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 14 / 10 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *आवेश में तो नहीं आये ?*

 

➢➢ *हड्डी सर्विस की ?*

 

➢➢ *सेवा की लगन द्वारा लोकिक को अलोकिक प्रवृति में परिवर्तित किया ?*

 

➢➢ *मन बुधी को बाप के आगे समर्पित किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *किसी भी प्रकार का देह का, सम्बन्ध का, वैभवों का बन्धन अपनी ओर आकर्षित न करे, ऐसे स्वतन्त्र बनो इसको ही कहा जाता है-बाप-समान कर्मातीत स्थिति।* प्रैक्टिस करो अभी-अभी कर्मयोगी, अभी-अभी कर्मातीत स्टेज।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं डबल लाइट फरिश्ता हूँ"*

 

  अपने को सदा डबल लाइट अनुभव करते हो? *डबल अर्थात् फरिश्ता और फरिश्ते की निशानी है - उनका कोई भी देह और देहधारियों से रिश्ता नहीं अर्थात् मन का लगाव नहीं। तो सदा फरिश्ते होकर हर कार्य करते हो? क्योंकि फरिश्तों का पाँव सदा ही ऊंचा रहता है, धरनी पर नहीं रहता। धरनी से ऊंचा अर्थात् देह-भान की स्मृति से ऊंचा।* ऐसे फरिश्ते बने हो? देह और देह की दुनिया दोनों का अनुभव अच्छी तरह से कर लिया है ना?

 

  तो जब अनुभव कर लिया तो अनुभव करने के बाद अभी फिर से देह व देह की दुनिया में बुद्धि जा सकती है? *देह और देह की दुनिया की स्मृति से ऊंचा रहने वाले फरिश्ते बनो। फरिश्ते अर्थात् सर्व बन्धनों से मुक्त। तो सब बन्धन समाप्त हुए या अभी समाप्त करेंगे? दुनिया वालों को तो कहते हो कि 'अब नहीं तो कब नहीं'।* यह पहले अपने को कहते या दूसरों को ही?

 

  दूसरों को कहना अर्थात् पहले अपने को कहना। जब किसी से बात करते हो तो पहले कौन सुनता है? पहले अपने कान सुनते हैं ना। *तो किसी को भी कहना अर्थात् पहले अपने आप को कहना। तो सदा हर कार्य में 'अब' करने वाले आगे बढ़ेंगे। अगर 'कब' पर छोड़ेंगे तो नम्बर आगे नहीं ले सकेंगे, पीछे नम्बर में आयेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सभी अपने को इस समय भी तख्तनशीन आत्माएँ अनुभव करते हो? डबल तख्त है या सिंगल? आत्मा का अकाल

तख्त भी याद है और दिल तख्त भी याद है। अगर अकाल तख्त को भूलते हो तो बॉडी कानशेस में आते हो। फिर परवश हो जाते हो। *सदैव यही स्मृति रखो कि मैं इस समय इस शरीर का मालिक हूँ।* तो मालिक अपनी रचना के वश कैसे हो सकता है?

 

✧  अगर मालिक अपनी रचना के वश हो गया तो मोहताज हो गया ना! तो अभ्यास करो और कर्म करते हुए बीच-बीच में चेक करो कि मैं मालिक-पन की सीट पर सेट हूँ? या नीचे तो नहीं आ जाता? सिर्फ रात को चेक नहीं करो। *कर्म करते बीच-बीच में चेक करो।* वैसे भी कहते हैं कि कर्म करने से पहले सोचो, फिर करो।

 

✧  ऐसे नहीं कि पहले करो, फिर सोची। फिर निरंतर मालिक-पन की स्मृति और नशे में रहेंगे। संगमयुग पर बाप आकर मालिक-पन की सीट पर सेट करता है। *स्वयं भगवान आपको स्थिति की सीट पर बिठाता है। तो बैठना चाहिए ना!* अच्छा। (पार्टियों के साथ)

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ सेकण्ड में बिन्दी स्वरूप बन मन-बुद्धि को एकाग्र करने का अभ्यास बार-बार करो। स्टॉप कहा और सेकण्ड में व्यर्थ देह-भान से मन-बुद्धि एकाग्र हो जाए। ऐसी कण्ट्रोलिंग पावर सारे दिन में यूज करके देखो। *ऐसे नही आर्डर करो - कण्ट्रोल और दो मिनट के बाद कण्ट्रोल हो, ५ मिनट के बाद कण्ट्रोल हो, इसलिए बीच-बीच में कण्ट्रोलिंग पावर को यूज करके देखते जाओ। सेकण्ड में होता है, मिनट में होता है, ज्यादा मिनट में होता है, यह सब चेक करते चलो।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- योगबल से विकारों रूपी रावण पर विजय प्राप्त करना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा ओम शांति ध्वनि किरणों से खींची चली जा रही हूँ... इन किरणों के रास्ते मैं आत्मा पहुँच जाती हूँ मधुबन... जहाँ प्रकृति से, पहाड़ों से, बगीचों से, बाबा के झूले से, चारों और से ओम शांति की ध्वनि गूंज रही है...* बाबा झूले में झूलते हुए दोनों बाँहों को पसारकर मुझे अपने पास बुलाते हैं... मैं आत्मा बाबा की बाँहों में समा जाती हूँ और उनकी गोदी के झूले में बैठ जाती हूँ... मीठे बाबा प्यार से मेरे सिर पर अपना हाथ फेरते हुए मीठी शिक्षाएं देते हैं...

 

   *योगबल से विकारो रुपी रावण दुश्मन पर विजय प्राप्त कर जगतजीत बनने की समझानी देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... सच्चे पिता से सच्चा ज्ञान पाकर सारी उलझनों से मुक्त होकर सदा के विजयी बन मुस्कराओ... *कागज के रावण को नही... मन की जमीन पर विकारो के रावण को जलाओ... और मीठी यादो में सच्चे राजतिलक को पाओ...*

 

_ ➳  *योगेश्वर बाबा की यादों की किरणों से विकारों रूपी रावण के पुतले को भस्म कर गुणों की खुशबू से महकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अज्ञान में सदा बाहर ही रावण को जलाती आई... और भीतर उसे सदा जिन्दा ही पाया... *मीठे बाबा आपने ज्ञान के नेत्र से मुझे विकारो रुपी रावण समझा दिया है... यादो की अग्नि में इसे जलाकर भस्म कर रही हूँ...*

 

   *ज्ञान का शंख बजाकर रावण माया के विकारों रूपी घेरे को तोड़कर मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... सुंदर खिलते हुए फूल बच्चे विकारो के रावण की गिरफ्त में दुखो के जंगल में भटक पड़े हो... *अब योग की अग्नि में इस समूचे जंगल को ही जला दो... और सच्ची विजयपताका लहराओ...* सच्चे सुखो को सितारों से जीवन को सजाओ... विश्व के मालिक बन खिलखिलाओ...

 

_ ➳  *दुःख, अंधकार के साए से दूर होकर खुशियों की बरसात में नहाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा...*मै आत्मा मन के भीतर विकारो के गहरे रावण पर विजय पाकर खूबसूरत जीवन को पाती जा रही हूँ...* मीठे बाबा आपकी यादो में विश्व की राजाई का तिलक सहज ही पाती जा रही हूँ... और अशोक वाटिका में मुस्करा रही हूँ...

 

   *ज्ञान योग के अमृत झरने में पावन बनाकर हीरे जैसे चमकाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *ईश्वरीय यादे ही विकारो के रावण से मुक्त कराने का दम रखती है... और सहज ही विजयी बनाकर विश्व अधिकारी बनाती है...* इन मीठी यादो में अंतर्मन भिगो दो... यह मीठी यादे पारस बनाएंगी सारे दुखो से शोक से मुक्त कराएंगी... खुशियो के आँगन में कदम रखोगे... हर दिल खुशनुमा हो झूम उठेगा...

 

_ ➳  *विकारों की लंका को जलाकर रावण की शोक वाटिका से निकल मुक्त गगन की पंछी बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा आपके मीठी यादो की ऊँगली पकड़कर विकारो के कालेपन से मुक्त होकर... उजली सी दमकती जा रही हूँ... और सच्चा सच्चा दशहरा मना रही हूँ...* अपने पावन स्वरूप को पाकर सदा की विजयी होती जा रही हूँ...

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप समान प्यार का सागर बनना है*"

 

_ ➳  प्यार के सागर अपने प्यारे पिता के प्यार के मीठे मधुर एहसास के बारे में विचार करते ही एक सिहरन सी पूरे शरीर मे दौड़ जाती है और मन व्याकुल हो उठता है फिर से उसी प्यार को पाने के लिए। *जैसे ही मन में बाबा के निःस्वार्थ, निष्काम प्यार को पाने का संकल्प मन मे आता है मैं महसूस करती हूँ जैसे प्यार के सागर मेरे बाबा मेरे हर संकल्प को पूरा करने और अपने स्नेह की मीठी फुहारे मेरे ऊपर बरसाने के लिए मेरे पास आ रहें हैं*। हवाओ में भी जैसे एक विचित्र रूहानी खुशबू फैल गई है जो उनके आने का मुझे पैगाम दे रही है। अपनी अनन्त शक्तियों की किरणों के रूप में मेरे प्यार के सागर बाबा अपने प्यार की शीतल फुहारे मुझ पर बरसाते हुए परमधाम से उतरकर धीरे - धीरे नीचे आ रहें हैं। 

 

_ ➳  मैं महसूस कर रही हूँ जैसे कि शक्तियों का एक तेजोमय पुंज आकाश से नीचे आकर, अब सीधा मेरे सिर के ऊपर स्थित हो गया है और अपने स्नेह की अनन्त किरणे मेरे ऊपर बिखेर रहा है। *बारिश की हल्की - हल्की बूंदों की तरह अपने ऊपर पड़ती अपने स्नेह के सागर पिता के स्नेह की किरणों के वायब्रेशन्स को मैं महसूस कर रही हूँ और उनके स्नेह में डूबती जा रही हूँ*।प्यार का सागर अपना असीम प्यार मुझ पर लुटाता जा रहा है और उस प्यार के मधुर एहसास में मैं गहराई तक समाती जा रही हूँ। देह और देह की दुनिया से जुड़े सम्बन्ध जैसे कहीं पीछे छूट रहें हैं और सारे सम्बन्ध उस एक के साथ जुड़ते जा रहें हैं। *हर सम्बन्ध का अविनाशी सुख अपने प्यारे पिता के प्यार में खोकर मैं ले रही हूँ। उनके लव में लीन यह लवलीन स्थिति मुझे उनके समान स्थिति में स्थित करती जा रही है*।

 

_ ➳  ऐसा लग रहा है जैसे देह से मेरा कोई सम्बन्ध नही। अपने स्वरूप में पूरी तरह डूब कर केवल दो सितारों की उपस्थिति को ही मैं अनुभव कर रही हूँ। एक अति सूक्ष्म चैतन्य स्टार के रुप में मैं स्वयं को देख रही हूँ और अपने सामने स्थित सुपर स्टार के रूप में अपने पिता को देख रही हूँ। *इन दोनों स्टार्स में ही जैसे सारी दुनिया समा गई है। अपने प्यार की अनन्त किरणों की वर्षा मुझ पर करते, प्यार के सागर मेरे सुपर स्टार शिव बाबा चुम्बक की तरह मुझे खींच कर अब अपने साथ ऊपर ले जा रहें हैं*। बाबा की सर्वशक्तियों की मैग्नेटिक पॉवर, नश्वर संसार की हर चीज से किनारा करवाकर मुझे खींचती हुई अब आकाश को पार कर, सूक्ष्म लोक से ऊपर मेरे स्वीट साइलेन्स होम में मुझे ले आई है। *अपने घर मे आकर मैं आत्मा शांति की गहन स्थिति का अनुभव कर रही हूँ*।

 

_ ➳  इस शांतिधाम घर मे चारों और फैले शांति के वायब्रेशन्स मुझे गहन शांति की अनुभूति करवाकर एक अनोखी शक्ति का संचार मेरे अन्दर कर रहें हैं। *साइलेन्स का बल अपने अंदर भरकर अब मैं सर्वगुणों और सर्वशक्तियों के सागर अपने प्यारे पिता के पास आकर बैठ गई हूँ और बड़े प्यार से उन्हें निहार रही हूँ*। मैं महसूस कर रही हूँ जैसे बाबा भी बड़े प्यार से मुझे निहार रहें हैं और अपना प्यार शीतल लहरों के रूप में धीरे - धीरे मुझ तक पहुँचा रहें हैं। बाबा के अथाह प्यार की शीतल लहरों की शीतलता मन को गहन सुख प्रदान कर रही है। धीरे - धीरे ये लहरे बढ़ रही हैं और मुझे अपने अंदर समाती जा रही हैं। 

 

_ ➳  प्यार के सागर मेरे पिता के प्यार की लहरों का प्रवाह मुझे बहा कर अपने बिल्कुल समीप ले आया है। जहाँ पहुँच कर ऐसा लग रहा है जैसे प्यार का कोई सतरंगी झरना मेरे ऊपर बरस रहा है और उस झरने के नीचे खड़ी होकर मैं स्नान करके प्यार के सागर अपने पिता के समान बनती जा रही हूँ। *नफरत, ईर्ष्या, द्वेष, घृणा के पुराने स्वभाव संस्कार जैसे प्यार के सागर की गहराई में डूब गए हैं और उसके स्थान पर सबको प्रेम देने, सहयोग देने के संस्कार जैसे इमर्ज हो गए हैं*। स्वयं को मैं बाप समान प्यार का सागर अनुभव कर रही हूँ। अपने प्यारे पिता के साथ स्नेह मिलन मनाकर, उनके समान बन कर अब मैं वापिस साकारी दुनिया में लौट आती हूँ और अपने साकार तन में फिर से भृकुटि के अकालतख्त पर आकर विराजमान हो जाती हूँ। 

 

_ ➳  *प्यार के सागर अपने पिता से प्राप्त किये हुए प्यार का मधुर एहसास मेरी शक्ति बनकर अब मुझे भी बाप समान प्यार का सागर बन सबको सच्चा रूहानी प्यार देने के लिए प्रेरित करता रहता है इसलिए अपने प्यारे पिता के प्यार से स्वयं को हरपल भरपूर रखते हुए अब मैं अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली हर आत्मा को आत्मिक स्नेह देकर उन्हें तृप्त करती रहती हूँ*

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सेवा की लगन द्वारा लौकिक को अलौकिक प्रवृति में परिवर्तन करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं निरन्तर सेवाधारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव अपने संस्कारों को दिव्य बनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा मन-बुद्धि को बाप के आगे समर्पित कर देती हूँ  ।*

   *मैं दिव्य आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *अभी से विदेही स्थिति का बहुत अनुभव चाहिए। जो भी परिस्थितियां आ रही हैं और आने वाली हैं उसमें विदेही स्थिति का अभ्यास बहुत चाहिए।* इसलिए और सभी बातों को छोड़ यह तो नहीं होगायह तो नहीं होगा। क्या होगाइस क्वेश्चन को छोड़ दो। *विदेही अभ्यास वाले बच्चों को कोई भी परिस्थिति वा कोई भी हलचल प्रभाव नहीं डाल सकती।* चाहे प्रकृति के पांचों ही तत्व अच्छी तरह से हिलाने की कोशिश करेंगे परन्तु विदेही अवस्था की अभ्यासी आत्मा बिल्कुल ऐसा अचल-अडोल पास विद आनर होगा जो सब बातें पास हो जायेंगी लेकिन वह ब्रह्मा बाप के समान पास विद आनर का सबूत रहेगा।

 

 _ ➳  बापदादा समय प्रति समय इशारे देते भी हैं और देते रहेंगे। आप सोचते भी होप्लैन बनाते भी होबनाओ। भले सोचो लेकिन क्या होगा!... उस आश्चर्यवत होकर नहीं। *विदेही, साक्षी बन सोचो लेकिन सोचा, प्लैन बनाया और सेकण्ड में प्लैन स्थिति बनाते चलो।* अभी आवश्यकता स्थिति की है। *यह विदेही स्थिति परिस्थिति को बहुत सहज पार कर लेगी। जैसे बादल आयेचले गये।* और विदेही, अचल-अडोल हो खेल देख रहे हैं। *अभी लास्ट समय को सोचते हो लेकिन लास्ट स्थिति को सोचो।*    

 

✺   *ड्रिल :-  "लास्ट स्थिति के लिए विदेही स्थिति का अभ्यास करना"*

 

 _ ➳  आज जब मैं आत्मा बाबा को याद कर रही थी तो बाबा ने अनुभव कराया कि बच्चे जब से तुम्हारा नया जन्म हुआ ये मरजीवा जन्म हुआ है तब से *अपने को विदेही आत्मा अनुभव करने का बहुत काल का अनुभव चाहिए...* मैं आत्मा बाबा की याद में विदेही बनती जा रही हूँ... देह का भान भूलता जा रहा है... मैं एकदम हल्की हो चुकी हूँ...

 

 _ ➳  जैसे जैसे मैं आत्मा आगे बढ़ती जा रही हूँ तो देख रही हूँ कि *जब तक बहुत काल का विदेही स्थिति का अनुभव नही होगा तो अंत में आत्मिक स्थिति का अनुभव नही कर पाएंगे...* और हलचल में आ जाएंगे... फिर मैं बाबा की याद में विदेही होती जा रही हूँ...

 

 _ ➳  फिर मैं आत्मा ये फील कर रही हूँ कि जो भी परिस्थिति या हलचल आ रही है या आने वाली है उन्हें मैं विदेही स्थिति से पार करती जा रही हूँ... बाबा भी मेरे साथ है हम दोनों का एक अटूट कनेक्शन है... *मैं आत्मा और सब बातों को छोड़ कि क्या होगा कैसे होगा आगे बढ़ती जा रही हूँ*... इस देह ओर देह के संबंधों को भूलतीं जा रही हूँ...

 

 _ ➳  मुझ आत्मा का विदेही पन का बहुत काल का अभ्यास हैं... जिसके कारण कोई भी परिस्थिति और हलचल का मुझ आत्मा पर कोई प्रभाव नही पड़ रहा है... बस मैं आत्मा बाबा की याद में मग्न हूँ... *मैं आत्मा देख रही हूँ कि प्रकृति के पांचों तत्व अपने विनाशी स्वरूप में हैं फिर भी मैं आत्मा विदेही बन सब साक्षी होकर देख रही हूँ*... और प्रकृति के पांचो तत्वों को सकाश दे रही हूँ.. और इस हलचल की स्थिति में भी मुझ आत्मा पर कोई प्रभाव नही पड़ रहा है...

 

 _ ➳  विदेही स्थिति में बाबा के सूक्ष्म इशारे मुझे अनुभव हो रहे है... और इन इशारों से मैं आत्मा और आत्माओं के साथ प्लान बना रही हूँ... और अचल अडोल स्थिति बनती जा रही है... *मैं आत्मा आश्चर्यवत नही हूँ कि ये क्या हो रहा है क्यों हो रहा है... क्योंकि बाबा ने पहले की ड्रामा के राज को स्पष्ट किया है... आदि से अंत तक का ज्ञान मुझ आत्मा में है*... और हर सेकेण्ड बाबा की याद से विदेही बनती जा रही हूँ... और जो भी परिस्थिति मेरे सामने आती जा रही हैं उसे मैं आत्मा ड्रामा के एक सीन की तरह देखते आगे बढ़ती जा रही हूँ... मैं आत्मा देख रही हूँ कि ये अंतिम समय है... प्रकृति अपने विनाशी स्वरूप में है... खून की नदियां बह रही है... लेकिन *मैं आत्मा अपने लास्ट स्टेज अपने फ़रिश्ता स्वरूप में ये सब देख रही हूँ...और उड़कर बाबा के गोद में समा चुकी हूँ*...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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