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 13 / 10 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सदा संतुष्ट रह संतोषी देवी बनकर रहे ?*

 

➢➢ *हद और बेहद के बाईस्कोप राज़ समझकर दूसरों को समझाया ?*

 

➢➢ *फुल स्टॉप की स्टेज द्वारा प्रकृति की हलचल को स्टॉप किया ?*

 

➢➢ *निर्विघन सेवाधारी बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *पिछले कर्मों के हिसाब-किताब के फलस्वरूप तन का रोग हो, मन के संस्कार अन्य आत्माओं के संस्कारों से टक्कर भी खाते हो लेकिन कर्मातीत, कर्मभोग के वश न होकर मालिक बन चुक्तू कराओ।* कर्मयोगी बन कर्मभोग चुक्तू करना-यह है कर्मातीत बनने की निशानी।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बाप की छत्रछाया में रहने वाली विशेष आत्मा हूँ"*

 

  सदा अपने को बाप की छत्रछाया में रहने वाली विशेष आत्माएं अनुभव करते हो? *जहाँ बाप की छत्रछाया है, वहाँ सदा माया से सेफ रहेंगे। छत्रछाया के अन्दर माया आ नहीं सकती। मेहनत से स्वत: ही दूर हो जायेंगे। सदा मौज में रहेंगे। क्योंकि जब मेहनत होती है, तो मेहनत मौज अनुभव नहीं कराती।*

 

  जैसे, बच्चों की पढ़ाई जब होती है तो पढ़ाई में मेहनत होती है ना। जब इम्तिहान के दिन होते हैं तो बहुत मेहनत करते हैं, मौज से खेलते नहीं हैं। और जब मेहनत खत्म हो जाती है, इम्तिहान खत्म हो जाते हैं तो मौज करते हैं। *तो जहाँ मेहनत है, वहाँ मौज नहीं। जहाँ मौज है, वहाँ मेहनत नहीं। छत्रछाया में रहने वाले अर्थात् सदा मौज में रहने वाले।* क्योंकि यहाँ पढ़ाई ऊंची पढ़ते हो लेकिन ऊंची पढ़ाई होते हुए भी निश्चय है कि हम विजयी हैं ही, पास हुए पड़े हैं। इसलिये मौज में रहते हैं।

 

  *कल्प-कल्प की पढ़ाई है, नयी बात नहीं है। तो सदा मोज् में रहो और दूसरों को भी मौज में रहने का सन्देश देते रहो, सेवा करते रहो। क्योंकि सेवा का ही फल इस समय भी और भविष्य में भी खाते रहेंगे। सेवा करेंगे तब तो फल मिलेगा।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जो आत्मा स्वराज्य चलाने में सफल रहती है तो *सफल राज्य अधिकारी की निशानी है वह सदा अपने पुरुषार्थ से और साथ-साथ जो भी सम्पर्क में आने वाली आत्माएँ हैं वह भी सदा उस सफल आत्मा से सन्तुष्ट होंगी* और सदा दिल से उस आत्मा के प्रति शुक्रिया निकलता रहेगा।

 

✧  *सर्व के दिल से, सदा दिल के साज से वाह-वाह के गीत बजते रहेंगे, उनके कानों में सर्व द्वारा यह वाह-वाह का शुक्रिया का संगीत सुनाई देगा।* यह गीत ऑटोमेटिक है। इसके लिए टेपरिकार्डर बजाना नहीं पडता। इसके लिए कोई साधनों की आवश्यकता नहीं। यह अनहद गीत है। तो ऐसे सफल राज्य अधिकारी बने हो?

 

✧  क्योंकि *अभी के सफल राज्य अधिकारी भविष्य में सफलता का फल विश्व का राज्य प्राप्त करेंगे।* अगर सम्पूर्ण सफलता नहीं, कभी कैसे हैं, कभी कैसे हैं, कभी 100 परसेन्ट सफलता है, कभी सिर्फ सफलता है। कभी 100 परसेन्ट सफल नहीं हैं तो ऐसे राज्य अधिकारी आत्मा को विश्व का राज्य ताज प्राप्त नहीं होता लेकिन रॉयल फैमिली में आ जाता है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *बापदादा भिन्न-भिन्न रूप से बच्चों को समान बनाने की विधि सुनाते रहते हैं। विधि है ही बिन्दी, और कोई विधि नहीं है।* अगर विदेही बनते हो तो भी विधि है बिन्दी बनना। अशरीरी बनते हो, कर्मातीत बनते हो, सबकी विधि बिन्दी है। *इसलिए बापदादा ने पहले भी कहा है। अमृतवेले बापदादा से मिलन मनाते, रूह-रूहान करते जब कार्य में आते हो तो पहले तीन बिन्दियों का तिलक मस्तक पर लगाओ।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- आत्म-अभिमानी होकर रहना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा एकांत में बैठ ड्रिल करती हूँ... मैं एक आत्मा हूँ... ये शरीर नहीं हूँ... इस शरीर को चलाने वाली एक चैतन्य शक्ति हूँ... मैं आत्मा भृकुटी सिहांसन पर बैठ राज करने वाली स्वराज्य अधिकारी हूँ...* धीरे-धीरे मैं आत्मा इस शरीर से बाहर निकल रही हूँ... चमकीले प्रकाश का सूक्ष्म शरीर धारण कर स्वदर्शन चक्र फिराती हूँ... *अपने पांचो स्वरूपों का दर्शन करती हुई पहुँच जाती हूँ मधुबन तपस्या धाम में... प्यारे बाबा से रूह रिहान करने...*

 

  *अपनी दुआओं और वरदानों से मुझे मालामाल करते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... देह को सत्य समझ जीते आये और दुःख के गहरे दलदल में धँस चले... *अब अपने आत्मिक सत्य स्वरूप की हर पल प्रैक्टिस करो... और अपने अविनाशीपन के भान में डूब जाओ...* मीठे बाबा की मीठी यादो में इस कदर खो जाओ कि देह का भान ही न रहे...और यूँ यादो में खोये हुए से घर को चलें...

 

_ ➳  *मैं आत्मा देहभान को भूल अपने सत्य स्वरुप में टिककर कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा अब शरीर के दायरे से ऊपर उठ अपने सत्य स्वरूप के भान में डूबी हुई आपकी यादो में... सच्चे प्यार के मीठे रंग में रंगी हुई हूँ.... *एक बाबा ही मेरा संसार है और मीठी यादे ही मेरे जीने का आधार है*...

 

  *अपनी श्रीमत से देवताई पद पाने की राह दिखाते हुए मीठा बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... देह समझने के अनुभवी जनमो तक रहे हो... *अब आत्मिक स्थिति के गहरे अनुभवी बनकर जीवन में अथाह सुखो के जादू को महसूस करो...* शिवबाबा की मीठी यादो में खोकर स्वयं को दिव्य गुण और शक्तियो से भरपूर कर लो... अशरीरीपन के भान में डूब जाओ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपने निज स्वरुप में अविनाशी सुखों की अनुभूति करते हुए कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा अपने सत्य स्वरूप की पहचान को आपसे पाकर खुशनुमा हो चली हूँ... *मै नश्वर नही अविनाशी आत्मा हूँ इस अहसास ने जीवन में सुखो की बहार ला दी है... और आत्मिक स्थिति में डूबकर आपके प्यार को जीती जा रही हूँ...*

 

  *पवित्रता की किरणों का ताज पहनाकर मुझे गले लगाते हुए मेरे मीठे बाबा कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *यह विनाशी देह नही हो खुबसूरत मणि हो... अपने अप्रतिम सौंदर्य में खो जाओ... दिव्य गुण और शक्तियो से सजकर देवताई सुंदरता को पाओ...* मीठे बाबा की यादो में अपनी खोयी शक्तियो और खजानो को पाकर मालामाल हो जाओ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा की बाँहों में समाकर सबकुछ भूल एकरस स्थिति में स्थित होकर कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपके प्यार भरे आगोश में कितनी सुखी कितनी महफूज हूँ... *इस देह के मटमैलेपन से मुक्त हो रही  हूँ और आपके प्यार भरे साये में देवताई गुणो से सज संवर रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  एक बाप की मत पर चल सदा सन्तुष्ट रह सन्तोषी देवी बनना है*"

 

_ ➳  संतुष्टमणि बन सदा संतुष्ट रहने और सर्व को संतुष्ट करने का जो लक्ष्य बाबा ने अपने हर एक ब्राह्मण बच्चे को दिया है उस लक्ष्य को पाने का आधार है स्वयं को सदा सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न अनुभव करना। क्योकि सर्व प्राप्तियों की अनुभूति ही जीवन मे सन्तुष्टता ला सकती है। *इसलिए अपने इस ब्राह्मण जीवन में अब मुझे सदा निर्विघ्न, सदा विघ्न विनाशक और सदा सन्तुष्ट रह सर्व को संतुष्ट करने का सर्टिफिकेट हर समय लेते रहना है ताकि टेंशन की शिकार, विश्व की सर्व असन्तुष्ट आत्माओं को सन्तुष्टता का अनुभव करवा कर उनकी टेंशन और परेशानियों को मैं समाप्त करके बापदादा से सन्तुष्टमणि आत्मा का सर्टिफिकेट प्राप्त कर बाबा का तख्तनशीन बन सकूँ*।

 

_ ➳  इसी प्रतिज्ञा के साथ स्वयं को परमात्म प्राप्तियों से भरपूर करने के लिए मैं श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर सेट होकर बैठ जाती हूँ और अपने मन बुद्धि को स्थिर करती हूँ परमात्म याद में। *अपने निराकार बिंदु स्वरूप में स्थित होकर अपने सम्पूर्ण ध्यान को अपने निराकार बिंदु बाप पर एकाग्र करते ही, परमात्म प्राप्तियों की अनुभूति मुझे सहज ही अपनी ओर खींचने लगती है*। परमात्म प्यार और परमात्म प्राप्तियों के अखुट खजाने से स्वयं को भरपूर करने के लिए मैं आत्मा विदेही बन देह और देह की दुनिया के हर बन्धन से मुक्त होकर अब अपने विदेही पिता के पास जाने के लिए चल पड़ती हूँ एक सुखमयी, आनन्दमयी यात्रा पर।

 

_ ➳  अंतर्मुखता की इस यात्रा पर एक - एक कदम बढ़ाती, परमात्म प्यार के सुखद पलों का मधुर एहसास करती मैं इस खूबसूरत यात्रा पर चलती जा रही हूँ। आकाश को पार कर, सूक्ष्म लोक से ऊपर यह यात्रा मुझे मेरे स्वीट साइलेन्स होम में ले आती है। *अपने शान्ति धाम घर मे शांति के सागर अपने निराकार बिंदु बाप के सामने मैं बिंदु आत्मा आकर बैठ जाती हूँ और स्वयं को परमात्म प्यार और परमात्म शक्तियों से भरपूर करने लगती हूँ*। प्यार के सागर अपने प्यारे बाबा से अपने अंदर असीम प्यार और शक्तियाँ भरकर तृप्त होकर अब मैं परमधाम से नीचे आ जाती हूँ और अपने लाइट के फ़रिशता स्वरूप को धारण कर ईश्वरीय वरदानों से स्वयं को सम्पन्न बनाने के लिए सूक्ष्म वतन में पहुँचती हूँ।

 

_ ➳  सूक्ष्म वतन में अव्यक्त बापदादा के सम्मुख बैठ उनके वरदानी हस्तों से वरदान ले कर अब मैं फ़रिश्ता स्वयं को भरपूर कर रहा हूँ। *अपनी सर्वशक्तियों से और अपनी लाइट माइट मुझे भरपूर करने के साथ - साथ बाबा अपनी पावन दृष्टि से मुझे निहारते हुए मेरे अंदर असीम बल और शक्ति का संचार कर रहे हैं*। स्वयं को सर्व प्राप्तियों के अखुट खजाने से भरपूर करके, सर्वप्राप्ति सपन्न स्वरूप बन कर अब मैं सन्तुष्टमणि के श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर बैठ, सर्व को संतुष्ट करने 

के लिये सूक्ष्म वतन से नीचे साकार लोक में आ जाता हूँ।

 

_ ➳  बापदादा का आह्वान कर, उनके साथ कम्बाइंड होकर अब मैं सारे विश्व में चक्कर लगा रहा हूँ और चारों ओर रोती बिलखती दुखी, अशांत, निराश और हताश आत्माओं को देख रहा हूँ। इन सभी दुखी अशांत आत्माओं को संतुष्ट करने के लिए अब मैं बाबा से सर्वशक्तियाँ लेकर इन आत्माओं तक  पहुंचा रहा हूँ। *मैं देख रहा हूँ बाबा से आ रही सर्वशक्तियों की किरणें मुझ फ़रिश्ते में समा कर, रंग बिरंगी फ़ुहारों के रूप में मुझ से निकल कर उन सभी आत्माओं के ऊपर बरस रही हैं*। पवित्रता, सुख, शांति, प्रेम, आनन्द, और शक्ति से सम्पन्न ये किरणे सभी आत्माओं छू कर उन्हें सन्तुष्ट कर रही है। सबके मुरझाये हुए चेहरे खिल उठे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे परमात्म पालना का अनुभव करके वो सब तृप्त हो गई है। 

 

_ ➳  टेंशन भरी जिंदगी जीती, विश्व की सभी असन्तुष्ट आत्माओं को परमात्म प्यार के सुख की अनुभूति द्वारा उन्हें सन्तुष्टता का अनुभव करवा कर अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में लौट रही हूँ। *स्वयं को परमात्म प्राप्तियों से सदा भरपूर रखते हुए, सन्तुष्टमणि बन, स्व से, सेवा से और सम्बन्ध में संतुष्टता का अनुभव करते हुए, अब मैं अपने संपर्क में आने वाली सभी आत्माओं को परमात्म प्यार और ईश्वरीय अलौकिक स्नेह दे कर सबके जीवन को सन्तुष्टता से भरपूर कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं फुलस्टॉप की स्टेज द्वारा प्रकृति की हलचल को स्टॉप करने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं प्रकृतिपति आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा निर्विघ्न राज्य अधिकारी हूँ  ।*

✺   *मैं निर्विघ्नं सेवाधारी हूँ  ।*

✺   *मैं स्वराज्य अधिकारी आत्मा विघ्न विनाशक हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. *सतयुग में या मुक्तिधाम में मुक्ति व जीवनमुक्ति का अनुभव नहीं कर सकेंगे। मुक्ति-जीवनमुक्ति के वर्से का अनुभव अभी संगम पर ही करना है।* जीवन में रहतेसमय नाजुक होते, परिस्थितियाँ, समस्यायें, वायुमण्डल डबल दूषित होते हुए भी इन सब प्रभाव से मुक्तजीवन में रहते इन सर्व भिन्न-भिन्न बन्धनों से मुक्त एक भी सूक्ष्म बन्धन नहीं हो - ऐसे जीवन मुक्त बने होवा अन्त में बनेंगे? अब बनेंगे या अन्त में बनेंगे?

 

 _ ➳  2. *बापदादा अभी से स्पष्ट सुना रहे हैंअटेन्शन प्लीज। हर एक ब्राह्मण बच्चे को बाप को बन्धनमुक्तजीवनमुक्त बनाना ही है।* चाहे किसी भी विधि से लेकिन बनाना जरूर है। जानते हो ना कि विधियाँ क्या हैंइतने तो चतुर हो ना! तो बनना तो आपको पड़ेगा ही। चाहे चाहोचाहे नहीं चाहोबनना तो पड़ेगा ही। फिर क्या करेंगे? (अभी से बनेंगे) *आपके मुख में गुलाबजामुन। सबके मुख में गुलाबजामुन आ गया ना। लेकिन यह गुलाबजामुन है - अभी बन्धनमुक्त बनने का। ऐसे नहीं गुलाबजामुन खा जाओ।*

 

✺   *ड्रिल :-  "संगम पर बन्धनमुक्त, जीवनमुक्त बनने का अनुभव करना"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा  *फर्श से न्यारी होती हुई एक बाबा से रिश्ता रख फरिश्ता बन उड़ चलती हूँ फरिश्तों की दुनिया में...* जहाँ बापदादा मेरे ही इन्तजार में बैठे हुए हैं... चारों ओर सफेद चमकीले प्रकाश की आभा बिखेरते हुए बापदादा अपने कोमल हाथों से मुझे अपनी गोदी में बिठाते हैं... बाबा अपनी मीठी दृष्टि देते हुए अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रखते हैं...  

 

 _ ➳  *बाबा की मीठी दृष्टि मुझ आत्मा में मिठास घोल रही है...* मैं आत्मा भी बाप समान मीठी बन रही हूँ... मुझ आत्मा के पुराने स्वभाव-संस्कार बाहर निकल रहे हैं... मैं आत्मा अटेन्शन की शक्ति द्वारा परिस्थितियों, समस्याओें, वायुमण्डल के  प्रभाव से मुक्तशरीर में रहते इन सर्व बन्धनों से न्यारी एवं प्यारी होती जा रही हूँ... मोह के सूक्ष्म बन्धन सब समाप्त हो रहे है... बाबा के हाथों से दिव्य अलौकिक गुण व शक्तियां निकलकर मुझ फरिश्ते में प्रवाहित हो रहे हैं... मुझ आत्मा के आसुरी अवगुण भस्म हो रहे हैं... मैं आत्मा दिव्य गुणों को धारण कर धारणा सम्पन्न अवस्था का अनुभव कर रही हूँ...

 

 _ ➳  मैं आत्मा स्व को परिवर्तित कर रही हूँ... मैं आत्मा कलियुगी संस्कारों से मुक्त हो रही हूँ... और संगमयुगी श्रेष्ठ संस्कारों को स्वयं में धारण कर रही हूँ... अब  *मैं आत्मा श्रीमत अनुसार ब्राह्मण कुल की सर्व धारणाओं पर चल रही हूँ...* मैं आत्मा स्व-परिवर्तन द्वारा सर्व को परिवर्तित कर रही हूँ...

 

 _ ➳  *मैं आत्मा परिपक्वता की शक्ति द्वारा परिवर्तन कर रही हूँ...* हर परिस्थिति में अचल अडोल बन विजय प्राप्त कर रही हूँ... कैसी भी परिस्थिति अब मुझ आत्मा को हिला नहीं सकती है... मैं आत्मा हर परिस्थिति में अटेंशन अपनी धारणा में परिपक्व रहती हूँ...

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा सदा अटेंशन रख परिवर्तन करने की कला से माया के सभी रूपों को परिवर्तित कर रही हूँ... परिपक्वता की शक्ति से मैं आत्मा सर्व मर्यादाओं का पालन कर रही हूँ... *मैं आत्मा अपनी निर्मान' स्थिति द्वारा हर गुण को प्रत्यक्ष कर रही हूँ...* मैं आत्मा धर्म सत्ताधारी बन इन गुणों का अनुभव कर रही हूँ... बाबा मुझ आत्मा से खुश हो कर मुझे गुलाबजामुन खिला रहे हैं...

 

 _ ➳  बाबा की शक्तिशाली किरणें मुझ फ़रिश्ते से होती हई विश्व के कोने कोने में पहुँच रही है... और *विश्व की सर्व आत्माओं तक बाबा का सन्देश पहुंचा रही है... विश्व की हर आत्मा धरती पर आये भगवान को पहचान रही है और बाबा से अपना जन्म सिद्ध अधिकार मुक्ति और जीवन मुक्ति का वर्सा प्राप्त कर रही है...* मैं फरिश्ता सदैव इसी तरह बाबा की सेवा में तत्पर विश्व की सर्व आत्माओं को आप समान बनाने की सेवा कर अपनी झोली दुआओं से भर रहा हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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