिता परमात्मा सदाशिव निराकार, ओ आनन्द के सागर तेरी महिमा अपरम्पार... तेरी महिमा अपरम्पार"... मैं आत्मा परमात्म प्यार में मगन होकर ये गीत गाती हुई झुला झूल रही हूँ...* याद करते ही बापदादा मुस्कुराते हुए मेरे बाजू में झूले में बैठ जाते हैं... मैं आत्मा तुरंत बाबा की गोदी में बैठ जाती हूँ... बाबा की गोदी के झूले में अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ...

➳ _ ➳ बाबा की गोदी में मैं आत्मा कितना सुख, शांति का अनुभव कर रही हूँ... कितना आराम, कितना सुकून मिल रहा है... बाबा के प्यार में, स्नेह में मैं आत्मा डूबती जा रही हूँ... बाबा साकार रूप की भासना दे रहे हैं... *मैं आत्मा एक बाबा से सर्व सम्बन्धों का अनुभव कर रही हूँ... बाबा ही मेरे मात-पिता, शिक्षक, सतगुरु, साथी, साजन हैं...* बाबा से सर्व प्राप्तियों का अनुभव हो रहा है...

➳ _ ➳ *बाबा के अविनाशी स्नेह में मुझ आत्मा का विनाशी संबंधो का स्नेह खत्म हो रहा है... मुझ आत्मा से लौकिक, अलौकिक दोनों संबंधो में आकर्षण मिट रहा है...* ज्ञान सागर से प्राप्त ज्ञान को पाकर मैं आत्मा ज्ञान स्वरुप बन गई हूँ... मुझ आत्मा की बुद्धि अब देहधारियों के मोह में नहीं पड़ रही हैं... अब एक बाबा का प्यार ही मुझ आत्मा की बुद्धि को अपनी तरफ खींचता है... मैं आत्मा मन-बुद्धि से पूरी तरह बाबा को समर्पित हो चुकी हूँ... अब बाबा ही मेरा संसार है, सर्वस्व है...

➳ _ ➳ अब कोई भी समस्या जीवन में आये या दिल में कोई उलझन की बात हो तो मैं आत्मा अल्पकाल के लिए सहारा देने वाले देहधारियों को याद नहीं करती हूँ... एक बाबा को ही याद करती हूँ... बाबा से ही अपने दिल की हर बात को शेयर करती हूँ... *अल्पकाल सहारा देने वाले आत्माओं को छोड़ एक सर्वशक्तिवान बाबा को ही दिल से अपना सहारा बनाती हूँ... मैं आत्मा बाबा में अटल विश्वास, सम्पूर्ण निश्चय रख हर परिस्थिति में बाबा की मदद का अनुभव कर रही हूँ...* बड़ी से बड़ी परिस्थिति को भी सहज ही पार कर रही हूँ...
 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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