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 14 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बाप को अपना सच्चा सच्चा पोतामेल दिया ?*

 

➢➢ *बुधीयोग और संग तोड़ एक बाप से जोड़ा ?*

 

➢➢ *"एक बाप दूसरा न कोई" - इस स्मृति से निमित बन सेवा की ?*

 

➢➢ *विघनो से डरे तो नही ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *तपस्वी मूर्त का अर्थ है-तपस्या द्वारा शान्ति के शक्ति की किरणें चारों ओर फैलती हुई अनुभव में आयें।* यह तपस्वी स्वरुप औरों को देने का स्वरुप है। *जैसे सूर्य विश्व को रोशनी की और अनेक विनाशी प्राप्तियों की अनुभूति कराता है।* ऐसे महान तपस्वी आत्माएं ज्वाला रुप शक्तिशाली याद द्वारा प्राप्ति के किरणों की अनुभूति कराती हैं।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं पूर्वज और पूज्य आत्मा हूँ"*

 

  हम पूज्य और पूर्वज आत्मायें हैं - इतना नशा रहता है? आप सभी इस सृष्टि रुपी वृक्ष की जड़ में बैठे हो ना? *आदि पिता के बच्चे आदि रत्न हो। तो इस वृक्ष के तना भी आप हो। जो भी डाल-डालियाँ निकलती है वह बीज के बाद तना से ही निकलती हैं। तो सबसे आदि धर्म की आप आत्माएं हो और सभी पीछे निकलते हैं इसलिए पूर्वज हो। तो आप फाउन्डेशन हो।* जितना फाउन्डेशन पक्का होता है उतनी रचना भी पक्की होती है। तो इतना अटेन्शन अपने उपर रखना है।

 

  *पूर्वज अर्थात तना होने के कारण डायरेक्ट बीज से कनेक्शन है। आप फलक से कह सकते हो कि हम डायरेक्ट परमात्मा द्वारा रचे हुए हैं।* दुनिया वालों से पूछो कि किसने रचा? तो सुनी-सुनाई कह देंगे कि भगवान ने रचा। लेकिन कहने मात्र हैं और आप डायरेक्ट परम आत्मा की रचना हो।

 

  आजकल के ब्राह्मण भी कहते हैं कि हम ब्रह्मा के बच्चे हैं। लेकिन ब्रह्मा के बच्चे प्रैक्टिकल में आप हो। तो यह खुशी है कि हम डायरेक्ट रचना है। कोई महान आत्मा, धर्म आत्मा की रचना नहीं, डायरेक्ट परम आत्मा की रचना हैं। तो डायरेक्ट कितनी शक्ति है! *दुनिया वाले ढूँढ़ रहे हैं कि कोई वेष में भगवान आ जायेगा और आप कहते मिल गया। तो कितनी खुशी हैं! तो इतनी खुशी रहती है कि आपको देख करके और भी खुश हो जाएं। क्योंकि खुश रहने वाले का चेहरा सदा ही खुशनुम: होगा ना?*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  ऐसे भी कई होते जिन्हें एकान्त पसन्द आता, संगठन में रहना, हँसना, बोलना ज्यादा पसन्द नहीं आता, लेकिन यह हुआ बाहर मुखता में आना। *अभी अपने को एकान्तवासी बनाओ अर्थात् सर्व आकर्षण के वायब्रेशन से अंतर्मुख बनो।*

 

✧  अब समय ऐसा आ रहा है जो यही अभ्यास काम में आएगा। अगर बाहर के आकर्षण के वशीभूत होने का अभ्यास होगा तो समय पर धोखा दे देगा। *सरकमस्टान्सेज ऐसे आयेंगे जो इस अभ्यास के सिवाए और कोई आधार ही नहीं दिखाई देगा।*

 

✧  एकान्तवासी अर्थात् अनुभवी मूर्त।  दिल्ली वाले सेवा के आदि के निमित बने हैं तो इस विशेषता में भी   निमित्त बनो। तो इस स्थिति के अनुभव को दूसरे भी कॉपी करेंगे। यह सबसे बड़े ते बड़ी सेवा है। *संगठित रूप में और इन्डिविजिवल रूप में दोनों ही रूप से ऐसे अभ्यास का वातावरण फैलाओ।* (पार्टियों के साथ)

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *देह के बन्धन का कारण है देही का सम्बन्ध बाप से नहीं जोड़ा है।* बाप की स्मृति और देही स्वरूप के स्मृति की धारणा नहीं हुई है। *पहला पाठ कच्चा है। सेकेण्ड में देह से न्यारे बनने का अभ्यास सेकेण्ड में देह के बन्धन से मुक्त बना देता है। स्वीच आन हुआ और भस्म ।* जैसे साइन्स के साधनों द्वारा भी वस्तु सेकेण्ड में परिवर्तन हो जाती है वैसे साइलेन्स की शक्ति से, देही के सम्बन्ध से बंधन खत्म। *अब तक भी अगर पहली स्टेज देह के बन्धन में हैं तो क्या कहेंगे! अभी तक पहले क्लास में हैं। जैसे कोई स्टूडेन्ट कमज़ोर होने के कारण कई वर्ष एक ही क्लास में रहते हैं- तो सोचो ईश्वरीय पढ़ाई का लास्ट टाइम चल रहा है और अब तक भी देह के सम्बन्ध की पहली चौपड़ी में हैं, ऐसे स्टूडेन्ट को क्या कहेंगे।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप पर पूरा-पूरा बलि चढ़ना"*

 

_ ➳  *भक्ति में, तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा* का गीत गाते मैं आत्मा सब कुछ भगवद् अर्पण करने के बजाय हमेशा मागँने वालों की कतार में ही दिखाई पडी... *देहभान ने मुझ दाता को न जाने कब भिखारियों की कतार में ला खडा किया*... पता ही न चला... *खोई स्मृतियों की लडियाँ चुन -चुन कर  मुझ आत्मा को अमूल्य मोती बना अपने गले का हार बनाना चाहते है, शिव पिता*, और इसी खातिर आज सम्मुख बैठकर *देह सहित सब कुछ बलि चढाकर ट्रस्टी बन, संभालने की समझानी दे रहे है*...

 

  *आकारी रूप में मेरे सम्मुख बैठे सच्चे सच्चे ट्रस्टी शिव पिता मुझ आत्मा से बोले:-* "मीठी बच्ची... भक्ति मार्ग में बलि की परम्परा बहुत काल से चली आ रही है... मगर क्या *बलि का सच्चा -सच्चा अर्थ समझती हो? सब कुछ प्रभु अर्पण कर मेरा पन समाप्त किया है... ट्रस्टी बन प्रभु पैगामों को आसमानों से बरसाया*देह से ममत्व निकाल बाप को अपना साथी बनाया?..."

 

_ ➳  *सतयुगी बादशाही के नशे में चूर मैं विदेही, जन्म- जन्म की राजाई भेंट में देने वाले बापदादा से बोली:-* "मेरे मीठे बाबा... *आपके अतुलनीय स्नेह और श्रीमत पर कर्मेन्द्रियों की गुलामी से मुक्त हो मैं आत्मा स्वराज्यधिकारी बन रही हूँ, ज्ञान के नशे में चूर हो, ज्ञानसागर की गहराई में गोते लगाना सीखा है मैने*... विकारी तूफानो को समझा ही नही बल्कि उनसे बचने की युक्तियाँ भी आपसे सीख अब सबको सिखा रही हूँ..."

 

  *सर्वसम्बन्धों का सुख देने वाले बापदादा दृष्टि से सुखो की बारिश करते हुए मुझ आत्मा से बोले:- "मीठी बच्ची, देह के सब सम्बन्धों से ट्रस्टी हो एक बाप से सर्व सम्बन्ध बना कर सब लौकिक संबंधों को संभालों*... सेवा का मान, शान और अपने संस्कारो को भी बाप को अर्पण करो, तो हर संस्कार दिव्य हो, बापसमान बन जायेगा... *निमित्त पन का भाव ही आप हर आत्मा को परमात्म प्रेम से भरेगा..."*

 

_ ➳  *व्यर्थ चक्रों से मुक्त रह निर्विघ्न सेवाधारी मैं आत्मा, अखण्ड सेवाधारी बाप से बोली:-* "मीठे बाबा... *आपसे स्व की सेवा का मूलमन्त्र पा  विश्वसेवा करने के लिए चली हूँ मैं*... देह सहित सब कुछ एक बाप पर बलि चढाकर अब मैं केवल ट्रस्टी बन सब संभाल रही हूँ... *जीवन सुन्दर मधुबन बन रहा हैअब तो हर पल रूहानी मौजो में पल रही हूँ... उँगली पकड कर आपकी पग पग श्रीमत पर चल रही हूँ मैं*..."

 

  *सच्ची सच्ची रूहानी यात्रा सिखाने वाले रूहानी मुसाफिर शिव बाबा मुझ आत्मा से बोले:-* "मेरी रूहानी बच्ची... *इन रूहानी मौजो का अनुभव अब तीर्थो पर भटकते भक्तों को कराओं*... बहुत भटके है बेचारें, अब परमात्म प्रेम के पैगाम आसमानों से बरसाओं... *जो -जो आपने पाया है बाप से, चेहरे चलन से उसकी प्रत्यक्षता कराओं*... *मातृ शक्ति के दीदार को कतार बद्ध खडे इन प्यासो को अब मातृ शक्ति का दीदार तो कराओं*..."

 

_ ➳  *बच्चों को प्रत्यक्ष कर खुद पीछे छिप जाने वाले शिव सूर्य से मैं आत्मा बोली:-* "प्यारे बाबा... मन बुद्धि की इस रूहानी यात्रा में शिव प्रियतम से मिलन मनाती मैं, हर आत्मा को प्रभु प्रेम का परिचय दे रही हूँ बाबा!.. *तीर्थों, मठो पर जाते भक्त संन्यासी अब एक बाप के नाम की अलख जगा रहे है... मधुबन तीर्थ के लिए हर तरफ यहीं है, यहीं है कि गूँज सुन सब हरस रहे है, आसमानो से देखों प्रभु प्रेम के मोती बरस रहे है*... और मैं आत्मा चुपचाप एक एक मोती को सहेजती गुणों को धारण करती... *बापदादा के वरदानों की छत्र छाया में पलती जा रही हूँ*..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप पर पूरा-पूरा बलिहार जाना है*"

 

_ ➳  अपने शिव पिता परमात्मा के साथ अलग - अलग सम्बन्धों का सुख अनुभव करते हुए मन बेहद खुशी से भर जाता है और मन मे विचार चलता है कि वो ऑल माइटी ऑथोरिटी भगवान जिसकी भक्त लोग केवल अराधना करते हैं, स्वप्न में भी नही सोच सकते कि भगवान उनका बाप, दोस्त, साजन, बच्चा, भी बन सकता है। लेकिन *मैं कितनी खुशनसीब हूँ जो हर रोज भगवान के साथ एक नया सम्बन्ध बना कर, उस सम्बन्ध का असीम सुख प्राप्त करती हूँ*। ऐसा सुख  जो देह के सम्बन्धो में कभी मिल ही नही सकता। क्योकि वो *अनकंडीशनल प्यार केवल प्यार का सागर भगवान ही दे सकता हैं*।

 

_ ➳  यही विचार करते करते अपने शिव पिता परमात्मा को अपना बच्चा अपना वारिस बनाने का संकल्प मन मे लिए मैं अपने मन बुद्धि को एकाग्र कर उनका आह्वान करती हूँ। आह्वान करते ही सेकेंड में उनकी छत्रछाया को मैं अपने ऊपर अनुभव करती हूं। *अपने चारों और फैले सर्वशक्तियों के रंग बिरंगे प्रकाश को मैं मन बुद्धि की आंखों से स्पष्ट देख रही हूँ*। ये प्रकाश मन को असीम शांति और सुकून का अनुभव करवा रहा है। सुख, शांति, प्रेम, पवित्रता के शक्तिशाली वायब्रेशन चारो और वायुमण्डल में फैल कर मन को असीम आनन्द की अनुभूति करवा रहें हैं। *इस असीम आनन्द की अनुभूति करते करते अपने शिव पिता परमात्मा की सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों के झूले में बैठ, मैं आत्मा अपने लाइट के सूक्ष्म शरीर के साथ उड़ चलती हूँ*। और उड़ते उड़ते एक बहुत सुंदर उपवन में पहुंच जाती हूँ।

 

_ ➳  चारों और फैली हरियाली, रंग बिरंगे फूंलो की खुशबू मन को आनन्दित कर रही है। उपवन में बैठी मैं प्रकृति के इस सुंदर नजारे का आनन्द ले रही हूं। तभी कानो में बांसुरी की मधुर आवाज सुनाई देती है औऱ *देखते ही देखते मेरे शिव पिता परमात्मा नटखट कान्हा के रूप में बाँसुरी बजाते हुए मेरे सामने आ जाते हैं*। उनके इस स्वरूप को देख मैं चकित रह जाती हूँ। धीरे धीरे बाँसुरी बजाते हुए मेरे नटखट गिरधर गोपाल मेरी गोदी में आ कर बैठ जाते हैं और अपने नन्हे हाथों को फैला कर मुझे अपनी बाहों में भर लेते हैं। *उनके नन्हे हाथों का कोमल स्पर्श पाकर मन उनके प्रति वात्सलय और प्यार से भर जाता है*। अपने नटखट कान्हा की माँ बन कर मैं उन्हें प्यार कर रही हूँ, उनकी लीलाओं का आनन्द ले रही हूं।

 

_ ➳  स्वयं भगवान नटखट गोपाल का रूप धारण कर, मेरा बच्चा बन मुझे मातृत्व सुख का अनुभव करवा कर अपने लाइट माइट स्वरूप में अब मेरे सामने उपस्थित हो जाते हैं और फिर से अपनी सर्वशक्तियों रूपी किरणों को बाहों में समेटे मुझे ऊपर की और ले कर चल पड़ते हैं। अपने सूक्ष्म आकारी फ़रिशता स्वरूप को सूक्ष्म वतन में छोड़, निराकारी आत्मा बन *अपने शिव पिता की बाहों के झूले में झूलते - झूलते मैं पहुँच जाती हूँ परमधाम और उनकी सर्वशक्तियों रूपी किरणों की छत्रछाया में जा कर बैठ जाती हूँ*। उनकी सर्वशक्तियों से स्वयं को भरपूर करके, तृप्त हो कर अब मैं वापिस साकारी लोक की ओर आ जाती हूँ और अपने साकारी तन में आ कर भृकुटि पर विराजमान हो जाती हूँ।

 

_ ➳  नटखट गिरधर गोपाल के रूप में मेरे शिव पिता परमात्मा ने बच्चा बन कर जिस अविस्मरणीय सुख का मुझे आज अनुभव करवाया उसकी स्मृति बार बार मन को आनन्दित कर रही है। *उसी सुख को बार बार पाने की इच्छा से अब मैं शिव बाबा को अपना वारिस बनाये, तन मन धन से उन पर पूरा पूरा बलिहार जा कर 21 जन्मो के लिए उनसे अविनाशी सुख का वर्सा प्राप्त कर रही हूँ*। जैसे सुदामा में मुट्ठी भर चावल दे कर महल ले लिए ठीक उसी प्रकार इस एक जन्म  में शिवबाबा को अपना वारिस बना कर उन पर बलिहार जाने से, मैं जन्म जन्म के लिए उनकी बलिहारी की पात्र आत्मा बन गई हूं।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं एक बाप दूसरा न कोई इस स्मृति में रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं निम्मित बन कर सेवा करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सर्व लगाव मुक्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा विघ्नों से सदा बलवान बन जाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा विघ्नों से डरने से सदा मुक्त हूँ  ।*

   *मैं विघ्न विनाशक आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ *टीचर्स के साथ- सेवाधारी आत्माओं का सदा एक ही लक्ष्य रहता है कि बाप समान बनना है? क्योंकि बाप समान सीट पर सेट हो। जैसे बाप शिक्षक बन, शिक्षा देने के निमित्त बनते हैं वैसे सेवाधारी आत्मायें बाप समान कर्त्तव्य पर स्थित हो। तो जैसे बाप के गुण वैसे निमित्त बने हुए सेवाधारी के गुण।* तो सदा पहले यह चेक करो - कि जो भी बोल बोलते हैं यह बाप समान हैं? जो भी संकल्प करते हैं यह बाप समान है! अगर नहीं तो चेक करके चेन्ज कर लो। कर्म में नहीं जाओ। ऐसे चेक करने के बाद प्रैक्टिकल में लाने से क्या होगा? जैसे बाप सदा सेवाधारी होते हुए सर्व का प्यारा और सर्व से न्यारा है, ऐसे सेवा करते सर्व के रूहानी प्यारे भी रहेंगे और साथ-साथ सर्व से न्यारे भी रहेंगे! बाप की मुख्य विशेषता ही है - जितना प्यारा उतना न्यारा'। ऐसे बाप समान सेवा में प्यारे और बुद्धियोग से सदा एक बाप के प्यारे सर्व से न्यारे। इसको कहा जाता है - बाप समान सेवाधारी'। तो शिक्षक बनना अर्थात् बाप की विशेष इस विशेषता को फालो करना। सेवा में तो सभी बहुत अच्छी मेहनत करते हो लेकिन कहाँ न्यारा बनना है और कहाँ प्यारा बनना है - इसके ऊपर विशेष अटेन्शन।

➳ _ ➳ अगर प्यार से सेवा न करो तो भी ठीक नहीं और प्यार में फँसकर सेवा करो तो भी ठीक नहीं। तो प्यार से सेवा करनी है लेकिन न्यारी स्थिति में स्थित होकर करनी है तब सेवा में सफलता होगी। *अगर मेहनत के हिसाब से सफलता कम मिलती है तो जरूर प्यारे और न्यारे बनने के बैलेन्स में कमी है।* इसलिए सेवाधारी अर्थात् बाप का प्यारा और दुनिया से न्यारा। यही सबसे अच्छी स्थिति है। इसी को ही कमल पुष्प समान' जीवन कहा जाता है। इसलिए शक्तियों को कमल आसन भी देते हैं! कमल पुष्प पर विराजमान दिखाते हैं। क्योंकि कमल समान न्यारे और प्यारे हैं। तो सभी सेवाधारी कमल आसन पर विराजमान हो ना? आसन अर्थात् स्थिति। स्थिति को ही आसन का रूप दिया है। बाकी कमल पर कोई बैठा हुआ तो नहीं है ना? तो सदा कमल आसन पर बैठो। कभी कमल कीचड़ में न चला जाए इसका सदा ध्यान रहे!

✺ *"ड्रिल :- सेवा करते सर्व के रूहानी प्यारे और साथ साथ से न्यारे बनकर रहना"*

➳ _ ➳ मैं आत्मा आज सेंटर पर दीदी के द्वारा मुरली सुन रही हूं... मैं देखती हूं कि हमारी प्यारी दीदी हमें बड़े ही प्यार से मुरली सुना रही है... *और मैं यह भी अनुभव करती हूं कि हमारी प्यारी दीदी हमें रोज नई नई ज्ञान की गहरी बातों को बताती हैं... हम चाहे कितनी भी क्वेश्चन दीदी से करें वह उनका बड़े प्यार से उत्तर देती है... उनकी ज्ञान देने की भावना से हमें ऐसा प्रतीत होता है कि मानो दीदी हमें अपने से भी ऊपर ले जाना चाहते हैं... वह चाहते हैं कि वह हम में इतना ज्ञान भर दे कि हम बहुत ऊंचे जाए और बहुत अच्छा पद प्राप्त करें...* वह हमें रोज रूहानी भावना से पढ़ाते हैं और रोज हमें रुहानी प्यार का अनुभव कराती है...

➳ _ ➳ और फिर मुरली सुनाते हुए हमें दीदी ब्रहमा बाबा के बारे में बताते हैं... उन्होंने बताया कि जैसे ब्रह्मा बाबा ने परमपिता परमात्मा के आदेश का आजीवन पालन करते हुए अपना सारा जीवन सेवा के लिए और अन्य आत्माओं के भविष्य के लिए समर्पित कर दिया... और एक सच्चे सेवाधारी बन कर रहे... बाबा सेवा करते थे तो वह हमेशा रूहानी दृष्टि से और रुहानी प्यार से सेवा किया करते थे... सभी को उनकी रुहानियत का बहुत गहराई से अनुभव होता था... *वह सदा कमल फूल समान पवित्र न्यारे और प्यारे बन कर रहे... उन्होंने हमेशा निमित्त भाव रखते हुए सेवा की... बाबा की इन विशेषताओं को जानकर मुझे उनके द्वारा सेवा में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली... और मुझे बाप समान बनने की लालसा भी लगी...*

➳ _ ➳ फिर दीदी ने हमें समझाया की सेवा अर्थात बाप का प्यारा और सबसे न्यारा... जब हम सेवा करते हुए बाप को याद रखेंगे अर्थात निमित्त भाव से सेवा करेंगे... तो हमें किसी भी सेवा में थकावट का अनुभव नहीं होगा... जब हम सेवा में निमित्त भाव नहीं रखते हैं तो अक्सर हम सेवा में थकावट का अनुभव करते हैं... और जब हम सेवा में बाप को याद रखते हैं तो कब सेवा हो जाती है और कितनी सेवा होती है इसका हमें आभास भी नहीं होता... *सेवा करते समय हमें चेकिंग करनी चाहिए कि हमसे सेवा में कोई भूल तो नहीं हुई... हमें सदा यह स्मृति में रखना चाहिए की हम न्यारे और प्यारे होकर सेवा करेंगे तो अपना और औरों का भी भविष्य खुशहाल बना सकेंगे... और पुरुषार्थ में कभी रुकावट का अनुभव नहीं करेंगे...*

➳ _ ➳ दीदी की मुरली सुनाने के बाद मैं बाबा के कमरे में आती हूं... और बाबा की आंखों में देखती हूं... मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो बाबा मुझे कुछ समझाना चाहते हो... तभी मुझे अनुभव होता है कि बाबा मुझे समझा रहे हैं कि *बच्चे, मुझे देखो मेरा चित्र हमेशा तुम्हें कमल आसन पर विराजमान हुआ दिखाई देगा... यह कमल आसन मेरी स्थिति है... यह कमल मेरी इस स्थिति का प्रमाण है कि मैंने इस कीचड़ रुपी संसार में रहते हुए भी अपनी बुद्धि इस कीचड़ में नहीं फंसाई... हमेशा अपने आपको अपने चौड़े चौड़े पत्ते रूपी बाप की याद और रुहानियत से अपने आप को इस कीचड़ से बचा कर रखा...* इसलिए अब तुम्हें भी अपना जीवन कमल फूल समान बनाना है बाबा के यह वचन सुनकर मेरा मन फूल की तरह खिलता है और मैं बाबा से कहती हूं बाबा मैं भी अब रुहानियत से सर्व से न्यारी और बाबा की प्यारी बनकर निमित्त भाव से सेवा करूंगी और सच्ची सच्ची सेवाधारी बनूंगी...
 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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