━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 13 / 11 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ चलन और वार्तालाप बहुत अच्छा रहा ?

 

➢➢ निश्चयबुधी बन एक बाप की मत पर चलते रहे ?

 

➢➢ अपने पुरुषार्थ की विधि में स्वयं की प्रगति को अनुभव किया ?

 

➢➢ सुख स्वरुप बनकर आत्माओं को सुख दिया ?

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

  ✰ अव्यक्त पालना का रिटर्न

         ❂ तपस्वी जीवन

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧  अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए सदा याद रहे कि समस्याओ को दूर भगाना है सम्पूर्णता को समीप लाना है। इसके लिए किसी भी ईश्वरीय मर्यादा में बेपरवाह नहीं बनना, आसुरी मर्यादा वा माया से बेपरवाह बनना। समस्या का सामना करना तो समस्या समाप्त हो जायेगी।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए

             ❂ श्रेष्ठ स्वमान

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

   "मैं करावनहार बाप द्वारा कार्य करने वाली निमित्त हूँ"

 

  सदा बुद्धि में यह स्मृति रहती है ना कि बाप करावनहार करा रहा है, हम निमित्त हैं। निमित्त बन करने वाले सदा हल्के रहते हैं क्योंकि जिम्मेवार करावनहार बाप है।

 

  जब 'मैं करता हूँ' - यह स्मृति रहती है तो भारी हो जाते और बाप करा रहा है - तो हल्के रहते।

 

  मैं निमित्त् हूँ, कराने वाला करा रहा, चलाने वाला चला रहा है - इसको कहते बेफिकर बादशाह। तो करावनहार करा रहा है। इसी विधि से सदा आगे बढ़ते रहो।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         रूहानी ड्रिल प्रति

अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  सारे दिन में 25-30 बार तो जरूर कहते होंगे। बोलते नहीं हो तो सोचते तो होंगे- 'मैं यह करूंगी, मुझे करना है| प्लैन भी बनाते हो तो सोचते हो ना। तो इतने बार का अभ्यास, आत्मा स्वरूप की स्मृति क्या बना देगी? निराकारी। निराकारी बन, आकारी फरिश्ता बन कार्य किया और फिर निराकारी!

 

✧  कर्म सम्बन्ध के स्वरूप से सम्बन्ध में आओ, सम्बन्ध को बन्धन में नहीं लाओ। देह-अभिमान में आना अर्थात कर्म-बन्धन में आना। देह सम्बन्ध में आना अर्थात कर्म-सम्बन्ध में आना। दोनों में अन्तर है। देह का आधार लेना और देह के वश होना - दोनों में अन्तर है।

 

✧  फरिश्ता वा निराकारी आत्मा देह का आधार लेकर देह के बन्धन में नहीं आयेगी, सम्बन्ध रखेगी लेकिन बन्धन में नहीं आयेगी। तो बापदादा फिर इसी वर्ष रिजल्ट देखेंगे कि निरहंकारी, आकारी फरिश्ते और निराकारी स्थिति में - लक्ष्य और लक्षण कितने समान हुए?

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ अशरीरी स्थिति प्रति

अव्यक्त बापदादा के इशारे

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧  बचपन रूप भी और सम्पूर्ण रूप भी। बस यह बन कर फिर यह बनेंगे। यह स्मृति रहती है। भविष्य की रूप-रेखा भी जैसे सम्पूर्ण देखने में आती है। जितना-जितना फ़रिश्ते लाइफ के नज़दीक होंगे उतना-उतना राजपद को भी सामने देखेंगे। दोनों ही सामने। आजकल कई ऐसे होते हैं जिनको अपने पास्ट की पूरी स्मृति रहती है। तो यह भविष्य भी ऐसे ही स्मृति में रहे- यह बनना है। वह भविष्य के संस्कार इमर्ज होते रहेंगे। मर्ज नहीं इमर्ज होंगे। अच्छा।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- बाप की श्रीमत पर चलना"

➳ _ ➳ मैं आत्मा जब परमधाम से इस सृष्टि पर आई थी तो बाबा की वरदानों से भरपूर होकर अपने सम्पन्न स्वरुप में थी... 16 कलाओं से सम्पन्न थी... फिर धीरे-धीरे माया के वश होती गई... आधे कल्प से मैं आत्मा माया के मत पर चलकर श्रापित हो गई थी... बाबा के दिए हुए गुणों-शक्तियों को खोकर कलाविहीन हो गई थी... अब फिर बाबा आये हैं मुझे माया के श्राप से मुक्त कराने... फिर से सम्पन्न सृष्टि की मालिक बनाने... मैं आत्मा उड़कर पहुँच जाती हूँ वतन में बाबा से श्रीमत लेने...

❉ दुःख देने वाले रावण की मत को छोड़ने श्रीमत देकर वर्से के लायक बनाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:- "मेरे मीठे फूल बच्चे... देह और विकारो के आकर्षण में जीवन दारुण दुखो से भर गया है... अब ईश्वरीय मत पर चलकर इसे मीठे सुख शांति और प्रेम की बगिया बना दो... श्रीमत के साये में फूलो सा खिल जाओ... और विकारो की परछाई से मुक्त होकर, सदा के प्रकाशवान हो जाओ..."

➳ _ ➳ मैं आत्मा श्रीमत की राह पर चलकर सहजता से अपनी मजिल को पाते हुए कहती हूँ:- "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा ईश्वरीय प्यार में और श्रीमत के हाथो में कितनी सुखी और खुशनुमा हो गयी हूँ... देह के भान से निकल कर आत्मिक स्मृति में सज गयी हूँ... श्रीमत ने जीवन कितना प्यारा और बेफिक्र और खुशियो से सजा दिया है..."

❉ मीठे बाबा श्रेष्ठ मत की झंकार को मेरे जीवन में गुंजाते हुए कहते हैं:- "मीठे प्यारे फूल बच्चे... श्रीमत ही अनन्त सतयुगी सुखो का सच्चा आधार है... जितना श्रीमत पर चलेंगे... उतना ही सुखो के मखमल पर देवताई कदम धरेंगे... संगम पर श्रीमत को मन बुद्धि दिल में समायेंगे... उतने ही मीठे सुखो की जागीर को बाँहों में पाएंगे... दुःख रहित सतयुगी राज्य में सदा के मुस्करायेंगे..."

➳ _ ➳ मैं आत्मा ज्ञान की रोशनी से रोशन होते हुए बाबा से कहती हूँ:- "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपके प्यार को पाकर सच्चे प्रेम की बदली हो गई हूँ... श्रीमत की सुखदायी राहो पर कदम रखकर... बेगमपुर की मालिक हो गयी हूँ... चहुँ ओर असीम सुख व्याप्त हो गया है... और मै आत्मा आपका हाथ पकड़कर दुखो के दलदल से बाहर हो गयी हूँ..."

❉ प्यारे बाबा अपने मखमली गोदी में बिठाकर सुखों की शहनाई बजाते हुए कहते हैं:- "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... श्रीमत के सुखदायी घेरे में रावण के दुखदायी पंजो से, सदा के सुरक्षित हो... ईश्वर पिता की स्नेह छत्रछाया में फूलो सा महक रहे हो... सदा श्रीमत की मीठी बाँहों में झूलते रहो... ईश्वर पिता की गोद से कभी नीचे उतर, पाँव मटमैले ना करो... तो सुखो की स्निग्धता कोमलता और खुशबु सदा बनी रहेगी... और दुःख के काँटों से परे रहेंगे..."

➳ _ ➳ मैं आत्मा श्रीमत को गले लगाकर 21 जन्मों के श्रेष्ठ भाग्य को पाकर कहती हूँ:- "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा इस कदर मीठे भाग्य को पाऊँगी... ईश्वरीय दिल की धड़कन बन मुस्कराऊंगी... और श्रीमत के आलिंगन में सदा प्रेम, सुख, शांति की तरंगो को पाऊँगी... मीठे बाबा ऐसा तो कभी कल्पनाओ में भी न सोचा था... आपने तो मुझे सुखो के आसमाँ पर बिठा दिया है..."

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- निश्चय बुद्धि बन एक बाप की मत पर चलते रहना है, कभी मूँझना वा घुटका नहीं खाना है"

➳ _ ➳ मेरे कौड़ी तुल्य जीवन को हीरे तुल्य बनाने वाले, सर्व सम्बन्धो का मुझे सुख देकर मेरे जीवन को खुशहाल बनाने वाले मेरे दिलाराम बाबा ने मेरे जीवन मे आकर जो अनगिनत उपकार मुझ पर किये हैं, उनका तो बदला चुकाया भी नही जा सकता। लेकिन उनके स्नेह का रिटर्न देने के लिए मैं सदा उनकी वफादार फरमानबरदार बनकर रहूँगी। अपने ऐसे सच्चे बाबा के प्रति निश्चय में मैं कभी कमी नही आने दूँगी। चाहे दुनिया कितने भी इल्जाम लगाए लेकिन अपने दिलाराम बाबा का हाथ और साथ मैं कभी नही छोडूंगी। मन ही मन स्वयं से बातें करते हुए मैं बाबा के प्रति निश्चय में कभी भी ना हिलने की दृढ़ प्रतिज्ञा करती हूँ और अपने प्यारे ब्रह्मा बाबा के बारे में विचार करती हूँ जिन्होंने समाज का विरोध सहन करके भी सम्पूर्ण निश्चय बुद्धि बन परमात्म कर्तव्य को सम्पूर्ण समर्पण भाव से पूरा किया और भगवान के दिल रूपी तख्त पर सदा के लिए विराजमान हो गए।

➳ _ ➳ ऐसे कदम - कदम पर फ़ॉलो फादर कर, ब्रह्मा बाप समान सम्पूर्ण निश्चय बुद्धि बन, परमात्म कार्य मे सदा सहयोगी बनने का संकल्प लेकर मैं अपने दिलाराम बाबा की दिल को आराम देने वाली मीठी सी प्यारी सी याद में अपने मन और बुद्धि को एकाग्र करती हूँ। मन को शीतलता देने वाली सागर की मीठी - मीठी लहरों के समान मेरे मीठे बाबा की मीठी - मीठी याद मेरे मन और बुद्धि को भी शान्त और शीतल बना देती है और शरीर को पूरी तरह रिलैक्स कर देती है। यह रिलैक्सेशन मेरे सारे शरीर से चेतना को धीरे - धीरे समेट कर मेरे सम्पूर्ण ध्यान को दोनों आईब्रोज के बीच भृकुटि के मध्य भाग पर केंद्रित कर देती है।

➳ _ ➳ मैं महसूस कर रही हूँ देह का भान पूरी तरह समाप्त हो गया है और स्वयं को मैं अशरीरी आत्मा देख रही हूँ। केवल एक अति सूक्ष्म चमकता हुआ शाइनिंग स्टार मुझे दिखाई दे रहा है। जिसमे से निकल रही किरणे मन को आनन्दित करती हुई चारों और फैल रही हैं। देह भान से पूरी तरह मुक्त यह अशरीरी स्थिति मुझे मेरे सातों गुणों और अष्ट शक्तियों से सम्पन्न, ओरिजनल स्वरूप का स्पष्ट अनुभव करवा रही है। अपने स्वधर्म में मैं पूरी तरह स्थित हो कर अपने सत्य स्वरूप का भरपूर आनन्द ले रही हूँ। दुनियावी आकर्षणों से बोझ से मुक्त स्वयं को मैं बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूँ और हल्की हो कर ऊपर की औऱ उड़ रही हूँ। पाँच तत्वों से निर्मित इस भौतिक जगत को पार करके, उससे ऊपर सूक्ष्म लोक को भी पार करके मैं पहुँच गई हूँ ब्रह्मलोक में अपने दिलाराम शिव पिता के पास जिनके साथ मेरा जन्म - जन्म का अनादि सम्बन्ध है।

➳ _ ➳ अपनी अनन्त शक्तियों की किरणों रूपी बाहों को फैलाये मेरे मीठे शिव बाबा मेरे सामने खड़े हैं। बिना एक पल भी व्यर्थ गंवाये अपने प्यारे पिता के पास जाकर मैं उनकी किरणों रूपी बाहों में समा जाती हूँ। पूरे पाँच हजार वर्ष उनसे बिछड़ कर उनसे दूर रहने की सारी पीड़ा को मैं उनकी किरणों रूपी बाहों में समाकर, अतीन्द्रिय सुख की गहन अनुभूति में खोकर, भुला रही हूँ। प्यार के सागर अपने शिव पिता के प्यार की गहराई में समाकर मैं स्वयं को उनके निस्वार्थ प्यार से भरपूर कर रही हूँ। मेरे शिव पिता का अविनाशी प्यार उनके स्नेह की किरणों के रूप में निरन्तर मुझ पर बरस रहा है। उनसे आ रही स्नेह की किरणों की मीठी फुहारें मुझे रोमांचित कर रही हैं और मेरे निश्चय को दृढ़ रखने का बल मुझे दे रही हैं।

➳ _ ➳ अपने दिलाराम बाबा की सर्व शक्तियों से स्वयं को भरपूर करके, उनके प्यार के खूबसूरत मीठे मधुर अति सुखद एहसास के साथ अब मैं वापिस देह और देह की दुनिया में लौट रही हूँ। बड़े से बड़ी परिस्थितियां भी अब बाबा के प्रति मेरे निश्चय को डिगा नही पाती क्योंकि मेरे बाबा का प्यार ढाल बन कर मुझमें असीम शक्ति का संचार प्रतिपल करता रहता है। अपने सर्वशक्तिवान बाबा की सर्वशक्तियों की छत्रछाया को मैं सदा अपने ऊपर महसूस करते हुए, सम्पूर्ण निश्चयबुद्धि बन अब माया के हर पेपर को अपने पिता के सहयोग से सहज ही पार करती जा रही हूँ। स्वयं पर, बाबा पर और ड्रामा पर सम्पूर्ण निश्चय मुझे व्यर्थ के हर संकल्प विकल्प से मुक्त रखते हुए, मेरी साइलेन्स की शक्ति को बढ़ाकर मेरी स्थिति को एकरस और अचल अडोल बनाता जा रहा है।

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   मैं आत्मा अपने पुरुषार्थ की विधि में स्वयं की प्रगति का अनुभव करती हूँ।
✺   मैं सफलतामूर्त आत्मा हूँ।
✺   मैं आत्मा सितारा हूँ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ मैं आत्मा सुख स्वरूप बनकर सबको सुख देती हूँ ।
✺ मैं आत्मा सदैव पुरुषार्थ में दुआएं एड करती हूँ ।
✺ मैं सुख स्वरूप मास्टर सुखदाता हूँ ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बाप सेवा के बिना रहता हैयाद के बिना भी नहीं रहता। जितना बाप याद में रहता उतना आप मेहनत से रहते हैं। रहते हैं लेकिन मेहनत सेअटेन्शन से। और बाप के लिए है ही क्यापरम आत्मा के लिए हैं ही आत्मायें। नम्बरवार आत्मायें तो हैं ही। सिवाए बच्चों की याद के बाप रह ही नहीं सकता।

 

 _ ➳  एक दिन में भी बाप के वर्से के अधिकारी बन सकते हैं अगर बाप समझकर कनेक्शन जोड़ा तो एक दिन में भी वर्सा ले सकता है। ऐसे नहीं कि हाँ अच्छा है, कोई शक्ति हैसमझ में तो आता है...यह नहीं। वर्से के अधिकारी बच्चे होते हैं। समझने वाले, देखने वाले नहीं। अगर एक दिन में भी दिल से बाप माना तो वर्से का अधिकारी बन सकता है। 

 

✺   ड्रिल :-  "दिल से बाप मानकर वर्से का अधिकारी बनना"

 

 _ ➳  मैं आत्मा इस संगमयुग पर अपने पुराने जन्म की स्मृति को भूल अपने अलौकिक जन्म की अविनाशी प्राप्तियों को याद कर रही हूँ... इस देह के भान को भी भूल अपने प्यारे बाबा की छत्रछाया में स्वयं को देखती हूँ और उनकी शक्तिशाली किरणों को अपने में भर रही हूँ... बाबा की शक्तियां जैसे जैसे मुझमें समाती जाती हैं मैं आत्मा अपनी कमजोरियों को छोड़ शक्तिशाली बनती जाती हूँ...

 

 _ ➳  मैं कितनी भाग्यशाली आत्मा हूँ जो स्वयं परमपिता परमात्मा मुझे याद करते हैं... सारी दुनिया उनको ढूंढ रही है और सर्वशक्तिमान बाप ने मुझे ढूंढ लिया और मेरी जन्म जन्मांतर की थकान मिटा दी है... मैं उन्हें घड़ी घड़ी भूल भी जाती हूँ पर वो हर पल मुझे याद करते हैं... अपने कार्य व्यवहार में मुझे बाबा की याद भूल जाती है और याद करने में मेहनत भी लगती है पर अटेंशन देकर मैं बाबा की याद में रहती हूँ... पर मेरे बाबा हर समय मुझ आत्मा को याद करते हैं...

 

 _ ➳  बाबा हर कदम पर सहयोगी बनकर मेरे साथ चलते हैं... जब भी मैं आत्मा बाबा को पुकारती हूँ बाबा आकर मेरी हर मुश्किल को सहज कर देते हैं... मैं कर्मयोगी हूँ, सेवाधारी हूँ और सहज पुरुषार्थी हूँ... हम सभी बाबा के बच्चे बाबा को याद करते हैं उनसे अपना कनेक्शन जोड़कर उनसे सर्वशक्तियाँ प्राप्त करते हैं... और बाबा भी हम सभी आत्माओं को याद करते हैं...

 

 _ ➳  मुझ आत्मा को जिस दिन से बाबा ने अपना बच्चा बनाया उसी पल से मैं बाबा के वर्से की अधिकारी बन गई हूँ... बाबा की सर्व शक्तियां अब मेरी भी शक्तियां हैं क्योंकि जो बाप की प्रॉपर्टी होती है उस पर बच्चे का पूरा हक होता है... मेरे बाबा ने भी मुझे अपना बच्चा बना कर अपना वारिस बना दिया है... मैं आत्मा पूरी तरह से बाप की हो चुकी हूँ बाप से कनेक्शन जोड़ कर सर्व शक्तियों का वर्सा उनसे प्राप्त करती हूँ...

 

 _ ➳  मेरे बाबा मुझे उस पुरानी कलियुगी आसुरी दुनिया से निकाल कर इस नई संगमयुगी दुनिया में ले आये हैं... सारी समझ मुझ आत्मा में भर दी है और मैं आत्मा उस समझ से अपने नए जन्म में बाबा से पूरा वर्सा लेने के लिए पुरुषार्थ कर रही हूँ... लौकिक जन्म के जो संबंध हैं वो तो दुख ही देते आये हैं... अपने पिता परमात्मा से जो मेरा अलौकिक संबंध जुड़ा है वो अविनाशी है और उसी अविनाशी संबंध से मैं आत्मा पूरी तरह अपने बाप की हो चुकी हूँ...

 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━