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 13 / 09 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *काम महाशत्रु पर विजय पायी ?*

 

➢➢ *हर कदम पर बाप से राय लेकर चले ?*

 

➢➢ *समस्याओं को चढ़ती कला का साधन अनुभव कर सदा संतुष्ट रहे ?*

 

➢➢ *स्व स्थिति में स्थित रहकर सर्व परिस्थितियों को पार किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जैसे बाप को सर्व स्वरुपों से वा सर्व सम्बन्धों से जानना आवश्यक है, ऐसे ही बाप द्वारा स्वयं को भी जानना आवश्यक है।* जानना अर्थात् मानना। मैं जो हूँ, जैसा हूँ, ऐसे मानकर चलेंगे तो देह में विदेही, व्यक्त में होते अव्यक्त, चलते-फिरते फरिश्ता वा कर्म करते हुए कर्मातीत स्थिति बन जायेगी।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं संगमयुगी पुरुषोत्तम आत्मा हूँ"*

 

  अपने को संगमयुगी पुरुषोत्तम आत्मायें अनुभव करते हो? पुरुषोत्तम अर्थात् पुरुषों में उत्तम पुरुष। तो अभी साधारण नहीं हो पुरुषोत्तम हो। क्योंकि ब्राह्मण अर्थात् श्रेष्ठ। ब्राह्मणों को सदा ऊंचा दिखाते हैं। मुख वंशावली दिखाते हैं ना। *तो ब्राह्मण बन गये अर्थात् श्रेष्ठ बन गये। साधारण पुरुष आप पुरुषोत्तम आत्माओंकी पूजा करते हैं क्योंकि ब्राह्मण अर्थात् पवित्र बन गये ना। तो पवित्रता की ही पूजा होती है। साधारण आत्मा भी पवित्रता को धारण करती है तो महान् आत्मा कहलाती है।* तो आप सब पवित्र आत्मायें हो ना कि मिक्स आत्मा हो? थोड़ी-थोड़ी अपवित्रता, थोड़ी-थोड़ी पवित्रता! नहीं। पवित्र आत्मा बन गये। तो पवित्रता ही श्रेष्ठता है। पवित्रता ही पूज्य है। तो ये नशा रहता है कि हम पुजारी से पूज्य बन गये?

 

  ब्राह्मणों की पवित्रता का गायन है। कोई भी शुभ कार्य होगा तो ब्राह्मण से करायेंगे। अशुभ कार्य ब्राह्मण से नहीं करायेंगे। अशुभ कार्य ब्राह्मण करें तो कहेंगे ये नाम का ब्राह्मण है, काम का नहीं। तो आप नामधारी हो या कामधारी? नामधारी ब्राह्मण तो बहुत हैं। *लेकिन आप जैसा नाम वैसा काम करने वाले हो। साधारण आत्मा नहीं हो, विशेष आत्मा हो। ये खुशी है ना। कल साधारण थे और आज विशेष बन गये। तो विशेष आत्मा समझने से जैसी स्मृति होगी वैसी स्थिति होगी और जैसी स्थिति वैसे कर्म होंगे।* चेक करो जब स्थिति कमजोर होती है तो कर्म कैसे होते हैं। कर्म में भी कमजोरी आ जायेगी और स्थिति शक्तिशाली तो कर्म भी शक्तिशाली होंगे।

 

  तो स्थिति का आधार है स्मृति। स्मृति खुशी की है तो स्थिति भी खुश। कर्म भी खुशी-खुशी से करेंगे। फाउन्डेशन है स्मृति। तो बाप ने स्मृति बदल ली। साधारण से विशेष आत्मा बने तो स्मृति चेंज हो गई। चाहे कर्म साधारण हों लेकिन साधारण कर्म में भी विशेषता हो। मानो खाना बना रहे हो तो ये तो साधारण कर्म है ना, सब करते हैं लेकिन आपका खाना बनाना और दूसरों के खाना बनाने में फर्क होगा ना। *आपके याद का भोजन और साधारण भोजन में अन्तर है। वो प्रसाद है, वो खाना है। तो विशेषता आ गई ना। याद में जो खाना खाते हो या बनाते हो तो उसको ब्रह्मा भोजन कहते हैं। तो सदा याद रखना कि पुरुषोत्तम विशेष आत्मायें बन गये तो साधारण कर्म कर नहीं सकते।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  तो *राजा का ऑर्डर उसी घडी उसी प्रकार से मानना - यह है राज्य-अधिकारी की निशानी।* ऐसे नहीं कि तीन-चार मिनट के अभ्यास के बाद मन माने या एकाग्रता के बजाए हलचल के बाद एकाग बने, इसको क्या कहेंगे?

 

✧   अधिकारी कहेंगे? तो ऐसी चेकिंग करो। क्योंकि पहले से ही सुनाया है कि *अंतिम समय की अंतिम रिजल्ट का समय एक सेकण्ड का क्वेचन एक ही होगा।*

 

✧  इन सूक्ष्म शक्तियों के अधिकारी बनने का अभ्यास अगर नहीं होगा अर्थात *आपका मन राजा का ऑर्डर एक घडी के बजाए तीनचार घडियों में मानता है तो राज्य अधिकारी कहलायेंगे वा एक सेकण्ड के अंतिम पेपर में पास होगे?* कितने माक्र्स मिलेंगे?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ तो ब्राह्मणों का स्थान और स्थिति - दोनों ऊँची। अगर स्थान की याद होगी तो स्थिति स्वत: ऊँची हो जायेगी। *ब्राह्मणों की दृष्टि भी सदा ऊपर रहती है। क्योंकि आत्मा 'आत्माओं' को देखती है, आत्मा ऊपर है तो दृष्टि भी ऊपर जायेगी।* कभी भी किससे मिलते हो या बात करते हो तो आत्मा को देखकर बात करते हो, आत्मा से बात करते हो, आपकी दृष्टि आत्मा की तरफ जाती है। आत्मा मस्तक में है ना। *तो ऊँची स्थिति में रहना सहज है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- तत्वों सहित मनुष्य को बदलने वाली यूनिवर्सिटी एक ही है"*

 

_ ➳  मैं आत्मा गॉडली स्टूडेंट बन सेंटर में बाबा के सम्मुख बैठ बाबा की यादों में मग्न हो जाती हूँ... धीमे-धीमे प्यारे बाबा के मधुर गीत बज रहे हैं... लाल प्रकाश से भरा पूरा हाल परमधाम नज़र आ रहा है... सभी आत्माएं चमकते हुए लाल बिंदु लग रहे हैं... *मनुष्य से देवता, नर से नारायण बनने की यह यूनिवर्सिटी है जिसमें मुझे कोटों में से चुनकर स्वयं परमात्मा ने एडमिशन करवाया है... अपना बच्चा, अपना स्टूडेंट, अपना वारिस बनाया है...* प्यारे बाबा का आह्वान करते ही दीदी के मस्तक में विराजमान होकर मीठे बाबा मीठी मुरली सुनाते हैं...

 

   *नर से नारायण बनने की सच्ची सच्ची नालेज सुनाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे बच्चे... इस झूठ की दुनिया में झूठ को ही सत्य समझ जीते आये... *अब सत्य पिता सचखण्ड की स्थापना करने आये है... अपने सत्य दमकते स्वरूप को भूल साधारण मनुष्य होकर दुखो में लिप्त हो गए बच्चों को... मीठा बाबा नारायण बनाकर विश्व का मालिक बनाने आया है...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा पत्थर से पारस, मनुष्य से देवता बनने की पढाई को धारण करते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा भगवान से बैठ सारे सत्य को समझ रही हूँ... कैसे साधारण नर से नारायण बन सकती हूँ... यह गुह्य रहस्य बुद्धि में भर रही... ईश्वर पिता मुझे गोद में बिठा पढ़ा रहा...* और मेरा सदा का नारायणी भाग्य जगा रहा है...

 

   *लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सत्य की राह पर ऊँगली पकड़कर चलाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... जब सब मनुष्य मात्र झूठ को सत्य समझ जी रहे तो सत्य फिर कौन बताये... *सत्य परमात्मा के सिवाय तो भूलो को... फिर कौन राह दिखाये... तो वही सत्य कथा प्यारा बाबा सुना रहा और कांटे हो गए बच्चों को फूलो सा फिर खिला रहा...*

 

_ ➳  *अपने भाग्य पर नाज करती अविनाशी खुशियों में लहराते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा मीठे बाबा से महान भाग्य प्राप्त कर रही हूँ... सचखण्ड की मालिक बन रही हूँ... *मनुष्य से देवताई रूप में दमक रही हूँ... और सुखो की बगिया में खुशियो संग झूल रही हूँ... कितना प्यारा मेरा भाग्य है...*

 

   *दुःख की धरती बदलकर सुख की स्वर्णिम नगरी स्थापित करते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... सच्चा पिता तो सत्य सुखो से भरा सचखण्ड ही बनाये... यह दुःख धाम तो विकारो की माया ही बसाये... पिता तो अपने बच्चों को मीठे महकते सुखो की नगरी में ही बिठाये... *सारे विश्व का राज्य बच्चों के कदमो में ले आये और नारायण बनाकर विश्व धरा पर शान से चमकाए... तो वही मीठी सत्य नालेज बाबा बैठ सुना रहा है...*

 

_ ➳  *परमात्म ज्ञान पाकर गुण, शक्तियों और अनुभवों के खजानों से सजकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा सच्चे पिता से सत्य जानकारी लेकर सोने सी निखरती जा रही हूँ... *मीठा बाबा मुझे नारायण सा सजा रहा... यह नालेज मै मन बुद्धि में ग्रहण करती जा रही हूँ... और अपने सत्य स्वरूप को जीती जा रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- काम महाशत्रु पर विजय पानी है*"

 

_ ➳  एकान्त में बैठ, अपने अनादि और आदि स्वरुप के बारे में मैं विचार करती हूँ कि जब मैं आत्मा अपने अनादि स्वरूप में अपने शिव पिता परमात्मा के साथ परमधाम में थी तो कितनी शुद्ध, पावन और सतोप्रधान थी। *यह सोचते - सोचते अपने अनादि ज्योति बिंदु स्वरूप में स्थित हो, मन बुद्धि के विमान पर बैठ मैं पहुँच जाती हूँ परमधाम और ज्ञान के दिव्य चक्षु से अपने वास्तविक स्वरूप को निहारने लगती हूँ*। देख रही हूँ मैं स्वयं को अति सुंदर, अति उज्ज्वल एक चमकती हुई ज्योति के रूप में जो एक चमकते हुए सितारे की भांति दिखाई दे रहा है। जिसमे से निकल रहा प्रकाश अनन्त किरणो के रूप में चारों और फैल रहा है। मेरा यह अनादि स्वरूप कितना सुंदर और प्यारा है। 

 

_ ➳  अपने इस अति सुंदर, सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप के साथ ही मैं आत्मा परमधाम से नीचे सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने के लिए आती हूँ। *अपने शिव पिता परमात्मा द्वारा स्थापित अति सुंदर, देवी देवताओं की सम्पूर्ण सतोप्रधान दुनिया स्वर्ग में मैं सम्पूर्ण सतोप्रधान दैवी शरीर धारण कर अवतरित होती हूँ*। देख रही हूँ अब मैं स्वयं को अपने अति सुंदर दैवी स्वरूप में सतयुगी दुनिया में। जहाँ सुख, शान्ति और सम्पन्नता भरपूर है। दुख का जहां कोई नाम निशान भी नही।

 

_ ➳  स्वर्ग के अपरमअपार सुखों को भोगते हुए सतयुग और त्रेता युग में अपना सुंदर पार्ट बजा कर मैं आत्मा जब द्वापर युग मे प्रवेश करती हूँ तो दैहिक भान आने से विकारों की उत्पत्ति होनी शुरू हो जाती है। *इन विकारों में से भी मुख्य काम विकार की चोट मुझ आत्मा के उज्ज्वल स्वरूप को काला कर देती है। मेरी सुख, शान्ति, समृद्धि छीन कर मुझे दुखी और अशांत, पूज्य से पुजारी बना देती है*। किन्तु संगम युग पर मेरे शिव पिता परमात्मा आ कर, सत्य ज्ञान दे कर, पवित्रता की धारणा कराकर मुझे फिर से उसी सुख और शन्ति को पाने का मार्ग दिखाते हैं। 

 

_ ➳  यह विचार करते - करते मैं अब अपने संगमयुगी ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ और अपने ब्राह्मण जीवन की महान उपलब्धियों को स्मृति में लाकर अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य का गुणगान करती हुई अपने शिव पिता की मीठी यादों में खो जाती हूँ। *मेरे शिव पिता की मीठी याद मेरे दिल को सुकून दे रही है औऱ एक गहन शांत चित स्थिति में मुझे स्थित कर रही है*। इस शांत चित स्थिति में स्थित होते ही मुझे ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे मैं आत्मा इस साकारी देह से बिल्कुल डिटैच, अशरीरी हूँ।

 

_ ➳  अशरीरीपन की स्थिति में स्थित होकर अब मैं एक सुंदर रूहानी यात्रा पर जा रही हूँ और इस यात्रा को पूरा करके मैं एक ऐसी दुनिया मे प्रवेश कर रही हूँ जहाँ चारों ओर जगमग करती हुई निराकारी आत्माएं ही आत्माएं दिखाई दे रही है। देह और देह से जुड़े किसी भी पदार्थ का यहां संकल्प मात्र भी नहीं। *एक बहुत ही न्यारी और प्यारी साक्षी स्थिति में स्थित हो कर मैं पवित्रता के सागर अपने शिव पिता परमात्मा के समीप जा रही हूँ*। उनसे आ रही सातों गुणों की सतरंगी किरणों और सर्वशक्तियों को स्वयं में समाने के साथ - साथ योग अग्नि में अपने विकर्मों को भी दग्ध कर रही हूँ।

 

_ ➳  *बाबा से आ रही सर्वशक्तियों की ज्वाला स्वरूप किरणें जैसे - जैसे मुझ आत्मा पर पड़ रही हैं वैसे - वैसे काम विकार के कारण मुझ आत्मा पर चढ़ी हुई मैल धुल रही है और मेरा स्वरूप फिर से सच्चे सोने के समान चमकदार हो रहा है*। सोने के समान शुद्ध बन कर अब मैं परमधाम से नीचे आ जाती हूँ और फिर से अपनी स्थूल देह में प्रवेश कर जाती हूँ। 

 

_ ➳  अपने इस संगमयुगी ब्राह्मण जीवन में मैं सम्पूर्ण पवित्र रहूँगी इस प्रतिज्ञा के साथ अब मैं फिर से अपनी सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था को पाने का पुरुषार्थ निरन्तर कर रही हूँ। *काम की चोट से स्वयं को बचा कर, कदम - कदम पर सावधानी रखते हुए गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल पुष्प समान जीवन जीते हुए, अपनी पवित्र मनसा वृति से मैं औरों को भी पवित्रता के इस मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं समस्याओं को चढ़ती कला का साधन अनुभव करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सन्तुष्ट रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं शक्तिशाली आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव स्व-स्थिति में स्थित रहती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सर्व परिस्थितियों को सदा पार कर लेती हूँ  ।*

   *मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *वर्तमान समय आप बच्चों की विश्व को इस सेवा की आवश्यकता है जो चेहरे सेनयनों सेदो शब्द से हर आत्मा के दु:ख को दूर कर खुशी दे दो।* आपको देखते ही खुश हो जाएं। इसलिए खुशनुमा चेहरा या खुशनुमा मूर्त सदा रहे क्योंकि मन की खुशी सूरत से स्पष्ट दिखाई देती है। कितना भी कोई भटकता हुआ, परेशानदु:ख की लहर में आयेखुशी में रहना असम्भव भी समझते हों लेकिन आपके सामने आते ही आपकी मूर्तआपकी वृत्ति, आपकी दृष्टि आत्मा को परिवर्तन कर ले।

 

 _ ➳  आज मन की खुशी के लिए कितना खर्चा करते हैंकितने मनोरंजन के नये-नये साधन बनाते हैं। *वह हैं अल्पकाल के साधन और आपकी है सदाकाल की सच्ची साधना।* तो साधना उन आत्माओं को परिवर्तन कर ले। *हाय-हाय ले आवें और वाह-वाह लेकर जाये। वाह कमाल है - परमात्म आत्माओं की! तो यह सेवा करो।* समय प्रति समय जितना अल्पकाल के साधनों से परेशान होते जायेंगेऐसे समय पर आपकी खुशी उन्हों को सहारा बन जायेगी क्योंकि आप हैं ही खुशनसीब। 

 

✺   *ड्रिल :-  "सच्ची खुशी बाँटने की सेवा का अनुभव"*

 

 _ ➳  रात्रि को पूरे दिन का चार्ट देकर मैं आत्मा... अपना स्थूल शरीर बिस्तर पर छोड़कर *सूक्ष्म वतन में चली जाती हूँ... मीठी ब्रह्मा मां की स्नेह भरी गोदी में सो जाती हूँ... ब्रह्म मुहूर्त के सुनहरे समय में... मीठी माँ अपना प्यार भरा हाथ मेरे सिर पर फिराते हुए... मुझे मीठी वाणी से मीठे बच्चे, लाडले बच्चे कह कर जगा रही है...* मीठी माँ गुणों और वरदानों से मुझ आत्मा को सजा रही है...

 

 _ ➳  पूरी तरह चार्ज होकर... *अपनी सम्पन्न और भरपूर अवस्था में मैं आत्मा... अपने स्थूल शरीर में प्रवेश करती हूँ... मैं स्वयं को ईश्वरीय खजानों से भरपूर देख रही हूँ...* साक्षी होकर मैं देखती हूँ कि... आज संसार में चारों तरफ कितना दुःख, अशांति है... आत्मायें कष्टों और पीड़ाओं से कराह रही हैं... आत्माएं भिखारी की भांति तलाश रही हैं... कि उनके अंधकारमय जीवन में... कहीं से खुशी की हल्की सी रोशनी नज़र आ जाये...

 

 _ ➳  मैं आत्मा खुशियों के सागर पिता की संतान हूँ... *मैं खुशी के खजाने की मालिक हूँ... मैं आत्मा खुशी के खजाने से भरपूर हूँ... लबालब हूँ... मैं आत्मा अपने मुस्कुराते चेहरे से, नयनों से, बोल से सर्व को यह खजाना बांटती जा रही हूँ...* खुशियों के फव्वारे बाबा के नीचे स्थित मैं आत्मा... सर्व आत्माओं पर खुशी का खजाना बरसा रही हूँ...

 

 _ ➳  आत्माओं के कष्ट दूर हो रहे हैं... वे सच्ची खुशी प्राप्त कर स्वयं को धन्य धन्य महसूस रही हैं... *मुझ फरिश्ते के वरदानी बोल, मधुर बोल आत्माओं को कष्टों से मुक्त करते जा रहे हैं... उनके जीवन में मिठास घोल रहे हैं...* बाबा मुझे यह सबसे श्रेष्ठ सेवा कराने के निमित्त बना रहे हैं...

 

 _ ➳  मैं आत्मा यह सच्ची सेवा कर रही हूँ... सर्व को खुशी का खजाना बांटती जा रही हूँ... आत्मायें, जो कि मनोरंजन के साधन आदि पर कितना खर्चा करके अल्पकाल की खुशी की तलाश कर रही हैं... लेकिन फिर भी उनको खुशी नहीं मिल पा रही है... वे *दुःखी, अशांत आत्मायें परमपिता परमात्मा से प्राप्त सच्ची खुशी को प्राप्त कर वाह-वाह कर रही हैं... उन के जीवन की बगिया इस सच्ची खुशी के शीतल जल से लहलहा गयी हैं... सभी के दिलों में परमात्म प्रत्यक्षता हो रही है... चारों ओर वाह बाबा, वाह बाबा के मधुर बोल गूंज रहे हैं...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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