━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 13 / 11 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *21 जन्मो के लिए अपना नया खाता जमा किया ?*

 

➢➢ *ड्रामा के राज़ को बुधी में रखा ?*

 

➢➢ *लगन की अग्नि द्वारा एक दीप से अनेक दीप जगाये ?*

 

➢➢ *"एक बल, एक भरोसा" - सदा इस पाठ को पक्का किया ?*

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧  *अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए सदा याद रहे कि समस्याओ को दूर भगाना है सम्पूर्णता को समीप लाना है।* इसके लिए किसी भी ईश्वरीय मर्यादा में बेपरवाह नहीं बनना, आसुरी मर्यादा वा माया से बेपरवाह बनना। *समस्या का सामना करना तो समस्या समाप्त हो जायेगी।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

   *"मैं करावनहार बाप द्वारा कार्य करने वाली निमित्त हूँ"*

 

  *सदा बुद्धि में यह स्मृति रहती है ना कि बाप करावनहार करा रहा है, हम निमित्त हैं। निमित्त बन करने वाले सदा हल्के रहते हैं क्योंकि जिम्मेवार करावनहार बाप है।*

 

  *जब 'मैं करता हूँ' - यह स्मृति रहती है तो भारी हो जाते और बाप करा रहा है - तो हल्के रहते।*

 

  *मैं निमित्त् हूँ, कराने वाला करा रहा, चलाने वाला चला रहा है - इसको कहते बेफिकर बादशाह। तो करावनहार करा रहा है। इसी विधि से सदा आगे बढ़ते रहो।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  सारे दिन में 25-30 बार तो जरूर कहते होंगे। बोलते नहीं हो तो सोचते तो होंगे- 'मैं यह करूंगी, मुझे करना है| प्लैन भी बनाते हो तो सोचते हो ना। तो इतने बार का अभ्यास, आत्मा स्वरूप की स्मृति क्या बना देगी? निराकारी। *निराकारी बन, आकारी फरिश्ता बन कार्य किया और फिर निराकारी!*

 

✧  *कर्म सम्बन्ध के स्वरूप से सम्बन्ध में आओ, सम्बन्ध को बन्धन में नहीं लाओ।* देह-अभिमान में आना अर्थात कर्म-बन्धन में आना। देह सम्बन्ध में आना अर्थात कर्म-सम्बन्ध में आना। दोनों में अन्तर है। देह का आधार लेना और देह के वश होना - दोनों में अन्तर है।

 

✧  *फरिश्ता वा निराकारी आत्मा देह का आधार लेकर देह के बन्धन में नहीं आयेगी, सम्बन्ध रखेगी लेकिन बन्धन में नहीं आयेगी।* तो बापदादा फिर इसी वर्ष रिजल्ट देखेंगे कि निरहंकारी, आकारी फरिश्ते और निराकारी स्थिति में - लक्ष्य और लक्षण कितने समान हुए?

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧  बचपन रूप भी और सम्पूर्ण रूप भी। बस यह बन कर फिर यह बनेंगे। यह स्मृति रहती है। भविष्य की रूप-रेखा भी जैसे सम्पूर्ण देखने में आती है। *जितना-जितना फ़रिश्ते लाइफ के नज़दीक होंगे उतना-उतना राजपद को भी सामने देखेंगे। दोनों ही सामने। आजकल कई ऐसे होते हैं जिनको अपने पास्ट की पूरी स्मृति रहती है। तो यह भविष्य भी ऐसे ही स्मृति में रहे- यह बनना है। वह भविष्य के संस्कार इमर्ज होते रहेंगे। मर्ज नहीं इमर्ज होंगे। अच्छा।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  निश्चयबुद्धि बनना"*

 

_ ➳  मीठे बाबा की यादो में खोयी हुई मै आत्मा इस देह को छोड़ प्रकाश की काया में वतन की सैर को निकलती हूँ... मुझे देखते ही बाबा ख़ुशी से पुलकित हो उठे और बोले :- "मीठे बच्चे *निश्चय ही सच्चे प्रेम की आधारशिला है... और इसी में मंजिल का पता छुपा है.*. निश्चय और गहरा विश्वास ईश्वर पिता और बच्चों के बीच एक पुल की तरहा है... जिस पर चलकर सहज ही मंजिल बाँहों में दौड़ी आयेगी... मै आत्मा मीठे बाबा के प्यार में खोयी हुई सी, बाबा के इन कथनो पर सहर्ष स्वीकृति दे रही हूँ..."

 

   *मीठे बाबा मेरे प्रेम से भरे भावो पर मुस्कराये और बोले :-* "मेरे प्यारे से रूहानी गुल... जिन इंसानी रिश्तो को गहराई से बुनते आये... वहाँ भी तो निश्चय ही आधार रहा... ईश्वरीय राहो की भी वही बुनियाद है... *जितनी गहराई से, इस सच्चे प्रेम समन्दर में डूबोगे, उतने अथाह खजाने बाँहों में भर पाओगे.*..और देवताई मंजिल  कदमो में स्वतः ही खिंची चली आएगी..."

 

_ ➳  *प्यारे बाबा को अपने सर पर वरदानी हाथ फेरते... प्यार से समझाते सुनकर, मै आत्मा अपने भाग्य पर झूम उठी और बोली :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... आपके बिना जीवन कितना सूना और वीरान था... जीवन का न कोई लक्ष्य न ठिकाना था... आज आपने मुझे खुबसूरत देवताई लक्ष्य देकर क्या से क्या बना दिया है... *इतना प्यारा भाग्य मेरे हाथो में सजा दिया है.*.."

 

   *प्यारे बाबा मेरे दिल के अरमान सुनकर... मीठी नजरो से निहारने लगे और बोले :-* "सिकीलधे लाडले बच्चे... जनमो से सच्चे सुख और प्रेम के लिए तड़फते रहे हो... ईश्वरीय प्रेम को सदा तरसते रहे हो... *आज ईश्वर पिता बनकर सारे जज्बात, सतगुरु बनकर सारी मुरादे पूरी करने के लिए, दिल के द्वार पर खड़ा दस्तक दे रहा है.*.. तो निश्चय और गहरे विश्वास संग अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जाओ..."

 

_ ➳  *मीठे बाबा के वरदानी बोल और स्नेह दृष्टि में भीगती हुई मै आत्मा बाबा को कह रही :-* "सबसे प्यारे मेरे बाबा... *आप ईश्वर पिता यूँ मेरे दिल पर प्रेम की थाप दे.*.. और मै आत्मा न झूमूँ  यह भला कैसे हो सकता है बाबा... आप ही तो सदा की मेरी पुकार रहे है... आपको पाने की चाहत में तो मै आत्मा कितना भटकी हूँ... अब जो मिले हो बाबा तो रोम रोम से कुर्बान हूँ..."

 

   *मीठे बाबा मेरी प्रेम भावनाओ में खो गये... और प्रेम की तरंगे जेसे पूरे वतन में तरंगित हो गई... और कहने लगे :-* "ईश्वरीय राहो पर सम्पूर्ण निश्चय के साथ, अपनी मंजिल को सहज ही पाने वाले बनकर, सदा की मुस्कराहट से सज जाओ... *देवताओ सी शानो शौकत और सुख, ईश्वरीय पुत्रो की बपौती है.*.. उसे तकदीर में भरकर, अनन्त खुशियो को चिर स्थायी बनाओ..."

 

_ ➳  *अपने प्यारे बाबा का इस कदर प्यार पाकर... ऐसी मीठी रुहरिहानं करते हुए, मै आत्मा बोली :-* "मेरे सच्चे साथी बाबा मेने तो अपनी चाहतो में आपको ही बसाया था... बस आपको ही चाहा और दुआओ में सदा माँगा था... *कब सोचा था कि आपके पीछे स्वर्ग के मीठे सुख कतारो में खड़े, मेरा इंतजार कर रहे है.*.. ऐसा जादू भरा जीवन तो मेरी कल्पनाओ में भी न था... मीठे बाबा और मै आत्मा मुस्करायी और अपने स्थूल जगत मै लौट आई..."

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सब हिसाब - किताब चुकतू करने है*"

 

_ ➳  देह भान में आ कर, जन्मजन्मांतर से किये हुए विकर्म जो कड़े हिसाब - किताब के रूप में जीवन मे आते रहते हैं उन हिसाब - किताब को चुकतू करने का केवल एक ही उपाय है योगबल। *बाबा की याद ही वो योग अग्नि है जो विकर्मों को विनाश कर सभी हिसाब - किताब को चुकतू कर सकती है*। इसलिए अपने अब के जीवन मे किये हुए और पिछले 63 जन्मों के किये हुए विकर्मों को भस्म करने के लिए मैं अशरीरी स्थिति में स्थित हो कर अपने शिव पिता की याद में अपने मन बुद्धि को स्थिर कर लेती हूँ।

 

_ ➳  देह और देह की दुनिया से सम्बन्ध रखने वाले हर संकल्प, विकल्प, हर विचार से अपने मन बुद्धि को हटा कर मैं अपना सम्पूर्ण ध्यान केवल अपने स्वरूप पर और अपने शिव पिता पर एकाग्र करती हूँ। *मन बुद्धि से अब मैं स्पष्ट देख रही हूँ अपने दिव्य ज्योति बिंदु स्वरूप को और अपने महाज्योति शिव पिता के स्वरूप को जो मेरे ही समान बिंदु है किंतु गुणों में सिंधु हैं*। एक चैतन्य सितारे के समान अपने जगमग करते स्वरूप को और सर्वशक्तियों, सर्व गुणों के सागर अपने शिव पिता के अनन्त तेजोमय स्वरूप को मैं देख रही हूँ।

 

_ ➳  विकारों की कट ने मुझ आत्मा को आयरन एजेड बना दिया है इसलिए *अपने शिव पिता की सर्वशक्तियों की ज्वालास्वरूप किरणों से अपने ऊपर चढ़ी विकारों की कट को जला कर, योग अग्नि में अपने पापों को भस्म कर, स्वयं को गोल्डन एजेड बनाने के लिए अब मैं ज्योति बिंदु आत्मा अपने शरीर की कुटिया से बाहर निकलती हूँ* और अपने शिव पिता के पास ले जाने वाली एक ऐसी रूहानी यात्रा पर चल पड़ती हूँ जो मन की असीम आनन्द देने वाली है। देह और देह के हर बन्धन से मुक्त इस अति सुखमय आंतरिक यात्रा पर मैं आत्मा चलती जा रही हूँ।

 

_ ➳  इस रूहानी यात्रा पर निरन्तर आगे बढ़ती अब मैं चमकती ज्योति प्रकृति के पांचों तत्वों को पार कर जाती हूँ और आकाश से ऊपर फरिश्तों की दुनिया को पार कर पहुँच जाती हूँ अपने शिव पिता परमात्मा के पास उनके घर परमधाम। *चैतन्य सितारों की इस जगमग करती दुनिया में मैं मास्टर बीज रूप आत्मा अब अपने बीज रूप शिव पिता परमात्मा के सम्मुख हूँ*। बिंदु का बिंदु से मिलन हो रहा है। एक बहुत ही खूबसूरत दिव्य आलौकिक नजारा मैं मन बुद्धि रूपी नेत्रों से देख रही हूँ।

 

_ ➳  चारों ओर लाल सुनहरी प्रकाश ही प्रकाश है। बिंदु बाप से आ रही सर्वशक्तियों की ज्वलंत किरणे निरन्तर मुझ बिंदु आत्मा पर पड़ रही हैं। *मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारों की कट इस योग अग्नि में जल कर भस्म हो रही है*। आत्मा पर चढ़ी विकारों की कट जैसे - जैसे योग अग्नि में जल रही है वैसे - वैसे विकर्मों का बोझ उतरने से मैं आत्मा हल्की और चमकदार बनती जा रही हूँ। विकर्मों को भस्म करके, हल्की और चमकदार बन कर मैं आत्मा वापिस साकारी दुनिया मे लौट रही हूँ।

 

_ ➳  अपनी साकार देह रूपी कुटिया में फिर से वापिस आ कर भृकुटि पर विराजमान हो कर अब मैं फिर से इस सृष्टि रंग मंच पर अपना पार्ट बजा रही हूँ। *कर्मयोगी बन हर कर्म बाबा की याद में रह कर करते और कर्म करके सेकण्ड में देह से उपराम, बीज स्वरूप में स्थित हो कर अपने बीज रूप शिव पिता परमात्मा के पास जा कर, स्वयं में योग का बल निरन्तर जमा कर, जीवन मे आने वाले हर कड़े से कड़े हिसाब - किताब को भी अब मैं योगबल से बिल्कुल सहज रीति चुकतू कर रही हूँ*।

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं लगन की अग्नि द्वारा एक दीप से अनेक दीप जगाने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा एक बल, एक भरोसा- इस पाठ को सदा पक्का रखती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा बीच भंवर से सहज निकल जाती हूँ  ।*

✺   *मैं निश्चयबुद्धि आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बाप सेवा के बिना रहता हैयाद के बिना भी नहीं रहता। *जितना बाप याद में रहता उतना आप मेहनत से रहते हैं। रहते हैं लेकिन मेहनत सेअटेन्शन से।* और बाप के लिए है ही क्यापरम आत्मा के लिए हैं ही आत्मायें। नम्बरवार आत्मायें तो हैं ही। सिवाए बच्चों की याद के बाप रह ही नहीं सकता।

 

 _ ➳  एक दिन में भी बाप के वर्से के अधिकारी बन सकते हैं अगर बाप समझकर कनेक्शन जोड़ा तो एक दिन में भी वर्सा ले सकता है। ऐसे नहीं कि हाँ अच्छा है, कोई शक्ति हैसमझ में तो आता है...यह नहीं। *वर्से के अधिकारी बच्चे होते हैं। समझने वाले, देखने वाले नहीं। अगर एक दिन में भी दिल से बाप माना तो वर्से का अधिकारी बन सकता है।* 

 

✺   *ड्रिल :-  "दिल से बाप मानकर वर्से का अधिकारी बनना"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा इस संगमयुग पर अपने पुराने जन्म की स्मृति को भूल अपने अलौकिक जन्म की अविनाशी प्राप्तियों को याद कर रही हूँ... इस देह के भान को भी भूल अपने प्यारे बाबा की छत्रछाया में स्वयं को देखती हूँ और उनकी शक्तिशाली किरणों को अपने में भर रही हूँ... *बाबा की शक्तियां जैसे जैसे मुझमें समाती जाती हैं मैं आत्मा अपनी कमजोरियों को छोड़ शक्तिशाली बनती जाती हूँ...*

 

 _ ➳  *मैं कितनी भाग्यशाली आत्मा हूँ जो स्वयं परमपिता परमात्मा मुझे याद करते हैं... सारी दुनिया उनको ढूंढ रही है और सर्वशक्तिमान बाप ने मुझे ढूंढ लिया और मेरी जन्म जन्मांतर की थकान मिटा दी है...* मैं उन्हें घड़ी घड़ी भूल भी जाती हूँ पर वो हर पल मुझे याद करते हैं... अपने कार्य व्यवहार में मुझे बाबा की याद भूल जाती है और याद करने में मेहनत भी लगती है पर अटेंशन देकर मैं बाबा की याद में रहती हूँ... पर मेरे बाबा हर समय मुझ आत्मा को याद करते हैं...

 

 _ ➳  बाबा हर कदम पर सहयोगी बनकर मेरे साथ चलते हैं... *जब भी मैं आत्मा बाबा को पुकारती हूँ बाबा आकर मेरी हर मुश्किल को सहज कर देते हैं...* मैं कर्मयोगी हूँ, सेवाधारी हूँ और सहज पुरुषार्थी हूँ... हम सभी बाबा के बच्चे बाबा को याद करते हैं उनसे अपना कनेक्शन जोड़कर उनसे सर्वशक्तियाँ प्राप्त करते हैं... और बाबा भी हम सभी आत्माओं को याद करते हैं...

 

 _ ➳  मुझ आत्मा को जिस दिन से बाबा ने अपना बच्चा बनाया उसी पल से मैं बाबा के वर्से की अधिकारी बन गई हूँ... *बाबा की सर्व शक्तियां अब मेरी भी शक्तियां हैं क्योंकि जो बाप की प्रॉपर्टी होती है उस पर बच्चे का पूरा हक होता है... मेरे बाबा ने भी मुझे अपना बच्चा बना कर अपना वारिस बना दिया है... मैं आत्मा पूरी तरह से बाप की हो चुकी हूँ बाप से कनेक्शन जोड़ कर सर्व शक्तियों का वर्सा उनसे प्राप्त करती हूँ...*

 

 _ ➳  मेरे बाबा मुझे उस पुरानी कलियुगी आसुरी दुनिया से निकाल कर इस नई संगमयुगी दुनिया में ले आये हैं... सारी समझ मुझ आत्मा में भर दी है और मैं आत्मा उस समझ से अपने नए जन्म में बाबा से पूरा वर्सा लेने के लिए पुरुषार्थ कर रही हूँ... लौकिक जन्म के जो संबंध हैं वो तो दुख ही देते आये हैं... *अपने पिता परमात्मा से जो मेरा अलौकिक संबंध जुड़ा है वो अविनाशी है और उसी अविनाशी संबंध से मैं आत्मा पूरी तरह अपने बाप की हो चुकी हूँ...*

 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━