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 14 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बंधनमुक्त बन सेवा की ?*

 

➢➢ *अपने हमजीन्स की सेवा की ?*

 

➢➢ *क्या क्यों की क्वेश्चन की जाल से सदा मुक्त रहे ?*

 

➢➢ *प्लेन बुधी से प्लान को प्रैक्टिकल में लाये ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *सबसे तीव्रगति की सेवा है'वृत्ति द्वारा वायब्रेशन फैलाना'। वृत्ति बहुत तीव्र राकेट से भी तेज है।* वृत्ति द्वारा वायुमण्डल को परिवर्तन कर सकते हो। जहाँ चाहो, जितनी आत्माओं के प्रति चाहो वृत्ति द्वारा यहाँ बैठे-बैठे पहुंच सकते हो। *वृत्ति द्वारा दृष्टि और सृष्टि परिवर्तन कर सकते हो। सिर्फ वृत्ति में सर्व के प्रति शुभ भावना, शुभ कामना हो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बालक सो मालिक हूँ"*

 

✧   डबल नशा रहता है कि मैं श्रेष्ठ आत्मा मालिक भी हूँ और फिर बालक भी हूँ? एक है मालिकपन का रूहानी नशा और दूसरा है बालकपन का रूहानी नशा। यह डबल नशा सदा रहता है या कभी-कभी रहता है? 'बालक' सदा हो या कभीकभी हो? *बालक सदा बालक ही है ना। परमात्म-बालक हैं और फिर सारे आदि-मध्य-अन्त को जानने वाले मालिक हैं। तो ऐसा मालिकपन और ऐसा बालकपन सारे कल्प में और कोई समय नहीं रह सकता।*

 

✧  सतयुग में भी परमात्म-बच्चे नहीं कहेंगे, देवात्माओंके बच्चे हो जायेंगे। *तीनों कालों को जानने वाले मालिक-यह मालिकपन भी इस समय ही रहता है। तो जब इस समय ही है, बाद में मर्ज हो जायेगा, तो सदा रहना चाहिए ना। डबल नशा रखो। इस डबल नशे से डबल प्राप्ति होगी मालिकपन से अपनी अनुभूति होती है और बालकपन के नशे से अपनी प्राप्ति* भिन्न-भिन्न प्राप्तिया हैं ना। यह रूहानी नशा नुकसान वाला नहीं है। रूहानी है ना। देहभान के नशे नुकसान में लाते हैं। वो नशे भी अनेक हैं। देहभान के कितने नशे हैं? बहुत हैं ना-मैं यह हूँ, मैं यह हूँ, मैं यह हूँ.......। लेकिन सभी हैं नुकसान देने वाले, नीचे लाने वाले।

 

  यह रूहानी नशा ऊंचा ले जाता है, इसलिए नुकसान नहीं है। हैं ही बाप के। तो बाप कहने से बचपन याद आता है ना। बाप अर्थात् मैं बच्चा हूँ तभी बाप कहते हैं। तो सारा दिन क्या याद रहता है? 'मेरा बाबा'। या और कुछ याद रहता है? 'बाबा' कहने वाला कौन? बच्चा हुआ ना। तो सदा बच्चे हैं और सदा ही रहेंगे। सदा इस भाग्य को सामने रखो अर्थात् स्मृति में रखो-कौन हूँ, किसका हूँ और क्या मिला है! क्या मिला है-उसकी कितनी लम्बी लिस्ट है! लिस्ट को याद करते हो या सिर्फ कॉपी में रखते हो? कॉपी में तो सबके पास होगा लेकिन बुद्धि में इमर्ज हो-मैं कौन? तो कितने उत्तर आयेंगे? बहुत उत्तर हैं ना। उत्तर देने में, लिस्ट बताने में तो होशियार हो ना। *अब सिर्फ स्मृतिस्वरूप बनो। स्मृति आने से सहज ही जैसी स्मृति वैसी स्थिति हो जाती है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बापदादा आपस में बोले कि अशरीरी आत्मा को अशरीरी बनने में मेहनत क्यों? ब्रह्मा बाप बोले - '*84 जन्म चोला धारण कर पार्ट बजाने के कारण पार्ट बजाते-बजाते शरीरधारी बन जाते हैं।*' शिव बाप बोले - पार्ट बजाया लेकिन अब समय कौन-सा है? समय की स्मृति प्रमाण कर्म भी स्वतः ही वैसे होता है। यह तो अभ्यास है ना?

 

✧  बाप बोले - *अब पार्ट समाप्त कर घर जाना है।* पार्ट की ड्रेस तो छोडनी पडेगी ना? घर जाना है तो भी *यह पुराना शरीर छोडना पडेगा,* राज्य में अर्थात स्वर्ग में जाना है तो भी यह पुरानी ड्रेस छोडनी पडेगी।

 

✧  तो जब *जाना ही है तो भूलना मुश्किल क्यों?* जाना है, क्या यह भूल जाते हो? आप सभी तो जाने के लिए एवररेडी हो ना कि अब भी कुछ रस्सियाँ बँधी हुई हैं? एवररेडी हो ना?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ 'बिन्दु' शब्द ही कमाल का शब्द है। जादू का शब्द है। *बिन्दु बनो और आर्डर करो तो सब तैयार है। संकल्प की ताली बजाओ और सब तैयार हो जायेगा। लेकिन बिन्दु की ताली प्रकृति भी सुनेगी, सर्व कर्मइन्द्रियाँ भी सुनेंगी और सर्वसाथी भी सुनेंगे। बिन्दु बन करके ताली बजाने आती है?*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  शरीर की वैल्यू तब है जब इसमें आत्मा प्रवेश करे*"

 

   *प्यारे बाबा :-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... इस देह की दुनिया से, इस मटमैले आवरण से, अब और दिल न लगाओ... *इस आवरण में चमकती हुई मणि आत्मा हो, इस मीठे नशे से भर जाओ.*.. आत्मा से ही प्रकाशित यह आवरण है यह याद एखने से देहाभिमान स्वतः छूटता चला जायेगा...."

 

_ ➳  *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा देह के मटमैले रूप से निकल कर अपने आत्मिक गौरव से भर गयी हूँ... प्यारे बाबा आपने जो मेरी आत्मिक खूबसूरती का आभास करवाया है... मै आत्मा *इस सत्य को पाकर असीम खुशियो में नाच उठी हूँ.*.."

 

   *मीठे बाबा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वरीय ज्ञान रत्नों को पाकर नये सतयुगी सुखो से सज जाओ... शरीर तो रथ है, और *आप चलाने वाली रथी हो, इसे प्रतिपल याद करो तो सहज ही हर कर्म से न्यारे बन जायेंगे.*.. अपने सत्य स्वरूप को ईश्वरीय यादो में इस कदर गहरा करो... की देह की मिटटी आकर्षित न करे..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी प्यारी मीठी यादो में डूबी हुई... *अपने आत्मिक स्वरूप की गहराई में गहरे उतरती जा रही हूँ..*. आपकी यादो सतोगुणी होती जा रही हूँ... अपना सुन्दरतम रूप आत्मा जानकर अतीन्द्रिय सुख में डूबती जा रही हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा :-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे...  ईश्वर पिता की मीठी यादो में,और अमूल्य ज्ञान रत्नों में डूबकर देह से अनासक्त हो जाओ... *आत्मा ही अनोखा जादू है इसे दिल में गहराई से समा लो..*. अपने दमकते तेज को ईश्वरीय यादो में और भी तेजस्वी बनाओ और देहभान के सहज ही मुक्त हो जाओ..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपको पाकर सत्य से चमक उठी हूँ... देह के अँधेरे में स्वयं के खुबसूरत वजूद को ही भूल बेठी थी... आपकी यादो में पुनः रौशन हो गई हूँ... *मै शरीर नही चलाने वाली प्यारी आत्मा हूँ* इस सत्य से सदा की मुस्करा उठी हूँ..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- हम सो देवता बनने वाले हैं, इसी नारायणी नशे में रहना है*"

 

_ ➳  अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य के नशे में बैठी, अपने मीठे बाबा के प्रेम की लगन में मगन मैं उनकी मीठी यादों में रमण करती हुई *अनुभव करती हूँ कि जैसे मेरे शिव पिता अपने साकार रथ पर विराजमान हो कर, अपनी बाहें पसारे मुझे बुला रहें हैं और कह रहे हैं:- "आओ मेरे डबल सिरताज बच्चे, मेरे पास आओ"*। अव्यक्त बापदादा के ये अव्यक्त महावाक्य जैसे ही मेरे कानों में सुनाई पढ़ते हैं मैं अपनी अव्यक्त स्थिति में स्थित हो जाती हूँ और सूक्ष्म आकारी देह धारण कर, अपने साकारी तन से बाहर निकल कर, बापदादा के पास उनके अव्यक्त वतन की ओर चल पड़ती हूँ।

 

_ ➳  अपनी लाइट की सूक्ष्म आकारी देह को धारण किये मैं फ़रिशता साकार लोक में भ्रमण करता हुआ, आकाश को पार करके पहुँच जाता हूँ सूक्ष्म आकारी फरिश्तों की उस अति सुंदर मनोहारी दुनिया में जहां बापदादा बाहें पसारे मेरा इंतजार कर रहें हैं। बापदादा के सामने पहुँच कर, मैं बिना कोई विलम्ब किये उनकी बाहों में समा जाता हूँ। *अपने बाबा की ममतामयी बाहों के झूले में झूलते हुए मैं असीम आनन्द से विभोर हो रहा हूँ*। बाबा का प्रेम और वात्सलय बाबा के हाथों के स्पर्श से मैं स्पष्ट अनुभव कर रहा हूँ।ऐसे निस्वार्थ प्रेम को पा कर मेरी आँखों से खुशी के आँसू छलक रहें हैं। बाबा मेरे आंसू पोंछते हुए बड़ी मीठी दृष्टि से मुझे देख रहें हैं।

 

_ ➳  बाबा की मीठी दृष्टि से, बाबा की सर्वशक्तियाँ मुझ फ़रिश्ते में समा रही हैं। मैं स्वयं को परमात्म बल से भरपूर होता हुआ अनुभव कर रहा हूँ। *बापदादा के प्यार की शीतल छाया में मैं फरिश्ता असीम सुख और आनन्द का अनुभव कर रहा हूँ*। बापदादा अपना वरदानीमूर्त हाथ मेरे सिर पर रख कर मुझे वरदानों से भरपूर कर रहे हैं। हर प्रकार की सिद्धि से बाबा मुझे सम्पन्न बना रहे हैं। सर्व सिद्धियों, शक्तियों और वरदानों से मुझे भरपूर करके अब बाबा मुझे भविष्य नई दुनिया का साक्षात्कार करवा रहें हैं।

 

_ ➳  ज्ञान के दिव्य चक्षु से मैं देख रहा हूँ, बाबा मेरा हाथ पकड़ कर मुझे आने वाली नई सतयुगी दुनिया मे ले जा रहें हैं और बड़े स्नेह से मुझे कह रहे हैं देखो, बच्चे:- इस नई दुनिया के आप मालिक हो" *अब मैं स्वयं को विश्व महाराजन के रूप में देख रहा हूँ। सारे विश्व पर मैं राज्य कर रहा हूँ। मेरे राज्य में डबल ताज पहने देवी देवता विचरण कर रहें हैं। राजा हो या प्रजा सभी असीम सुख, शान्ति और सम्पन्नता से भरपूर हैं*। चारों ओर ख़ुशी की शहनाइयाँ बज रही हैं। प्राकृतिक सौंदर्य भी अवर्णनीय है। रमणीकता से भरपूर सतयुगी नई दुनिया के इन नजारों को देख मैं मंत्रमुग्घ हो रहा हूँ।

 

_ ➳  इस खूबसूरत दृश्य का आनन्द लेने के बाद मैं जैसे ही अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होती हूँ। *स्वयं को एक दिव्य अलौकिक नशे से भरपूर अनुभव करती हूँ और अब मैं सदा इसी रूहानी नशे में रहते हुए कि मैं ब्रह्माण्ड और विश्व की मालिक बन रही हूँ, निरन्तर अपने पुरुषार्थ को आगे बढ़ा रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं क्यो, क्या के क्वेश्चन की जाल से सदा मुक्त्त रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं विश्व सेवाधारी आत्मा हूँ।*

   *मैं चक्रवर्ती आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा प्लेन बुद्धि से प्लैन को प्रैक्टिकल में लाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा सफलतामूर्त हूँ  ।*

   *मैं शांत स्वरूप आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  बापदादा ऐसे आदि रत्नों को लाख-लाख बधाईयाँ देते हैं क्योंकि आदि से सहन कर स्थापना के कार्य को साकार स्वरूप में वृद्धि को प्राप्त कराने के निमित्त बने हो। तो जो स्थापना के कार्य में सहन किया वह औरों ने नहीं किया है। *आपके सहनशक्ति के बीज ने यह फल पैदा किये हैं। तो बापदादा आदि-मध्य- अन्त को देखते हैं - कि हरेक ने क्या-क्या सहन किया है और कैसे शक्ति रूप दिखाया है। और सहन भी खेल-खेल में किया।* सहन के रूप में सहन नहीं किया, खेल-खेल में सहन का पार्ट बजाने के निमित्त बन अपना विशेष हीरो पार्ट नूँध लिया। इसलिए आदि रत्नों का यह निमित्त बनने का पार्ट बापदादा के सामने रहता है। और इसके फलस्वरूप आप सर्व आत्मायें सदा अमर हो। समझा अपना पार्टकितना भी कोई आगे चला जाये - लेकिन फिर भी... फिर भी कहेंगे। बापदादा को पुरानी वस्तु की वैल्यु का पता है।

 

✺   *"ड्रिल :- खेल खेल में सहन करने का पार्ट बजाना"*

 

 _ ➳  वर्षा ऋतु आने पर चारों तरफ फूल ही फूल खिल रहे हैं हरियाली छा रही है... यह प्रकृति बहुत ही मनमोहक लग रही है... इस दृश्य को देखकर मेरा मन अति आनंदित हो रहा है... जैसे ही वर्षा प्रारंभ होती है, मैं इस वर्षा ऋतु का आनंद लेने के लिए घर से बाहर आ जाती हूं और हरे भरे खेतों की तरफ दौड़ने लगती हूँ... बारिश में नहाते हुए मैं ऐसे स्थान पर आ पहुँचती हूँ... *जहां फूल ही फूल खिल रहे हैं और ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो इन फूलों को प्रकृति नहलाने आई हो... इसी दौरान मैं खिले हुए फूलों से बातें करने लगती हूं... और मैं उन फूलों से कहती हूं, तुम कितने सुंदर प्रतीत हो रहे हो... तुम्हें ऐसा कौन बनाता है...* जिससे तुम सबके दिलों को वश में कर लेते हो और उनके दिल पर राज करते हो...

 

 _ ➳  तभी उन फूलों में से कुछ फूल मुझे कहते हैं कि हम बहुत कुछ सहन करने पर ऐसे खिले हुए फूल बनते हैं... फिर वह फूल मुझे कहते हैं कि आओ हम तुम्हें अपना राज बताते हैं जिससे हम सबके दिलों पर राज करते हैं... वह फूल मेरे आगे औऱ मैं उनके पीछे पीछे चलने लगती हूं... और मुझे एक ऐसे स्थान पर ले आते हैं जहां एक किसान अपने खेत में बीज बो रहा होता है और मुझे यह दृश्य दिखाकर कहने लगते हैं... कि इस किसान को देख तुम्हें कैसा प्रतीत होता है, यह किसान अपने खेत में इन बीजों को कुछ इस तरह से डाल रहा है कि यह बड़े होकर हमें फूल फल दे सके... *उसने अपना कर्तव्य करके छोड़ दिया बाकी अब सारा कार्यभार इन बीजों पर आ जाता है कि उन्हें अब आगे अपना कर्तव्य किस प्रकार निभाना है...*

 

 _ ➳  फिर वह फूल मुझे कहते हैं कि आप इन बीजों को देखो कैसे यह मिट्टी में रहकर अपना बलिदान देते हैं और अपने आप को इस मिट्टी में छुपा कर रखते हैं... फिर यह कुछ दिनों तक इस मिट्टी में इसी प्रकार दबे रहते हैं और फिर कुछ दिनों बाद यह मिट्टी से अंकुरित होकर बाहर निकलने लगते हैं तो इन्हें सबसे पहले सूर्य की किरणों का सामना करना पड़ता है... ताकि यह सूर्य की तेज किरणों का सामना करके एक पौधे का निर्माण कर सकें... इसके बाद इन्हें तेज धूप और तेज हवाओं का सामना करना पड़ता है... तेज हवाएं इन्हें अपनी मंजिल से भटकाने की पूरी कोशिश करते हैं... परंतु ये *मिट्टी में रहकर अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर लेते हैं कि इनका तेज हवा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती... और फिर तेज हवा को सहन करते-करते इसे अपनी आदत बना लेते हैं जिससे वह अपने आने वाले सुन्दर भविष्य का निर्माण करते हैं... तेज धूप से निडर होकर यह इस धूप को अपना साथी बना लेते हैं...*

 

 _ ➳  और यह इस तरह इन प्रकृति रुपी कठिनाइयों का सामना कर लेते हैं और इन्हें अपना साथी बना लेते हैं... और यह एक मजबूत पौधे बन जाते हैं और धीरे-धीरे इनकी डालियों से कलियां निकलने लगती है... और उन कलियों से फिर रंग बिरंगे फूल खिलने लगते हैं... जिसे देखकर सभी अति आनंदित हो उठते है... जब फूलों ने मुझे यह दृश्य दिखाया तो मुझे भी सब समझ आने लगता है... और मैं उन फूलों को कहने लगती कि कैसे *इन छोटी छोटी कठिनायों का डटकर सामना करने से तुम्हारा निर्माण हुआ है... ऐसे ही मैं भी अपने पुरुषार्थ से उज्जवल भविष्य का निर्माण करूंगी...* इतना कहकर मैं बारिश में नहाती हुई आगे की ओर चल पड़ती हूं और ठंडी ठंडी बारिश की फुहारों का आनंद लेती हूं...

 

 _ ➳  मैं आत्मा परमात्मा की याद में बैठती हूँ... परमात्मा से शक्तियों को ग्रहण कर अपनी स्थिति को और भी मजबूत बना रही हूँ... जो भी परिस्थितियां आती हैं, मैं आत्मा परिस्थिति का चिंतन नहीं करती हूँ बल्कि परमात्म चिंतन में रहकर.. सहन शक्ति के द्वारा, परिस्थिति को आगे बढ़ने का साधन समझ खेल-खेल में पार कर लेती हूँ... यह परिस्थिति मुझे और भी मजबूत बनाने आई है... इसलिए इन छोटी-छोटी परेशानियों का चिंतन करके और बड़ी परेशानी नहीं बनाती हूँ... *बल्कि शक्ति स्वरूप बन खेल-खेल में सहन करने का पार्ट बजाती हूँ... और ड्रामा में अपना विशेष हीरो पार्ट नूँध रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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