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 14 / 10 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कर्म करते भी एक माशूक की याद में रहे ?*

 

➢➢ *मनुष्य से देवता बनने की म्हणत की ?*

 

➢➢ *जहां के नूर बन भक्तो को नज़र से निहाल किया ?*

 

➢➢ *निर्मल बन सफलता को प्राप्त किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *किसी भी प्रकार का देह का, सम्बन्ध का, वैभवों का बन्धन अपनी ओर आकर्षित न करे, ऐसे स्वतन्त्र बनो इसको ही कहा जाता है-बाप-समान कर्मातीत स्थिति।* प्रैक्टिस करो अभी-अभी कर्मयोगी, अभी-अभी कर्मातीत स्टेज।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं डबल लाइट फरिश्ता हूँ"*

 

  अपने को सदा डबल लाइट अनुभव करते हो? *डबल अर्थात् फरिश्ता और फरिश्ते की निशानी है - उनका कोई भी देह और देहधारियों से रिश्ता नहीं अर्थात् मन का लगाव नहीं। तो सदा फरिश्ते होकर हर कार्य करते हो? क्योंकि फरिश्तों का पाँव सदा ही ऊंचा रहता है, धरनी पर नहीं रहता। धरनी से ऊंचा अर्थात् देह-भान की स्मृति से ऊंचा।* ऐसे फरिश्ते बने हो? देह और देह की दुनिया दोनों का अनुभव अच्छी तरह से कर लिया है ना?

 

  तो जब अनुभव कर लिया तो अनुभव करने के बाद अभी फिर से देह व देह की दुनिया में बुद्धि जा सकती है? *देह और देह की दुनिया की स्मृति से ऊंचा रहने वाले फरिश्ते बनो। फरिश्ते अर्थात् सर्व बन्धनों से मुक्त। तो सब बन्धन समाप्त हुए या अभी समाप्त करेंगे? दुनिया वालों को तो कहते हो कि 'अब नहीं तो कब नहीं'।* यह पहले अपने को कहते या दूसरों को ही?

 

  दूसरों को कहना अर्थात् पहले अपने को कहना। जब किसी से बात करते हो तो पहले कौन सुनता है? पहले अपने कान सुनते हैं ना। *तो किसी को भी कहना अर्थात् पहले अपने आप को कहना। तो सदा हर कार्य में 'अब' करने वाले आगे बढ़ेंगे। अगर 'कब' पर छोड़ेंगे तो नम्बर आगे नहीं ले सकेंगे, पीछे नम्बर में आयेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सभी अपने को इस समय भी तख्तनशीन आत्माएँ अनुभव करते हो? डबल तख्त है या सिंगल? आत्मा का अकाल

तख्त भी याद है और दिल तख्त भी याद है। अगर अकाल तख्त को भूलते हो तो बॉडी कानशेस में आते हो। फिर परवश हो जाते हो। *सदैव यही स्मृति रखो कि मैं इस समय इस शरीर का मालिक हूँ।* तो मालिक अपनी रचना के वश कैसे हो सकता है?

 

✧  अगर मालिक अपनी रचना के वश हो गया तो मोहताज हो गया ना! तो अभ्यास करो और कर्म करते हुए बीच-बीच में चेक करो कि मैं मालिक-पन की सीट पर सेट हूँ? या नीचे तो नहीं आ जाता? सिर्फ रात को चेक नहीं करो। *कर्म करते बीच-बीच में चेक करो।* वैसे भी कहते हैं कि कर्म करने से पहले सोचो, फिर करो।

 

✧  ऐसे नहीं कि पहले करो, फिर सोची। फिर निरंतर मालिक-पन की स्मृति और नशे में रहेंगे। संगमयुग पर बाप आकर मालिक-पन की सीट पर सेट करता है। *स्वयं भगवान आपको स्थिति की सीट पर बिठाता है। तो बैठना चाहिए ना!* अच्छा। (पार्टियों के साथ)

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ सेकण्ड में बिन्दी स्वरूप बन मन-बुद्धि को एकाग्र करने का अभ्यास बार-बार करो। स्टॉप कहा और सेकण्ड में व्यर्थ देह-भान से मन-बुद्धि एकाग्र हो जाए। ऐसी कण्ट्रोलिंग पावर सारे दिन में यूज करके देखो। *ऐसे नही आर्डर करो - कण्ट्रोल और दो मिनट के बाद कण्ट्रोल हो, ५ मिनट के बाद कण्ट्रोल हो, इसलिए बीच-बीच में कण्ट्रोलिंग पावर को यूज करके देखते जाओ। सेकण्ड में होता है, मिनट में होता है, ज्यादा मिनट में होता है, यह सब चेक करते चलो।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- आत्म-अभिमानी बनने की मेहनत करना"*

 

_ ➳  अमृतवेला के मनमोहक मिलन का आनंद ले, *बाबा से देही अभिमानी बन मिलन कर... मैं आत्मा बहुत हल्का महसूस कर रही हूँ... बाबा ने मुझे गले लगा कर पवित्रता, सुख, शांति का वर्सा दिया हैं* ... कल्प कल्प से भटकती मुझ आत्मा को बाप ने अपना बना कर... हर तरह से तृप्त कर दिया हैं... भगवान के दिल की रानी बन मैं अपने भाग्य पर बलिहार जा रही हूँ... *देही अभिमानी बना कर बाप ने खुद से मिलने का रास्ता बता दिया हैं*... मैं आत्मा अपने आत्मिक रूप मे स्थित हो कर परमधाम, बाप से देही अभिमानी स्थिति मे रह कर मिलने जा रही हूँ...

 

  *मेरा पिता तो मेरे इन्तजार में ही बैठा था... मुझ पर अपनी प्रखर किरणों का सुख औऱ शांति का झरना डालते हुए बाबा बोले* :-"मेरे लाडले बच्चे आओ... अपनी देही अभिमानी स्थिति को भरपूर करो... तुम्हें इस अवस्था मे ही हर समय रहना हैं... *शरीर भान को दूर करना हैं... ये देही अभिमानी अवस्था ही तुम्हें पवित्रता, सुख, शांति के वरसे के लायक बना रही हैं* ...तुम्हें सम्पूर्ण देही अभिमानी बनना है..."

 

_ ➳  *इतने बड़े वरसे की मालिक बनी मै आत्मा अपने भाग्य पर मन ही मन मुस्कुराते हुए अपने प्यारे बाप को कहती हूँ* :-" मेरे बाबा... मै आत्मा कुछ भी नही जानती थी... *आपने आकर मुझे अपना बनाया... आत्मा का पाठ पढ़ा कर पवित्रता, सुख, शांति का वर्सा दिया... मेरा भाग्य चमकाया... इतना प्यार बरसाया की मैं आत्मा धन्य धन्य हो गई* ... इतनी बड़ी मिलकियत की रानी बना दिया..."

 

  *बाबा मेरे प्यार में डूबे हुए सत्यवचन सुनकर अपनी किरणों से और भी प्यार बरसाते हुए कहते हैं* :-"मेरे प्यारे, मेरे वरसे के हकदार बच्चे... कल्प पहले भी मैंने तुम्हें ही चुना था... *तुम ही कल्प कल्प से देही अभिमानी बन कर वर्सा ले रहे हो... कभी भी अपनी इस अवस्था को मत छोड़ना... बाप पर पूरा पूरा बलिहार जाना है*... अपना पूरा वर्सा लेना है..."

 

_ ➳  *बाबा के प्यार में सराबोर होती मै आत्मा भाव विभोर हो अपने न्यारे प्यारे बाबा को कहती हूँ* :-"मेरे बाबा, प्यारे बाबा... आपने आ कर तो मुझ पतित आत्मा को पावन बना दिया... *परमपिता का साथ औऱ सिर पर आपका हाथ... इस अहसास ने तो मुझ आत्मा में बल भर दिया हैं... देही अभिमानी बन मैं आत्मा अलौकिक आंनद में रहती हूँ* ..."

 

  *बाबा मुस्कुराते हुए मुझ आत्मा को बड़े प्यार से देखते हुए कहते है* :-"वरसे के अधिकारी बच्चे... *तुम इस संगम युग पर देही अभिमानी अवस्था मे रहकर... जन्नत के नजारे लूटते हो... कभी भी बाप को छोड़ना नही* ... बाप तुम्हें वर्सा देंने, स्वर्ग में ले जाने ही तो आता हैं... आत्मा का पाठ ही तो पढ़ाने आता हैं... *तुम्हें आत्मिक स्थिति में स्थित रहकर पवित्रता, शांति, सुख का पूरा वर्सा लेना हैं* ..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा का सगा बच्चा बन, वरसे की अधिकारी आत्मा बन बहुत खुश होकर बाबा को कहती हूँ* :- "मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपसे वायदा करती हूँ... *मैं आपकी अधिकारी आत्मा बन अन्य आत्माओ को भी... अधिकारी बना रही हूँ... जो आत्मिक सत्य मैने जाना है... जो वर्सा मैने प्राप्त किया हैं... सबको उसकी खुशबू दे रही हूं* ... देही अभिमानी अवस्था को पक्का करती मै आत्मा... वापिस अपने लौकिक देह मे प्रवेश करती हूँ..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बुद्धि को पवित्र बनाने के लिए याद की यात्रा में मस्त रहना है*"

 

_ ➳  कर्मयोगी बन, चलते फिरते बुध्दि का योग अपने शिव पिता परमात्मा के साथ लगाकर, स्वयं को उनकी सर्वशक्तियों की शीतल छाया के नीचे अनुभव करते मैं बड़ी सहजता से हर कर्म कर रही हूँ। *बाबा की याद मेरे अंदर बल भर रही है जिससे बिना मेहनत और थकावट के हर कार्य बड़ी ही सहज रीति से और स्वत: ही सफलतापूर्वक संपन्न हो रहा है*। हर कर्म में भगवान को अपना साथी बना कर, कदम - कदम पर उनकी मदद और उनके साथ का अनुभव मेरे अंदर हर पल एक नई स्फूर्ति और ऊर्जा का संचार करता रहता है। 

 

_ ➳  ऐसे बाबा की याद में रह शरीर निर्वाह अर्थ हर रोज के अपने दैनिक कार्यो को सम्पन्न करके जैसे ही मैं कर्तव्यमुक्त होती हूँ। अपने भगवान बाप का दिल से शुक्रिया अदा करते हुए उनकी दिल को सुकून देने वाली अति मीठी याद में बैठ जाती हूँ। *अपनी पलको को हौले से बंद कर, अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की स्मृति में खोई मैं स्वयं से ही बातें कर रही हूँ कि कितनी महान सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा जो मुझे हर पल भगवान का संग मिलता रहता है*। कभी सिर्फ उनके एक दर्शन मात्र की मैं प्यासी थी और आज वो भगवान मेरे हर कर्म में मेरा सहयोगी है। 

 

_ ➳  "वाह मैं आत्मा वाह" "वाह मेरा भाग्य वाह" ऐसे मन ही मन वाह - वाह के गीत गाते हुए मैं मनमनाभव होकर अपने मन को सभी संकल्पो, विकल्पों से हटाकर उस एक अपने भगवान साथी पर एकाग्र करती हूँ। *एक पल के लिए मुझे अनुभव होता है जैसे बापदादा मेरे सामने हैं। अपनी पलको को मैं जैसे ही खोलती हूँ अपने सामने लाइट माइट स्वरूप में बापदादा को बैठे हुए देखती हूँ*। बापदादा की बहुत तेज लाइट और माइट मेरे ऊपर पड़ रही है जो मुझे लाइट माइट स्थिति में स्थित कर रही है।

 

_ ➳  अपने साकार शरीर मे से एक अति सूक्ष्म लाइट का फ़रिश्ता मैं निकलता हुआ देख रही हूँ। *बापदादा की लाइट माइट मुझ नन्हे फ़रिश्ते को अपनी ओर खींच रही हैं। मैं नन्हा फ़रिश्ता आगे बढ़ता हूँ और जाकर बापदादा की गोद मे बैठ जाता हूँ*। अपने प्यार की शीतल छाँव में बिठाकर बापदादा अपना सारा स्नेह मेरे ऊपर उड़ेल रहें हैं। अपनी गोद मे मुझे लिटाकर, बड़े प्यार से अपना हाथ मेरे सिर पर थपथपाकर बाबा मुझे मीठी लोरी सुना रहें हैं। *ऐसा लग रहा है जैसे मेरी पलकें बंद हो रही हैं और थोड़ी देर के लिए मीठी निंद्रा की स्थिति में जाकर मैं गहन सुकून का अनुभव कर रही हूँ*। 

 

_ ➳  क्षण भर की इस मीठी निंद्रा से जगते ही मैं स्वयं को फिर से अपने ब्राह्मण स्वरूप में देखती हूँ। किन्तु अब मैं स्वयं को बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूँ। *बाबा की गोद मे विश्राम करने के  इस अति खूबसूरत सुखद अहसास ने मुझे बहुत ही एनर्जेटिक बना दिया है*। जैसे लौकिक रीति से भी एक साधारण मनुष्य कर्म करते - करते जब थक जाता है तो थोड़ी देर विश्राम कर लेता है ताकि दोबारा कर्म करने की शक्ति उसमे आ जाए। ऐसे ही बाबा की गोदी में लेटने के इस एक सेकण्ड के अनुभव ने मुझमे जैसे असीम बल भर दिया है। *इस अति मीठे सुखद एहसास के साथ, स्वयं को पहले से कई गुणा अधिक बलशाली अनुभव करके मैं उठती हूँ और फिर से कर्म योगी बन कर्म करने लग जाती हूँ*। 

 

_ ➳  हर कर्म बाबा की याद में रह कर करने से कर्म का बोझ अब मुझे भारी नही बनाता बल्कि बाबा की याद, कर्म करते भी कर्म के बन्धन से मुझे मुक्त रख, सदा हल्केपन का अनुभव करवाती है। *चलते -  फिरते कर्म करते बीच - बीच मे शरीर से डिटैच हो कर अपने प्यारे बाबा की सर्वशक्तियों की किरणों रूपी गोद मे बैठ विश्राम करना और उनकी शक्तियों से भरपूर हो कर, शक्तिशाली बन फिर से कर्म में लग जाना, यही अभ्यास हर समय करते हुए, हर कर्म को मैं बड़ी सहजता से सम्पन्न कर लेती हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं जहान के नूर बन भक्तों को नजरों से निहाल करने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं दर्शनीय मूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा निर्मानता की निशानी निर्मल स्वभाव को धारण करती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा सदा निर्मल बन कर सफलता प्राप्त करती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा सफलतामूर्त हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *अभी से विदेही स्थिति का बहुत अनुभव चाहिए। जो भी परिस्थितियां आ रही हैं और आने वाली हैं उसमें विदेही स्थिति का अभ्यास बहुत चाहिए।* इसलिए और सभी बातों को छोड़ यह तो नहीं होगायह तो नहीं होगा। क्या होगाइस क्वेश्चन को छोड़ दो। *विदेही अभ्यास वाले बच्चों को कोई भी परिस्थिति वा कोई भी हलचल प्रभाव नहीं डाल सकती।* चाहे प्रकृति के पांचों ही तत्व अच्छी तरह से हिलाने की कोशिश करेंगे परन्तु विदेही अवस्था की अभ्यासी आत्मा बिल्कुल ऐसा अचल-अडोल पास विद आनर होगा जो सब बातें पास हो जायेंगी लेकिन वह ब्रह्मा बाप के समान पास विद आनर का सबूत रहेगा।

 

 _ ➳  बापदादा समय प्रति समय इशारे देते भी हैं और देते रहेंगे। आप सोचते भी होप्लैन बनाते भी होबनाओ। भले सोचो लेकिन क्या होगा!... उस आश्चर्यवत होकर नहीं। *विदेही, साक्षी बन सोचो लेकिन सोचा, प्लैन बनाया और सेकण्ड में प्लैन स्थिति बनाते चलो।* अभी आवश्यकता स्थिति की है। *यह विदेही स्थिति परिस्थिति को बहुत सहज पार कर लेगी। जैसे बादल आयेचले गये।* और विदेही, अचल-अडोल हो खेल देख रहे हैं। *अभी लास्ट समय को सोचते हो लेकिन लास्ट स्थिति को सोचो।*    

 

✺   *ड्रिल :-  "लास्ट स्थिति के लिए विदेही स्थिति का अभ्यास करना"*

 

 _ ➳  आज जब मैं आत्मा बाबा को याद कर रही थी तो बाबा ने अनुभव कराया कि बच्चे जब से तुम्हारा नया जन्म हुआ ये मरजीवा जन्म हुआ है तब से *अपने को विदेही आत्मा अनुभव करने का बहुत काल का अनुभव चाहिए...* मैं आत्मा बाबा की याद में विदेही बनती जा रही हूँ... देह का भान भूलता जा रहा है... मैं एकदम हल्की हो चुकी हूँ...

 

 _ ➳  जैसे जैसे मैं आत्मा आगे बढ़ती जा रही हूँ तो देख रही हूँ कि *जब तक बहुत काल का विदेही स्थिति का अनुभव नही होगा तो अंत में आत्मिक स्थिति का अनुभव नही कर पाएंगे...* और हलचल में आ जाएंगे... फिर मैं बाबा की याद में विदेही होती जा रही हूँ...

 

 _ ➳  फिर मैं आत्मा ये फील कर रही हूँ कि जो भी परिस्थिति या हलचल आ रही है या आने वाली है उन्हें मैं विदेही स्थिति से पार करती जा रही हूँ... बाबा भी मेरे साथ है हम दोनों का एक अटूट कनेक्शन है... *मैं आत्मा और सब बातों को छोड़ कि क्या होगा कैसे होगा आगे बढ़ती जा रही हूँ*... इस देह ओर देह के संबंधों को भूलतीं जा रही हूँ...

 

 _ ➳  मुझ आत्मा का विदेही पन का बहुत काल का अभ्यास हैं... जिसके कारण कोई भी परिस्थिति और हलचल का मुझ आत्मा पर कोई प्रभाव नही पड़ रहा है... बस मैं आत्मा बाबा की याद में मग्न हूँ... *मैं आत्मा देख रही हूँ कि प्रकृति के पांचों तत्व अपने विनाशी स्वरूप में हैं फिर भी मैं आत्मा विदेही बन सब साक्षी होकर देख रही हूँ*... और प्रकृति के पांचो तत्वों को सकाश दे रही हूँ.. और इस हलचल की स्थिति में भी मुझ आत्मा पर कोई प्रभाव नही पड़ रहा है...

 

 _ ➳  विदेही स्थिति में बाबा के सूक्ष्म इशारे मुझे अनुभव हो रहे है... और इन इशारों से मैं आत्मा और आत्माओं के साथ प्लान बना रही हूँ... और अचल अडोल स्थिति बनती जा रही है... *मैं आत्मा आश्चर्यवत नही हूँ कि ये क्या हो रहा है क्यों हो रहा है... क्योंकि बाबा ने पहले की ड्रामा के राज को स्पष्ट किया है... आदि से अंत तक का ज्ञान मुझ आत्मा में है*... और हर सेकेण्ड बाबा की याद से विदेही बनती जा रही हूँ... और जो भी परिस्थिति मेरे सामने आती जा रही हैं उसे मैं आत्मा ड्रामा के एक सीन की तरह देखते आगे बढ़ती जा रही हूँ... मैं आत्मा देख रही हूँ कि ये अंतिम समय है... प्रकृति अपने विनाशी स्वरूप में है... खून की नदियां बह रही है... लेकिन *मैं आत्मा अपने लास्ट स्टेज अपने फ़रिश्ता स्वरूप में ये सब देख रही हूँ...और उड़कर बाबा के गोद में समा चुकी हूँ*...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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