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 14 / 11 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सबको मुक्ति जीवनमुक्ति का रास्ता बताया ?*

 

➢➢ *देहि अभिमानी बनने की तपस्या की ?*

 

➢➢ *दिब्य गुणों के आह्वान द्वारा सर्व अवगुणों को आहुति दी ?*

 

➢➢ *स्वमान की सीट पर सदा सेट रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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〰✧  बीच-बीच में संकल्पों की ट्रैफिक को स्टॉप करने का अभ्यास करो। *एक मिनट के लिए संकल्पों को, चाहे शरीर द्वारा चलते हुए कर्म को रोककर बिन्दू रुप की प्रैक्टिस करो। यह एक सेकेण्ड का भी अनुभव सारा दिन अव्यक्त स्थिति बनाने में मदद करेगा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बाप की छत्रछाया में रहने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  *बाप की छत्रछाया में रहने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ - यही अनुभूति होती है। जो अभी छत्रछाया में रहते, वही छत्रधारी बनते हैं।*

 

  *तो छत्रछाया में रहने वाली भाग्यवान आत्मा हूँ - यह खुशी रहती है ना। छत्रछाया ही सेफ्टी का साधन है।*

 

  *इस छत्रछाया के अन्दर कोई आ नहीं सकता। बाप की छत्रछाया के अन्दर हूँ - यह चित्र सदा सामने रखो।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  ज्ञाता तो नम्बरवन हो गये हैं, *सिर्फ एक बात में अलबेले बन जाते हो, वो है - 'स्व को सेकण्ड में व्यर्थ सोचने, देखन, बोलने और करने में फुलस्टॉप लगाकर परिवर्तन करना।* समझते भी हो कि यही कमजोरी सुख की अनुभूति में अन्तर लाती है, शाक्ति स्वरूप बनने में वा बाप समान बनने में विघ्न स्वरूप बनती है फिर भी क्या होता है? स्वयं को परिवर्तन नहीं कर सकते, फुलस्टॉप नहीं दे सकते।

 

✧  ठीक है, समझते हैं - का कॉमा (,) लगा देते हैं, वा दूसरों को देख आश्चर्य की निशानी(!) लगा देते हो कि ऐसा होता है क्या! ऐसा होना चाहिए! वा क्वेचन मार्क की क्यू (लाइन) लगा देते हो, क्यों की क्यू लगा देते हो। फुलस्टॉप अर्थात बिन्दु (.)। तो *फुलस्टॉप तब लग सकता है जब बिन्दु स्वरूप बाप और बिन्दु स्वरूप आत्मा - दोनों की स्मृति हो।* यह स्मृति फुलस्टॉप अर्थात बिन्दु लगाने में समर्थ बना देती है।

 

✧  उस समय कोई-कोई अन्दर सोचते भी हैं कि मुझे आत्मिक स्थिति में स्थित होना है लेकिन माया अपनी स्क्रीन द्वारा आत्मा के बजाय व्यक्ति वा बातें बार-बार सामने लाती है, जिससे आत्मा छिप जाती है और बार-बार व्यक्ति और बातें सामने स्पष्ट आती हैं। तो मूल कारण *स्व के ऊपर कन्ट्रोल करने की कन्ट्रलिंग पॉवर कम है।* दूसरों को कन्ट्रोल करना बहुत आता है लेकिन स्व पर कन्ट्रोल अर्थात परिवर्तन शक्ति को कार्य में लगाना कम आता है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  ब्राह्मणों को त्रिमूर्ति शिव वंशी कहते हो ना? त्रिमूर्ति बाप के बच्चे स्वयं भी त्रिमूर्ति हैं। बाप भी त्रिमूर्ति है। जैसे बाप त्रिमूर्ति है वैसे आप भी त्रिमूर्ति हो? *तीन प्रकार की लाइट्स साक्षात्कार की आती हैं? वह मालूम है कौन-सी हैं जो ब्राह्मणों के तीन प्रकार की लाइट्स साक्षात्कार होते रहते हैं?* आप लोगों से लाइट का साक्षत्कार होता मालूम पड़ता है? त्रिमूर्तिवंशी त्रिमूर्ति बच्चों की तीन प्रकार की लाइट्स का साक्षत्कार होता है। वह कौन-सी लाइट्स हैं? *एक तो लाइट का साक्षत्कार होता है नयनों से। कहते हैं ना कि नयनों की ज्योति! नयन ऐसे दिखाई पड़ेगे जैसे नयनों में दो बड़े बल्ब जल रहे हैं। दूसरी होती है मस्तक की लाइट। तीसरी होती है माथे पर लाइट का क्राउन।* अभी यह कोशिश करना है जो तीनों ही लाइट्स का साक्षात्कार हो।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सच्चे-सच्चे राजऋषि बनना*

 

_ ➳  मैं ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण कुलभूषण आत्मा... चमकीला प्रकाश का शरीर धारण कर... इस हद की दुनिया से निकल बेहद की दुनिया में बेहद बाबा के पास पहुँच जाती हूँ... *ऊँचे बादलों की पहाड़ी पर बैठे बापदादा अपनी सफ़ेद प्रकाश की चमकीली आभा से पूरे वतन को प्रकाशित कर रहे हैं...* बापदादा मुस्कुराते हुए मुझे अपने पास बुलाते हैं... मैं बाबा के सम्मुख बाबा को निहारती हुई बैठ जाती हूँ... *बाबा मुझे अपनी दृष्टि से निहाल कर रहे हैं... और मीठी शिक्षाओं से मेरा भाग्य बना रहे हैं...*

 

  *राजयोग सिखाकर राजऋषि बनाकर विश्व की राजाई के सुखों से भाग्य को सजाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे बच्चे... *तुम्हारे जैसा खुशनसीब इस पूरे जहान में नही मिलेगा... भगवान की पसन्द हो राजऋषि हो...* ईश्वर सम्मुख आ बैठा है... और सामने बैठ राजयोग सिखा रहा... और यही राजयोग सुखो को कदमो में बिछा देगा... जीवन खूबसूरती से महका देगा...

 

_ ➳  *वरदानों की बरसात में खजानों से मालामाल होकर मयूर बन नाचती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा... कितने प्यारे से भाग्य की मल्लिका हूँ... *ईश्वर पिता की पसन्द हूँ... उसके सम्मुख हूँ... राजयोग सीख रही हूँ... और सारे सुख पिता से अपनी झोली में डलवा सदा की अमीर हो रही हूँ...*

 

  *विनाशी सुखों से न्यारा बनाकर स्वराज्य और विश्व राज्य का अधिकारी बनाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे.... संसार के अल्पकाल के सुख दुनिया के पास हो सकते है पर मेरे बच्चों जैसे सुख तो उनके नसीब में नही... *यहाँ कर्मेन्द्रियों पर राज कर राजऋषि बनते हो सतयुगी दुनिया में अथाह सुखो पर राज्य करते हो...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपने भाग्य के दामन को दिव्य सुखों के सितारों से सजाती हुई कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा... *आपकी यादो में राजऋषि बन रही हूँ सच्चे सुखो से दामन भर रही हूँ...* सदा की खूबसूरत और प्यारी बन रही हूँ... और सुंदर भाग्य से राजरानी बन रही हूँ...

 

  *मेरे बाबा ज्ञान रत्नों की दौलत लुटाकर अपने मखमली वरदानी हाथ मेरे सिर पर रखते हुए कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे बच्चे... मेरे खूबसूरत भाग्य से भरे बच्चों का कही कोई सानी नही... *विश्व पिता धरती पर उतर राजयोग सिखला रहा... सदा का विश्व महाराजन बना रहा...* और अनन्त सुख और खुशियां बाँहो में दिला रहा... सजा रहा संवार रहा...

 

_ ➳  *मैं आत्मा मायाजीत बन बाबा के दिलतख़्त पर बैठ अपने भाग्य पर इठलाती हुई कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मुझ आत्मा का भाग्य ही खिल गया... मेरा प्यारा बाबा तो मुझे मिल गया... *जनमो की प्यास बुझ गयी... और मै आत्मा ईश्वरीय वरदानों से सज गयी... सारी खुशियां बाँहो में भर मै आत्मा मुस्कराने लगी हूँ...*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- इस पुरानी छी - छी दुनिया से बेहद का वैरागी बनना है*"

 

_ ➳  बेहद की वैराग्य वृति को धारण कर, विकारों का सन्यास करके ही आत्मा रूपी सीता अपने प्रभु राम से मिल सकती है, *मन ही मन यह विचार करती मैं आत्मा सीता उस समय को याद करती हूँ जब तक मेरे प्रभु राम मुझे नही मिले थे*। पाँच विकारों रूपी रावण की जेल में कैद मैं आत्मा सीता कैसे अपने प्रभु राम के वियोग में तड़प रही थी। 

 

_ ➳  मेरा जीवन पिंजड़े में बन्द उस पंछी के समान बन गया था जो इस बात का कभी अनुभव ही नही कर पाता कि आजाद हो कर उड़ने में कितना आनन्द समाया है? अपने प्रभु राम का पता पाने के लिए मैं कितनी व्याकुल थी। कोई भी मुझे उनका पता बताने वाला नही था। *किंतु मेरे प्रभु राम, मेरे दिलाराम शिव पिता परमात्मा ने स्वयं आ कर ना केवल मुझे रावण की कैद से छुड़ाया बल्कि विकारों रूपी रावण ने जो मेरे पंख काट दिए थे वो ज्ञान और योग के पंख लगा कर मुझे उड़ना भी सिखाया*। इस उड़ने में जो परमआनन्द समाया है उसे मैं जब चाहे तब अनुभव कर सकती हूँ। 

 

_ ➳  ज्ञान और योग के पंख लगा कर मैं आत्मा सीता जब चाहे अपने प्रभु राम से मिलन मनाने जा सकती हूँ। *यही चिंतन करते - करते मैं आत्मा रूपी सीता विदेही बन देह रूपी पिंजड़े को छोड़ इससे बाहर निकल आती हूँ और चल पड़ती हूँ ऊँची उड़ान भरते हुए अपने प्रभु राम के पास*। सेकण्ड में पाँच तत्वों से बनी साकारी दुनिया को पार कर, उससे परे सूक्ष्म वतन को भी पार कर मैं पहुंच जाती हूँ अपनी निराकारी दुनिया परमधाम में।

 

_ ➳  अब मैं परमधाम में अपनी निराकारी स्थिति में स्थित हो, बिंदु बन, अपने बिंदु शिव बाबा के साथ मिलन मना रही हूँ। मेरे शिव पिता से आ रही अनन्त सर्वशक्तियों की किरणें मुझ बिंदु आत्मा पर पड़ रही हैं। इन किरणों के पड़ने से मैं आत्मा एकदम हल्की होती जा रही हूँ। *मेरा स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली व चमकदार बनता जा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे मेरे प्रभु राम ने सर्वशक्तियों को समाने की ताकत मुझे दे दी हो*। अपने प्रभु राम की सर्वशक्तियों को स्वयं में समा कर मैं शक्तियों का पुंज बनती जा रही हूँ। परमात्म लाइट मुझ में समा कर मुझे लाइट माइट स्वरूप में स्थित करती जा रही हैं । 

 

_ ➳  अपने प्रभु राम के साथ मिलन मना कर परमात्म शक्तियों से मैं भरपूर हो चुकी हूँ। बेहद की वैरागी बन, विकारों का सन्यास करने का बल मेरे शिव पिता ने मेरे अंदर भर दिया है। *इस बल को अपने साथ लिए, शक्तिशाली बन अब मैं आत्मा वापिस साकारी दुनिया की ओर प्रस्थान करती हूँ*। साकारी दुनिया मे अपने साकारी तन में वापिस भृकुटि के भव्य भाल पर आ कर मैं विराजमान हो जाती हूँ। 

 

_ ➳  मेरे शिव पिता परमात्मा का बल अब मुझे बेहद का वैरागी बनने और विकारों का सन्यास करने की शक्ति दे रहा है। देह, देह की दुनिया और देह के सम्बन्धों से मैं नष्टोमोहा बनती जा रही हूँ। *मेरे शिव पिता से मिल रहा पवित्रता का बल मुझे विकारों के ऊपर विजयी बनने में मदद कर रहा है और विकारों का सन्यास करवा कर मुझे विकर्माजीत बना रहा है*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं दिव्य गुणों का आव्हान करने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं सर्व अवगुणों की आहुति देने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं सन्तुष्ट आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा स्वमान की सीट पर सदा सेट रहती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा दृढ़ संकल्प की बेल्ट को अच्छी तरह से बांध लेती हूँ  ।*

✺   *मैं स्वमानधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  सिर्फ एक बात याद रखना कि सेवा और स्व-उन्नति के बैलेन्स में अन्तर नहीं आवे प्लैन प्रैक्टिकल करने के बाद यह नहीं कहना कि सर्विस में बिजी हो गये ना इसलिए स्व-उन्नति में अन्तर आ गया - यह नहीं कहना। दोनों का बैलेन्स सदा रखना। क्यों? *दूसरों की सेवा करो और स्व की सेवा नहीं तो यह अच्छा नहीं। दोनों का बैलेन्स रखना ही सफलता है*। समझा। अच्छा।

 

✺   *ड्रिल :-  "सेवा और स्व-उन्नति का बैलेन्स रखना"*

 

 _ ➳  सेवा और स्व उन्नति का बैलेंस रखने वाली मैं स्व परिवर्तक सो विश्व परिवर्तक आत्मा हूँ। *स्वयं के परिवर्तन द्वारा विश्व का परिवर्तन करने की ईश्वरीय सेवा अर्थ बाबा ने मुझे यह संगमयुगी ब्राह्मण जीवन गिफ्ट किया है।* इस बात को स्मृति में लाकर मैं अपने प्यारे मीठे शिव बाबा की याद में अशरीरी हो कर जैसे ही बैठती हूँ। ऐसा अनुभव होता है जैसे मेरे मीठे प्यारे बाबा के प्रकाश की रश्मियां मुझे बुला रही हैं। मेरा आह्वान कर रही हैं। *ऐसा लग रहा है जैसे कोई मुझे ऊपर की ओर खींच रहा है।* 

 

 _ ➳  प्रभु प्यार की किरणों के खिंचाव से मैं आत्मा स्वयं को सम्पूर्ण स्वच्छ और शक्तिशाली बनाने के लिए धीरे - धीरे वतन की ओर बढ़ रही हूँ। *ज्ञानसूर्य शिव बाबा से आ रहा प्रकाश मुझे उन तक पहुंचने का रास्ता दिखा रहा है*। सूर्य के प्रकाश से भी अधिक शक्तिशाली ये किरणे मुझे अपने वास्तविक स्वभाव और संस्कार की अनुभूति कराने के लिए उस ज्योति के देश में खींच रही है।

 

 _ ➳  फरिश्तों की दुनिया को पार करते हुए मैं जा रही हूं उस प्रकाश देश मे, उस ज्योति के देश मे जहां मेरे शिव पिता परमात्मा अपनी किरणों रूपी बाहों को फैलाये मेरे स्वागत के लिए खड़े हैं। उनकी किरणों रूपी बाहों में समाकर अब मैं उनके बिल्कुल समीप पहुंच गई हूं। *बस मैं और मेरा बाबा। परम प्रकाशमय बाबा के प्रकाश की एक - एक किरण मुझ आत्मा के अनेक जन्मों के नकारात्मक स्वभाव संस्कार को धोकर मुझे शुद्ध बना रही है।* शक्तियों का प्रकाश मुझ आत्मा के चारो ओर बढ़ रहा है । प्रकाश का यह फ्लो मुझे फ्लालेस बना रहा है। मेरी कमजोरियां निकल रही हैं और मेरे अंदर शक्तियों का संचार हो रहा है। मैं बेदाग हीरा बन रही हूं।

 

 _ ➳  पवित्र, शुद्ध, ज्ञान प्रकाश स्वरूप में मैं आत्मा अनेकों को रास्ता दिखाने के लिए अब मूल वतन से फरिश्तो के वतन में प्रस्थान कर रही हूं। मेरे साथ - साथ मेरे मीठे प्यारे बाबा भी अव्यक्त वतन में चल रहे हैं। इस अव्यक्त वतन में मेरा सम्पूर्ण फरिश्ता स्वरूप मेरे सामने खड़ा है। *अपने इस सम्पूर्ण फरिश्ता स्वरूप में मैं प्रवेश कर जाती हूँ। मेरे मीठे प्यारे शिव बाबा भी अव्यक्त ब्रह्मा के सम्पूर्ण अव्यक्त फरिश्ता स्वरूप में प्रवेश कर जाते हैं*। बापदादा की दृष्टि मुझ फ़रिश्ते पर पड़ रही है। बाबा के साथ - साथ मीठी प्यारी मम्मा, एडवांस पार्टी की अनेक आत्मायें भी मुझे दृष्टि दे रही हैं।

 

 _ ➳  मेरा एक हाथ बाबा के हाथ मे है और दूसरा हाथ मम्मा के हाथ मे है। बाबा मम्मा का रूहानी प्यार सूक्ष्म सेवा के लिए मुझमें उत्साह और बल भर रहा है। समस्त विश्व की सेवा हेतू अब मैं फरिश्ता विश्व ग्लोब पर पहुंच गया हूँ। *मेरा बुद्धि का कनेक्शन बाबा के साथ जुटा हुआ है जिससे बाबा की सर्वशक्तियाँ मुझ में संचारित हो रही हैं और मुझ से होती हुई सारे विश्व मे फैल रही हैं*। परमात्म प्रकाश के स्वरूप में विश्व की एक - एक आत्मा को परमात्मा के आने का संदेश मिल रहा है। विश्व की सर्व आत्माओं को परमात्म सन्देश पहुंचा कर मैं फरिश्ता साकारी दुनिया की ओर बढ़ रहा हूँ।

 

 _ ➳  अपने फरिश्ता स्वरुप को अपने ब्राह्मण स्वरूप में मर्ज करके अब मैं ब्राह्मण आत्मा बाबा की याद से अपने हर संकल्प, बोल और कर्म को ऐसा श्रेष्ठ बना रही हूं जो मेरा हर संकल्प, बोल और कर्म सहज ही औरों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन रहा है। *परमात्म याद में रहने से मनसा, वाचा, कर्मणा तीनो रूपो से शक्तिशाली बन सेवा के क्षेत्र में मैं सहज ही सफलता प्राप्त कर रही हूं*। सेवा और स्व उन्नति का बैलेंस मुझे स्वयं के साथ - साथ सर्व का कल्याणकारी बना कर सर्व की, और परमात्म दुआओं की अधिकारी आत्मा बना रहा है।

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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