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 13 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सबको कांटे से फूल बनाया ?*

 

➢➢ *रूहानी यात्रा की और करवाई ?*

 

➢➢ *फराकदिल बन अखूट खजानों से भरपूर रहे ?*

 

➢➢ *पावरफुल मनसा वृत्ति से खराब को भी अच्छा बनाया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  डबल लाइट अर्थात् आत्मिक स्वरुप में स्थित होने से हल्कापन स्वत: हो जाता है। ऐसे डबल लाइट को ही फरिश्ता कहा जाता है। *डबल लाइट अर्थात् सदा उड़ती कला का अनुभव करने वाले।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बाबा के साथ सदा कम्बाइण्ड रहने वाली आत्मा हूँ"*

 

〰✧  सभी अपने को सदा बाप और आप कम्बाइण्ड हैं-ऐसा अनुभव करते हो? जो कम्बाइण्ड होता है उसे कभी भी, कोई भी अलग नहीं कर सकता। आप अनेक बार कम्बाइण्ड रहे हो, अभी भी हो और आगे भी सदा रहेंगे। ये पक्का है? तो इतना पक्का कम्बाइण्ड रहना। *तो सदैव स्मृति रखो कि- 'कम्बाइण्ड थे, कम्बाइण्ड हैं और कम्बाइण्ड रहेंगे। कोई की ताकत नहीं जो अनेक बार के कम्बाइण्ड स्वरूप को अलग कर सके।'* तो प्यार की निशानी क्या होती है? (कम्बाइण्ड रहना) क्योंकि शरीर से तो मजबूरी में भी कहाँ-कहाँ अलग रहना पड़ता है। प्यार भी हो लेकिन मजबूरी से कहाँ अलग रहना भी पड़ता है। लेकिन यहाँ तो शरीर की बात ही नहीं। एक सेकेण्ड में कहाँ से कहाँ पहुंच सकते हो!

 

✧  आत्मा और परमात्मा का साथ है। परमात्मा तो कहाँ भी साथ निभाता है और हर एक से कम्बाइण्ड रूप से प्रीत की रीति निभाने वाले हैं। हरेक क्या कहेंगे-मेरा बाबा है। या कहेंगे-तेरा बाबा है? हरेक कहेगा-मेरा बाबा है! तो मेरा क्यों कहते हो? अधिकार है तब ही तो कहते हो। *प्यार भी है और अधिकार भी है। जहाँ प्यार होता है वहाँ अधिकार भी होता है। अधिकार का नशा है ना। कितना बड़ा अधिकार मिला है! इतना बड़ा अधिकार सतयुग में भी नहीं मिलेगा! किसी जन्म में परमात्म-अधिकार नहीं मिलता। प्राप्ति यहाँ है। प्रालब्ध सतयुग में है लेकिन प्राप्ति का समय अभी है।* तो जिस समय प्राप्ति होती है उस समय कितनी खुशी होती है! प्राप्त हो गया-फिर तो कॉमन बात हो जाती है।

 

✧  लेकिन जब प्राप्त हो रहा है, उस समय का नशा और खुशी अलौकिक होती है! तो कितनी खुशी और नशा है! क्योंकि देने वाला भी बेहद का है। तो दाता भी बेहद का है और मिलता भी बेहद का है। तो मालिक किसके हो-हद के या बेहद के? *तीनों लोक अपने बना दिये हैं। मूलवतन, सूक्ष्मवतन हमारा घर है और स्थूल वतन में तो हमारा राज्य आने वाला ही है। तीनों लोकों के अधिकारी बन गये! तो क्या कहेंगे- अधिकारी आत्मायें।* कोई अप्राप्ति है? तो क्या गीत गाते हो? (पाना था वह पा लिया) पाना था वह पा लिया, अभी कुछ पाने को नहीं रहा।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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छोडना भी नहीं चाहते और उडना भी नहीं चाहते। तो क्या करना पडेगा? चलना पडेगा। चलने में तो जरूर मेहनत लगेगी ना। इसलिए *अब कमजोर रचना बन्द करो तो मन की मेहनत से छूट जायेंगे।* फिर हँसी की बात क्या कहते हैं? बाप कहते यह रचना क्यों करते, तो जैसे आजकल के लोग कहते हैं ना - क्या करें ईश्वर दे देता है। दोष सारा ईश्वर पर लगाते हैं, ऐसे यह व्यर्थ रचना पर क्या कहते? हम चाहते नहीं है लेकिन माया आ जाती है। हमारी चाहना नहीं है लेकिन हो जाता है। इसलिए *सर्वशक्तिवान बाप के बच्चे मालिक बनो। राजा बनो।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *रूहे गुलाब अर्थात् जिसमें सदा रूहानी खुशबू हो। रूहानी खुशबू वाले जहाँ भी देखेंगे, जिसको भी देखेंगे तो रूह को देखेंगे, शरीर को नहीं देखेंगे। स्वयं भी सदा रूहानी स्थिति में रहेंगे और दूसरों की भी रूह को देखेंगे। इसको कहते हैं रूहानी गुलाब।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  बाप से पवित्र बनने की प्रतिज्ञा कर, मददगार बनना"*

 

_ ➳  मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को... पवित्रता की खशबू से सजाकर... कितना प्यारा और मीठा  महकता बना दिया है... मै आत्मा देह की मिटटी में विकारो में कितनी लथपथ थी... और *आज ईश्वरीय यादो का साथ पाकर मेरी कालिमा धुल गयी है*... और मै आत्मा देव तुल्य धवल पवित्र प्रतिमा बनती जा रही हूँ... *मीठे बाबा जादूगर ने अपनी जादुई तरंगो में मुझे कितना निखार दिया है.*.. मेरे लिए इतना सब कुछ सिर्फ... मेरा भगवान ही तो कर सकता था... यह दिल की बात बाबा को बताने मै आत्मा... तपस्या धाम में बाबा को बुलाती हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को सच्चे ज्ञान धन से आबाद करते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *सच्चे सुखो का आधार सम्पूर्ण पवित्रता है... विकारो भरा मन और बुद्धि सतयुगी दुनिया में कभी जा नही सकते..*. इसलिए मीठे बाबा की यादो में रह विकर्मो को भस्म कर, मन बुद्धि को उजला धवल बनाओ... पवित्र रहने की प्रतिज्ञा को दिल से निभाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की यादो में अपने खोये तेज को पुनः पाकर कहती हूँ :-* "मीठे मीठे प्यारे बाबा... *आपने मुझ आत्मा को अपनी प्यार भरी बाँहों में लेकर कितना प्यारा और पवित्र बना दिया है..*. मेरे विकारी मन को सुमन बनाकर मुझे सच्चे सुखो के अहसासो से भर दिया है... पवित्रता के सौंदर्य से मुझे निखार दिया है..."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को पवित्रता की सुंदरता से सजाकर, दिव्य बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... जब घर से निकले थे, किस कदर खुबसूरत और पवित्र थे... देह के भान में आकर कितने पतित और मटमैले हो गए... *अब पुनः पवित्रता को अपने दामन में सजा लो और अपनी पवित्रता से मीठे बाबा के मददगार बनो..*. विकारो रहित सुंदर दिव्य दुनिया बनाने में, मीठे बाबा की मदद करने वाले महा भाग्यवान बनो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के गुण और शक्तियो को स्वयं में भरते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... *आपने मुझे सत्य ज्ञान देकर, पवित्रता और दिव्य गुणो से सजाकर, असीम खुशियो का मालिक बना दिया है.*.. मै आत्मा अपने पिता की मददगार बनकर, कितने प्यारे भाग्य की मालकिन बन गयी हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को मेरी पवित्रता की प्रतिज्ञा को याद दिलाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे :- "ईश्वर पिता का श्रीमत रुपी हाथ पकड़कर पावन बनकर मुस्कराओ... *पावनता से सजधज कर... सतयुगी दुनिया को बनाने में मीठे बाबा का हाथ बंटाओ.*.. सच्चे सुखो से भरी खुबसूरत दुनिया बनाकर, विश्व के मालिक बन मुस्कराओ...

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से अपनी खोयी पावनता को पाकर कहती हूँ :-* "मीठे दुलारे मेरे बाबा... मै आत्मा आपके प्यार को पाने वाली महाभाग्यवान हूँ... आपकी यादो की छत्रछाया में कितनी सुंदर और पावन बनकर, सुखो की दुनिया बनाने में सहयोगी बन रही हूँ... *पवित्रता से सज संवर कर, अथाह खुशियो से सजी दुनिया को बाँहों में भर रही हूँ.*.."मीठे बाबा से दिल से पावन बनने की प्रतिज्ञा कर मै आत्मा... स्थूल जगत में आ गयी..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सदा रूहानी यात्रा करनी और करानी है*"

 

_ ➳  स्वयं परम पिता परमात्मा शिव बाबा ने रूहानी पण्डा बन जो रूहानी यात्रा हम बच्चों को सिखलाई है, उस यात्रा पर रहने के लिए एक दो को सावधानी देते आगे बढ़ना और बढ़ाना ही हम ब्राह्मण बच्चों का कर्तव्य है। *अपने आश्रम में, बाबा के कमरे में बैठी मैं मन ही मन यह विचार करते हुए बाबा का आह्वान करती हूँ और बाबा के साथ कम्बाइंड हो कर वहाँ उपस्थित अपने सभी ब्राह्मण भाईयों और बहनों को मनसा सकाश देते हुए ये संकल्प करती हूँ कि यहाँ उपस्थित मेरे सभी ब्राह्मण भाई बहन एक दो को सहयोग देते, इस रूहानी यात्रा पर निरन्तर आगे बढ़ते रहें* और ऐसे ही आगे बढ़ते और दूसरों को बढ़ाते जल्दी ही सारे विश्व की सभी ब्राह्मण आत्मायें संगठित रूप से एकमत होकर बाबा को प्रत्यक्ष करने का कार्य सम्पन्न करें।

 

_ ➳  इसी संकल्प के साथ, स्वयं को अपने प्यारे बाबा की छत्रछाया के नीचे अनुभव करते, *अपने ब्राह्मण सो फरिश्ता स्वरुप में स्थित हो कर, मैं फरिश्ता अब बापदादा के साथ कम्बाइंड होकर ऊपर की ओर उड़ते हुए मधुबन की पावन धरनी पर पहुँचता हूँ जो परमात्मा की अवतरण भूमि है*। जहाँ भगवान साकार में आ कर अपने ब्राह्मण बच्चों से मिलन मनाते हैं, उनकी पालना करते हैं और परमात्म प्यार से उन्हें भरपूर करते हैं। *इस पावन धरनी पर आकर अब मैं देख रहा हूँ करोड़ो ब्राह्मण आत्मायें यहां उपस्थित है और सभी एक दूसरे के प्रति आत्मा भाई - भाई की रूहानी दृष्टि, वृति रख, अपने रूहानी शिव पिता के प्रेम की लग्न में मग्न हैं*।

 

_ ➳  सभी ब्राह्मण बच्चों के स्नेह की डोर बाबा को अपनी ओर खींच रही है और बच्चो के स्नेह में बंधे भगवान को भी अपना धाम छोड़ कर नीचे आना पड़ता है। मन बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं देख रही हूँ, बाबा परमधाम से नीचे आ रहें है। *सूक्ष्म वतन से होते हुए अपने आकारी रथ पर विराजमान हो कर बापदादा अब मधुबन की उस पावन धरनी पर हम बच्चों के सामने आ कर उपस्थित होते हैं*। सभी ब्राह्मण बच्चे अब अपने पिता परमात्मा से मिलन मनाने का आनन्द ले रहे हैं। बापदादा अपने एक - एक अमूल्य रत्न को नजर से निहाल कर रहें हैं। एक - एक करके सभी ब्राह्मण बच्चे बाबा के पास जा कर बाबा से दृष्टि और वरदान ले रहें हैं।

 

_ ➳  मैं फरिश्ता भी बापदादा से दृष्टि और वरदान लेने के लिए उनके पास पहुंचता हूँ और उनकी ममतामयी गोद में जा कर बैठ जाता हूँ। अपनी स्नेह भरी दृष्टि से बाबा मुझे निहार रहें हैं। बाबा की दृष्टि से बाबा के सभी गुण मुझ में समाते जा रहें हैं। *बाबा की शक्तिशाली दृष्टि मुझमें एक अलौकिक रूहानी नशे का संचार कर रही हैं । जिससे मैं फरिश्ता असीम रूहानी आनन्द का अनुभव कर रहा हूँ*। बाबा के हाथों का मीठा - मीठा स्पर्श मुझे बाबा के अपने प्रति अगाध प्रेम का स्पष्ट अनुभव करवा रहा है ।

 

_ ➳  मैं बाबा के नयनो में अपने लिए असीम स्नेह देख कर गद गद हो रहा हूँ और साथ ही साथ बाबा के नयनों में अपने हर ब्राह्मण बच्चे के लिए जो आश है कि सभी एक दो को सावधान करते इस रूहानी यात्रा पर सदा आगे बढ़े। *बाबा की इस आश को जान, मन ही मन बाबा को मैं प्रोमिस करता हूँ कि इस रूहानी यात्रा पर एक दो को सावधान करते, मैं निरन्तर आगे बढ़ता ओर बढाता रहूँगा*। बाबा मेरे मन के हर संकल्प को पढ़ते हुए, अपना वरदानी हाथ मेरे मस्तक पर रख मुझे सदा विजयी रहने का वरदान दे रहें हैं।

 

_ ➳  अपने सभी ब्राह्मण बच्चो को नजर से निहाल करके, वरदानो से भरपूर करके, अपने मीठे मधुर महावाक्यों द्वारा अपने सभी बच्चों को मीठी समझानी देकर अब बाबा सभी बच्चों को याद की रूहानी यात्रा पर चलने की ड्रिल करवा रहें है। *मैं देख रही हूँ सभी ब्राह्मण आत्मायें सेकेंड में अपनी साकारी देह को छोड़ निराकारी आत्मायें बन रूहानी दौड़ में आगे जाने की रेस कर रही हैं। सभी का लक्ष्य इस रूहानी दौड़ में आगे बढ़ने का है और सभी अपने पुरुषार्थ के अनुसार नम्बरवार इस लक्ष्य को प्राप्त कर अपनी मंजिल पर पहुंच रही हैं*।

 

_ ➳  सभी आत्मायें इस रूहानी यात्रा को पूरा कर अब परमधाम में अपने प्यारे बाबा के सम्मुख बैठ उनसे मिलन मना रही हैं। परमात्म शक्तियों से स्वयं को भरपूर कर रही हैं। *शक्ति सम्पन्न बन कर अब सभी आत्मायें वापिस अपने साकारी ब्राह्मण स्वरूप में लौट रही है और सभी एक दो को सावधान करते, एक दूसरे को सहयोग देते अपनी रूहानी यात्रा पर निरन्तर आगे बढ़ रही हैं*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं फ्राकदिल बन अखुट खजानों से सबको भरपूर करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं मास्टर दाता आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा अपनी मन्सा वृत्ति को पावरफुल बनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव खराब को भी अच्छा बना देती हूँ  ।*

   *मैं मास्टर सर्वशक्तिमान् हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  *एक होती है कल्याण के भावना की सेवा और दूसरी होती है स्वार्थ से।* *मेरा नाम आ जायेगामेरा अखबार में फोटो आ जायेगा, मेरा टी.वी. में आ जायेगामेरा ब्राह्मणों में नाम हो जायेगाब्राह्मणी बहुत आगे रखेगीपूछेगी..... यह सब भाव स्वार्थी-सेवा के हैं।* क्योंकि आजकल के हिसाब सेप्रत्यक्षता के हिसाब सेअभी सेवा आपके पास आयेगीशुरू में स्थापना की बात दूसरी थी लेकिन अभी आप सेवा के पिछाड़ी नहीं जायेंगे। *आपके पास सेवा खुद चलकर आयेगी। तो जो सच्चा सेवाधारी है उस सेवाधारी को चलो और कोई सेवा नहीं मिली लेकिन बापदादा कहते हैं अपने चेहरे सेअपने चलन से सेवा करो।* आपका चेहरा बाप का साक्षात्कार कराये। आपका चेहरा, आपकी चलन बाप की याद दिलावे। ये सेवा नम्बरवन है। ऐसे सेवाधारी जिनमें स्वार्थ भाव नहीं हो। ऐसे नहीं मुझे ही चांस मिलेमेरे को ही मिलना चाहिए। क्यों नहीं मिलता, मिलना चाहिए - *ऐसे संकल्प को भी स्वार्थ कहा जाता है।*

➳ _ ➳  चाहे ब्राह्मण परिवार में आपका नाम नामीग्रामी नहीं है,सेवाधारी अच्छे हो फिर भी आपका नाम नहीं हैलेकिन बाप के पास तो नाम है ना, *जब बाप के दिल पर नाम है तो और क्या चाहिए!* *और सिर्फ बाप के दिल पर नहीं लेकिन जब फाइनल में नम्बर मिलेंगे तो आपका नम्बर आगे होगा। क्योंकि बापदादा हिसाब रखते हैं।* आपको चांस नहीं मिलाआप राइट हो लेकिन चांस नहीं मिला तो वो भी नोट होता है। और मांग कर चांस लियावो किया तो सही लेकिन वो भी मार्क्स कट होते हैं।

➳ _ ➳  *ये धर्मराज का खाता कोई कम नहीं है। बहुत सूक्ष्म हिसाब-किताब है। इसलिए नि:स्वार्थ सेवाधारी बनोअपना स्वार्थ नहीं हो। कल्याण का स्वार्थ हो।* यदि आपको चांस है और दूसरा समझता है कि हमको भी मिले तो बहुत अच्छा और योग्य भी है तो अगर मानो आप अपना चांस उसको देते हो तो भी आपका शेयर उसमें जमा हो जाता है। चाहे आपने नहीं कियालेकिन किसको चांस दिया तो उसमें भी आपका शेयर जमा होता है। क्योंकि *सच्चा डायमण्ड बनना है ना। तो हिसाब-किताब भी समझ लोऐसे अलबेले नहीं चलोठीक हैहो गया...... बहुत सूक्ष्म में हिसाब-किताब का चौपड़ा है। बाप को कुछ करना नहीं पड़ता हैआटोमेटिक है।*

✺   *ड्रिल :-  "नि:स्वार्थ सेवाधारी बन सच्चा डायमण्ड बनना"*

➳ _ ➳  *मैं आत्मा अपने ही धुन में तितली की भांति उड़ती चली जा रही हूँ... कभी इस फूल पे तो कभी किसी बादल की टुकड़ी पर...* जो भी मुझे देख रहे खुश हो रहे, तारीफ कर रहे... मैं आत्मा देख रही हूँ हर बादल की टुकड़ी को... वो कभी टी.वी, तो कभी अखबार है... अपनी ऊंचाइयों को छूती जा रही हूँ... कितना सुकून है जहां सिर्फ मैं ही मैं हूँ... कितना ना आराम से बैठी हूँ बादल की टुकड़ी पर... और देखती हूँ कि दिव्य किरणें नीचे की ओर आ रही है... *ये किरणें चारों ओर फैल रही है... देखती हूँ बाबा धीरे-धीरे किरणों से उतरते जा रहे हैं...*

➳ _ ➳  बाबा मेरे हाथ थामे माउंट आबू की पहाड़ी पर ले जाते हैं... और बाबा के साथ बैठ जाती हूँ... *बाबा कहते हैं बच्चे तुम अपने दिव्य बुद्धि से देखो, त्रिकालदर्शी बन अपनी हर एक पार्ट को देखो जो अंतिम जन्म तक भी श्रेष्ठ है...* अपनी असली स्वरूप की स्मृति होते ही अल्पकाल की मान, प्रशंसा, नाम की जो भी संकल्प रहते थे उससे डिटैच होने लगी हूँ...

➳ _ ➳  *मैं आत्मा बाबा के सानिध्य में बैठी बाबा से पवित्रता की सफेद किरणें ग्रहण करती जा रही हूँ... जो मेरे देहभान को खत्म करता जा रहा है...* ज्ञान सूर्य शिव बाबा से ज्ञान की नीली किरणें ग्रहण करती जा रही हूँ... मास्टर ज्ञान सूर्य बन मास्टर दाता बनती जा रही हूँ... स्नेह, सुख, शांति, शक्ति, आनंद की रंगबिरंगी किरणें मुझमें समाती जा रही है... सातों गुणों से भरपूर होकर मैं आत्मा इच्छा मात्रम अविद्या सी हो गयी हूँ... देहअभिमान से छूटती देहिअभिमानी होती जा रही हूँ... मैं आत्मा डायमंड जैसी बनती जा रही हूँ... *बाबा ने कहा कि बच्चे सेवा तुम्हारे पास चल कर आएगी... तुम्हें सेवा मांगना नहीं है... निस्वार्थ सेवाधारी बनना है...*

➳ _ ➳  *कल्प-कल्प मैं आत्मा ही निस्वार्थ सेवाधारी बनी हूँ... हर ब्राह्मण आत्मा को शुभभावना, शुभकामना की टचिंग हो रही है...* हर ब्राह्मण आत्मा को सेवा का चांस मिलता जा रहा है... कोई न कोई सेवा का चांस बाबा मुझ आत्मा द्वारा औरों को भी दे रहे हैं... *ये ब्राह्मण जीवन सफल होता जा रहा है... कल्प-कल्प के लिए श्रेष्ठ भाग्य का खाता नूँध हो गया है... वाह रे मैं आत्मा... वाह रे मेरा भाग्य...*

➳ _ ➳  *दिलाराम बापदादा की दिलतख़्तनशीन बन गई हूँ... सच्चा-सच्चा  डायमंड बनती जा रही हूँ... निस्वार्थ सेवाधारी बनना है... बाबा ने मुझ आत्मा को बेदाग, सच्चा डायमंड बना दिया है...* एक चमकता हुआ डायमंड जो रोशनी से भरपूर होकर... औरों को भी अपने चेहरे और चलन से बाबा की प्रत्यक्षता करती जा रही है... शुक्रिया बाबा... बहुत बहुत शुक्रिया... जो धर्मराज के खाते में पुण्य जमा होता जा रहा है... सूक्ष्म हिसाब-किताब का चौपड़ा भी चमक रहा... *शुक्रिया बाबा जो सच्चा डायमंड बन गई हूँ... ओम् शान्ति।*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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