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 14 / 05 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *आपस में बहुत प्यार से रहे ?*

 

➢➢ *चलते फिरते बाप को याद करने का अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *ज्ञान के राजो को समझ सदा अचल रहे ?*

 

➢➢ *दृढ़ता का शक्ति से सफलता प्राप्त की ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *विनाशी साधनों के आधार पर आपकी अविनाशी साधना नहीं हो सकती।* साधन निमित्त मात्र हैं और साधना निर्माण का आधार है *इसलिए अब साधना को महत्व दो। साधना ही सिद्धि को प्राप्त करायेगी।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं रूप-बसंत हूँ"*

 

〰✧  सदा अपने को रुप-बसंत अनुभव करते हो? *रुप अर्थात् ज्ञानी तू आत्मा भी हैं और योगी तू आत्मा भी हैं। जिस समय चाहें रुप बन जायें और जिस समय चाहें बसंत बन जाएं। इसलिए आप सबको सलोगन है- 'योगी बनो और पवित्र बनो माना ज्ञानी बनो'। औरों को यह सलोगन याद दिलाते हैं ना। तो दोनों स्थिति सेकेण्ड में बन सकते हैं।* ऐसे न हो कि बनने चाहे रुप और याद आती रहें ज्ञान की बातें। सेकण्ड से भी कम टाइम में फुलस्टाप लग जाये। ऐसे नहीं- फुलस्टाप लगाओ अभी और लगे पांच मिनट के बाद। इसे पावरफुल ब्रेक नहीं कहेंगे। पावरफुल ब्रेक का काम है जहाँ लगाओ वहां लगे। सेकण्ड भी देर से लगी तो एक्सीडेंट हो जायेगा।

 

  फुलस्टाप अर्थात् ब्रेक पावरफुल हो। जहां मन-बुद्धि को लगाना चाहे वहाँ लगा लें। यह मन, बुद्धि- संस्कार आप आत्माओं की शक्तियाँ है। इसलिए सदा यह प्रैक्टिस करते रहो कि जिस समय, जिस विधि से मन-बुद्धि को लगाना चाहते हैं वैसा लगता है या टाइम लग जाता है? *जिसमें कंट्रोलिंग पावर नहीं वह रुलिंग पावर के अधिकारी बन नहीं सकते। स्वराज्य के हिसाब से अभी भी रुलर (शासक) हो। स्वराज्य मिला है ना! ऐसे नहीं आंख को कहो यह देखो और वह देखे कुछ और, कान को कहो कि यह नहीं सुनो और सुनते ही रहें। इसको कंट्रोलिंग पावर नहीं कहते। कभी कोई कर्मेन्द्रिय धोखा न दे - इसको कहते हैं 'स्वराज्य'।* तो राज्य चलाने आता है ना? अगर राजा को प्रजा माने नहीं तो उसे नाम का राजा कहेंगे या काम का? आत्मा का अनादि स्वरुप ही राजा का है, मालिक का है। यह तो पीछे परतंत्र बन गई है लेकिन आदि और अनादि स्वरुप स्वतंत्र है। तो आदि और अनादि स्वरुप स्वतंत्र है। तो आदि और अनादि स्वरुप सहज याद आना चाहिए ना। 

 

  स्वतंत्र हो या थोड़ा-थोड़ा परतंत्र हो? मन का भी बंधन नहीं। अगर मन का बंधन होगा तो यह बंधन और बंधन को ले आयेगा। कितने जन्म बंधन में रहकर देख लिया! अभी भी बंधन अच्छा लगता है क्या? बंधन्मुक्त अर्थात् राजा, स्वराज्य अधिकारी। क्योंकि बंधन प्राप्तियो का अनुभव करने नहीं देता। इसलिए सदा ब्रेक पावरफुल रखो, तब अन्त में पास-विद-ओनर होंगे अर्थात् फर्स्ट डिवीजन में आयेंगे। फर्स्ट माना फास्ट, ढीले-ढीले नहीं। ब्रेक फास्ट लगे। कभी भी ऊंचाई के रास्ते पर जाते हैं तो पहले ब्रेक चेक करते हैं। आप कितना ऊंचे जाते हो! तो ब्रेक पावरफुल चाहिए ना! बार-बार चेक करो। ऐसा ना हो कि आप समझो ब्रेक बहुत अच्छी है लेकिन टाइम पर लगे नहीं, तो धोखा हो जायेगा। इसलिए अभ्यास करो- स्टाप कहा और स्टाप हो जाये।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *क्या आवाज़ से परे शान्त स्थिति इतनी ही प्रिय लगती है कि जितनी आवाज़ में आने की स्थिति प्रिय लगती है?* आवाज़ में आना और आवाज़ से परे हो जाना यह दोनों ही एक समय सहज लगते हैं या आवाज़ से परे जाना मुश्किल लगता है? वास्णव में स्वधर्म शान्त स्वरूप होने के कारण आवाज़ से परे जाना अति सहज होना चाहिए।

  

✧  अभी - अभी एक सेकण्ड में जैसे स्थूल शरीर से बुद्धि  द्वारा परे जाना और आना यह दोनों ही सहज अनुभव होंगे। अर्थात क्या एक सेकण्ड में ऐसा कर सकते हो? जब चाहें शरीर का आधार ले और जब चाहे शरीर का आधार छोड कर अपने अशरीरी स्वरूप में स्थित हो जायें, क्या ऐसे अनुभव चलते - फिरते करते रहते हो? *जैसे शरीर धारण किया वैसे ही फिर शरीर से न्यारा हो जाना इन दोनों का क्या एक ही अनुभव करते हो?* यही अनुभव अंतिम पेपर में फस्ट नम्बर लाने का आधार है। जो लास्ट पेपर देने के लिए अभी से तैयार हो गये हो या हो रहे हो?

 

✧  जैसे विनाश करने वाले एक इशारा मिलते ही अपना कार्य सम्पन्न कर देंगे, अर्थात *विनाशकारी आत्मायें इतनी एवर - रेडी हैं कि एक सेकण्ड के इशारे से अपना कार्य अभी भी प्रारम्भ कर सकती हैं।* तो क्या विश्व का नव - निर्माण करने वाली अर्थात स्थापना के निमित्त बनी हुई आत्माएँ ऐसे एवर - रेडी हैं? अपनी स्थापना का कार्य ऐसे कर लिया है कि जिससे विनाशकारियों को इशारा मिले?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *सर्व पवाइन्ट्स का सार एक शब्द में सुनाओ? प्वाइन्ट्स का सार प्वाइन्ट रूप अर्थात् बिन्दु रूप हो जाना।* बिन्दु रूप अर्थात् पॉवरफुल स्टेज, जिसमें व्यर्थ संकल्प नही चलते हैं *और बिन्दु अर्थात् 'बीती सो बीती'। इससे कर्म भी श्रेष्ठ होते हैं और व्यर्थ संकल्प न होने के कारण पुरूषार्थ की गति भी तीव्र होगी।* इसलिए बीती सो बीती को सोच-समझ कर करना है। *व्यर्थ देखना, सुनना व बोलना सब बन्द। समर्थ आंखें खुली हों अर्थात् साक्षीपन की स्टेज पर रहो।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  सारे विश्व को शांति का दान देना"*

 

_ ➳  भगवान जब धरती पर आएगा... *मुझे चुनकर, अपने दिल में यूँ सजाएगा... अथाह रत्नों को देकर मुझे अमीर बनाएगा..*. धरती पर रहकर मात्र देह समझकर जीने वाली मै आत्मा... *आत्मिक स्थिति में डूबकर यूँ आसमां में उड़ूँगी... वरदानो सजुगी... पवित्रता और दिव्यता से भरकर देवताई ताजोतख्त पाकर... बड़ी शान से सतयुगी दुनिया में राज करूंगी.*.. भला मेने ऐसा कब सोचा था.... *आज मेरा जीवन इस खुबसूरत हकीकत से खनक रहा है.*.. यूँ ही असीम प्यार में डूबी हुई मै आत्मा... दिलबर बाबा को अपने दिल की आवाज सुनाने... वतन में उड़ चलती हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अनन्य विशेषताओ से सजाते हुए कहा :-* " मीठे प्यारे फूल बच्चे... *आपके महान भाग्य के गुण स्वयं ईश्वर पिता गा रहे है... सदा इस महान नशे में झूमते रहो.*.. सदा शुभ भावना की वाइब्रेशन विश्व में फेलाते रहो... रियालजेशन और सॉल्युशन से सहज ही शांति की अनुभूति कराओ... शक्तियो और गुणो से भरकर हर निर्बल आत्मा को शक्तिशाली बनाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बापदादा से ज्ञान मोतियो को अपनी बाँहों में भरकर कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... *इतना प्यारा भाग्य भला कब सोचा था... कि स्वयं भगवान बेठ मेरे भाग्य के गीत गायेगा*... मुझे अपने दिल में जगह देकर, मेरा मान बढ़ाकर, इतना ऊँचा स्थान दिलाएगा... मै आत्मा अपने इस मीठे भाग्य के नशे में झूम रही हूँ...

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को अपनी अमूल्य शिक्षाओ से सजाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... सदा दूसरो को आगे बढ़ाते हुए स्वयं को आगे बढ़ाओ... *सदा याद में रहो, याद दिलाते रहो, हर कदम पर यादगार कदम बढ़ाते चलो.*.. अपनी रूहानी चाल से सर्व आत्माओ को स्व का बाप का साक्षात्कार कराओ... ऐसे वरदानी महादानी बनकर, मीठे बाबा के दिल में मुस्कराओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के प्यार में वरदानों से भरपूर होकर कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा... मै आत्मा *आपके प्यार की किरणों तले... आत्मिक गुणो से पुनः सज संवर गयी हूँ.*.. सबको सहयोग भरे हाथ देकर, आगे बढ़ाने वाली विश्व कल्याण कारी बन गयी हूँ... पूरा विश्व मेरा परिवार है... इस मीठी भावना से ओतप्रोत होकर, गुणो की प्रतिमूर्ति बनकर... मुस्करा रही हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को शक्तियो से सम्पन्न बनाकर कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... *सदा एक बल एक भरोसा इस निश्चय से ईश्वरीय राहो में बढ़ते रहो... निश्चय बुद्धि आत्मा बन, सदा विजय तिलक लगाते रहो*... सदा मा सागर बनकर... अपने गुणो और शक्तियो की शीतल तरंगो से... विश्व को अभिभूत करो... हंस सिहांसन पर विराजमान होकर... अपनी खुशनसीबी की स्मर्तियो में डूबे हुए... सर्व खजानो से सम्पन्न होकर मुस्कराओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा की अथाह सम्पदा को दिल में भरकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... मै आत्मा *अपने भाग्य पर कितना न इतराऊँ, झूमूँ और नाचूं.. कि मेरी बाँहों में स्वयं भगवान आ गया है... और मुझे सच्ची खुशियो से सजा दिया है.*..मीठे बाबा आपसे पायी हुई खुशियो की, वरदानों की यह दौलत मै आत्मा... हर दिल पर लुटा रही हूँ..."प्यारे बाबा को अपनी खुशियो का इजहार करके मै आत्मा... साकारी देह में लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- चलते फिरते बाप को याद करने का अभ्यास करना है*"

 

_ ➳  कर्मयोगी बन, चलते फिरते बुध्दि का योग अपने शिव पिता परमात्मा के साथ लगाकर, स्वयं को उनकी सर्वशक्तियों की शीतल छाया के नीचे अनुभव करते मैं बड़ी सहजता से हर कर्म कर रही हूँ। *बाबा की याद मेरे अंदर बल भर रही है जिससे बिना मेहनत और थकावट के हर कार्य बड़ी ही सहज रीति से और स्वत: ही सफलतापूर्वक संपन्न हो रहा है*। हर कर्म में भगवान को अपना साथी बना कर, कदम - कदम पर उनकी मदद और उनके साथ का अनुभव मेरे अंदर हर पल एक नई स्फूर्ति और ऊर्जा का संचार करता रहता है। 

 

_ ➳  ऐसे बाबा की याद में रह शरीर निर्वाह अर्थ हर रोज के अपने दैनिक कार्यो को सम्पन्न करके जैसे ही मैं कर्तव्यमुक्त होती हूँ। अपने भगवान बाप का दिल से शुक्रिया अदा करते हुए उनकी दिल को सुकून देने वाली अति मीठी याद में बैठ जाती हूँ। *अपनी पलको को हौले से बंद कर, अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की स्मृति में खोई मैं स्वयं से ही बातें कर रही हूँ कि कितनी महान सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा जो मुझे हर पल भगवान का संग मिलता रहता है*। कभी सिर्फ उनके एक दर्शन मात्र की मैं प्यासी थी और आज वो भगवान मेरे हर कर्म में मेरा सहयोगी है। 

 

_ ➳  "वाह मैं आत्मा वाह" "वाह मेरा भाग्य वाह" ऐसे मन ही मन वाह - वाह के गीत गाते हुए मैं मनमनाभव होकर अपने मन को सभी संकल्पो, विकल्पों से हटाकर उस एक अपने भगवान साथी पर एकाग्र करती हूँ। *एक पल के लिए मुझे अनुभव होता है जैसे बापदादा मेरे सामने हैं। अपनी पलको को मैं जैसे ही खोलती हूँ अपने सामने लाइट माइट स्वरूप में बापदादा को बैठे हुए देखती हूँ*। बापदादा की बहुत तेज लाइट और माइट मेरे ऊपर पड़ रही है जो मुझे लाइट माइट स्थिति में स्थित कर रही है।

 

_ ➳  अपने साकार शरीर मे से एक अति सूक्ष्म लाइट का फ़रिश्ता मैं निकलता हुआ देख रही हूँ। *बापदादा की लाइट माइट मुझ नन्हे फ़रिश्ते को अपनी ओर खींच रही हैं। मैं नन्हा फ़रिश्ता आगे बढ़ता हूँ और जाकर बापदादा की गोद मे बैठ जाता हूँ*। अपने प्यार की शीतल छाँव में बिठाकर बापदादा अपना सारा स्नेह मेरे ऊपर उड़ेल रहें हैं। अपनी गोद मे मुझे लिटाकर, बड़े प्यार से अपना हाथ मेरे सिर पर थपथपाकर बाबा मुझे मीठी लोरी सुना रहें हैं। *ऐसा लग रहा है जैसे मेरी पलकें बंद हो रही हैं और थोड़ी देर के लिए मीठी निंद्रा की स्थिति में जाकर मैं गहन सुकून का अनुभव कर रही हूँ*। 

_ ➳  क्षण भर की इस मीठी निंद्रा से जगते ही मैं स्वयं को फिर से अपने ब्राह्मण स्वरूप में देखती हूँ। किन्तु अब मैं स्वयं को बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूँ। *बाबा की गोद मे विश्राम करने के  इस अति खूबसूरत सुखद अहसास ने मुझे बहुत ही एनर्जेटिक बना दिया है*। जैसे लौकिक रीति से भी एक साधारण मनुष्य कर्म करते - करते जब थक जाता है तो थोड़ी देर विश्राम कर लेता है ताकि दोबारा कर्म करने की शक्ति उसमे आ जाए। ऐसे ही बाबा की गोदी में लेटने के इस एक सेकण्ड के अनुभव ने मुझमे जैसे असीम बल भर दिया है। *इस अति मीठे सुखद एहसास के साथ, स्वयं को पहले से कई गुणा अधिक बलशाली अनुभव करके मैं उठती हूँ और फिर से कर्म योगी बन कर्म करने लग जाती हूँ*। 

 

_ ➳  हर कर्म बाबा की याद में रह कर करने से कर्म का बोझ अब मुझे भारी नही बनाता बल्कि बाबा की याद, कर्म करते भी कर्म के बन्धन से मुझे मुक्त रख, सदा हल्केपन का अनुभव करवाती है। *चलते -  फिरते कर्म करते बीच - बीच मे शरीर से डिटैच हो कर अपने प्यारे बाबा की सर्वशक्तियों की किरणों रूपी गोद मे बैठ विश्राम करना और उनकी शक्तियों से भरपूर हो कर, शक्तिशाली बन फिर से कर्म में लग जाना, यही अभ्यास हर समय करते हुए, हर कर्म को मैं बड़ी सहजता से सम्पन्न कर लेती हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं ज्ञान के राजों को समझ सदा अचल रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं निश्चयबुद्धि आत्मा हूँ।*

   *मैं विघ्नविनाशक आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा दृढ़ता की शक्ति को सदा साथ रखती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सफलता को गले का हार बना लेती हूँ  ।*

   *मैं शक्तिशाली आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  और चतुराई सुनावें? ऐसे समय पर फिर ज्ञान की प्वाइन्ट यूज़ करते हैं कि अभी प्रत्यक्ष फल तो पा लो भविष्य में देखा जायेगा। लेकिन प्रत्यक्षफल अतीन्द्रिय सुख सदा का है, अल्पकाल का नहीं। कितना भी प्रत्यक्षफल खाने का चैलेन्ज करे लेकिन अल्पकाल के नाम से और खुशी के साथ-साथ बीच में असन्तुष्टता का कांटा फल के साथ जरूर खाते रहेंगे। मन की प्रसन्नता वा सन्तुष्टता अनुभव नहीं कर सकेंगे। इसलिए ऐसे गिरती कला की कलाबाजी नहीं करो। बापदादा को ऐसी आत्माओं पर तरस होता है - बनने क्या आये और बन क्या रहें हैं! *सदा यह लक्ष्य रखो कि जो कर्म कर रहा हूँ यह प्रभु पसन्द कर्म है? बाप ने आपको पसन्द किया तो बच्चों का काम है - हर कर्म बाप पसन्द, प्रभु पसन्द करना। जैसे बाप गुण मालायें गले में पहनते हैं वैसे गुण माला पहनों, कंकड़ो की माला नहीं पहनों। रत्नों की पहनो।*

 

✺  *"ड्रिल :- हर कर्म प्रभु पसंद करना*

 

_ ➳  *मैं आत्मा एकांत में बैठकर अपने दिलाराम बाबा को याद करती हूँ और प्यारे बाबा को प्यार से ख़त लिखती हूँ...* फिर मैं आत्मा पंछी बन ख़त लेकर उड़ चलती हूँ और पहुँच जाती हूँ सूक्ष्म वतन प्यारे-प्यारे बाबा के पास... एक नन्हा फरिश्ता बन बाबा की गोद में बैठ जाती हूँ... बाबा से कहती हूँ... बाबा मैं आपके लिए ख़त लाई हूँ... *प्यारे बाबा मुस्कुराते हुए मेरे हाथों से ख़त लेकर पढ़ते हैं...*

 

_ ➳  प्राण प्यारे बाबा, मेरे मीठे बाबा- आप कितने ही प्यारे हो, मीठे हो... आपने मुझे नवजीवन दिया है... कौड़ी से हीरे तुल्य बना दिया है... *मीठे बाबा आपने अपने दिव्य कलम से कितना ही सुन्दर भाग्य लिखा है मेरा... अगर मैं सागर को स्याही बनाकर, जंगल को कलम बनाकर भी आपकी महिमा करूँ, आपको शुक्रिया करूँ तो भी कम है बाबा...* कैसे शुक्रिया करूँ मैं आपकी बाबा... मेरे बाबा आपका दिया जीवन आपको समर्पित... आपकी प्यारी लाडली...

 

_ ➳  प्यारे बाबा ख़त पढ़कर प्यार से मेरे सिर पर हाथ रखते हैं और अविनाशी वरदानों से भरपूर कर देते हैं... मैं आत्मा बाबा को देखते हुए बाबा के प्यार में खो जाती हूँ... बाबा के हाथों से, मस्तक से दिव्य तेजस्वी किरणें निकलकर मुझ पर पड़ रही हैं... *बाबा से निकलती दिव्य गुण, शक्तियों की किरणें मुझ फरिश्ते को दिव्य गुणधारी बना रही हैं...* बाबा अखूट ख़ज़ानों से मुझे भरपूर कर रहे हैं... *बाबा मुझे ज्ञान रत्नों की, दिव्य गुणों की माला पहना रहे हैं...*

 

_ ➳  मैं आत्मा भक्ति में बाबा को पाने के लिए कितना दर-दर भटकती थी... पर अब बाप ने मुझको पसन्द किया, अपना बनाया तो मैं सदा प्रभु पसंद बन बाबा के दिलतख्त पर रहती हूँ... सदा उडती कला में रहती हूँ... कोई भी काम गिरती कला वाली नहीं करती हूँ... *अल्पकाल के नाम, मान, शान का प्रत्यक्षफल नहीं खाती हूँ... अतीन्द्रिय सुख का अविनाशी प्रत्यक्षफल खाती हूँ...*

 

_ ➳  *अब मैं आत्मा सदा एक ही लक्ष्य रखकर हर कर्म कर रही हूँ... हर कर्म करने के पहले चेक करती हूँ कि ये प्रभु पसंद है या नहीं... मैं आत्मा सदा हर कर्म बाप पसन्द, प्रभु पसन्द कर बाबा को शुक्रिया अदा कर रही हूँ...* मैं आत्मा सदा बाबा द्वारा दिए दिव्य गुणों और रत्नों की माला पहने रहती हूँ... कभी भी अवगुणों की कंकड़ो की माला नहीं पहनती हूँ... *प्रभु पसंद कर्म करने से अब मैं आत्मा सदा प्रसन्नता वा सन्तुष्टता का अनुभव कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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