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 14 / 09 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बाप समान रहमदिल, दुःख हर्ता सुख कर्ता बनकर रहे ?*

 

➢➢ *अहंकार में आकर मियाँ मिठू तो नहीं बने ?*

 

➢➢ *संकल्पों के इशारों से सारी कारोबार चलाई ?*

 

➢➢ *दुःखधाम से किनारा किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे विदेही बापदादा को देह का आधार लेना पड़ता है, बच्चों को विदेही बनाने के लिए। ऐसे आप सभी जीवन में रहते, देह में रहते, विदेही आत्मा-स्थिति में स्थित हो इस देह द्वारा करावनहार बन करके कर्म कराओ। *यह देह करनहार है, आप देही करावनहार हो, इसी स्थिति को 'विदेही स्थिति' कहते हैं। इसी को ही फॉलो फादर कहा जाता है। बाप को फॉलो करने की स्थिति है सदा अशरीरी भव, विदेही भव, निराकारी भव!*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं होली हँस हूँ"*

 

  सदा होली हंस बन गये - ऐसा अनुभव करते हो? होली हंस हो ना! तो हंस क्या करता है? हंस का काम क्या होता है? (मोती चुगना) और दूसरा? दूध और पानी को अलग करना। *एक है ज्ञान रत्न चुगना अर्थात् धारण करना और दूसरी विशेषता है निर्णय शक्ति की विशेषता। दूध और पानी को अलग करना अर्थात् निर्णय शक्ति की विशेषता। जिसमें निर्णय शक्ति होगी वो कभी भी दूध की बजाय पानी नहीं धारण करेगा। दूध की वैल्यु पानी से ज्यादा है। तो दूध और पानी का अर्थ है व्यर्थ और समर्थ का निर्णय करना।* व्यर्थ को पानी समान कहते हैं और समर्थ को दूध समान कहते हैं। तो ऐसे होली हंस हो? निर्णय शक्ति अच्छी है? कि कभी पानी को दूध समझ लेते, कभी दूध को पानी समझ लेते? व्यर्थ को अच्छा समझ लें और समर्थ में बोर हो जायें। नहीं।

 

  तो होली हंस अर्थात् सदा स्वच्छ। हंस सदा स्वच्छ दिखाते हैं। स्वच्छता अर्थात् पवित्रता। तो अभी स्वच्छ बन गये ना। मैलापन निकल गया या अभी भी थोड़ा-थोड़ा है? थोड़ा-थोड़ा रह तो नहीं गया? कभी मैले के संग का रंग तो नहीं लग जाता? कभी-कभी मैले का असर होता है? तो स्वच्छता श्रेष्ठ है ना। मैला भी रखो और स्वच्छ भी रखो तो क्या पसन्द करेंगे? स्वच्छ पसन्द करेंगे या मैला भी पसन्द करेंगे? *तो सदा मन-बुद्धि स्वच्छ अर्थात् पवित्र। व्यर्थ की अपवित्रता भी नहीं। अगर व्यर्थ भी है तो सम्पूर्ण स्वच्छ नहीं कहेगे। तो व्यर्थ को समाप्त करना अर्थात् होलीहंस बनना।*

 

  *हर समय बुद्धि में ज्ञान रत्न चलते रहें, मनन चलता रहे। ज्ञान चलेगा तो व्यर्थ नहीं चलेगा। इसको कहा जाता है रत्न चुगना। व्यर्थ है पत्थर। कभी भी अगर व्यर्थ आता है तो दु:ख की लहर आती है ना। परेशान तो होते हो ना कि ये क्यों आया? तो पत्थर दु:ख देता है और रत्न खुशी देता है।* अगर किसी के हाथ में रत्न आ जाये तो परेशान होगा या खुश होगा? खुश होगा ना। अगर कोई पत्थर फ़ेक दे तो दु:ख होगा। तो बुद्धि द्वारा भी पत्थर ग्रहण नहीं करना। सदा ज्ञान रत्न ग्रहण करना। एक-एक रत्न की अनगिनत वैल्यु है! आपके पास कितने रत्न हैं? अनगिनत हैं ना! रत्नों से भरपूर हैं, खाली तो नहीं हैं? कभी भी बुद्धि को खाली नहीं रखो। कोई न कोई होम वर्क अपने आपको देते रहो।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अब तो घर जाना है? (कब जाना है?) *समय कभी भी बता के नहीं आयेगा, अचानक ही आयेगा।* जब समझेंगे समीप है तो नहीं आयेगा। जब समझने से थोडे अलबेले होंगे तो अचानक आयेगा।

 

✧  आने की निशानी अलबेलेपन वाले अलबेलेपन में आयेंगे, नहीं तो नम्बर कैसे बनेंगे? फिर तो सब कहें - हम भी अष्ट हैं, हम भी पास हैं। लेकिन थोडा बहुत अचानक होने से ही नम्बर होंगे। बाकी *जो महारथी हैं उन्हों को टचिंग आयेगी।*

 

✧  लेकिन बाप नहीं बतायेगा। *टचिंग ऐसे ही आयेगी जैसे बाप ने सुनाया।* लेकिन बाप कभी एनाउन्स नहीं करेंगे। एक सेकण्ड पहले भी नहीं कहेंगे कि एक सेकण्ड बाद होना है। यह भी नहीं कहेंगे। नम्बरवार बनने हैं, इसलिए यह हिसाब रखा हुआ है। अच्छा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ और कुछ भी याद न हो, हर समय एक ही बात याद हो 'मेरा बाबा'। *क्योंकि मन व बुद्धि कहाँ जाती है? जहाँ मेरा-पन होता है। अगर शरीर-भान में भी आते हो तो क्यों आते हो? क्योंकि मेरा-पन है। अगर 'मेरा बाबा' हो जाता तो स्वत: ही मेरे तरफ बुद्धि जायेगी। सहज साधन है - 'मेरा बाबा'।* मेरा-पन न चाहते हुए भी याद आता है। जैसे-चाहते नहीं हो कि शरीर याद आवे, लेकिन क्यों याद आता है? मेरा-पन खीचता है ना, न चाहते भी खींचता है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺  *"ड्रिल :-  अपना सच्चा-सच्चा चार्ट रखना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा के कमरे में बाबा के फोटो को निहारती हुई स्वचिन्तन करती हूँ...* अपने भाग्य को देख रही हूँ... मैं कोटों में कोई, कोई में भी कोई आत्मा हूँ... जो भगवान ने मुझे चुनकर अपना बनाया... इतना लाड प्यार देकर... शिक्षाएं देकर मेरा भाग्य बना रहे हैं... स्वर्ग की बादशाही सौगात में लेकर आएं हैं... ऐसे प्यारे ते प्यारे बाबा को प्यार से पुकारती हूँ... तुरंत बाबा सम्मुख हाजिर हो जाते हैं... 

 

   *प्यारे बाबा मुझे देख मुस्कुराते हुए कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वरीय प्यार में सांसो को डुबो दो... हर लम्हा यादो से रंग दो... ईश्वर पिता को नये नये तरीको से प्यार करो... अपनी यादो का चार्ट भी रखो... जितना अथक बन यादो में गहरे डूबोगे उतना ही गहरा प्यार का प्रतिफल भी पाओगे... *बाप को याद करने की भिन्न भिन्न युक्तियाँ रचो पुरुषार्थ का चार्ट रखो थको नही तूफानों में अडोल रहो"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा एकटक बाबा को निहारते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा मै आत्मा अब तक झूठे नातो को याद किया करती थी अब विश्व पिता को यादकर जीवन को महान भाग्य में रंग रही हूँ... *हर पल अचल अडोल होकर मीठी मीठी यादो में डूबी हूँ...*

 

   *मीठे बाबा सच्ची कमाई का रहस्य समझाते हुए कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... यह ईश्वर पिता के साथ का समय कितना खुबसूरत है जितना चाहो उतना महान भाग्य बाँहों में भर लो... तो इस महान समय का पूरा फायदा उठाओ... हर सेकण्ड सच्ची कमाई में लगाओ... *अथक बन यादो का चार्ट प्यारे बाबा को रोज थमाओ... और विजयी बन मुस्कराओ..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपने भाग्य पर नाज करती हुई कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा कितनी भाग्यशाली हूँ कहाँ कब मैंने ऐसा सोचा था... की भगवान यूँ मिल जायेगा और मेरा सोया सा भाग्य जगायेगा...* मेरे मटमैलेपन को अपने मीठे प्यार में धोकर यूँ उजला बना दमकायेगा...

 

   *प्यारे बाबा मीठी दृष्टि देते हुए कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... इस वरदानी ईश्वर पिता के साथ के समय को हर साँस में समाओ... हर पल यादो में भीग जाओ... मन को नयी युक्तियों से रिझाकर ईश्वरीय यादो में लगाओ और सच्ची कमाई को दामन में सजाओ... *ईश्वर पिता के साथ की ऊँगली पकड़कर हर तूफान को तिनका बना दो...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा के प्यार में मगन होकर कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... आप भगवान होकर मेरी फ़िक्र में खपे है तो मै आत्मा भी सचेत बन सच्ची कमाई में जुटी हूँ... *आपकी मीठी यादो में गहरा सच्चा सुख पाकर सदा की आनन्दित हो रही हूँ... और विघ्नो में विजयी बन मुस्करा रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- संगदोष से अपनी बहुत - बहुत सम्भाल करनी है*"

 

_ ➳  "संग तारे, कुसंग बौरे" मुरली में आने वाली इस कहावत को स्मृति में ला कर मैं विचार करती हूँ कि आज दिन तक आसुरी दुनिया के आसुरी मनुष्यों का संग करते - करते मेरी बुद्धि कितनी मलीन हो गई थी जो अपने ही आत्मा भाईयों के गुणों को ना देख उनके अवगुणों को देख उनकी निंदा करने लगी थी। किन्तु *भगवान बाप ने आ कर, अपना सत्य संग देकर, मुझ पत्थर बुद्धि को पारस बुद्धि बना दिया। ज्ञान का दिव्य चक्षु दे कर, मुझ आत्मा को होली हंस बना कर, अवगुण रूपी पत्थर को छोड गुण रूपी मोती चुगना सिखा दिया*।

 

_ ➳  ऐसे होली हंस बनाने वाले अपने प्यारे मीठे शिव बाबा का शुक्रिया अदा करने के लिए, अब मैं अपने निराकार ज्योति बिंदु स्वरूप में स्थित होती हूँ और *मन बुद्धि की उस मीठी रूहानी यात्रा पर चल पड़ती हूँ जो सीधी मुझे मेरे ज्ञान सूर्य अति मीठे, अति प्यारे, सिकीलधे बाबा तक ले जाती है*। मन बुद्धि की यात्रा पर चलते, अनेक सुंदर, अद्भुत अनुभूतियाँ करते, मैं अपने निराकार बाबा के पास उनकी निराकारी दुनिया की ओर बढ़ रही हूँ।

 

_ ➳  आकाश मण्डल को पार करके, सूक्ष्म लोक को पार करते हुए अब मैं स्वयं को अपनी रूहानी मंजिल के बिल्कुल समीप अनुभव कर रही हूँ। *मेरे शिव पिता की शक्तिशाली किरणों का एक दिव्य आभामंडल मुझे मेरे चारों और दिखाई दे रहा है*। इस आभामंडल के बिल्कुल बीचों - बीच गहन आनन्द की अनुभूति करते हुए मैं अपने शिव पिता के अति समीप जा रही हूँ। *समीपता की इस स्थिति में सिवाय दो बिंदुओं के और कुछ भी मुझे दिखाई नही दे रहा*। मेरे अति समीप ज्योति बिंदु शिवबाबा और उनके बिल्कुल सामने मैं ज्योति बिंदु आत्मा।

 

_ ➳  अपने निराकार ज्योति बिंदु बाबा की किरणों के साये में मैं स्वयं को देख रही हूँ। उनकी शक्तिशाली किरणों रूपी बाहों में समा कर मैं उनकी सर्वशक्तियों को स्वयं में भरता हुआ महसूस कर रही हूँ। *बाबा की शक्तिशाली किरणों का तेज प्रवाह निरन्तर मुझ आत्मा में प्रवाहित हो कर, मुझे भी बाप समान बना रहा है*। सर्वशक्तिवान बाप की सन्तान स्वयं को मैं मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा के रूप में देख रही हूँ और स्वयं को बहुत ही शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ। *परमात्म संग का रंग स्वयं पर चढ़ा हुआ मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ*।

 

_ ➳  परमात्म शक्तियों से स्वयं को भरपूर करके और अपने शिव पिता परमात्मा के अविनाशी संग के रंग में स्वयं को रंग कर अब मैं वापिस साकारी दुनिया की ओर लौट रही हूँ । मेरे शिव पिता परमात्मा के अविनाशी संग का रंग अब मुझे आसुरी दुनिया के आसुरी मनुष्यो के संग से दूर कर रहा है। *आसुरी दुनिया और आसुरी मनुष्यों के बीच रहते हुए भी उनकी आसुरी वृति का अब मुझ पर कोई प्रभाव नही पड़ता*। निंदा, चुगली करने वालों के संग से दूर, केवल अपने शिव पिता परमात्मा के संग में सदा रहते हुए अब मैं सदा परमात्म प्रेम की मस्ती में खोई रहती हूँ और हर प्रकार के कुसंग से बची रहती हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं संकल्प के इशारों से सारी कारोबार चलाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं लाइट की ताजधारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा इस दु:खधाम से किनारा कर लेती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा दुख की लहर आने से सदैव मुक्त हूँ  ।*

   *मैं सुख स्वरूप आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *ब्राह्मण जीवन अर्थात् खुशी की जीवन।* कभी-कभी बापदादा देखते हैंकोई-कोई के चेहरे जो होते हैं ना वह थोड़ा सा.... क्या होता हैअच्छी तरह से जानते हैंतभी हंसते हैं। तो बापदादा को ऐसा चेहरा देख रहम भी आता और थोड़ा सा आश्चर्य भी लगता। मेरे बच्चे और उदास! हो सकता है क्यानहीं ना! *उदास अर्थात् माया के दास। लेकिन आप तो मास्टर मायापति हो। माया आपके आगे क्या हैचींटी भी नहीं हैमरी हुई चींटी। दूर से लगता है जिंदा है लेकिन होती मरी हुई है।* सिर्फ दूर से परखने की शक्ति चाहिए। जैसे बाप की नालेज विस्तार से जानते हो नाऐसे माया के भी बहुरूपी रूप की पहचाननालेज अच्छी तरह से धारण कर लो। वह सिर्फ डराती हैजैसे छोटे बच्चे होते हैं ना तो उनको माँ बाप निर्भय बनाने के लिए डराते हैं। कुछ करेंगे नहींजानबूझकर डराने के लिए करते हैं।

 

 _ ➳  ऐसे माया भी अपना बनाने के लिए बहुरूप धारण करती है। जब बहुरूप धारण करती है तो आप भी बहुरूपी बन उसको परख लो। परख नहीं सकते हैं नातो क्या खेल करते होयुद्ध करने शुरू कर देते हो हायमाया आ गई! और युद्ध करने से बुद्धि, मन थक जाता है। फिर थकावट से क्या कहते होमाया बड़ी प्रबल हैमाया बड़ी तेज है। कुछ भी नहीं है। *आपकी कमजोरी भिन्न-भिन्न माया के रूप बन जाती है। तो बापदादा सदा हर एक बच्चे को खुशनसीब के नशे में, खुशनुमा चेहरे में और खुशी की खुराक से तन्दरूस्त और सदा खुशी के खजानों से सम्पन्न देखने चाहते हैं।*       

 

✺   *ड्रिल :-  "माया को मरी हुई चींटी समझ सदा खुशनसीब के नशे में रहने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा एकांत में शांत स्थिति में बैठी हुई... अपनी जीवन यात्रा पर एक नजर दौड़ाती हूँ... मैं देख रही हूँ कि जीवन यात्रा में जो भी खूबसूरत पल आये... भगवान हर पल, हर क्षण मेरे साथ थे... और जीवन के चैलेंजिंग क्षणों में मैं आत्मा... स्वयं को ईश्वर की गोदी में महफूज देख रही हूँ... यह सब देख कर *ईश्वर के प्रति मेरे मन में अगाध स्नेह उमड़ रहा है... ईश्वरीय स्नेह में मेरे नयन भीग रहे हैं...*

 

 _ ➳  प्रभु स्नेह में भीगी हुई मैं आत्मा... अपने प्यारे शिवबाबा को अपने बिल्कुल समीप देख रही हूँ... *उनकी शक्तियों का, प्यार का जल अजस्त्र धारा की तरह मुझ पर बरसता जा रहा है... मैं आत्मा ईश्वरीय स्नेह में डूबती जा रही हूँ*... मैं परमात्म प्यार से सराबोर होती जा रही हूँ... मैं स्वयं को ईश्वरीय रंग में रंगा हुआ देख रही हूँ...  

 

 _ ➳  कितना सुंदर है मेरा यह मरजीवा जन्म... *मेरा यह ब्राह्मण जीवन खुशियों से भरा जीवन है... मैं आत्मा बाबा की शक्तियों और सहयोग से... माया के हर रूप पर विजय प्राप्त करती जा रही हूँ... मैं मास्टर मायापति बन रही हूँ...* माया कैसा भी विकराल रुप धारण करके आवे... लेकिन मुछ आत्मा को हलचल में नहीं ला सकती... क्योंकि सर्वशक्तिमान बाबा मेरे साथ है... उनके साथ से हर क्षण मेरी विजय होती जा रही है... मैं आत्मा मायाजीत बन रही हूँ...

 

 _ ➳  बाबा अपनी सर्व शक्तियों के खजानों से मुझे भरपूर कर रहे हैं... मीठे बाबा ने अपनी समस्त शक्तियां मुझे दे दी हैं... माया तो मरी हुई चींटी के समान निर्जीव बन गई है... *बाबा से मुझ आत्मा में परखने की शक्ति संपूर्ण रूप में समाती जा रही है... मुझ आत्मा को ज्ञान की गुह्य बातें स्पष्ट हो रही हैं... साथ ही माया के विविध रूपों की भी स्पष्ट परख, स्पष्ट पहचान होती जा रही है*... माया तो सिर्फ डराने के लिए आती है, वास्तव में उसमें कोई भी शक्ति नहीं है...

 

 _ ➳  मैं परख शक्ति के द्वारा माया के हर रूप को परख पा रही हूँ... हर कमजोरी से स्वयं को मुक्त अनुभव कर रही हूँ... वह कमजोरी ही माया के विभिन्न रुप धारण कर आती थी और मैं आत्मा उसे युद्ध करने में अपनी शक्तियां गंवा रही थी, मन-बुद्धि इस युद्ध में शिथिल होती जा रही थी... लेकिन अब *हर प्रकार की कमजोरी पर जीत पाकर मैं आत्मा... अपनी खुशनसीब स्थिति में हूँ... अपने श्रेष्ठ भाग्य, श्रेष्ठ प्राप्तियों के गीत गुनगुना रही हूँ... खुशी की खुराक से मैं आत्मा तंदुरुस्त हो रही हूँ... खुशी के खजानों से भरपूर हो रही हूँ...* अपनी इस खुशकिस्मत अवस्था में खुशनुमा चेहरे और चलन से... सर्व आत्माओं को खुशी का खजाना बांटती जा रही हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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