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 14 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कर्मयोगी बनकर रहे ?*

 

➢➢ *सदा प्यार के मिलन मेले में रहे ?*

 

➢➢ *सदा लवलीं स्थिति का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *निमित भाव का अभ्यास किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  डबल जिम्मेवारी होते भी डबल लाइट रहो। *डबल लाइट रहने से लौकिक जिम्मेवारी कभी थकायेगी नहीं क्योंकि ट्रस्टी हो। ट्रस्टी को क्या थकावट।* अपनी गृहस्थी, अपनी प्रवृत्ति समझेंगे तो बोझ है। अपना है ही नहीं तो बोझ किस बात का। बिल्कुल न्यारे और प्यारे, बालक सो मालिक।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं तीन तख्तनशीन और त्रिकालदर्शी आत्मा हूँ"*

 

  अपने को तख्त-नशीन आत्मायें अनुभव करते हो? अभी तख्त मिला है या भविष्य में मिलना है, क्या कहेंगे? सभी तख्त पर बैठेंगे? (दिलतख्त बहुत बड़ा है) दिलतख्त तो बड़ा है लेकिन सतयुग के तख्त पर एक समय में कितने बैठेंगे? तख्त पर भले कोई बैठे लेकिन तख्त अधिकारी रॉयल फैमली में तो आयेंगे ना। तख्त पर इक्ठे तो नहीं बैठ सकेगे! इस समय सभी तख्त-नशीन हैं। इसलिए इस जन्म का महत्व है। जितने चाहें, जो चाहें दिलतख्त-नशीन बन सकते हैं। इस समय और कोई तख्त है? कौनसा है? (अकालतख्त) आप अविनाशी आत्मा का तख्त ये भृकुटी है। *तो भृकुटी के तख्त-नशीन भी हो और दिलतख्त-नशीन भी हो। डबल तख्त है ना! नशा है कि मैं आत्मा भृकुटी के अकालतख्त-नशीन हूँ! तख्त-नशीन आत्मा का स्व पर राज्य है, इसीलिए स्वराज्य अधिकारी हैं। स्वराज्य अधिकारी हूँ-यह स्मृति सहज ही बाप द्वारा सर्व प्राप्ति का अनुभव करायेगी।*

 

  तो तीनों ही तख्त की नॉलेज है। नॉलेजफुल हो ना! पावरफुल भी हो या सिर्फ नॉलेजफुल हो? जितने नॉलेजफुल हो, उतने ही पावरफुल हो। या नॉलेजफुल अधिक, पावरफुल कम? *नॉलेज में ज्यादा होशियार हो! नॉलेजफुल और पावरफुल-दोनों ही साथ-साथ। तो तीनों तख्त की स्मृति सदा रहे। ज्ञान में तीन का महत्व है। त्रिकालदर्शी भी बनते हैं। तीनों काल को जानते हो।* या सिर्फ वर्तमान को जानते हो? कोई भी कर्म करते हो तो त्रिकालदर्शी बनकर कर्म करते हो या सिर्फ एकदर्शी बनकर कर्म करते हो? क्या हो-एक दर्शी या त्रिकालदर्शी?

 

  तो कल क्या होने वाला है-वह जानते हो? कहो-हम यह जानते हैं कि कल जो होगा वह बहुत अच्छा होगा। ये तो जानते हो ना! तो त्रिकालदर्शी हुए ना। *जो हो गया वो भी अच्छा, जो हो रहा है वह और अच्छा और जो होने वाला है वह और बहुत अच्छा! यह निश्चय है ना कि अच्छे से अच्छा होना है, बुरा नहीं हो सकता। क्यों? अच्छे से अच्छा बाप मिला, अच्छे से अच्छे आप बने, अच्छे से अच्छे कर्म कर रहे हो। तो सब अच्छा है ना।* कि थोड़ा बुरा, थोड़ा अच्छा है? जब मालूम पड़ गया कि मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ, तो श्रेष्ठ आत्मा का संकल्प, बोल, कर्म अच्छा होगा ना! तो यह सदा स्मृति रखो कि-कल्याणकारी बाप मिला तो सदा कल्याण ही कल्याण है।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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कमजोर अर्थात अधीन प्रजा। मालिक अर्थात शक्तिशाली राजा। तो आह्वान करो मालिक बन करके। स्वस्थिति के श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठो। *सिंहासन पर बैठ के शक्ति रूपी सेवाधारियों का आह्वान करो। ऑर्डर दो।* हो नहीं सकता कि आपके सेवाधारी आपके ऑर्डर पर न चलें। फिर ऐसे नहीं कहेंगे क्या करें सहन शक्ति न होने के कारण मेहनत करनी पडती है। समाने की शक्ति कम थी इसलिए ऐसा हुआ। आपके सेवाधारी समय पर कार्य में न आवें तो सेवाधारी क्या हुए? कार्य पूरा हो जाए फिर सेवाधारी आवें तो क्या कहेंगे! *जिसको स्वयं समय का महत्व है उसके सेवाधारी भी समय पर महत्व जान हाजिर होंगे।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ अपने देह भान से न्यारा। *जैसे साधारण दुनियावी आत्माओं को चलते-फिरते, हर कर्म करते स्वत: और सदा देह का भान रहता ही है, मेहनत नहीं करते कि मैं देह हूँ, न चाहते भी सहज स्मृति रहती ही है। ऐसे कमल-आसनधारी ब्राह्मण आत्मायें भी इस देहभान से स्वत: ही ऐसे न्यारे रहें जैसे अज्ञानी आत्म-अभिमान से न्यारे हैं।* है ही आत्म-अभिमानी। शरीर का भान अपने तरफ आकर्षित न करे। जैसे ब्रह्मा बाप को देखो, चलते-फिरते फरिश्ता-रूप व देवता-रूप स्वत: स्मृति में रहा। ऐसे नैचुरल देही-अभिमानी स्थिति सदा रहे-इसको कहते हैं देहभान से न्यारे। *देहभान से न्यारा ही परमात्म-प्यारा बन जाता है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अनेक जन्म सम्पन्न जीवन बनाने का आधार-इस जन्म का परमात्म प्यार"*

 

_ ➳  *प्रेम के सागर से बिछुडी मैं स्नेह की एक नन्हीं सी बूँद... स्वार्थ के इस सूखे और कंटीले रेगिस्तान में अपने वजूद को बचानें की कोशिशों में जिस राह चली, वो राहें ही मेरे लिए लिए दलदली होती चली*... प्यार के नाम पर स्वार्थ को पाया और स्वार्थ ही अपनाया... मगर अब लौट चली इन राहों से, जब निस्वार्थ प्यार का तोहफा लेकर वो मेरे प्रेम सागर मेरे दर पर आया...  *कल्प कल्प का स्नेह बरसाता वो प्रेम का सागर बैठा है मेरे सामने... और चातक के समान प्यासी मैं आत्मा उस स्नेह की बूँद-बूँद को निरन्तर पिये जा रही हूँ*...

 

  *नयनों से अविरल स्नेह बरसाते स्नेह के सागर बाप मुझ लवलीन आत्मा से बोलें:-"स्नेह सरिता मेरी मीठी बच्ची... जन्म-जन्म की पुकार का प्रत्यक्ष फल ये परमात्म प्यार अब आपने पाया है*... ब्राह्मण जीवन के आधार परमात्म प्यार से तीनो मंजिलों को पार किया... *इस प्रेम में डूबकर क्या देहभान की विस्मृति हुई है? सर्वसबंधो का रस एक बाप में पाया है? और दुनियावी आकर्षणों से छुटकारा पाया... ?*"

 

_ ➳  *निस्वार्थ प्रेम से भरपूर हो कर दैहिक सम्बन्धों के मोहपाश से मुक्त मैं आत्मा रूहानी स्नेह सागर से बोली:-" मीठे बाबा... आपके अनोखे स्नेह ने सब कुछ सहज ही भूलाया है*... त्याग करना नही पडा... स्वतः ही त्याग  कराया है, चत्तियाँ लगी ये अन्तिम जन्म की जर्जर काया, क्या मोल रह गया इसका... बदले में में इसके जब ये चमचमाता फरिश्ता रूप पाया... *सबंध संस्कार दैवी हो रहे... जीवन में दिव्यता को पाया...*"

 

  *ईश्वरीय मर्यादाओं का कंगन बाँध कर हर बंधन से छुडाने वाले मुक्तिदाता बाप मुझ आत्मा से बोले:-*" सर्व सम्बन्धों का सुख मुझ बाप से पाने वाली मेरी मीठी बच्ची... निस्वार्थ प्रेम के लिए तरसती संसार की आत्माओं को भी अब *परमात्म स्नेह का अनुभव कराओं*... सदा ही स्नेह माँगने वालो की कतार में खडे इन स्नेह के प्यासों पर परमात्म स्नेह का मीठा झरना बन बरस जाओं... *दैहिक संबन्धों में बूँद बूँद स्नेह तलाशते इन प्यासों को परमात्म संबन्धों का अनुभव कराओं...*"

 

_ ➳  *एक बाप दूसरा न कोई इस स्मृति से सब कुछ विस्मृत करने वाली मैं आत्मा दिलाराम बाप से बोली:-"मीठे बाबा... आपकी स्मृति से सर्व समर्थियाँ पायी है मैने*... स्नेह सागर को स्वयं में समाँकर अब उसी के रूप में ढलती जा रही हूँ... *परमात्म स्नेह का ये झरना मेरे स्वरूप से बेहद में बरस रहा है... प्रकृति भी परमात्म प्रेम से भरपूर हो गयी है... इस कल्प वृक्ष का तना भी भरपूर हुआ, पत्ता पत्ता प्रभु प्रेम से हरष रहा है...*"

 

  *अव्यक्त रूप में बेहद के सेवाधारी विश्व कल्याणी बाप मुझ आत्मा से बोलें:- "समर्थ संकल्पों के द्वारा व्यर्थ का खाता समाप्त करने वाली मेरी होली हंस बच्ची!... अब ये प्यार शान्ति सुख की किरणें बेहद में फैलाओं*... अपने अन्तिम स्थिति के अन्तःवाहक स्वरूप से अब सबको उडती कला का अनुभव कराओं... *नाजुक समय की नाजुकता को पहचानों और एक एक सेकेन्ड का अभ्यास बढाओं... अपने शक्ति स्वरूप से शक्तिमान का दीदार कराओं...*"

 

_ ➳  *फालो फादर कर मनसा सेवा से कमजोरों में बल भरने वाली मैं आत्मा स्नेह सागर बापदादा से  बोली:-*" मीठे बाबा... आपके निस्वार्थ प्रेम ने मँगतों से देने वालों की कतार में खडा किया है... रोम रोम आपके स्नेह में डूबा है, *जो निस्वार्थ स्नेह आपसे पाया है अब औरों पर लुटा रही हूँ... इस असीम स्नेह का कण कण मैं आप समान मनसा सेवा से चुका रही हूँ*... स्नेह के अविरल झरने अब दोनो ओर से ही झर झर बह रहे है,.. और *मैं आत्मा इस बहते स्नेह के दरिया में फिर से डूबी जा रही हूँ*...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कर्मयोगी बनकर रहना है*"

 

_ ➳  अपने रूहानी पिता द्वारा सिखाई रूहानी यात्रा पर चलने के लिए मैं स्वयं को आत्मिक स्मृति में स्थित करती हूँ और रूह बन चल पड़ती हूँ अपने रूहानी बाप के पास उनकी सर्वशक्तियों से स्वयं को भरपूर करने के लिये। *अपने रूहानी शिव पिता के अनन्त प्रकाशमय स्वरूप को अपने सामने लाकर, मन बुद्धि रूपी नेत्रों से उनके अनुपम स्वरूप को निहारती, उनके प्रेम के रंग में रंगी मैं आत्मा जल्दी से जल्दी उनके पास पहुँच जाना चाहती हूँ* और जाकर उनके प्रेम की गहराई में डूब जाना चाहती हूँ। मेरे रूहानी पिता का प्यार मुझे अपनी ओर खींच रहा है और मैं अति तीव्र गति से ऊपर की ओर उड़ती जा रही हूँ।

 

_ ➳  सांसारिक दुनिया की हर वस्तु के आकर्षण से मुक्त, एक की लगन में मग्न, एक असीम आनन्दमयी स्थिति में स्थित मैं आत्मा *अब ऊपर की और उड़ते हुए आकाश को पार करती हूँ और उससे भी ऊपर अंतरिक्ष से परें सूक्ष्म लोक को भी पार कर उससे और ऊपर, अपनी मंजिल अर्थात अपने रूहानी शिव पिता की निराकारी दुनिया मे प्रवेश कर अपनी रूहानी यात्रा को समाप्त करती हूँ*। लाल प्रकाश से प्रकाशित, चैतन्य सितारों की जगमग से सजी, रूहों की इस निराकारी दुनिया स्वीट साइलेन्स होम में पहुँच कर मैं आत्मा एक गहन मीठी शांति का अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  अपने रूहानी बाप से रूहानी मिलन मनाकर मैं आत्मा असीम तृप्ति का अनुभव कर रही हूँ। बड़े प्यार से अपने पिता के अति सुंदर मनमोहक स्वरूप को निहारते हुए मैं धीरे - धीरे उनके समीप जा रही हूँ। *स्वयं को मैं अब अपने पिता की सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों के आगोश में समाया हुआ अनुभव कर रही हूँ*। ऐसा लग रहा है जैसे मैं बाबा में समाकर बाबा का ही रूप बन गई हूँ। यह समीपता मेरे अंदर मेरे रूहानी पिता की सर्वशक्तियों का बल भरकर मुझे असीम शक्तिशाली बना रही है। *स्वयं को मैं सर्वशक्तियों का एक शक्तिशाली पुंज अनुभव कर रही हूँ*।

 

_ ➳  अपनी रूहानी यात्रा का प्रतिफल अथाह शक्ति और असीम आनन्द के रूप में प्राप्त कर अब *मैं इस रूहानी यात्रा का मुख वापिस साकारी दुनिया की और मोड़ती हूँ और शक्तिशाली रूह बन, शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करने के लिए वापिस अपने साकार शरीर मे लौट आती हूँ*। किन्तु अपने रूहानी पिता के साथ मनाये रूहानी मिलन का सुखद अहसास अब भी मुझे उसी सुखमय स्थिति की अनुभूति करवा रहा है। *बाबा के निस्वार्थ प्रेम और स्नेह का माधुर्य मुझे बाबा की शिक्षाओं को जीवन मे धारण करने की शक्ति दे रहा है*।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण जीवन में हर कदम श्रीमत प्रमाण चलते हुए, बुद्धि से सम्पूर्ण समर्पण भाव को धारण कर, कर्मेन्द्रियों से हर कर्म करते बुद्धि को अब मैं केवल अपने शिव पिता पर ही एकाग्र रखती हूँ। *साकार सृष्टि पर, ड्रामा अनुसार अपना पार्ट बजाते, शरीर निर्वाह अर्थ हर कर्म करते, साकारी सो आकारी सो निराकारी इन तीन स्वरूपो की ड्रिल हर समय करते हुए, अब मैं मन को अथाह सुख और शांति का अनुभव करवाने वाली मन बुद्धि की इसी रूहानी यात्रा पर ही सदैव रहती हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं स्मृति के महत्व को जान अपनी श्रेष्ठ स्थिति बनाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं अविनाशी तिलकधारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा अच्छा-अच्छा सोचती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा सब अच्छा होते अनुभव करती हूँ  ।*

   *मैं सफलता मूर्त आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  *जब सर्वशक्तिमान् बाप साथ है तो सर्वशक्तिमान् के आगे अपवित्रता आ सकती हैनहीं आ सकती।* लेकिन आती तो है! तो आती फिर कहाँ से हैकोई और जगह हैचोर लोग जो होते हैं वो अपना स्पेशल गेट बना लेते हैं। चोर गेट होता है। तो *आपके पास भी छिपा हुआ चोर गेट तो नहीं हैचेक करो। नहीं तो माया आई कहाँ से?* ऊपर से आ गईअगर ऊपर से भी आ गई तो ऊपर ही खत्म हो जानी चाहिये।

➳ _ ➳  कोई छिपे हुए गेट से आती है जो आपको पता नहीं पड़ता है तो चेक करो कि माया ने कोई चोर गेट तो नहीं बनाकर रखा है? और गेट बनाती भी कैसे हैमालूम है? *आपके जो विशेष स्वभाव या संस्कार कमजोर होंगे तो वहीं माया अपना गेट बना देती है। क्योंकि जब कोई भी स्वभाव या संस्कार कमजोर है तो आप कितना भी गेट बन्द करोलेकिन कमजोर गेट हैतो माया तो जानीजाननहार है,उसको पता पड़ जाता है* कि ये गेट कमजोर हैइससे रास्ता मिल सकता है और मिलता भी है।

➳ _ ➳  *चलते-चलते अपवित्रता के संकल्प भी आते हैंबोल भी होताकर्म भी हो जाता है। तो गेट खुला हुआ है नातभी तो माया आई।* फिर साथ कैसे हुआकहने में तो कहते हो कि सर्वशक्तिमान् साथ है तो ये कमजोरी फिर कहाँ से आईकमजोरी रह सकती है? नहीं नातो क्यों रह जाती हैचाहे पवित्रता में कोई भी विकार हो, मानो लोभ हैलोभ सिर्फ खाने-पीने का नहीं होता। कई समझते हैं हमारे में पहनने, खाने या रहने का ऐसा तो कोई आकर्षण नहीं हैजो मिलता हैजो बनता हैउसमें चलते हैं। लेकिन जैसे आगे बढ़ते हैं तो माया लोभ भी रायल और सूक्ष्म रूप में लाती है।

➳ _ ➳   *मानो स्टूडेण्ट हैबहुत अच्छा निश्चयबुद्धिसेवाधारी है, सबमें अच्छा है लेकिन जब आगे बढ़ते हैं तो ये रायल लोभ आता है कि मैं इतना कुछ करता हूँसब रूप (तरह) से मददगार हूँ,* तन से, मन सेधन से और जिस समय चाहिये उस समय सेवा में हाजिर हो जाता हूँ फिर भी मेरा नाम कभी भी टीचर वर्णन नहीं करती कि ये जिज्ञासु बहुत अच्छा है। अगर मानों ये भी नहीं आवे तो फिर दूसरा रूप क्या होता हैअच्छानाम ले भी लिया तो *नाम सुनते-सुनते- मैं ही हूँमैं ही करता हूँमैं ही कर सकता हूँवो अभिमान के रूप में आ जायेगा।*

✺   *ड्रिल :-  "माया के रायल और सूक्ष्म रूप की चेकिंग करना"*

➳ _ ➳  मन बुद्धि रूपी विमान में बैठ मैं आत्मा पहुँच जाती हूँ *शांतिवन में... बाबा रूम में... संकल्पों विकल्पों की हलचल से दूर... शांति के सागर शिवबाबा के सामने...* अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ... शक्तियों के सागर अपने प्यारे पिता को एकटक निहार रही हूँ... उनसे निकल रही शांति की किरणों से भरपूर कर रही हूँ स्वयं को... 

➳ _ ➳  मैं बाबा से कहती हूँ... बाबा, जब सर्वशक्तिवान आप मेरे साथ हो तो माया चोर गेट बना कर कैसे आ सकती है... पर बाबा... *माया बड़ी दुस्तर है... मेरे ऊपर बहुत कड़ी निगरानी रखती है...* कभी एक सेकंड के लिये भी क्रोध का सूक्ष्म अंश आ जाता है... या किसी बात में थोड़ा सा देहभान आ जाता है तो माया बिना एक पल गवांये वार कर देती है...  

➳ _ ➳  *बाबा, जब मैं आपकी बन गई... पवित्रता का कंगन बांध लिया तो फिर संकल्प में... बोल में... कर्म में... अपवित्रता सूक्ष्म में भी क्यों आ जाती है... मैं और मेरापन क्यों आ जाता है...* बाबा... जब पवित्रता के सागर... आप स्वयं मेरे साथ हो तो फिर यह अपवित्रता क्यों... बाबा, मेरे मीठे बाबा... *अब मैं अपने हर संकल्प... हर बोल... हर कर्म... की सूक्ष्म चेकिंग करुँगी... अटेंशन रूपी पहरेदार को अपनी इन सूक्ष्म कमजोरियों पर कड़ी निगरानी रखने के लिये कहूँगी...*

➳ _ ➳  *माया की इन रॉयल और सूक्ष्म कमजोरियों पर काबू पाने के लिये मुझे परखने की... समाने की... सहन करने की... शक्तियों का बल जमा करना है... मैं और मेरेपन के सूक्ष्म अहंकार को समाप्त करना है...* पुराने स्वभाव और संस्कार के वंश के अंश पर जीत पहननी है... जहाँ "मैं" शब्द याद आये वहाँ बाबा... आप याद आओ... और जहाँ "मेरा" याद आये... वहाँ आपकी श्रीमत याद आये...

➳ _ ➳  बाबा के हाथ में अपना हाथ देकर... मैं बाबा से कहती हूँ... प्यारे बाबा... *आज मैं आपसे प्रतिज्ञा करती हूँ  मैं माया के इस चोर गेट को अटेंशन रूपी डबल लॉक द्वारा बंद करुँगी... और हर कदम पर आपकी श्रीमत पर चलकर सम्पूर्ण पावन बन माया के रॉयल और सूक्ष्म रूप की गहराई से चेकिंग करुँगी...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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